श्री समाधि शतक मण्डल विधान | Shri Samadhi Shatak Mandal Vidhan

मङ्गलाचरण

(छंद-अनुष्टुप)

मंगलं पंच परमेष्ठी मंगलं तीर्थंकरं ।
मंगलं शुद्ध चैतन्यं आत्मधर्मोस्तु मंगलं ।।

(छंद-पंचचामर)

वीतराग श्री जिनेन्द्र ज्ञानरूप मंगलं ।
गणधरादि सर्व साधु ध्यान रूप मंगलं ।।
आत्म धर्म विश्वधर्म सार्वधर्म मंगलं ।
वस्तु का स्वभाव ही आनाद्यनंत मंगलं ।।

(छंद-गीतिका)

पंचपरमेष्ठी जिनालय बिम्ब जिनवंदन करूँ।
मात जिनवाणी तथा जिनधर्म वन्दूँ दुख हरूँ ।।
पूज्यपाद आचार्य पद मैं विनय से अर्चन करूँ।
श्री समाधि शतक पढ़कर मोह भ्रमतम को हरूँ ।।
शुद्ध सम्यग्दृष्टि होकर स्वरूपाचरणी बनूँ ।
आत्मतत्त्व स्वरूप समझूँ अनात्मा से नहीं जुड़ूँ।।

(छंद-दोहा)

जयति पंचपरमेष्ठी जिनप्रतिमा जिनधाम ।
जय जगदम्बे दिव्यध्वनि श्री जिनधर्म प्रणाम ।।

पीठिका

(छंद-गीतिका)

पूज्यपाद आचार्यश्री मंगलमयी द्वारा रचित।
प्रभाचंद्राचार्य की टीका मनोहर गुण खचित ।।

यह समाधि शतक अथवा नाम द्वितीय समाधि तंत्र।
कर्मबंधन नाश हित है यही उत्तम श्रेष्ठ मंत्र।।
एकशत अरु पाँच हैं श्लोक इसके ज्ञानमय।
श्लोक टीका ज्ञानवर्धक यही है निज ध्यानमय।।
व्याकरण जैनेन्द्र और समाधि तंत्र स्वज्ञान ऋद्धि।
रचा था इष्टोपदेश सु रची थी सर्वार्थ सिद्धि ।।
शताब्दी षष्टम हुई थी धन्य तुमको प्राप्त कर।
फिर श्री गुरु गए सुरपुर ज्ञान उर में व्याप्त कर।।
भेद ज्ञान महान पाकर सर्वभव बंधन हरूँ।
पूज्यपाद आचार्यपद मैं विनय से वन्दन करूँ ।।
हृदय समता भाव लाऊँ साम्य भावी ही रहूँ।
ज्ञान सागर धार में ही सतत् हे स्वामी बहूँ ।।
प्रभाचंद्राचार्य को भी नमन मेरा बार-बार ।
सभी मुनियों को नमन कर बनूँ स्वामी निर्विकार ।।

(छन्द-वीर)

धन्य समाधितंत्र के कर्त्ता पूज्यपाद आचार्य प्रधान।
करुणा करके भेदज्ञान का दिया दिव्य संदेश महान ।।
टीका लिख मुनि प्रभाचंद ने किया सभी का ही कल्याण।
मैं भी लिखता ग्रंथ समाधि शतक का उत्तम श्रेष्ठ विधान ।।
मंगल कृपा आपकी पाकर करते हम सब आज विधान।
इस विधान का फल हम पाएँ निर्मल वीतराग विज्ञान ।।

(पुष्पांजलिं क्षिपामि)

समुच्चय पूजन

स्थापना

(छंद-रोला)

ग्रंथ समाधि शतक की पूजन भव दुखहारी।
आत्म समाधि प्राप्त होती है शिव सुखकारी ।।
पूज्यपाद आचार्य रचित यह शास्त्र मनोरम।
भेदज्ञान की निधि मिलती है बिना परिश्रम ।।
आत्मत्त्व को शरीरादि से भिन्न जान लूँ।
मोक्षमार्ग श्रम ही सर्वोत्तम श्रेष्ठ मान लूँ ।।
करूं विनय से शास्त्र समाधि शतक की पूजन।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्त कर काटूँ बंधन ।।
सर्व अमंगलहारी सम्यग्दर्शन पाऊँ।
रत्नत्रय तरणी पर चढ़कर शिवपुर जाऊँ।।
यह विधान कर काललब्धि अपनी निज पाऊँ।
स्व-पर विवेक जगा अंतर में समकित लाऊँ ।।

ॐ ह्रीं भेदज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्र अत्र अवतर अवतर संवौषट आह्वाननं ।

ॐ ह्रीं भेदज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं।

ॐ ह्रीं भेदज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्र अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणं।

(पुष्पांजलिं क्षिपामि)

अष्टक

(छंद-ताटंक)

आधि-व्याधि पर की उपाधि से रहित समाधि दशा पाऊँ।
जन्म-जरा मरणादि नाश हित शुद्धभाव जल ही लाऊँ।।
शास्त्र समाधि शतक को पूजूँ करूँ आत्मा का चिन्तन।
आत्म तत्त्व की प्रतीति करके क्षय कर दूँ भव दुख क्रन्दन ।।

ॐ ह्रीं भेदज्ञानप्ररूपकश्रीसमाधिशतकशास्त्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्व. ।

आधि-व्याधि पर की उपाधि से रहित समाधि दशा पाऊँ।
भव आतप का नाश करूँ मैं ध्रुव शीतलता उर लाऊँ ।। शास्त्र. ।।

ॐ ह्रीं भेदज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्व. ।

आधि-व्याधि पर की उपाधि से रहित समाधि दशा पाऊँ।
अक्षय पद की प्राप्ति हेतु उर ज्ञान भाव अक्षत लाऊँ ।। शास्त्र. ।।

ॐ ह्रीं भेदज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अक्षयपदप्राप्ताय अक्षतं निर्वपामीति. ।

आधि-व्याधि पर की उपाधि से रहित समाधि दशा पाऊँ।
कामबाण विध्वंस करूँ मैं महाशील उर में लाऊँ ।। शास्त्र. ।।

ॐ ह्रीं भेदज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्व. ।

आधि-व्याधि पर की उपाधि से रहित समाधि दशा पाऊँ।
क्षुधा रोग विध्वंस करूँ प्रभु परम तृप्त निजपद पाऊँ ।। शास्त्र. ।।

ॐ ह्रीं भेदज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति ।

आधि-व्याधि पर की उपाधि से रहित समाधि दशा पाऊँ।
मोहतिमिर सर्वांश नाशकर सम्यक्ज्ञान पूर्ण पाऊँ।। शास्त्र. ।।

ॐ ह्रीं भेदज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्व. ।

आधि-व्याधि पर की उपाधि से रहित समाधि दशा पाऊँ।
अष्टकर्म विध्वंस करूँ प्रभु शुक्ल ध्यान उर में लाऊँ ।। शास्त्र. ।।

ॐ ह्रीं भेदज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अष्टकर्मविध्वंसनाय धूपं निर्वपामीति ।

आधि-व्याधि पर की उपाधि से रहित समाधि दशा पाऊँ।
महा मोक्षफल परम सुखमयी लाऊँ ज्ञान सुतरु पाऊँ।।
शास्त्र समाधि शतक को पूजूँ करूँ आत्मा का चिन्तन।
आत्म तत्त्व की प्रतीति करके क्षय कर दूँ भव दुख क्रन्दन ।।

ॐ ह्रीं भेदज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय मोक्षफलप्राप्ताय फलं निर्वपामीति ।

आधि-व्याधि पर की उपाधि से रहित समाधि दशा पाऊँ।
पद अनर्घ्य पाने को निर्मल अर्घ्य अष्ट विधिवत् लाऊँ ।।
दिव्य ध्वनि का सार भरा है, ग्रंथ समाधि शतक के मध्य ।
एकमात्र निज ध्रौव्य त्रिकाली का ही हो प्रभु उर में लक्ष्य ।। शास्त्र. ।।

ॐ ह्रीं भेदज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अनर्घ्यपदप्राप्ताय अर्घ्यं निर्वपामीति ।

महार्घ्य

(छंद-वीर)

मैं तो सदा शुद्ध निर्मल चैतन्य चंद्र हूँ ज्योति स्वरूप।
शाश्वत् मुक्ति प्राप्ति में सक्षम मेरा दर्शनज्ञान अनूप।।
ज्ञानस्वभावी होकर भी मैं हो न सका हूँ स्याद्वादी।
अंधा बना विवादों में ही निज मत या परमत वादी ।।
जल में रहकर मगर अगर प्यासा है तो आश्चर्य महान।
सुख समुद्र में रहकर आत्मा प्यासा हैं आश्चर्य प्रधान।।
नाशवान पर्याय दृष्टि का विषय विकारमयी परयोग।
द्रव्य दृष्टि का विषय त्रिकाली ध्रुव आत्मा ही है अवियोग ।।
ज्ञाता-दृष्टा आत्म स्वभाव नहीं अनुभव करता जब जीव।
जड़ अनात्मा में रत होकर बन जाता ज्यों तत्त्व अजीव ।।
जल स्वभाव शीतल संयोग से जल हो जाता ऊष्ण प्रसिद्ध ।
पृथक ऊष्णता के होते ही होता शीतल सहज स्व सिद्ध ।।
महाअर्घ्य अर्पित करता हूँ विनयभाव से हो स्वीकार।
आत्म समाधि सहज मैं पाऊँ हो जाऊँ भव सागर पार।।

ॐ ह्रीं श्रीभेदज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

(छंद-वीर)

मैं अमूर्त्तिक पिंड आत्मा दर्शन-ज्ञान स्वभावी रूप।
अष्ट कर्म संयोगों को पा बना हुआ हूँ मैं विद्रूप ।।
पर में परिवर्तन करने का ही पुरुषार्थ किया अब तक।
ज्ञाता बनने का उपाय यह जीव न कर पाया अब तक।।
पर का कर्त्तापना तथा स्वामित्वपना अरु अहंपना।
अरे बावरे इन्हें छोड़ दे पाले अपना ज्ञानपना।।
ज्ञान स्वरूप धरातल से तू देख अरे निज ध्रुव चैतन्य।
निज को निज पर को पर जानेगा तो हो जायेगा धन्य ।।
सकल वस्तुएँ ज्ञेय जानकर अपना ज्ञान स्वरूप निरख।
ज्ञान-ज्ञेय-ज्ञाता विकल्प तज शाश्वत् आत्म स्वरूप परख ।।
आत्म ज्ञान का सूर्य प्रकाशित होते ही होगा कल्याण।
जो इससे वंचित रहता है वह न कभी पाता निर्वाण।।
निजानंद आनंदकंद आत्मत्व प्राप्ति का ही पुरुषार्थ ।
आज अभी प्रारम्भ करूँगा पाऊँगा निश्चय भूतार्थ ।।
व्यवहाराभासी न बनूँगा ना निश्चयाभासी भगवान।
मात्र भाव भासना करूँगा पाऊँगा समाधि निर्वाण।।

ॐ ह्रीं श्रीभेदज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय जयमाला पूर्णार्घ्य निर्वपामीति ।

आशीर्वाद

(छंद-दोहा)

सिद्ध स्वरूप महान की, जागी उर में चाह।
करूँ विधान महान यह, उर में भर उत्साह ।।
(इत्याशीर्वादः)

अर्ध्यावलि
(1)
अब श्री समाधि-शतक ग्रन्थ की भाषा वचनिका लिखी जाती
है प्रथम मंगलाचरण कहते हैं :-
येनात्माऽबुद्धयतात्मैव परत्वेनैव चापरम्।
अक्षयानंतबोधाय तस्मै सिद्धात्मने नमः ।। 1।।

अर्थ :- जिसके द्वारा आत्मा आत्मा रूप से ही और आत्मा से
भिन्न सर्व जो कुछ पर है सो पररूप से ही जाना गया है उस अविनाशी
अनन्तज्ञान स्वरूप सिद्धात्मा को नमस्कार हो।

1.ॐ ह्रीं अक्षयानन्तबोधरूपसमतास्वरूपाय नमः ।

अक्षयज्ञानस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

जिसके द्वारा आत्मा आत्मरूप जानने में आता।
आत्मा से जो भिन्न सर्व पर रूप मानने में आता।।
उस अक्षय अनंत अविनाशी सिद्धात्मा को करूँ प्रणाम ।
गुण अनंतपति समभावी सर्वज्ञ देव वन्दूँ वसु याम।।
उनके द्वारा कहे गए छह द्रव्यों का मैं ज्ञान करूँ।
आत्म द्रव्य की प्रतीति करके स्वामी सम्यक्ज्ञान करूँ ।।
जीव रु पुद्गल धर्म अधर्म आकाश काल छह द्रव्य पिछान।
आत्म द्रव्य का ज्ञान करूँ मैं हो जाऊँ अरहंत समान।।
सिद्ध स्वरूप प्राप्ति के ही पावन उपाय को लूँ मैं जान।
फिर उसका पालनकर स्वामी पाऊँ सिद्ध स्वपद निर्वाण।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ प्रभु निज पद निर्वाण।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 2 )

इस तरह कहे हुए सिद्ध स्वरूप का व उसकी प्राप्ति के उपाय
का उपदेश करने वाले जो सकलात्मा अर्थात् शरीर सहित अरहंत
परमेष्ठी हैं उनकी स्तुति करते हुए श्री पूज्यपाद भगवान कहते हैं :-
जयन्ति यस्यावदतोऽपि भारती,
विभूतयस्तीर्थ कृतोऽप्यनीहितुः ।
शिवाय धात्रे सुगताय विष्णवे,
जिनाय तस्मै सकलात्मनेनमः ।। 2।।

अर्थ :- तालु ओष्ठ से हम लोगों के समान न बोलते हुए भी
तथा किसी प्रकार की इच्छा न रखते हुए भी जिस तीर्थंकर की वाणी
रूपी विभूतियाँ जयवन्त हैं उस परम कल्याणमयी, सन्मार्गोपदेशक,
सम्यग्ज्ञान रूप, ज्ञानापेक्षा सर्वव्यापक व कर्मों को जीतने वाले सकल
परमात्मा अर्थात् अर्हत को नमस्कार हो।

