मध्यलोक में ढ़ाई द्वीप के सिद्ध क्षेत्रों को वन्दन ।
जम्बूद्वीप सुभरत क्षेत्र के तीर्थक्षेत्रों को वन्दन ।।
श्री कैलाश आदि निर्वाण भूमियों को मैं करूँ नमन ।
श्रद्धा भक्ति विनयपूर्वक हर्षित हो करता पूजन ।।
शुद्ध भावना यही हृदय में मैं भी सिद्ध बनूँ भगवन ।
रत्नत्रय पथ पर चलकर मैं नाशूँ चहुँ गति का क्रन्दन ।।
ॐ ह्रीं श्री समस्त सिद्ध क्षेत्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री समस्त सिद्ध क्षेत्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री समस्त सिद्ध क्षेत्र ! अत्र मम् सन्निहितो भव भव वषट् ।
ज्ञान स्वभावी निर्मल जल का सागर उर में लहराता ।
फिर भी भव सागर भंवरों में जन्म मरण के दुःख पाता ।।
श्री सिद्धक्षेत्रों का दर्शन पूजन वन्दन सुखकारी ।
जो स्वभाव का आश्रय लेता उसको है भव दुख हारी ।।
ॐ ह्रीं श्री समस्त सिद्धक्षेत्रेभ्यो जन्म-जरा-मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
ज्ञान स्वभावी शीतलतामय चंदन निज में भरा अपार ।
फिर भी भव दावानल में जल बहु दुख पाया बारम्बार ।।श्री.।।
ॐ ह्रीं श्री समस्त सिद्धक्षेत्रेभ्यो संसार ताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।
ज्ञान स्वभावी उज्ज्वल अक्षत पुंज हृदय में भरे अटूट ।
फिर भी अविनाशी अखंड होकर भी पा न सका निज कूट ।।श्री.।।
ॐ ह्रीं श्री समस्त सिद्धक्षेत्रेभ्यो अक्षयपंद प्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।
ज्ञान स्वभावी दिव्य सुगन्धित पुष्पों का निज में उपवन ।
फिर भी भव माया में पड़ निष्काम न बन पाया भगवन् ।।श्री.।।
ॐ ह्रीं श्री समस्त सिद्धक्षेत्रेभ्यो कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
ज्ञान स्वभावी सरस मनोरम तृप्ति पूर्ण नैवेद्य स्वयम् ।
फिर भी क्षुधारोग से व्याकुल तृष्णा हुई न तिलभर कम ।।श्री.।।
ॐ ह्रीं श्री समस्त सिद्धक्षेत्रेभ्यो क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
ज्ञान स्वभावी स्व पर प्रकाशी केवलरवि निज में अनुपम ।
फिर भी अघमय अंधियारे में भटका मिटा न मिथ्यातम ।।श्री.।।
ॐ ह्रीं श्री समस्त सिद्धक्षेत्रेभ्यो मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
ज्ञान स्वभावी सहजानंदी विमल धूप से हूँ परिपूर्ण ।
फिर भी प्रभो नहीं कर पाया अब तक अष्टकर्म् अरिचूर्ण ।।श्री.।।
ॐ ह्रीं श्री समस्त सिद्धक्षेत्रेभ्यो अष्टकर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
ज्ञान स्वभावी शिवफलधारी अविकारी हूँ सिद्ध स्वरूप ।
फिर भी भव अटवी में अटका होकर मैं त्रिभुवन का भूप ।।श्री.।।
ॐ ह्रीं श्री समस्त सिद्धक्षेत्रेभ्यो मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
ज्ञान स्वभावी चिदानन्द चैतन्य अनन्त गुणों से पूर ।
फिर भी पद अनर्घ ना पाया रह कर निज परिणति से दूर ।।श्री.।।
ॐ ह्रीं श्री समस्त सिद्धक्षेत्रेभ्यो अनर्घ पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
तीर्थंकर ऋषि आदि मुनि गये जहाँ निर्वाण ।
उन क्षेत्रों को वंद्यकर करूँ आत्म कल्याण ।।
जम्बूद्वीप धातकी खण्ड अरु पुष्करार्द्ध में क्षेत्र विदेह ।
पंच भरत अरु पंच ऐरावत तीर्थ क्षेत्र बन्दूँ धर नेह ।।
तीन लोक के सकल तीर्थ निर्वाण क्षेत्र सविनय वन्दूँ ।
सिद्ध अनन्तानन्त विराजित सिद्धशिला नित प्रति वन्दूँ ।।
अष्टापद कैलाशशिखर पर ऋषभदेव के पद वन्दूँ ।
बाली महाबाली मुनि नागकुमार आदि मुनिवर वन्दूँ ।।
श्री सम्मेदशिखर पर्वत पर बीस तीर्थंकर वन्दूँ ।
अजितनाथ सम्भव, अभिनन्दन, सुमति, पद्म प्रभु को वन्दूँ ।।
श्री सुपार्श्व चन्द्रप्रभ स्वामी, पुष्पदन्त, शीतल वन्दूँ ।
प्रभु श्रेयान्स, विमल, अनन्त जिन, धर्म, शान्ति, कुन्थु वन्दूँ ।।