2. ॐ ह्रीं शिवचैतन्यरूपसमतास्वरूपाय नमः ।

विष्णुस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

बिन इच्छा के ओष्ट तालु बिन खिरती तीर्थंकर वाणी।
वे सर्वज्ञ जिनेश्वर वन्दूँ जो जयवंत पूर्ण ज्ञानी ।।
परम पूज्य कल्याणमयी सन्मार्गोपदेशक श्री अरहंत।
सुगत ज्ञानमय कर्मजयी जिन बार-बार वन्दूँ भगवंत ।।
जीवरु पुद्गल धर्म अधर्म आकाशकाल छहद्रव्य पिछान ।
आत्म द्रव्य का ज्ञान करूँ मैं हो जाऊँ अरहंत समान।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ प्रभु निज पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(3)

सिद्ध तथा अरहंत को नमस्कार रूप मंगलाचरण करके अब
आचार्य अपनी ज्ञानशक्ति को दिखाते हुए आत्मा का स्वरूप कहने की
प्रतिज्ञा करते हैं :-
श्रुतेन लिंगेन यथात्मशक्तिः,
समाहितान्तः करणेन सम्यक् ।
समीक्ष्य कैवल्यसुखस्पृहाणां,
विविक्तमात्मानमथाभिधास्ये ।। ३ ।।

अर्थ :- अब नमस्कार के पीछे मैं शास्त्र के द्वारा, अनुमान रूप
युक्ति के द्वारा तथा एकाग्र मन के द्वारा भली प्रकार जान करके तथा
अनुभव में ले करके अतीन्द्रिय आनंद की वांछा करने वालों के लिए
अन्य सबसे भिन्न आत्मा के स्वरूप को अपनी शक्ति के अनुसार कहूँगा।

3. ॐ ह्रीं अनंतशक्तिरूपसमतास्वरूपाय नमः ।

अनंतज्ञानस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-गीतिका)

शास्त्र से अनुमान से अरु युक्ति से अनुभव करूँ।
एकाग्र होकर आत्मा का ज्ञान अंतर में धरूँ ।।
अतीन्द्रिय आनंद की वांछा हृदय में हो जिसे ।
आत्म बल से अनात्मा का रूप समझाऊँ उसे ।।
इस समाधि शतक उत्तम ग्रंथ का कर स्वाध्याय।
आत्म का अनुभव करूँ मैं करूँ अपनी ही सहाय ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(4)
‘जब शुद्ध आत्मा की इतनी विशेषता कही तो क्या आत्मा के
कई भेद होते हैं’, इस शंका को दूर करने के लिए अब आचार्य आत्मा
के भेदों को बताते हैं :-

बहिरन्तः परश्चेति त्रिधात्मा सर्वदेहिषु ।
उपेयात्तत्र परमं मध्योपायाद्बहिस्त्यजेत् । ।4 ।।
अर्थ :- सर्व प्राणियों में बहिरात्मा, अन्तरात्मा और परमात्मा
इस तरह तीन प्रकार की आत्मा है। उनमें से बहिरात्मपने को छोड़ना चाहिये
और अंतरात्मा रूप उपाय से परमात्मपने का साधन करना चाहिये।

4. ॐ ह्रीं बहिरात्मावस्थारहितसमतास्वरूपाय नमः ।

शाश्वत्स्वरूपोऽहम् ।

(छंद-गीतिका)

सर्व जीवात्मा रहे हैं सदा से बहिरात्मा।
ज्ञान जिनने किया वे ही हुए अन्तर्रात्मा ।।
फिर किया पुरुषार्थ तो वे हो गए परमात्मा।
बहिरात्मापन छोड़ होऊँ आज अन्तर्रात्मा ।।
इसी एक उपाय से हो जाऊँगा परमात्मा ।
फिर न भटकेगा कभी भी कहीं मेरा आत्मा।।
इस समाधि शतक उत्तम ग्रंथ का कर स्वाध्याय ।
आत्मा का अनुभव करूँ मैं करूँ अपनी ही सहाय ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(5)
अब आचार्य आत्मा की अवस्थाओं को लक्षण से प्रकार कहते हैं :-
बहिरात्मा शरीरादौ जातात्मभ्रान्तिरान्तरः ।
चित्तदोषात्मविभ्रान्तिः परमात्माऽतिनिर्मलः ।। 5 ।।

अर्थ :- शरीर, वचन, मन आदि में आत्मा के होने की जिसके
भ्रांति या भ्रम है वह मिथ्यादृष्टि अज्ञानी बहिरात्मा है, संकल्प विकल्प रूप
चित्त तथा रागादि दोषों को आत्मा मानने की भ्रान्ति जिसके नहीं रही
है वह अन्तरात्मा है तथा जो अति शुद्ध व कर्ममलरहित है वह परमात्मा है।

5. ॐ ह्रीं आत्मभ्रांतिरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

निर्मलस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-गीतिका)

मन-वचन-तन को समझ निज आज तक यह आत्मा।
भूल से अब तक बना अज्ञान मय बहिरात्मा ।।
रहित जो संकल्प आदि विकल्प से अन्तर्रात्मा।
कर्म मल से रहित केवल शुद्ध है परमात्मा ।।
इस समाधि शतक उत्तम ग्रंथ का कर स्वाध्याय।
आत्मा का अनुभव करूँ मैं करूँ अपनी ही सहाय ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(6)
अब आचार्य परमात्मा के अन्य प्रसिद्ध नामों को कहते हैं :-
निर्मलः केवलः शुद्धो विविक्तः प्रभुरव्ययः ।
परमेष्ठी परात्मेति परमात्मेश्वरो जिनः ।। 6 ।।

अर्थ :- कर्मों के मल से रहित होने से वे निर्मल हैं; शरीरादिकों
के संबंध से रहित हैं अर्थात् केवल मात्र आप ही हैं इससे केवल हैं;
द्रव्य कर्म और भाव कर्मों के अभाव से परम शुद्धि को रखने वाले हैं
इस कारण शुद्ध हैं; शरीर तथा कर्म आदि का स्पर्श उनके आत्म प्रदेशों
से नहीं है अतः अस्पर्श और अबन्ध होने से विविक्त हैं; इन्द्रादि तथा
गणधरादि मुनियों के स्वामी हैं अतः प्रभु हैं; जिस अनंत ज्ञान-दर्शन
सुख और वीर्यमय स्वभाव को प्राप्त किया है उससे कभी छूटने वाले
नहीं हैं इससे अव्यय हैं; इन्द्रादिकों से वन्दने योग्य परम अर्थात्
उत्कृष्ट पद में विराजमान हैं इस कारण परमेष्ठी हैं; संसारी जीवों से
विलक्षण आत्मा रूप होने से परमात्मा हैं; संसारी जीवों को असम्भव
ऐसे आत्मिक परम ऐश्वर्य को रखने वाले हैं इससे ईश्वर हैं और
मोहनीयादि कर्मों पर विजय प्राप्त कर लेने के कारण जिन हैं-इस
प्रकार ये परमात्मा के वाचक नाम हैं।

6. ॐ ह्रीं शुद्धात्मरूपसमतास्वरूपाय नमः ।

अव्ययस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

कर्म मल रहित अतः सुनिर्मल शरीरादि संबंध विहीन।।
द्रव्य-भाव कर्मों से विरहित पूर्ण शुद्ध है ज्ञान प्रवीण।।
अस्पर्शी निर्बंध अव्ययी विविक्त परमेष्ठी ईश्वर ।।
घाति जयी जिन परमात्मा प्रभु सिद्ध स्वपद पति जगदीश्वर ।।
परम अनुभवी गुणनिधान सर्वज्ञ सर्वदर्शी ज्ञानी।।
महामोह संपूर्ण नाशकर नाथ हुए केवलज्ञानी ।।
सम्यक्ज्ञानी ज्ञानमूर्त्ति चैतन्य स्वरूपासक्त महान।।
अनंत ज्ञानी केवल ज्ञायक परम तत्त्व वेदी विद्वान।।
परमात्मा के गुण अनंत का मनन चिन्तवन सुखकारी।।
सकल व्याधियां हर लेता है सकल विश्व को हितकारी ।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मैं निज पद निर्वाण।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(7)
अब कहते हैं कि इसका क्या कारण है जो बहिरात्मा देहादि
को आत्मा मान लेता हैं :-
बहिरात्मेन्द्रिय-द्वारैरात्मज्ञान-पराङ्मुखः ।
स्फुरितः स्वात्मनो देहमात्मत्वेनाध्यवस्यति ।। 7 ।।

अर्थ :- आत्मा का सच्चा स्वरूप क्या है- इस ज्ञान से जो
शून्य है ऐसा मिथ्यादृष्टि अज्ञानी जीव अपनी इंद्रियों के द्वारा विषयों
के ग्रहण में व्यापार करता हुआ अपनी आत्मा की देह को आत्मा रूप
से माना करता है।

7. ॐ ह्रीं इन्द्रियज्ञानरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

निर्देहस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

आत्म ज्ञान से जो पराङ्गमुख वे अज्ञानी मिथ्यादृष्टि ।
इन्द्रिय विषय ग्रहण करते हैं अनात्मा पर ही है दृष्टि ।।
अंतरंग की बुद्धि मंद है वैभाविक परिणति के दास।
नहीं ज्ञान एकत्व विभक्त आत्मा का है पर के दास ।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मैं निज पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(8)

देह को ही आत्मा मानता हुआ वह अज्ञानी जीव मनुष्यादि चारों
गतियों के शरीरों को अभेद रूप से आत्मा मानता है ऐसा दिखाते हैं :-
नरदेहस्थमात्मानमविद्वान् मन्यते नरम् ।
तिर्यंचं तिर्यगङ्गस्थं सुरांगस्थं सुरं तथा ।। 8 ।।

अर्थ :- अज्ञानी बहिरात्मा मनुष्य देह में तिष्ठी हुई आत्मा को
मनुष्य, तिर्यंच शरीर में ठहरी हुई आत्मा को पशु और देव के शरीर में
ठहरी हुई आत्मा को देव मानता है।

8. ॐ ह्रीं नरादिदेहस्थावस्थारहितसमतास्वरूपाय नमः ।

निजगुणधामस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

बहिरात्मा तो देह विराजित आत्मा को समझा है नर।
तिर्यञ्च तन में जो आत्मा है उसको माना है पशु भर।।
सुरतन में जो आत्मा राजित उसको भी जाना है सुर।
भेद ज्ञान के बिना यही अज्ञान दशा में है तत्पर ।।

नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मैं निज पद निर्वाण।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(9)

और कहते हैं :-
नारकं नारकाङ्गस्थं न स्वयं तत्त्वतस्तथा ।
अनन्तानन्तधीशक्तिः स्वसंवेद्योऽचलस्थितिः ।। १ ।।

अर्थ :- नारकी के देह में ठहरी हुई आत्मा को वह नारकी
मानता है परन्तु निश्चय से उस रूप अर्थात् मनुष्य, तिर्यंच, देव तथा
नारकी रूप अपने आप अर्थात् कर्म की उपाधि के बिना नहीं होता
क्योंकि निश्चय से यह आत्मा अनन्तानन्त ज्ञान और वीर्य की धारी है,
अपने से ही अंतरंग में अनुभव करने योग्य है तथा निश्चल रूप से
रहने के स्वभाव वाली हैं।

9. ॐ ह्रीं नारकाङ्गरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

अचलबोधस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

देह व्यवस्थित निज आत्मा को माना है नारकी सदा।
यह सब कर्मोपाधि जनित है ऐसा माना नहीं कदा।।
निश्चय से तो ज्ञान वीर्य का धारी सौख्य स्वभावी है।
अंतरंग में अनुभवन योग्य है स्वसंवेद्य समभावी है।।
जब तक है बहिरात्म बुद्धि तब तक ही यह अज्ञानी है।
जब बहिरात्म अवस्था जाती हो जाता तब ज्ञानी है।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मैं निजपद निर्वाण।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 10 )
अपनी देह में ही आत्मा की मान्यता करने वाला बहिरात्मा
दूसरे की देह में कैसी बुद्धि रखता है, इस बात को कहते हैं :-
स्वदेहसदृशं दृष्ट्वा परदेहमचेतनम् ।
परात्माधिष्ठितं मूढः परत्वेनाध्यवस्यति ।। 10 ।।

अर्थ :- अज्ञानी बहिरात्मा अपनी देह के समान अर्थात् अपनी
देह के व्यापार, वचन-व्यवहार व आकार आदि के समान दूसरे की
देह को अर्थात् दूसरे की देह के व्यापार आदि को देखकर अन्य की
आत्मा को अपने में रखने वाली ऐसी उस देह को अथवा परात्मा
अर्थात् आत्मा से परस्वरूप जो कर्म, उसके द्वारा अधिष्ठित अर्थात्
प्राप्त हुई ऐसी देह को जो चेतन सहित है तथा स्वयं जड़ है पररूप
अर्थात् पर की आत्मा रूप मान लेता है।

10.ॐ ह्रीं पराधिष्ठानरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

स्वाधीनस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

कर्मोदय से प्राप्त देह को ही अज्ञानी अपनी जान।
सतत् देह व्यापार लीन है यह बहिरात्मा मूढ़ अजान ।।
जड़ तन पूर्ण अचेतन पुद्गल को ही मान रहा आत्मा।
अन्य दूसरे तन लखकर भी मान रहा है पर आत्मा।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मैं निजपद निर्वाण।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 11 )
इस तरह की मान्यता से युक्त बहिरात्मा और क्या करता है,
यह बताते हैं :-
स्वपराध्यवसायेन देहेष्वविदितात्मनाम् ।
वर्तते विभ्रमः पुंसां पुत्रभार्यादिगोचरः।। 11।।

अर्थ :- अपनी या दूसरों को देहों में स्व-पर की आत्मा की
मान्यता के कारण आत्मा को न जानने वाले पुरुषों के पुत्र, स्त्री आदि
संबंधी भ्रम वर्तन करता है।

11.ॐ ह्रीं पुत्रभार्यादिसङ्गरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

निःसङ्गस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

अपने या पर के तन को ही स्वपर आत्मा मान रहा।।
स्त्री पुरुष आदि सबको ही भ्रम से आत्मा जान रहा।।
पर्यायों में आत्म बुद्धि है इसीलिए है बहिरात्मा।।
तज दे यह पर्याय बुद्धि तो हो जाएगा परमात्मा।।
पहिले जीते यह विभ्रम को सर्व भ्रान्तियां क्षय कर दे।।
फिर यह अपनी शुद्ध आत्मा को गुण रत्नों से भर दे।।
जैसे पंछी रैन बसेरा करते किसी वृक्ष पर आ।।
विविध दिशाओं से आते हैं प्रात समय यहाँ जा वहाँ जा।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मैं निज पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 12 )
इस प्रकार स्त्री-पुत्रादिकों में अपनेपने का भ्रम हो जाने का
क्या फल होता है सो कहते हैं :-
अविद्या संज्ञितस्तस्मात्संस्कारो जायते दृढः ।
येन लोकोऽङ्गमेव स्वं पुनरप्यभिमन्यते ।। 12 ।।

अर्थ :- इस मिथ्या मान्यता या भ्रम बुद्धि से बहिरात्मा के
भीतर अविद्या है नाम जिसका ऐसा संस्कार अर्थात् असर मजबूत या
गाढ़ा हो जाता है जिसके द्वारा यह अविवेकी मनुष्य शरीर को ही फिर-
फिर भी यहाँ तक कि अन्य-अन्य जन्म में भी आत्मा माना करता हैं।

12.ॐ ह्रीं स्वानन्तगुणलक्ष्मीरूपसमतास्वरूपाय नमः ।

चैतन्यस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

मिथ्या है मान्यता तथा भ्रम बुद्धि अविद्या है भीतर।
अविवेकी बहिरात्मा को ही मान रहा है आत्मा भर।।
मैं मनुष्य हूँ ब्राह्मण क्षत्री वैश्य शूद्र निर्बल बलवान।
मैं पशु हूँ गज अश्व सिंह हूँ दाता पंडित हूँ विद्वान।।
मैं निग्रंथ तपस्वी भिक्षुक साधु संत श्रावक गुणवान।
इत्यादिक मान्यता सर्व ही मिथ्या भ्रम की है पहचान।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मैं निज पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(13)
बहिरात्मा उपर्युक्त प्रकार मानता हुआ क्या करता है तथा
अंतरात्मा कैसे इस भ्रम से बचता है सो दिखाते हैं :-
देहे स्वबुद्धिरात्मानं युनक्त्येतेन निश्चयात् ।
स्वात्मन्येवात्मधीस्तस्माद्वियोजयति देहिनम् ।। 13 ।।

अर्थ :- इस शरीर में व अन्य पर वस्तु और भावों में आत्मा
की बुद्धि रखने वाला बहिरात्मा अपनी आत्मा को इस देह से या
पुद्गल कर्मादि से बंधनरूप कर देता हैं अर्थात् कर्म बंधन में पड़कर
दीर्घ संसारी हो जाता है एवं अपनी आत्मा के सच्चे स्वरूप में ही
आत्मा की बुद्धि रखने वाला अंतरात्मा अपनी आत्मा को निश्चय ही
देह से या पुद्गल कर्म बंध से छुड़ा लेता है।

13. ॐ ह्रीं अनंतधीसमतास्वरूपाय नमः ।

ज्ञानपुंजस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

बहिरात्मा अपनी आत्मा को कर्मादिक से करता युक्त।
बना दीर्घ संसारी अब तक अतः न हो पाया है मुक्त।।
आत्मा में आत्मत्व बुद्धि रखने वाला ही होता मुक्त।
अंतरात्मा कर्म बंध क्षयहित न देह से होता युक्त ।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो, पाऊँ मैं निज पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 14 )
देह के साथ अपनापना जोड़ने वाले बहिरात्मा के निन्दनीय
व्यापार को दिखाते हुए आचार्य खेद प्रगट करते हैं :-
देहेष्वात्मधिया जाताः पुत्रभार्यादिकल्पनाः ।
सम्पत्तिमात्मनस्ताभिर्मन्यते हा हतं जगत्।। 14।।

अर्थ :- अपनी या दूसरों की देहों में आत्मा की बुद्धि रखने
से ही पुत्र, स्त्री आदि की कल्पनाएँ पैदा होती है। खेद है कि यह जगत्
उन्हीं स्त्री पुत्रादि से अपनी सम्पदा मानता है, इसलिए नष्ट-भ्रष्ट
हुआ है।

14. ॐ ह्रीं पुत्रभार्यादिकल्पनारहितसमतास्वरूपाय नमः ।

स्वगुणसंपत्तिस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

अपनी या पर की देहों में आत्म बुद्धि से भ्रमित हुआ।
स्त्री पुरुष आदि संबंधों में ही पड़कर चकित हुआ।।
विविध कल्पनाएँ करता है उन्हें संपदा मान रहा।
नष्ट भ्रष्ट हो दुखी बना है आत्म स्वरूप न जान रहा।।

नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मैं निज पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 15 )
आगे बहिरात्मा के स्वरूप को संकोचते हुए यह बताते हैं कि
इस बहिरात्मपने को छोड़कर अंतरात्मा को अपनी आत्मा में प्रवेश
करना चाहिए :-
मूल संसारदुःखस्य देहे एवात्मधीस्ततः ।
त्यक्त्वैनां प्रविशेदन्तर्बहिरव्यापृतेन्द्रियः ।। 15।।

अर्थ :- संसार के दुःखों का मूल कारण शरीर में अर्थात् पुद्गल
व पुद्गल संबंधी पर्यायों में ही आत्मपने की बुद्धि है इस कारण से इस
मिथ्या बुद्धि को छोड़कर ज्ञानी पुरुष आत्मा से बाहर बाहरी इन्द्रियों के
विषय रूप पदार्थों में इन्द्रियों के व्यापार में न प्रवर्तता हुआ अपने
अन्दर जावे अर्थात् अपनी आत्मा में ही आत्मबुद्धि करे और अंतरात्मा
होकर अपनी आत्मा का अनुभव करे।

15. ॐ ह्रीं इन्द्रियव्यापाररहितसमतास्वरूपाय नमः ।

अनंतसुखस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

पुद्गल संबंधी पर्यायों में है आत्मपने की बुद्धि ।
अब तो तज दे ज्ञानी बनकर इस प्रकार की मिथ्याबुद्धि ।।
इन्द्रिय विषय पदार्थो में इन्द्रिय व्यापार सदा को छोड़।
आत्मा में आत्मत्व बुद्धिकर निज को निज आत्मा से जोड़।।
अंतरात्मा बनकर अपनी आत्मा का अनुभव कर ले।
सर्व भ्रान्तियाँ तथा व्याधियाँ अन्तर्मुख होकर हर ले।।
होगी एक अपूर्व लब्धि बस अंतरात्मा बनते ही।
आत्म शुद्धि होगी भीतर में बहिरात्मा मति हनते ही।।

नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मैं निज पद निर्वाण।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 16 )
अंतरात्मा अपनी आत्मा में आत्मबुद्धि करता हुआ यह समझता
है कि अनादि काल से मुझे जिस पदार्थ का लाभ नहीं हुआ था सो
पदार्थ मुझे मिल गया अर्थात् मैं अपनी आत्मा को मिथ्या ही अशुद्ध
रूप जान रहा था सो अब उसके सच्चे स्वरूप को पहचान गया, मुझे
एक अपूर्व लब्धि मिल गई। इस तरह परम संतोषी होकर अपनी
पहले ही बहिरात्मपने की अवस्था को स्मरण करके विषाद करता
हुआ वह इस तरह अपने मन में कहता हैं :-
मत्तश्च्युत्वेन्द्रियद्वारैः पतितो विषयेष्वहम् ।
तान् प्रपद्याहमिति मां पुरा वेद न तत्त्वतः ।। 16 ।।

अर्थ :-मैं अपने आत्म स्वरूप से हट करके अर्थात् आत्मस्वरूप
को न जान करके इन्द्रियों की कामनाओं के द्वारा इन्द्रियों के विषय
संबंधी पदार्थों में गिरा पड़ा था अर्थात् अति आसक्ति से इन्द्रिय भोगों
में लिप्त हुआ पड़ा था तथा उन विषयों को प्राप्त होकर अर्थात् ‘ये
विषय मेरे उपकार करने वाले हैं’ ऐसा समझकर उनमें मग्न होकर
अनादिकाल से ‘मैं आत्मा हूँ, शरीरादिक नहीं हूँ’ ऐसा अपने आपको
तत्त्व दृष्टि से अथवा परमार्थ से वा निश्चयनय से नहीं जानता था
अर्थात् अनुभव नहीं करता था, इसका मुझे बड़ा सोच है।

16. ॐ ह्रीं इन्द्रियविषयभोगरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

शाश्वत्चिदानन्दस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

इन्द्रिय विषय पदार्थों में ही अब तक फँसा हुआ था नाथ।
इन्द्रिय भोगों में ही रत रह तज न सका मैं इनका साथ।।

मैं आत्मा हूँ देह नहीं हूँ ऐसा कभी नहीं जाना।
इस पर पश्चाताप हुआ अब आज दोष अपना माना।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मैं निज पद निर्वाण।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 17 )
अब अंतरात्मा को, अपनी आत्मा को जानकर उसका अनुभव
करने का उपाय बताते हैं :-
एवं त्यक्त्वा बहिर्वाचं त्यजेदन्तरशेषतः ।
एष योगः समासेन प्रदीपः परमात्मनः ।। 17।।

अर्थ :- जैसा कि आगे बतायेंगे, उस रीति से पहले पुत्र, स्त्री,
धन, धान्य संबंधी बाहर कहे जाने वाले शब्दों को सर्व तरह से छोड़कर,
पीछे अंतरंग की वचन प्रवृत्ति को अर्थात् मैं शिष्य हूँ, गुरु हूँ, सुखी हूँ,
दुःखी हूँ, चेतन हूँ, असंख्यात प्रदेशी हूँ एवं अनन्त गुणपर्याय स्वरूप
हूँ इत्यादि मन के सारे विकल्पों को भी संपूर्णपने त्याग देवे। संक्षेप से
यही योग अर्थात् अपने स्वरूप में चित्त के रोकने रूप समाधि भाव है
जो कि परमात्मा के स्वरूप का प्रकाश करने वाला है।

17. ॐ ह्रीं अंतर्बहिर्जल्परहितसमतास्वरूपाय नमः ।

निर्योगस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

पहिले स्त्री पुरुष धान्य धन शब्दादिक से तज संबंध।
फिर मैं दुखी-सुखी हूँ ऐसी वचन वृत्ति भी कर दे बंद ।।
गुण-पर्याय स्वरूप आदि के विकल्प भी अब सारे छोड़।
निज स्वरूप में दत्त चित्त हो निज समाधि से नाता जोड़ ।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मैं निज पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 18 )
आगे कहते हैं कि बाहरी वचन की प्रवृत्ति का त्याग करने के
लिए अन्तरात्मा को ऐसा विचारना चाहिये :-
यन्मयाऽदृश्यते रूपं तन्न जानाति सर्वथा।
जानन् दृश्यते रूपं ततः केन ब्रवीम्यहम्।। 18।।

अर्थ :- इन्द्रियगोचर जो शरीर आदि रूपी पदार्थ मेरे द्वारा
इन्द्रियों से जाना जाता है वह पदार्थ अचेतन होने से कहे हुए वचन को
बिल्कुल भी नहीं जानता है तथा जो जानने वाला चैतन्य स्वभाव है वह
दिखलाई नहीं पड़ता है अर्थात् इन्द्रियों के द्वारा जानने में नहीं आता है
क्योंकि वह अमूर्तिक है एवं स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण रहित है जब ऐसी
दशा है तब मैं किसके साथ बात करूँ?

18. ॐ ह्रीं अचेतनरूपरहितसमतास्वरूपाय नमः।

अरूपस्वस्वरूपोऽहम्।

(छंद-ताटंक)

शरीरादि रूपी पदार्थ इन्द्रिय द्वारा मैंने जाने।
इन्द्रिय गोचर पुद्गलादि सब मैंने अब पर पहचाने।।
किस से बोलूँ बात करूँ इनसे मेरा है क्या संबंध।।
ये मूर्तिक हैं मैं अमूर्तिक कर्मों से भी मैं निर्बंध।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मैं निज पद निर्वाण।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 19 )
अब आचार्य बताते हैं कि अपने भीतर के विकल्प को छोड़ने
का यत्न करते हुए अंतरात्मा को इस तरह विचार करना चाहिये :-
यत्परैः प्रतिपाद्योऽहं यत्परान् प्रतिपादये।
उन्मत्तचेष्टितं तन्मे यदहं निर्विकल्पकः।। 19।।

अर्थ :- अंतरात्मा विचार करता है कि जो कुछ मैं दूसरों से
अर्थात् उपाध्याय आदिकों से समझाने योग्य हूँ तथा जो कुछ दूसरों को
अर्थात् शिष्यों को मैं समझाता हूँ वह सब मेरी उन्मत्तपने की चेष्टा है
अर्थात् मोह के आधीन होकर मेरे मन का यह सब विकल्प जाल है,
जैसे बावले की सी क्रिया हो वैसी यह मेरी क्रिया है क्योंकि मैं तो वह
आत्मा हूँ जो सब प्रकार के विकल्पों से रहित है अर्थात् जो आत्मा
वचन विकल्पों से कभी ग्रहण में नहीं आ सकता सो ही मैं हूँ।