श्री अर, मल्लि, मुनिसुव्रत, नमिजिन, पार्श्वनाथ प्रभु को वन्दूँ ।
मुनि अनन्त निर्वाण गये जो, उनके चरणाम्बुज वन्दूँ ।।
चम्पापुर में वासुपूज्य तीर्थंकर को सादर वन्दूँ ।
श्री मंदारगिरि से मुक्त हुए मुनियों के पद वन्दूँ ।।
श्री गिरनार नेमि प्रभु शंबु प्रदुम्न अनिरुद्ध आदि वन्दूँ ।
कोटि बहत्तर सात शतक मुनि मुक्त हुए उनको वन्दूँ ।।
पावापुर में महावीर अन्तिम तीर्थंकर को वन्दूँ ।
क्षेत्र गुणावा गौत्तम स्वामी के पद कमलों को वन्दूँ ।।
तुन्गीगिरी श्री रामचन्द्र, हनुमान् गवय, गवाक्ष वन्दूँ ।
महानील, सुग्रीव, नील मुनि निन्यानवे कोटि वन्दूँ ।।
शत्रुन्जय पर आठ कोटि मुनियों के चरणाम्बुज वन्दूँ ।
भीम युधिष्ठिर अर्जुन पांडव और द्रविड़ राजा वन्दूँ ।।
श्री गजपंथ शैल पर मैं बलभद्र सप्त के पद वन्दूँ ।
आठ कोटि मुनि मुक्ति गये हैं भाव सहित उनको वन्दूँ ।।
सोनागिरि पर नंग-अनंग कुमार आदि मुनि को वन्दूँ ।
साड़े पाँच कोटि ऋषियों की यह निर्वाण भूमि वन्दूँ ।।
रेवा तट पर रावण के सुत आदि मुनिश्वर को वन्दूँ ।
साड़े पाँच कोटि मुनियों को सादर सविनय अभिनन्दूँ ।।
पावागढ़ पर साड़े पाँच कोटि मुनियों के पद वन्दूँ ।
रामचन्द्र सुत लव, मदनांकुश, लाड़देव के नृप वन्दूँ ।।
तारंगागिरि साड़ेतीन कोटि मुनियों को मैं वन्दूँ ।
श्री वरदत्तराय मुनिसागरदत्त आदि पद अभिनन्दूँ ।।
श्री सिद्धवरकूट सनत, मघवा चक्री दोनों वन्दूँ ।
कामदेव दस आदि ऋषिश्वर साड़ेतीन कोटि वन्दूँ ।।
मुक्तागिरि से साड़े तीन कोटि मुनि मोक्ष गये वन्दूँ ।
पावागिरि पर सुवर्णभद्र आदिक चारों मुनि को वन्दूँ ।।
कोटि शिला से एक कोटि मुनि सिद्ध हुए उनको वन्दूँ ।
देश कलिंग यशोधर नृप के पाँच शतक सुत मुनि वन्दूँ ।।
श्री चूलगिरि इन्द्रजीत अरु कुम्भकरण ऋषिवर वन्दूँ ।
कुन्थलगिरि पर श्री देशभूषण कुलभूषण मुनि वन्दूँ ।।
रेशंदीगिरि वरदत्तादि पंच ऋषियों को मैं वन्दूँ ।
द्रोणागिरि पर गुरुदत्तादिक मुनियों को सविनय वन्दूँ ।।
पंच पहाड़ी राजगृही से मुक्त हुए मुनिवर वन्दूँ ।
चरम केवली जम्बूस्वामी मथुरा मुक्ति भूमि वन्दूँ ।।
पटना से श्री सेठ सुदर्शन मुक्त हुए उनको वन्दूँ ।
कुण्डलपुर से मोक्ष गये श्रीधर स्वामी के पद वन्दूँ ।।
पोदनपुर से सिद्ध हुए श्री बाहुबली स्वामी वन्दूँ ।
भरत आदि चक्रेश्वर मुनियों की निर्वाण धरा वन्दूँ ।।
श्रवण, द्रोण, वैभार, बलाहक, विंध्य, सह्य, पर्वत वन्दूँ ।
प्रवर कुण्डली, विपुलाचल, हिमवान क्षेत्रों को वन्दूँ ।।
तीर्थंकर के सभी गणधरों की निर्वाण भूमि वन्दूँ ।
वृषभसेन आदिक गौत्तम, चौदह सौ उनसठ ऋषि वन्दूँ ।।
कामदेव बलभद्र चक्री जो मुक्त हुए उनको वन्दूँ ।
जल थल नभ से सिद्ध हुए उपसर्ग केवली सब वन्दूँ ।।
ज्ञात और अज्ञात सभी निर्वाण भूमियों को वन्दूँ ।
भूत भविष्यत् वर्तमान की सिद्ध भूमियों को वन्दूँ ।।
मन वच काय त्रियोग पूर्वक सर्व सिद्ध भगवन वन्दूँ ।
सिद्ध स्वपद की प्राप्ति हेतु मैं पाँचों परमेष्ठी वन्दूँ ।।
सिद्ध क्षेत्रों के दर्शन कर निज स्वरूप दर्शन करलूँ ।
शुद्ध चेतना सिंधु नीर पी मोक्ष लक्ष्मी को वर लूँ ।।
सब तीर्थों की यात्रा करके आत्मतीर्थ की ओर चलूँ ।
अजर-अमर अविकल अविनाशी सिद्ध स्वपद की ओर ढलूँ ।।
भाव शुभाशुभ का अभाव कर शुद्धआत्म का ध्यान करूँ ।
राग-द्वेष का सर्वनाश कर मंगलमय निर्वाण वरूँ ।।
ॐ ह्रीं श्री समस्त सिद्धक्षेत्रेभ्यो अनर्घ पद प्राप्तये पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
श्री निर्वाण क्षेत्र का पूजन वंदन जो जन करते हैं ।
समकित का पावन वैभव पा मुक्ति वधू को वरते हैं ।।
इत्याशीर्वादः
Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ २९३ से २९७