19. ॐ ह्रीं प्रतिपाद्यप्रतिपादकविकल्परहितसमतास्वरूपाय नमः ।

निर्विकल्पस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

अंतरात्मा विचार करता पर से समझाने के योग्य ।
पर को मैं समझाता ये उन्मत्त चेतना पूर्ण अयोग्य ।।
मोहाधीन विकल्प जाल यह क्रिया बदलने जैसी है।
मैं तो विकल्प विरहित आत्मा ज्ञान क्रिया ही ऐसी है ।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो, पाऊँ मैं निज पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 20 )
आचार्य कहते हैं कि विकल्पों से रहित उस आत्मा का स्वरूप
अंतरात्मा के अनुभव में इस रूप में आता हैं :-
यदग्राह्यं न गृहणाति गृहीतं नापि मुञ्चति ।
जानाति सर्वथा सर्व तत्स्वसंवेद्यमस्म्यहम् ।। 20।।

अर्थ :- जो शुद्धात्मा का स्वरूप है वह अपने स्वरूप से बाहर
जो ग्रहण में आने योग्य नहीं है ऐसे कर्मपुद्गलों व कर्म के उदय के
निमित्त से होने वाले क्रोधादि भावों को तो ग्रहण नहीं करता है अर्थात्
अपने आत्मस्वभाव रूप नहीं करता है तथा जिस अनन्त ज्ञानादि

स्वरूप को वह ग्रहण किये हुए है उसको कभी भी छोड़ता नहीं है तथा
सर्व चेतन और अचेतन वस्तुमात्र को सब तरह से उनके अनंत गुण व
पर्यायों सहित जानता ही है ऐसा वह अपने ही द्वारा अपने अनुभव में
आने योग्य आत्मा मैं हूँ।

20. ॐ ह्रीं ग्रहणत्यागविकल्परहितसमतास्वरूपाय नमः ।

निजगुणनिधिस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

जो शुद्धात्मा का स्वरूप है अलिंग ग्रहण है ग्राह्य नहीं।
कर्मोदय के निमित्त में क्रोधादि भाव का ग्रहण नहीं।।
जिस अनंत ज्ञानादिरूप को ग्रहण किया है वही महान।
चेतन तथा अचेतन सबको जान रहा मेरा भगवान।।
स्वसंबंध है अनुभव में आने के योग्य सदैव त्रिकाल।
मेरा तो है अगुरुलघु गुण इससे मैं हूँ मालामाल ।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो, पाऊँ मैं निज पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 21 )
इस प्रकार आत्मज्ञान व स्वानुभव की प्राप्ति करके वह अंतरात्मा
जब सविकल्प दशा में आता है तब ऐसा विचारता है कि आत्मज्ञान
होने से पहले मेरी चेष्टा इस प्रकार की रह चुकी हैं :-
उत्पन्नपुरुषभ्रान्तेः स्थाणौ यद्वद्विचेष्टितम् ।
तद्वन्ते चेष्टितं पूर्वं देहादिष्वात्मविभ्रमात्।। 21।।

अर्थ :- जिस तरह स्थाणु या खंभे में पैदा हुआ है पुरुषपने का
भ्रम जिसको, उसकी नानाप्रकार की विपरीत चेष्टा होती है उसी
प्रकार पहले आत्मा के विषय में भ्रम होने से वा आत्मा को उल्टा
समझने से शरीर आदि के संबंध में मेरी चेष्टा थी।

21.ॐ ह्रीं देहादिषु एकत्वबुद्धिभ्रमरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

निष्क्रियोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

जिस प्रकार स्थाणु या कि खंभे में पुरुषपने का भ्रम।
होती हैं विपरीत चेष्टाएँ जो है सब ही विभ्रम।।
देहादिक में ही विपरीत चेष्टा मैंने की अब तक।
अन्तरात्मा नहीं बना अतएव सहे हैं दुख अब तक।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो, पाऊँ मैं निज पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 22 )
अब अंतरात्मा विचारता है कि सच्चा ज्ञान हो जाने पर अब
मेरी कैसी चेष्टा हो गई हैं :-
यथाऽसौ चेष्टते स्थाणौ निवृत्ते पुरुषाग्रहे ।
तथा चेष्टोऽस्मि देहादौ विनिवृत्तात्मविभ्रमः ।। 22 ।।

अर्थ :- जैसे वही पुरुष जिसे कि खंभे में पुरुषपने का भ्रम हो
गया था खंभे में पुरुषपने का हठ दूर हो जाने पर यथायोग्य चेष्टा करता
है अर्थात् खंभे को पुरुष मानकर जो डरना, भागना व अन्य चेष्टा आदि
करने का उद्यम हो रहा था, उसको छोड़ देता है वैसे में शरीर आदि के
संबंध में आत्मपने का भ्रम या मिथ्यात्व दूर हो जाने पर यथायोग्य
रीति से वर्त्तन करता हूँ।

22.ॐ ह्रीं विभ्रमरहितसहजचैतन्यसमतास्वरूपाय नमः ।

सत्स्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

खंभे में जो पुरुषपने का हठ था वह अब दूर हुआ।
डरना, भगना, आदि चेष्टा का श्रम भी कर्पूर हुआ।।

परमें आत्मपने का भ्रम मिथ्यात्व आदि सब नष्ट हुआ।
इस मिथ्यात्व भाव के कारण ही मुझको बहुकष्ट हुआ।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य भाव नो कर्म रहित हो पाऊँ मैं निज पद निर्वाण।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 23 )
आत्मानुभव के लिए अन्तरात्मा विचारता है कि मेरी आत्मा में
लिंग भेद व संख्या भेद नहीं है किन्तु इन विकल्पों से रहित उसका तो
एक साधारण स्वभाव हैं :-
येनात्मनाऽनुभूयेऽहं आत्मनैवात्मानमात्मनि ।
सोऽहं न तन्न सा नासौ नैको न द्वौ न वा बहुः ।। 23 ।।

अर्थ :- जिस चैतन्य स्वरूप से मैं आत्मा में आत्मा को आप
ही, अपने से ही अनुभव करता हूँ वही मैं हूँ। ऐसा मेरा स्वरूप न
नपुंसक है, न स्त्रीलिंग है, न पुल्लिंग है तथा न एक है, न दो है अथवा
न बहुत हैं।

23.ॐ ह्रीं स्त्रीपुंनपुंसकवेदरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

निर्वेदस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

निज चैतन्य स्वरूप आत्मा में आत्मा को ही पहचान।
स्वयं आत्मा में अपने को अनुभव करके ही लूँ जान।।
आत्म स्वरूप कभी नपुंसक स्त्रीलिंग है ना पुल्लिंग।
नहीं एक या दो अथवा बहु एकमात्र है पूर्ण अलिंग।।
इस प्रकार के विकल्प जालों से विरहित हूँ शुद्धात्मा।
अब तो अंतरात्मा हूँ मैं हो जाऊँगा परमात्मा ।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मैं निज पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 24 )
आगे अन्तरात्मा फिर विचारता है कि जिस आत्मा के स्वरूप
का मैं अनुभव करता हूँ वह कैसा हैं :-
यदभावे सुषुप्तोऽहं यद्भावे व्युत्थितः पुनः ।
अतीन्द्रियमनिर्देश्यं तत्स्वसंवेद्यमस्म्यहम् ।। 24।।

अर्थ :- जिस स्वसंवेदनगोचर आत्मस्वरूप के प्राप्त न करते
हुए अर्थात् जिसका अनुभव न करने से मैं सोया हुआ था अर्थात् पदार्थ
के यथार्थ ज्ञान को न पाकर अज्ञानरूपी नींद में गाढ़पने बेहोश हो रहा
था तथा जिस आत्मस्वरूप के पाने पर यानि जिसका अनुभव हो जाने
पर मैं विशेषपने जाग गया तथा मैंने स्वरूप के यथार्थ ज्ञान को प्राप्त
कर लिया वह आत्मस्वरूप जो कि इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण योग्य नहीं
हैं, स्वभावजन्य है, शब्दों के द्वारा कहने योग्य नहीं है तथा अपने ही
द्वारा अनुभव करने योग्य है सो ही मैं हूँ।

24. ॐ ह्रीं निद्रारहितानन्दसमतास्वरूपाय नमः ।

चिदानंदस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

निज अनुभव बिन सोया आत्मा मेरा देखो जाग गया।
मूर्छा भाव अनादि काल का पूरा-पूरा भाग गया।।
स्वसंवेद्य गोचर निजात्मा अन्तरात्मा आज हुआ।
परमात्मा बनने का निर्णय करते ही निज काज हुआ।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो, पाऊँ मैं निज पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 25 )
अब अंतरात्मा विचारता है कि उस आत्मस्वरूप का अनुभव
करते हुए रागद्वेषादिभाव नहीं रहते अतः वहाँ न कोई शत्रु मालूम होता
है और न कोई मित्र :-

क्षीयन्तेऽत्रैव रागाद्यास्तत्त्वतो मां प्रपश्यतः ।
बोधात्मानं ततः कश्चिन्न मे शत्रुर्न च प्रियः ।। 25 ।।

अर्थ :- तत्त्वदृष्टि से अर्थात् शुद्ध निश्चयनय से अपने को ज्ञानस्वरूप
अनुभव करने से इस जन्म में ही अथवा यहाँ ही राग-द्वेषादि भाव नष्ट
हो जाते हैं इसीलिए मेरा न कोई शत्रु है और न कोई मित्र है।

25. ॐ ह्रीं शत्रुमित्रतारहितसमतास्वरूपाय नमः ।

विरागस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

तत्त्व दृष्टि से निर्मल आत्मा निश्चय से है ज्ञान स्वरूप।
कोई न शत्रु मित्र है मेरा राग-द्वेष से रहित अनूप।।
ऐसा अनुभव करते ही होता है राग-द्वेष सब दूर।
शुद्ध स्वानुभव ही वैभव है अब तो मैं इससे भरपूर ।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो, पाऊँ मैं निज पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 26 )
अंतरात्मा से कोई शंका करता है कि ठीक है, तुम तो अन्य
किसी को अपना शत्रु वा मित्र नहीं मानते हो पर अन्य कोई तो तुम्हें
अपना शत्रु या मित्र अवश्य मानता होगा और जब दूसरा कोई तुम्हें शत्रु
या मित्र रूप माने तब तुम्हारे मन में भी यह विकल्प कदाचित् हो ही
सकता है कि मेरा कोई शत्रु या मित्र है और ऐसी दशा में तुम निर्विकल्प
नहीं हो सकते। इसके उत्तर में अंतरात्मा विचारता हुआ कहता हैं :-
मामपश्यन्नयं लोको न मे शत्रुर्न च प्रियः ।
मां प्रपश्यन्नयं लोको न मे शत्रुर्न च प्रियः ।। 26 ।।

अर्थ :- मेरे आत्मस्वरूप को नहीं देखता हुआ यह लौकिक
प्राणी न मेरा शत्रु है और न प्यारा है क्योंकि चर्म चक्षुओं से मेरा स्वरूप

दिख नहीं सकता और जब तक किसी वस्तु को देखा जाना नहीं जाता
तब तक उससे राग-द्वेषभाव नहीं हो सकता। मेरे आत्मस्वरूप को
देखता हुआ यह ज्ञानी पुरुष न मेरा शत्रु है और न मित्र है क्योंकि जो
आत्मस्वरूप का अनुभव करता है उसके रागादि भाव न होने से उसके
भीतर शत्रु या मित्रभाव नहीं हो सकता।

26. ॐ ह्रीं परद्रव्यविषये इष्टानिष्टकल्पनारहितसमतास्वरूपाय नमः ।

प्रशांतस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

जो भी लौकिक प्राणी मेरा नहीं जानता आत्म स्वरूप।
वह ना मेरा शत्रु मित्र है ना प्रिय है अज्ञान स्वरूप।।
चर्म चक्षुओं से मेरा निजरूप न देख सका कोई ।
फिर उससे क्यों राग-द्वेष हो है संबंध नहीं कोई ।।
आत्म स्वरूप अनुभवन करने वाला ही समभावी है।
शत्रु मित्र आदिक भावों से दूर निजात्म स्वभावी है।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो, पाऊँ मैं निज पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 27 )
अंतरात्मा के लिए आचार्य अब यह उपदेश करते हैं कि उसे
बहिरात्मपने का त्याग करके परमात्मपने की प्राप्ति का उपाय इस
भाँति करना चाहिए :-
त्यक्त्वैवं बहिरात्मानमन्तरात्म व्यवस्थितः ।
भावयेत्परमात्मानं सर्व संकल्प वर्जितम् ।। 27 ।।

अर्थ :- अंतरात्म-अवस्था में ठहरा हुआ जीव जिस तरह
ऊपर कहा गया है उस तरह बहिरात्मपने को छोड़कर तथा सर्वसंकल्प
विकल्पों से रहित होकर परमात्मा को भावे अर्थात् जिसमें कोई
संकल्प-विकल्प नहीं है ऐसे परमात्मा के स्वरूप का अनुभव करें।

27.ॐ ह्रीं सर्वसंकल्परहितसमतास्वरूपाय नमः ।

नित्यानंदस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

बहिरात्मापन छोड़ अन्तरात्मा में जो जन रहता है।
सब संकल्प विकल्प छोड़ निज परमात्मा को भजता है ।।
जो संकल्प विकल्प हीन है उसका ही तू अनुभव कर।
निज परमात्मा पद पाएगा उसका ही तू चिन्तन कर।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नोकर्म रहित हो पाऊँ मैं निज पद निर्वाण।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 28 )
परमात्मा की भावना करने का क्या फल होता है, वह कहते हैं :-
सोऽमित्यात्तसंस्कारस्तस्मिन्भावनया पुनः ।
तत्रैव दृढ़संस्काराल्लभते ह्यात्मनि स्थितिम् ।। 28।।

अर्थ :- उस परमात्म-स्वरूप की भावना के प्रताप से तथा
अनन्त ज्ञानस्वरूप से प्रसिद्ध वह जो परमात्मा है, सो ही मैं हूँ इस
प्रकार के अभ्यास से जिसने अपनी वासना जमा ली है वह भेदाभ्यासी
तत्वज्ञानी पुरुष फिर उसी उत्कृष्ट आत्मस्वरूप में अति निश्चल
भावना के बल से प्रगटपने अपने आत्मस्वरूप में निश्चलपने को
प्राप्त करता है।

28.ॐ ह्रीं अस्थिरपर्यायरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

टङ्कोत्कीर्णस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

उस परमात्म स्वरूप भावना को ही तू अंतर से ध्या।
तत्त्वाभ्यासी तत्त्व ज्ञानकर निज स्वरूप को प्रतिफल ध्या ।।
निश्चल दृढ़ संस्कार जगा ले त्वरित मिलेगा आत्म स्वरूप ।
तू परमात्म भावना करके पाले निश्चल आत्म अनूप।।

नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नोकर्म रहित हो पाऊँ मैं निज पद निर्वाण।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 29 )
यहाँ पर कोई शिष्य शंका करता है कि आत्मा की भावना
करने के लिए तप आदि करना होगा जिसमें परम्परा से बहुत कष्ट
होगा, इस कारण ऐसा कार्य करने में भय लगता है और जब वस्तु-
स्थिति ऐसी है तो फिर किसकी प्रवृत्ति इस आत्मभावना के संबंध में
होगी अर्थात् ऐसे कठिन कार्य के लिए कौन उद्यम करेगा ? अब इस
आंशका को दूर करने के लिए आचार्य कहते हैं :-
मूढात्मा यत्र विश्वस्तस्ततोनान्यदभयास्पदम् ।
यतो भीतस्ततो नान्यदभयस्थानमात्मनः ।। २9।।

अर्थ :- बहिरात्मा मिथ्यादृष्टि जिन स्त्री, पुत्र, कुटुम्ब, मित्र
व शरीर आदि में इस रूप का विश्वास कर लेता है कि ये मेरे हैं और
मैं इनका हूँ उन शरीर, स्त्री व पुत्रादि में मोह करने के सिवाय दूसरा
कोई इस आत्मा के लिए भय का स्थान नहीं हैं क्योंकि इसी मोह से
ही तो आत्मा संसार मैं दुःख उठाता है और जिससे अर्थात् जिस
परमात्मस्वरूप के अनुभव से वह डरता है उसके सिवाय दूसरा कोई
आत्मा के लिए संसार के दुःखों से बचने का निर्भय उपाय नहीं है।

29.ॐ ह्रीं भयास्पदत्वरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

अभयस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

मूढात्मा ही स्त्री पुत्र मित्र आदि पर कर विश्वास।
उनको अपना मान रहा है सारा ही खोटा आभास ।।
ये मेरे हैं मैं इनका हूँ इसका ही करता अभ्यास।
भेदाभ्यासी तत्त्व दृष्टि से करता ना इनका विश्वास।।

इसी मोह के कारण प्राणी जग में कष्ट उठाता है।
यह उपाय निर्भय न कही है भवदधि मध्य डुबाता है ।।
परमात्मा के अनुभव से डरता है अज्ञानी प्राणी।
इसीलिए ये भटक रहा है बात न आगम की मानी।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मैं निज पद निर्वाण।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 30 )
आत्मा की प्राप्ति जिस तरह होती है, उसका उपाय कहते हैं :-
सर्वेन्द्रियाणि संयम्य स्तिमितेनान्तरात्मना ।
यत्क्षणं पश्यतो भाति तत्तत्वं परमात्मनः ।। 30 ।।

अर्थ :- अपने-अपने विषयों में जाती हुई सर्व इन्द्रियों को
रोककर स्थिरीभूत मन से अर्थात् अपने भीतर जो कोई आत्मा है उस
तरफ अपने उपयोग को सन्मुख करते हुए क्षण मात्र भी अनुभव करने
वाले के जो स्वरूप झलकता है सो ही परमात्मा का स्वरूप है।

30.ॐ ह्रीं सर्वेन्द्रियनिरोधकल्पनारहितसमतास्वरूपाय नमः ।

परममङ्गलस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

सभी इन्द्रियों के विषयों में जाती हुई इन्द्रियाँ रोक।
अपने भीतर जो आत्मा है उसको जाने से तू टोक ।।
क्षणभर भी निज अनुभव कर ले तो स्वरूप निज झलकेगा।
तेरा परमात्मा भीतर, परमात्मा बनकर ललकेगा।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो, पाऊँ मैं निज पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 31 )
शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि किसकी आराधना करने से
आत्मस्वरूप की प्राप्ति होगी ? अब आचार्य इसका उत्तर कहते हैं:-
यः परात्मा स एवाऽहं योऽहं स परमस्ततः ।
अहमेव मयोपास्यो नान्यः कश्चिदिति स्थितिः ।। 31 ।।

अर्थ :- जो कोई प्रसिद्ध उत्कृष्ट आत्मा या परमात्मा है वह
ही मैं हूँ तथा जो कोई स्वसंवेदन गोचर मैं आत्मा हूँ सो ही परमात्मा
है इसलिए अर्थात् जब परमात्मा और मैं एक ही हूँ तब मेरे द्वारा मैं ही
आराधने योग्य हूँ, कोई दूसरा नहीं। इस प्रकार अपने स्वरूप में ही
आराध्य-आराधक भाव की व्यवस्था है।

31.ॐ ह्रीं निजपरमेश्वररूपसमतास्वरूपाय नमः ।

परमदेवस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

जो भी है परमात्मा वह मैं ही हूँ यह अब अनुभव कर।
दोनों ही जब एक तत्त्व है तो उसका ही निश्चय कर।।
यह ही तो आराध्य योग्य है नहीं दूसरा है कोई।
वह ही परमात्मा होता है जिसने निज आत्मा जोई ।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मैं निज पद निर्वाण।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 32 )
इसी स्व-स्वरूप की उपासना का विशेष उपाय दिखाते हैं :-
प्रच्याव्य विषयेभ्योऽहं मां मयैव मयि स्थितम् ।
बोधात्मानं प्रपन्नोऽस्मि परमानन्द निर्वृतम् ।। 32 ।।

अर्थ :- पंचेन्द्रियों के विषयों से अपने को हटा करके अपने
ही द्वारा अर्थात् अपने आत्मस्वरूप के ही द्वारा अपने ही स्वरूप में

ठहरते हुए ज्ञानस्वरूप तथा उत्कृष्ट आनंद से पूर्ण अपने स्वरूप की
अवस्था को मैं प्राप्त होता हूँ।

32.ॐ ह्रीं बोधसाम्राज्यरूपसमतास्वरूपाय नमः ।

परमानंदस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

पंचेन्द्रिय के विषयों से तू निज को हटा ध्यान निज कर।
निज स्वरूप में ठहर अभी तू निज अनुभव रस उर में भर ।।
सर्वोकृष्ट अवस्था सुख की निमिष मात्र में होगी प्राप्त।
अनुभव का सागर लहराएगा होगा अंतर में व्याप्त।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मैं निज पद निर्वाण।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 33 )
ऊपर कहे प्रमाण आत्मा के स्वरूप को जो शरीर तथा पुद्गल
के समस्त विकारों से भिन्न अनुभव नहीं करता है, उसके संबंध में
कहते हैं :-
यो न वेत्ति परं देहादेवमात्मानमव्ययम् ।
लभते सः न निर्वाणं तप्त्वाऽपि परमं तपः ।। 33।।

अर्थ :- जो कोई विद्वान ऊपर कहे प्रमाण शरीरादि पर पदार्थों
तथा परभावों से भिन्न अविनाशी एवं अपने ज्ञानादि गुणों से परिपूर्ण
आत्मा को नहीं जानता है अर्थात् अनुभव नहीं करता है वह पुरुष
बहुत तीव्र तपस्या को अर्थात् महान् उपवासादि कायक्लेश को तप
करके भी संसार के सर्वदुःखों से मुक्तरूप निजस्वरूपानंदमयी निर्वाण
को प्राप्त नहीं करता है।

33. ॐ ह्रीं देहभिन्ननिजात्मसमतास्वरूपाय नमः ।

अविनाशस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

जो उपरोक्त प्रमाण आत्मा जान न पाता पर से भिन्न।
शुद्ध ज्ञानगुण से परिपूर्ण आत्मा तो है सदा अभिन्न।।
जो न आत्म अनुभव करता है करता है तप काया क्लेश।
वह निर्वाण नहीं पाता है केवल मात्र धार परवेश ।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो, पाऊँ मैं निज पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 34 )

यहाँ शिष्य शंका करता है कि जो तपस्वी महा कठिन तप को
करते हैं उन्हें महादुःख होता है जिससे उनके मन में खेद व आकुलता
होती है अतः ऐसी दशा में उन तपस्वियों को निर्वाण की प्राप्ति कैसे
हो सकती है ? अब इसका आचार्य समाधान करते हैं :-
आत्मदेहान्तरज्ञान जनिताल्हाद निर्वृतः ।
तपसा दुष्कृतं घोरं भुञ्जानोऽपि न खिद्यते ।। 34 ।।

अर्थ :- आत्मा और शरीर के भेदज्ञान से पैदा होने वाले आनंद
से भरा हुआ योगी बारह प्रकार तपस्या करके भयानक पूर्व कर्म के
फलरूप महादुःख को भोगते हुए भी खिन्न नहीं होता है।

34.ॐ ह्रीं खेदजनितपीड़ारहितसमतास्वरूपाय नमः ।

परमाल्हादस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

आत्मा और शरीर भिन्न है जो योगी निर्णय करता।
वह आनंद अतीन्द्रिय पाता निजानंद रस उर भरता।।
भोग रहा वह पूर्व कर्मफल खिन्न नहीं निज को करता।
जो न जानता भिन्न देह से निज को कुतप वही करता।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो, पाऊँ मैं निज पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 35 )
आचार्य कहते हैं कि यदि तपस्वी को तप की क्रिया में खेद हो
जाये तो उसे आत्मस्वरूप की प्राप्ति नहीं हो सकती क्योंकि उसका
मन उस समय धर्मध्यान से छूटकर आर्त्तध्यान में आ जाएगा :-
रागद्वेषादि कल्लोलैरलोलं यन्मनोजलम् ।
स पश्यत्यात्मनस्तत्त्वं स तत्त्वं नेतरो जनः ।। 35 ।।

अर्थ :- जिसका मनरूपी जल राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया व
लोभादि तरंगों से चंचल वा मलिन नहीं है एवं वीतरागता में स्थिर है
वही योगी आत्मा के यथार्थ स्वरूप को देखता है अथवा अनुभव
करता है एवं वही आत्मदर्शी स्वयं तत्त्वस्वरूप है अर्थात् परमात्मा के
स्वभावरूप है, दूसरा मनुष्य नहीं अर्थात् जो मनुष्य आत्मा की तरफ
सन्मुख नहीं है, वह उस समय वर्तमान पर्याय की अपेक्षा तत्त्वरूप
नहीं है।

35. ॐ ह्रीं रागद्वेषादिकल्लोलरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

नीरागस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

जिसका मन जल राग-द्वेष कल्लोलों से चंचल न कभी।
वीतरागता में सुस्थिर है आत्मस्वरूप यथार्थ सभी ।।
वही आत्मदर्शी परमात्म स्वरूप रूप करता दर्शन।
अन्य पुरुष पर्याय मात्र में रहकर करता है बंधन।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मैं निज पद निर्वाण।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 36 )
जिस आत्म-तत्त्व को रागद्वेष रहित जीव देखता है, वह तत्त्व
कैसा है और उसका क्या स्वरूप है, सो कहते हैं :-
अविक्षिप्तं मनस्तत्त्वं विक्षप्तं भ्रान्तिरात्मनः ।
धारयेत्तदविक्षिप्तं विक्षिप्तं नाश्रयेत्ततः ।। 36 ।।

अर्थ :- विक्षेप रहित अर्थात् रागादि में परिणमन नहीं करता
हुआ देहादि और आत्मा को एक मानने के अभिप्राय का त्याग करने
से अपने स्वरूप में ही निश्चलता को प्राप्त करता हुआ जो मन है सो
आत्मा का वास्तविक स्वरूप है तथा ऊपर से विपरीत अर्थात् विक्षेपरूप,
रागादि में परिणत हुआ एवं शरीरादि और आत्मा का भेद-ज्ञान न
करता हुआ जो मन है सो भ्रम है, मिथ्यात्वरूप है, आत्मा का स्वभाव
नहीं है इसीलिए अविक्षिप्त अर्थात् राग-द्वेषादि रहित मन की अवस्था
को तो धारण करना चाहिए और राग-द्वेष से क्षोभित मन की अवस्था
का आश्रय छोड़ना चाहिये।

36.ॐ ह्रीं विक्षिप्तचित्तरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

अविक्षिप्तस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

अविक्षिप्त रागादिक में परिणमन न करता है जो जीव।
आत्मा के सच्चे स्वरूप में ही रहता वह ज्ञानी जीव।।
राग-द्वेष से क्षोभित दशा दुखमयी का तू आश्रय छोड़।
भेदज्ञान महिमा तू पाकर निज स्वरूप से नाता जोड़।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो, पाऊँ मुनि बन पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 37 )
शिष्य प्रश्न करता है कि किस तरह मन को क्षोभ तथा किस
तरह अक्षोभ होता है, इसी का उत्तर आचार्य देते हैं :-
अविद्याभ्यास संस्कारैरवशं क्षिप्यते मनः।
तदेव ज्ञान संस्कारैः स्वतस्तत्त्वेऽवतिष्ठते ।। 37 ।।

अर्थ :- शरीर आदि को शुचि, स्थिर तथा आत्मा ही मान लेने
रूप जो अविद्या एवं अज्ञान और इस अज्ञान के बार-बार होने से पैदा
हुई जो वासनायें, उनके कारण तो यह मन अपने वश को छोड़कर
अर्थात् इन्द्रियों के आधीन होकर विक्षिप्त एवं रागी-द्वेषी हो जाता है
और वही मन, ‘आत्मा, शरीरादि से भिन्न है’ इस प्रकार के ज्ञान के
बार-बार अभ्यास से प्राप्त हुए संस्कारों के द्वारा अर्थात् भेदज्ञान के
अभ्यास से अपने आप ही आत्मस्वरूप में ठहर जाता है।

37. ॐ ह्रीं अविद्याभ्याससंस्काररहितसमतास्वरूपाय नमः ।

निजज्ञानानंदस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

शरीरादि को शुचि थिर माना तन को ही आत्मा माना।
अरु अज्ञान अविद्या का संस्कार आपना ही जाना।।
यह मन अपने वश को तजकर रहा इन्द्रियाधीन सदा।
रागी-द्वेषी बना रहा यह निज को जाना नहीं कदा।।
शरीरादि से भिन्न आत्मा का यह बार-बार अभ्यास ।
आत्मा अपने में ठहरेगा भेदज्ञान का कर विश्वास ।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो, पाऊँ मुनि बन पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 38 )
चित्त के विक्षिप्त होने का क्या फल होता है तथा अविक्षिप्त
रहने का क्या फल होता है, इसी बात को दर्शाते हैं :-
अपमानादयस्तस्य विक्षेपो यस्य चेतसः ।
नापमानादयस्तस्य न क्षेपो यस्य चेतसः ।। 38 ।।

अर्थ :- जिसके चित्त में राग, द्वेष, मोह का क्षोभ रहता है उसी
के अपमानादि भाव हुआ करते हैं अर्थात् ‘मेरा मान खंड हो गया, मेरी
अवज्ञा हुई, मैं दूसरों से बड़ा हूँ’ आदि रूप भाव एवं दूसरे को देखकर
ईर्ष्या करना आदि रूप भाव हुआ करते हैं तथा जिसके चित्त में राग
द्वेषादि का क्षोभ नहीं होता है उसके ये अपमानादि अशुभ भाव नहीं
होते हैं।

38.ॐ ह्रीं मानापमानस्थानरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

निर्मानस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

राग-द्वेष मोहादि क्षोभ अज्ञान भाव जब करता है।
हुई अवज्ञा मान खड हो गया आदि यह कहता है।।
जिसके मन में राग-द्वेष या क्षोभ नहीं होता है अल्प।
उसको अपमानादिक भाव नहीं होते हैं खोटे जल्प।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो, पाऊँ मुनि बन पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 39 )
मान-अपमान आदि राग-द्वेष रूप भाव जब आवें तब उनको
दूर करने का क्या उपाय है, इसी को समझाते हैं :-
यदा मोहात्प्रजायेते राग-द्वेषौ तपस्विनः ।
तदैव भावयेत्स्वस्थमात्मानं शाम्यतः क्षणात् ।। 39।।

अर्थ :- जब किसी तपस्वी के मोहनीय कर्म के उदय से राग
व द्वेष उत्पन्न होवें उस समय उसे बाहरी विषयों से हटकर अपने
स्वरूप में स्थित आत्मा की बारम्बार भावना करनी चाहिए। ऐसा
करने से वे राग-द्वेष क्षणमात्र में ही शांत हो जायेंगे।

39. ॐ ह्रीं मोहकर्मरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

निर्मोहस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

राग-द्वेष मोहादि जन्य जब भाव हृदय में हों उत्पन्न।
उनसे मन को हटा आत्मा में थित हो गुण से सम्पन्न ।।
बार-बार भावना आत्म की भाकर हो सहज प्रशान्त।
क्षणभर में ही राग-द्वेष आदिक हो जाएंगे सब शान्त।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो, पाऊँ मुनि बन पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 40 )
आगे कहते हैं कि रागद्वेष करने का विषय कौन है और यदि
इन्हें छोड़ना हो तो राग-द्वेष के विषय से विपक्ष विषय कौन हैं :-
यत्र काये मुनेः प्रेम, ततः प्रच्याव्य देहिनम् ।
बुद्धया तदुत्तमे काये योजयेत्प्रेम नश्यति ।। 40 ।।

अर्थ :- जिसे अपने या पर के शरीर में अथवा इन्द्रियादि
पदार्थों में मुनि का प्रेम हो उस शरीर से या इन्द्रियादि पदार्थों से अपनी
आत्मा को भेदज्ञान के बल से हटाकर पीछे उत्तम चिदानन्दमयी शरीर
वाले निज आत्म-स्वरूप में अपनी आत्मा को लगाना चाहिए, जिसका
यह फल होगा कि उसका शरीरादि संबंधी स्नेह नष्ट हो जाएगा।

40.ॐ ह्रीं कायप्रेमरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

निष्कायस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

जिस मुनि को अपने तन से या पर तन से हो जाए प्रेम।
उसे हटाकर भेद ज्ञान बल से तू कर निज से ही प्रेम।।
चिदानंदमय निज शरीर से जगा नेह कर निज चिन्तन।
जिसके फल में शरीर आदि का नेह विलय होगा तत्क्षण ।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मुनि बन पद निर्वाण।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 41 )
रागद्वेषादि के नष्ट हो जाने पर क्या अवस्था होती है, सो कहते हैं :-
आत्मविभ्रमजं दुःखमात्मज्ञानात्प्रशाम्यति ।
नायतास्तत्र निर्वान्ति कृत्वापि परमं तपः ।। 41 ।।

अर्थ :- आत्मा के मिथ्याश्रद्धान से उत्पन्न हुआ अर्थात् ‘अनात्मा
जो शरीरादि सो ही आत्मा है’ इस तरह के मिथ्याज्ञान से पैदा हुआ जो
नाना प्रकार का इहलोक व परलोक संबंधी क्लेश है सो आत्मज्ञान से
अर्थात् शरीरादि से आत्मस्वरूप का भेद-ज्ञान हो जाने से और
आत्मस्वरूप का अनुभव करने से शांत हो जाता है, परन्तु जो उस
आत्मस्वरूप में उद्योगी नहीं है वे उत्कृष्ट तप अर्थात् महा कठिन-
कठिन तपस्या को करके भी निर्वाण की प्राप्ति नहीं कर सकते और
न ही सुखी होते हैं।

41.ॐ ह्रीं सुखदुःखादिपर्यायरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

सहजानंदस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

आत्मा की मिथ्या श्रद्धा से जो होता है मिथ्याज्ञान।
लोक तथा परलोक क्लेश से होता है वह दुखी महान।।
आत्मज्ञान करते ही होते ये विकार पूरे ही शान्त।
जो न आत्म उद्योगी होते तप कर भी रहते हैं भ्रान्त ।।

कठिन तपस्या करके भी निर्वाण नहीं वे पाते हैं।
शाश्वत् सुख से सदा दूर रह भवदुख बहुत बिसाते हैं ।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मुनि बन पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 42 )
तप का साधन करते हुए बहिरात्मा मिथ्यादृष्टि क्या चाहता है
तथा अंतरात्मा किसलिए तप करता है, इसी बात को बताते हैं :-
शुभं शरीरं दिव्यांश्च विषयानभिवाञ्छति ।
उत्पन्नात्म मतिर्देहे तत्त्वज्ञानी ततश्च्युतिम् ।। 42 ।।

अर्थ :- शरीर में व तत्सम्बन्धी अनेक पदार्थों में पैदा हुई है
आत्मपने की बुद्धि जिसको ऐसा बहिरात्मा जीव तप करके सुन्दर
शरीर और स्वर्ग संबंधी उत्तम विषय भोगों को चाहता है किन्तु जिसने
आत्म-स्वरूप को भली प्रकार जान लिया है ऐसा तत्त्व ज्ञानी शरीर व
उससे संबंधित विषय-भोगों से छुटटी अर्थात् मुक्ति चाहता है।

42. ॐ ह्रीं दिव्यशरीरादिवाञ्छारहितसमतास्वरूपाय नमः ।

निरपेक्षोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

शरीरादि में आत्मबुद्धि है तो है बहिरात्मा प्राणी।
तप करके भी उत्तम तन सुर भोग चाहता अज्ञानी ।।
किन्तु तत्त्व ज्ञानी शरीर से भिन्न आत्मा जान रहा।
विषय भोग से मुक्ति चाहता निज स्वभाव को मान रहा।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो, पाऊँ मुनि बन पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 43 )
मिथ्याज्ञानी जहाँ अपनी मिथ्या परिणति के कारण बंध को
अवश्य प्राप्त करता है वहाँ सम्यग्ज्ञानी अपनी सम्यक् परिणति के
प्रताप से बंध को न करता हुआ उल्टे कर्मों की निर्जरा करता है, यही
कहते हैं :-

परत्राहम्मतिः स्वस्माच्च्युतो बध्नात्य संशयम् ।
स्वस्मिन्नहम्मतिः च्युत्वा परस्मान्मुच्यते बुधः ।। 43 ।।

अर्थ :- पर जो शरीर व कर्मबन्ध आदि हैं उनमें आत्मा की
बुद्धि रखने वाला बहिरात्मा अपने आत्मस्वरूप से भ्रष्ट हुआ बिना
किसी संशय के, अवश्य ही बंधन को प्राप्त करता है अर्थात् कर्मों को
बाँधता है जबकि अपनी आत्मा के स्वरूप में आत्मपने की बुद्धि
रखने वाला अन्तरात्मा ज्ञानी पर जो शरीर व कर्मबंध आदि हैं उनसे
अलग होकर मुक्त हो जाता है।

43.ॐ ह्रीं परत्राहम्मतिरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

निजशाश्वत्स्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

पर अथवा तन कर्म बंध में आत्म बुद्धि रखने वाला।
आत्म स्वरूप भ्रष्ट हो करके पाता है दुख का नाला।।
कर्मों से बंधता जाता है आत्म बुद्धि से रहकर दूर।
निज में आत्म बुद्धि जो करते वे ही पाते सुख आपूर ।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो, पाऊँ मुनि बन पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 44 )
बहिरात्मा जिन पदार्थों में अपनेपने की बुद्धि करता है, उन
पदार्थों के संबंध में इस बुद्धि के द्वारा वह क्या माना करता है तथा

अंतरात्मा जिसमें अपनेपने की बुद्धि करता है, वह इस बुद्धि से उस
पदार्थ को क्या समझता है, इस बात को दिखलाते हैं :-
दृश्यमानमिदं
मूढ़स्त्रिलिंगमवबुध्यते ।
इदमित्यवबुद्धस्तु निष्पन्नं शब्द वर्जितम् ।। 44 ।।

अर्थ :- मूर्ख अज्ञानी प्राणी इस दिखलाई देने वाले मनुष्यों के
तीन लिंगरूप अर्थात् स्त्री, पुरुष व नपुंसकरूप शरीरादि के कारण
आत्मा को वैसा ही मान लेता है अर्थात् अज्ञानी जीव को भिन्न आत्मा
की प्रतीति नहीं है, उससे शरीर को आत्मा मानने से उस आत्मा को
ही स्त्री, पुरुष, नपुंसक देखता हुआ वह वैसा ही व्यवहार करता है किन्तु
ज्ञानी अंतरात्मा इस आत्मतत्त्व को परिपूर्ण अर्थात् अपने गुणों से पूर्ण,
अनादि से सिद्धस्वरूप तथा शब्द की कल्पना से रहित मानता है।

44.ॐ ह्रीं त्रिलिङ्गरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

अलिङ्गस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

महा मूढ़ अज्ञानी प्राणी दृश्यमान इन दृश्यों में।
महा भ्रान्ति से स्त्री पुरुष नपुंसक आदिक लिंगों में।।
अज्ञानी को भिन्न आत्मा की प्रतीति होती न कभी।
वह व्यवहार मूढ़ रहता है निज की प्रीत न उसे कभी ।।
अंतरात्मा आत्म तत्त्व को सिद्ध समान जानता है।
शब्द कल्पना से विरहित रह निज को सिद्ध मानता है ।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मुनि बन पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 45 )
यहाँ शिष्य शंका करता है कि जब अंतरात्मा, आत्मा को भली
प्रकार जानता है तब उसके पुनः इस प्रकार का एकत्वपने का भ्रम क्यों
हो जाता है, जिससे वह अपने को ऐसा मानने लगता है कि ‘मैं पुरुष
हूँ, मैं गोरा हूँ’ इत्यादि ? इस शंका का समाधान आचार्य करते हैं :-
जानन्नप्यात्मनस्तत्त्वं विविक्तं भावयन्नपि ।
पूर्व विभ्रम संस्काराद् भ्रांतिं भूयोऽपि गच्छति ।। 45 ।।

अर्थ :- आत्मा का यथार्थस्वरूप जानते हुए भी तथा उसे
शरीरादि सर्व पुद्गल द्रव्यों और उनकी अनेक अवस्थाओं से भिन्न
भावते हुए भी पूर्व में अर्थात् मिथ्यात्व अवस्था में अनुभव किये हुए
मिथ्याश्रद्धा की वासना के प्रभाव से वह अंतरात्मा फिर भी भ्रांति में
पड़ जाता है।

45.ॐ ह्रीं पूर्वविभ्रमसंस्काररहितसमतास्वरूपाय नमः ।

सनातनस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

आत्म स्वरूप यथार्थ जानकर भी करता है पर से नेह।
जड़ पुद्गल की विविध अवस्थाओं से करता सदा सनेह ।।
मिथ्या श्रद्धा के प्रभाव से अन्तरात्मा भ्रान्त हुआ।
दृढ़ सम्यक्त्व भाव को तज कर व्यर्थ खेद से क्लान्त हुआ ।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो, पाऊँ मुनि बन पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 46 )
उपरोक्त प्रकार यदि फिर से भ्रांति हो जाए तो उसे किस तरह
छोड़े इसका उपाय बताते हैं :-
अचेतनमिदं दृश्यमदृश्यं चेतनं ततः ।
क्व रुष्यामि क्व तुष्यामि मध्यस्थोऽहं भवाम्यतः ।।46 ।।

अर्थ :- शरीरादि जो वस्तुएँ देखने में अर्थात् इंद्रियों से ग्रहण
करने में आ रही हैं, सो सब जड़ हैं। इन पर यदि क्रोध वा संतोष किया

जाए तो ये कुछ समझ नहीं सकती क्योंकि इनमें चेतनपना नहीं है और
चेतनस्वरूप जो आत्मा का स्वभाव है सो इन्द्रियों के द्वारा देखने वा
ग्रहण करने में आता नहीं अतः जैसे शरीरादि जड़ होने से क्रोध वा हर्ष
के पात्र नहीं हैं वैसे ही यह आत्म-स्वरूप भी जो कि चेतन हैं, मेरे
क्रोध वा हर्ष का स्थान नहीं हो सकता क्योंकि वह दिखाई ही नहीं
पड़ता और अदृश्य पर क्रोधादि कैसे किया जाए। इसीलिए तत्त्वज्ञानी
को विचार करना चाहिए कि मैं किस पर क्रोध करूँ व किस पर संतोष
करूँ ? अतः क्रोध व संतोष का जब कोई विषय ही नहीं हैं तब मैं
मध्यस्थ अर्थात् उदासीन, वीतरागी रहता हूँ।

46. ॐ ह्रीं अमूर्तचेतनस्वरूपसमतास्वरूपाय नमः ।

साम्यस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

शरीरादि जड़ सभी वस्तुएँ ग्रहण कर रहा है अनजान।
जिनमें चेतनपना नहीं उनको भी लेता अपनी मान।।
तू विचार कर क्रोध हर्ष क्यों पर में मूरख करता है।
तत्त्व दृष्टि बन वीतराग बन जो सब भव दुख हरता है ।।
किस पर क्रोध कर रहा पगले किस पर करता है संतोष ।
पर द्रव्यों से मोह त्याग दे जिससे हो जाए निर्दोष ।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मुनि बन पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 47 )
आगे बताते हैं कि मिथ्यादृष्टि किस वस्तु को त्यागता तथा
ग्रहण करता है और अंतरात्मा सम्यग्दृष्टि किस वस्तु को त्यागता व
ग्रहण करता हैं :-
त्यागादाने बहिर्मूढः करोत्यध्यात्ममात्मवित्।
नान्तर्बहिरुपादानं न त्यागो निष्ठितात्मनः ।। 47 ।।

अर्थ :- मूर्ख मिथ्यादृष्टि बाहरी पदार्थों में त्याग और ग्रहणकरता
है अर्थात् जिन पदार्थों को वह अनिष्ट समझकर बुरा जानता है, उन पर
तो द्वेष करके उन्हें छोड़ देता है और जिनको इष्ट समझकर अच्छा
जानता है, उन पर राग करके उन्हें ग्रहण कर लेता है पर आत्मज्ञानी
सम्यग्दृष्टि अपने भीतर त्याग और ग्रहण करता है अर्थात रागद्वेषादि
विभावों व अंतरंग, बहिरंग विकल्पों को तो वह त्यागता है और अपने
चिदानन्दमयी स्वभाव को ग्रहण करता है और कृतकृत्य आत्मा के
अन्तरंग या बहिरंग न तो कुछ ग्रहण ही होता है और न कुछ त्याग ही
होता है।

47.ॐ ह्रीं त्यागोपादानविकल्परहितसमतास्वरूपाय नमः ।

विज्ञानधनस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

बाह्य पदार्थों में तू करता त्याग ग्रहण के खोटे भाव।
उनको इष्ट-अनिष्ट जानकर भूल रहा है आत्म स्वभाव ।।
सम्यग्दृष्टि जीव करता है अपना आत्म स्वभाव ग्रहण।
राग-द्वेष के त्याग पूर्वक क्षय करता है भाव मरण।।
कृतकृत्य बन चिदानंदमय आत्म स्वभाव ग्रहण करले।
अंतरंग बहिरंग न कुछ भी ग्रहण त्याग निश्चय करले ।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मुनि बन पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 48 )
आगे कहते हैं कि सविकल्प अन्तरात्मा अन्तरंग में किस तरह
त्याग व ग्रहण करें :-
युंजीत मनसाऽऽत्मानं वाक्कायाभ्यां वियोजयेत् ।
मनसा व्यवहारं तु त्यजेद्वा क्काय योजितम् ।। 48 ।।

अर्थ :- मन से आत्मा का संबंध करे अर्थात् चित को आत्मा
के स्वरूप में एकाग्र करे तथा अपनी आत्मा को वचन और काय से
अलग करे अर्थात् उस मानस उपयोग के साथ जो कि वास्तव में
आत्मा का ज्ञानोपयोग है, आत्मा को अभेद समझे और शरीर व वचन
से आत्मा का बिल्कुल भेद है इससे उनसे आत्मा का भेद समझे और
वचन तथा काय से किए हुए व्यवहार को मन से छोड़ देवे अर्थात्
वचन व काय से जो कुछ प्रवृत्ति वा निवृत्तिरूप क्रिया बिना आसक्त-
बुद्धि के करनी पड़े उनमें उदास रहकर मन से उनकी चिंता न करें।

48. ॐ ह्रीं वाक्काययोजितमनोव्यापाररहितसमतास्वरूपाय नमः ।

निर्दण्डस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

मन से आत्मा का संबंध जोड़कर तुम एकाग्र बनो।
वचन-काय से अलग बनो तुम पर स्वरूप से अभी तनो ।।
है ज्ञानोपयोग आत्मा का यह अभेद है और अखण्ड।
भेद ज्ञान कर निज में पाओ शुद्ध आत्मा परम प्रचंड।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मुनि बन पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 49 )
अब शिष्य प्रश्न करता है कि पुत्र व स्त्री आदि के साथ वचन
व काय से व्यवहार करते हुए तो सुख की प्राप्ति होती है, तब इस
व्यवहार का त्याग करना क्यों ठीक है ? इसका समाधान आचार्य करते हैं :-
जगद्देहात्म दृष्टीनां विश्वास्यं रम्यमेव च।
स्वात्मन्येवात्मदृष्टीनां क्व विश्वासः क्व वा रतिः ।। 49 ।।

अर्थ :- देह को आत्मा मानने वाले बहिरात्माओं को यह
जगत् अर्थात् पुत्र, स्त्री, मित्र, महल, धन, वस्त्र, आभूषण, बाग,

तालाब व समुद्र आदि पदार्थ विश्वास के योग्य अर्थात् ‘ये हमारे और
हम इनके’ इस रूप तथा रमणीक व मनोरंजक ही मालूम होते हैं परन्तु
अपनी आत्मा के स्वरूप में ही आत्मा को देखने वाले अन्तरात्माओं
को इन पदार्थों पर कैसा विश्वास अथवा कैसी प्रीति ?

49.ॐ ह्रीं जगत्कायादिपरद्रव्येषुरतिभावरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

श्रद्धागुणसंपन्नोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

देह आत्मा मान रहे जो एक वही बहिरात्मा है।
स्त्री पुत्र महल धन आदिक मान रहे बहिरात्मा है।।
अन्तरात्मा अपना आत्म स्वरूप जानते भली प्रकार ।
पर पदार्थ से प्रीति भाव का तो वे करते हैं परिहार।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो, पाऊँ मुनि बन पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(50)
आगे शिष्य शंका करता है कि आत्मज्ञानी जीव का विश्वास
व प्रेम जब देहादि बाहरी पदार्थों पर नहीं होता तो भोजन करने,
अजीविका-साधन का आरम्भ करने, उपदेश करने, विहार-निहार
आदि कर्म करने व शिष्यों को सुमार्ग पर चलने की प्रेरणा करने आदि
कार्यों में उस तत्त्वज्ञानी की कैसे प्रवृत्ति होती होगी ? अब इसी का
समाधान करते हुए आचार्य कहते हैं :-
आत्मज्ञानात्परं कार्यं न बुद्धौ धारयेच्चिरम्।
कुर्यादर्थवशात्किंचिद्वाक्कायाभ्यामतत्परः ।। 50 ।।

अर्थ :- तत्त्वज्ञानी आत्मज्ञान व आत्मानुभव के सिवाय दूसरे
कार्य को अपने या दूसरे के उपकार रूप प्रयोजन के होने पर उनमें
लीन व आसक्त न होता हुआ वचन और काय से कुछ करे, तो करे पर
उसे अपनी बुद्धि में बहुत काल तक नहीं रक्खे अर्थात् आत्मज्ञान के
कार्य पर तो बराबर लक्ष्य रक्खे पर अन्य कार्यों को करके भूल जावे।

50. ॐ ह्रीं आत्मज्ञानातन्यत्कार्यरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

कारणपरमात्मस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

तत्त्व ज्ञान करने वाला ही आत्म ज्ञान युत अनुभव कर।
पर में लीन न होना अणुभर या आसक्ति न हो कण भर ।।
वचन-काय से कुछ करता है तो मत रखना उसमें बुद्धि ।
बहुत काल तक अगर करेगा तो फिर कभी न होगी सिद्धि ।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो, पाऊँ मुनि बन पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 51 )
आचार्य कहते हैं कि अंतरात्मा शरीरादि का काम करते हुए भी
बुद्धि में आत्मज्ञान को जागृत रखता है और जब शरीरादि के कामों से
वह निवृत्त होता है तब आतमज्ञान में विशेष उद्यमशील होता हुआ
अंतरंग में इस भाँति विचार करता है :-
यत्पश्यामीन्द्रियैस्तन्मे नास्ति यन्नियतेन्द्रियः ।
अन्तः पश्यामि सानन्दं तदस्तु ज्योतिरुत्तमम् ।। 51 ।।

अर्थ :- मैं जिन शरीरादि बाहरी पदार्थों को इंद्रियों के द्वारा
देखता हूँ सो मेरा स्वरूप नहीं है तथा इन्द्रियों को जीतकर जितेन्द्रिय
होकर जिस अतीन्द्रिय आनन्दरूप उत्कृष्ट आत्मज्योति को अपने
भीतर देखता हूँ, अनुभव करता हूँ सो ही मेरा स्वरूप होंवे।

51.ॐ ह्रीं निजानंदरूपसमतास्वरूपाय नमः ।

ज्ञानज्योतिस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

शरीरादि पर पदार्थ आदिक रंच नहीं है आत्म स्वरूप।
इन्द्रियजयी अतीन्द्रिय होकर हो जाना आनंद स्वरूप।।

वह उत्कृष्ट ज्योति भीतर है सम्यक् उज्ज्वल महा महान।
अनुभव करते ही मिलता है मिलता सिद्ध स्व पद निर्वाण ।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मुनि बन पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 52 )
‘आत्मा की परम ज्योति जब आनन्द से पूर्ण है तब इन्द्रियों को
रोककर आत्मा का अनुभव करने पर दुःख क्यों होना चाहिए ?’ ऐसी
शिष्य की शंका का निरास आचार्य करते हैं :-
सुखमारब्धयोगस्य बहिर्दुःखमथात्मनि ।
बहिरेवासुख सौख्यमध्यात्मं भावितात्मनः ।। 52 ।।

अर्थ :- जिसने आत्मध्यान का अभ्यास प्रारंभ किया है अर्थात्
जो पहली बार निज स्वरूप की भावना का उद्यम कर रहा है उसे अपने
स्वरूप से बाहर अन्य विषयों में तो सुख मालूम होता है और खेद है
कि अपने आत्मस्वरूप के मनन में कष्ट होता है परन्तु जिसने अपनी
आत्मा की सतत् भावना करके यथावत निज स्वरूप का अभ्यास कर
लिया है उसे आत्मा से बाहर के विषयों में दुःख तथा निज चैतन्य-
स्वरूप में ही सुख मालूम होता है।

52.ॐ ह्रीं निजसौख्यार्णवरूपसमतास्वरूपाय नमः ।

आनंदधामस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

आत्म ज्ञान अभ्यास अगर प्रारंभ किया है पहली बार।
उद्यम कर निज आत्मरूप भावना का तू बारंबार ।।
जो स्वरूप से विमुख उसे ही होता है उर में बहुखेद।
जो आत्मा की सतत् भावना करता उसे न होता खेद।।
आत्मा से बाहर विषयों में तो लगता है उसको दुख।
निज चैतन्य स्वरूप भावना में ही मिलता उत्तम सुख।।

नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मुनि बन पद निर्वाण ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 53 )
आचार्य कहते हैं कि आत्मस्वरूप की भावना निम्न प्रकार से
करनी चाहिए :-
तद्ब्रूयातत्परान् पृच्छेतदिच्छेत्तत्परो भवेत् ।
येनविद्यामयं रूपं त्यक्त्वा विद्यामयं ब्रजेत् ।। 53 ।।

अर्थ :- उस आत्मस्वरूप को कहे अर्थात् उसी का व्याख्यान
करे; उसी आत्मस्वरूप को दूसरों से यानि जिन्हें उसका अच्छा ज्ञान
तथा अनुभव है उनसे पूछे, उसी को चाहे अथवा उसी की प्राप्ति की
दृढ़ कामना करे और उसी की भावना में आदरवान होकर लीन होवे
जिस आत्मस्वरूप के द्वारा अर्थात् जिसकी भावना करने से अज्ञानमयी
विभाव यानि बहिरात्म स्वभाव को छोड़कर ज्ञानमयी अर्थात् अंतरात्म
स्वभावमयी अथवा केवल ज्ञानमयी अवस्था को प्राप्त हो जावे।

53ॐ ह्रीं अविद्यामयरूपरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

ज्ञानार्णवस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

आत्मस्वरूप कथन करने वालों से ही पूछों अनुभव।
दृढ़ कामना उसे पाने की अंतर में जागे अभिनव ।।
आत्म भावना भाने से ही क्षय होते अज्ञान विभाव।
अंतरात्मा हो जाते ही क्षय होता बहिरात्म स्वभाव ।।
फिर परमात्म दशा होती है प्रगटित होता ज्ञानस्वभाव।
अंतरात्मा स्वभाव वाला ही पाता है सिद्ध स्वभाव।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 54 )
अब यहाँ कोई शंका करता है कि वचन और काय को छोड़कर
जब आत्मा इनसे भिन्न कोई दूसरा पदार्थ ही नहीं है तो उसकी चर्चा
करो व उसी की भावना करो, यह बात कहनी ठीक नहीं है ? इसी का
समाधान आचार्य करते हैं :-
शरीरे वाचि चात्मानं सन्धत्ते वाक्शरीरयोः ।
भ्रान्तोऽभ्रान्तः पुनस्तत्त्वं पृथगेषां विबुध्यते ।। 54 ।।

अर्थ :- वचन और शरीर में आत्मा की मान्यता करने वाला
बहिरात्मा शरीर और वचन में आत्मा का आरोपण करता है परन्तु जो
शरीर और वचन में आत्मा की भ्रांति नहीं रखता किन्तु यथावत्
स्वरूप को जानता है ऐसा अन्तरात्मा इन शरीर और वचन के स्वरूप
को आत्मा से भिन्न समझता है।

54.ॐ ह्रीं भ्रान्ताभ्रान्तविकल्परहितसमतास्वरूपाय नमः ।

संशयादिरहितोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

वचन देह में आत्म मान्यता करने वाला बहिरात्मा।
वचन देह में आत्मा का आरोपण करता वह आत्मा।।
वचन देह में आत्म भ्रान्ति से जो रहता योजन भर दूर।
वही आत्मा वचन देह के विकल्प से हो जाता दूर ।।
भिन्न आत्मा समझ देह से हो जाता सुख से आपूर्ण।
पाता है आनंद अतीन्द्रिय होता शाश्वत सुख परिपूर्ण।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 55 )
इस तरह आत्मा के सच्चे स्वरूप को न जानता हुआ मूढ़बुद्धि
बहिरात्मा इन्द्रियों के जिन विषयों में आसक्तचित्त होकर फँस जाता है,

उनमें से कोई भी विषय उसका उपकार करने वाला नहीं है, ऐसा
आचार्य कहते हैं :-
न तदस्तीन्द्रियार्थेषु यत्क्षेमङकरमात्मनः ।
तथापि रमते बालस्तत्रैवाज्ञान भावनात् ।। 55।।

अर्थ :- उन पाँचों इन्द्रियों के विषयरूप पदार्थों में ऐसा कोई
भी पदार्थ नहीं है जो इस आत्मा का कुशलक्षेम करने वाला हो पर फिर
भी यह बालकवत् मूढ़ अज्ञानी बहिरात्मा अनादिकालीन मिथ्यात्व के
संस्कार से पाई हुई अपनी अज्ञान भावना के जोर से उन्हीं इन्द्रियों के
विषयों में रमण व प्रीति करता है और अपने स्वरूप में रमण नहीं करता।

55.ॐ ह्रीं शिवमङ्गलरूपसमतास्वरूपाय नमः ।

शिवानंदस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

वचन देह अथवा इन्द्रिय विषयों में कोई नहीं पदार्थ।
जो आत्मा का कुशलक्षेम करने वाला हो सरल यथार्थ ।।
फिर भी बालक वत् अज्ञानी बहिरात्मा करता है यत्न।
मिथ्या संस्कार है उर में निजसुख का है नहीं प्रयत्न।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 56 )
आगे फिर भी आचार्य अनादिकालीन मिथ्यात्व के संस्कार के
आधीन होने से बहिरात्माओं की दशा किस प्रकार की होती है, उसे
बतलाते हैं :-
चिरं सुषुप्तास्तमसि मूढात्मानः कुयोनिषु।
अनात्मीयात्मभूतेषु ममाहमिति जाग्रति ।। 56।।

अर्थ :- मिथ्यात्व संस्काररूपी अंधकार के होते हुए मूढ़
बहिरात्मा प्राणी अनादिकाल से नित्य निगोद आदि चौरासी लाख

योनियों में सोये रहते हैं और उन्हें अपने आत्मस्वरूप की कुछ भी
खबर नहीं होती क्योंकि मनरहित अवस्थाओं में विचार करने का
अवसर ही नहीं होता। कदाचित् मन सहित अवस्थाओं में जब वे जन्म
धारते हैं तब कुछ समझने लगते हैं, परन्तु अज्ञान के होते हुए उन
अवस्थाओं में भी अनात्मीय पुत्र, स्त्री व धनादि बिल्कुल पर-वस्तुओं
में तथा आत्मीय शरीर व इन्द्रियों आदि में ममकार अहंकार करते हुए
यानि पुत्र, स्त्री आदि में तो ममपना तथा शरीर, इन्द्रियों व रागद्वेषादि
भावकर्मों में अहंपना करते हुए वे जागते हैं और इस प्रकार संज्ञी
अवस्था में भी अज्ञान की वासना से अपने असली स्वरूप को नहीं
समझकर वे पर में ही अहंकार-ममकार किया करते हैं।

56. ॐ ह्रीं अनात्मीयपरद्रव्यरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

आत्मानंदस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

मिथ्या संस्कार से दूषित बहिरात्मा है अज्ञानी।
लाख चौरासी योनि भ्रमण करता रहता है ये प्राणी।।
आत्मतत्त्व की खबर नहीं है भूला अपना आत्म स्वभाव ।
पर में अहम् तथा ममकार भाव का ही है पूर्ण प्रभाव।।
राग-द्वेष आदिक से पीड़ित भाव मरण करता प्रतिक्षण।
संज्ञी होकर भी अज्ञान वासना से दुखिया प्रतिक्षण।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 57 )
आगे आचार्य कहते हैं कि हे भव्य जीवों ! बहिरात्म-स्वभाव
को छोड़ो और शरीर को कभी भी अपना न मानकर उसका इस तरह
अनुभव करो :-

पश्येन्निरंतरं देहमात्मनोऽनात्मचेतसा ।
अपरात्मधियाऽन्येषामात्मतत्वे व्यवस्थितः ।। 57 ।।

अर्थ :- आत्मा के यथार्थस्वरूप में व्यवस्थित होता हुआ
अन्तरात्मा अपने शरीर को अनात्मबुद्धि से अर्थात् ‘यह देह मेरी
आत्मा नहीं है’ इस बुद्धि से और दूसरे प्राणियों के शरीर को भी ‘वे
दूसरों की आत्मा नहीं है’ ऐसी बुद्धि से अर्थात् अनात्मबुद्धि से सदा
ही देखे।

57.ॐ ह्रीं पररूपदेहरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

स्वगुणवैभवस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

आत्मा के यथार्थ रूप में हुआ व्यवस्थित अंतरात्मा।
आत्मबुद्धि से जान रहा है देह नही है यह आत्मा।।
पर की आत्मा भी अनात्मा यही जानना सम्यक्ज्ञान।
शुद्ध आत्मा अपनी भजकर शेष अनात्मा हैं पहचान।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं नि. ।

( 58 )
आगे शिष्य शंका करता है कि जो आत्मस्वरूप का स्वयं
अनुभव करते हैं वे उसका अनुभवन कर मूढ़ अज्ञानी जीवों को क्यों
नहीं बताते, वे मूढ़ उस आत्मस्वरूप को स्वयं तो जानते नहीं पर यदि
उनको बताया जाये तो वे भी जानकर सुखी होवें ? इसके समाधान में
आचार्य गूढ़ मर्म की तरफ झुकते हुए इस भांति कहते हैं :-
अज्ञापितं न जानन्ति यथा मां ज्ञापितं तथा।
मूढात्मानस्ततस्तेषां वृथा में ज्ञापनश्रमः ।। 58 ।।

अर्थ :- अज्ञानी मूर्ख प्राणी जिस तरह बिना समझाए हुए मेरे
अर्थात् आत्मा के स्वरूप को नहीं जानते हैं वैसे ही समझाए जाने पर
भी नहीं जानते क्योंकि उनके मिथ्यात्व भाव की प्रबलता है और जब
वे किसी तरह समझ ही नहीं सकते तब उन मूढात्माओं के लिए मेरा
समझाने का परिश्रम निष्फल है।

58. ॐ ह्रीं ज्ञापनश्रमरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

ज्ञायकस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

अज्ञानी समझाने पर भी नहीं जानता आत्मस्वरूप ।
समझाने पर भी नहीं मानता मिथ्याभाव प्रबल दुखरूप ।।
मूढात्मा को समझाने का सर्व परिश्रम निष्फल है।
उसका मन अज्ञान भाव के कारण ही अति चंचल है ।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 59 )
इस संबंध में दूसरा श्लोक कहते हैं :-
यद्बोधयितुमिच्छामि तन्नाहं यदहं पुनः ।
ग्राहयं तदपि नान्यस्य तत्किमन्यस्य बोधये ।। 59।।

अर्थ :- जिस विकल्प के द्वारा आत्मस्वरूप को या देहादिक
को समझाने की मैं इच्छा करता हूँ वह विकल्प मैं निश्चय से हूँ नहीं
और जो चिदानन्दमयी स्वरूप मैं हूँ सो दूसरे से समझने योग्य नहीं है,
वह तो स्वयं अनुभवने योग्य है इसीलिये मैं दूसरे को क्या समझाऊँ ?

59.ॐ ह्रीं अन्यबोधनेच्छारहितसमतास्वरूपाय नमः ।

निरिच्छस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

जिस विकल्प के द्वारा आत्म बताने का है सतत् प्रयत्न।
देहादिक का स्वरूप समझाने का है आगम का यत्न।।
निश्चय से मैं विकल्प विरहित चिदानंदमय आत्मा हूँ।
सदा समझने योग्य तथा अनुभव के योग्य आत्मा हूँ।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 60 )
अंतरंग तत्त्व को समझाए जाने पर भी बहिरात्मा का अनुराग
उस तत्त्व में होना संभव नहीं है क्योंकि मोह के उदय से उस का
अनुराग बाहरी पदार्थों में ही होता है, इसी बात को अब दिखाते हैं :-
बहिस्तुष्यति मूढात्मा पिहितज्योतिरन्तरे ।
तुष्यत्यंतः प्रबुद्धात्मा बहिर्व्यावृत्ति कौतुकः ।। 60 ।।

अर्थ :- अंतरंग में जिसकी ज्ञान-ज्योति, मोह या मिथ्यात्व से
विपरीत हो रही है ऐसा मूढ़बुद्धि अज्ञानी जीव बाहरी शरीरादि पदार्थों
में प्रीति करता है, परन्तु जिसके मिथ्यात्व का उदय नहीं है ऐसा
आत्मज्ञानी जीव बाहरी शरीरादि पदार्थों में मूर्च्छा को त्यागता हुआ
अंतर में जो आत्मतत्त्व हैं, उसमें प्रीति करता है।

60.ॐ ह्रीं बाह्यकौतुकरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

स्वयंभूस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

अंतरंग में जिसकी ज्ञान ज्योति मंद है पर की मीत।
ऐसा मूढ़ बुद्धि अज्ञानी देहादिक से करता प्रीत ।।
पर न जिसे मिथ्यात्व उदय है वही आत्मज्ञानी प्राणी।
पर पदार्थ से मूर्छा तजता आत्मतत्त्व प्रेमी ज्ञानी ।।

भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 61 )
अंतरात्मा शरीर आदि को भूषित वा अलंकारित करने के
अनुराग से क्यों हटा हुआ होता है, इसका समाधान आचार्य करते हैं :-
न जानन्ति शरीराणि सुखदुःखान्यबुद्धयः ।
निग्रहानुग्रहधियं तथाप्यत्रैव कुर्वते ।। 61 ।।

अर्थ :- सब शरीर जड़ होने से सुखों तथा दुखों को नहीं जानते
हैं तो भी अज्ञानी बहिरात्मा जीव इन्हीं शरीरों पर ही निग्रह अर्थात् दंड
और अनुग्रह अर्थात् उपकार की बुद्धि किया करते हैं।

61.ॐ ह्रीं निग्रहानुग्रहरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

अनशनस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

शरीरादि जड़ नहीं जानता सुख अथवा दुख पल भर भी।
फिर भी अज्ञानी मोहित है इन पर सदा अनुग्रह भी ।।
है उपकार बुद्धि जड़ तन पर विषय वासना का है राग।
अंतरात्मा को न राग है रंच नहीं तन पर अनुराग ।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्री समाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 62 )
जब तक शरीर आदि पर-पदार्थों में आत्मपने की बुद्धि हो रही
है तभी तक संसार है तथा इस बुद्धि के छूटने पर ही मुक्ति है, ऐसा
दिखाते हुए कहते हैं :-
स्वबुद्धया यावद्गृहणीयात्कायवाग्चेतसां त्रयम् ।
संसारस्तावदेतेषां भेदाभ्यासे तु निवृतिः ।। 62 ।।

अर्थ :- जब तक शरीर, वचन और मन-इन तीनों का आत्मपने
की बुद्धि से ग्रहण है तब तक संसार है अर्थात् जीव का संसार में भ्रमण
है परन्तु इनके भेद का इस इनके भेद का इस रूप ज्ञान होने से कि ये
तीनों मन, वचन व काय आत्मा के स्वभाव से भिन्न हैं, मुक्ति है अर्थात्
संसार से जीव छूट जाता है।

62.ॐ ह्रीं मनोवाक्कायरूपसंसारदुःखरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

सदानंदस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

मनवचतन में आत्मपने की बुद्धि ग्रहण है तो संसार।
ऐसे जीवों का संसार भ्रमण ही है दुख का आगार।।
मन-वचन निज आत्मा से हैं भिन्न जानता जो प्राणी।
वह संसार दुखों को क्षय कर मुक्ति प्राप्त करता ज्ञानी ।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 63 )
शरीर आदि से आत्मा का भेद-विज्ञान हो जाने पर वह अंतरात्मा
शरीर की दृढ़ता वा मरणादि में आत्मा की दृढ़ता वा मरणादि को नहीं
मानता है, इसी बात को आगे दिखाते हैं :-
घने वस्त्रे यथाऽऽत्मानं न घनं मन्यते तथा।
घने स्वदेहेप्यात्मानं न घनं मन्यते बुधः ।। 63 ।।

अर्थ :- जैसे बुद्धिमान मनुष्य शरीर पर बहुत मोटे वस्त्रों को
पहन लेने पर भी अपने को मोटा नहीं मानता वैसे अपनी देह के मोटे
होने पर भी बुद्धिमान अंतरात्मा अपनी आत्मा का मोटा नहीं मानता।

63.ॐ ह्रीं शरीरदृढ़तादिविकल्परहितसमतास्वरूपाय नमः ।

चिद्घनस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

ज्ञानी मोटे वस्त्र पहिन तन मोटा नहीं जानता है।
अगर देh मोटी ही आत्मा मोटी नहीं मानता है ।।
भिन्न देह से निज चैतन्य मूर्त्ति आत्मा अपनी जान।
अंतरात्मा ज्ञानी प्राणी पा लेता है केवलज्ञान।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 64 )
ऐसा ही और भी कहते हैं :-
जीर्णे वस्त्रे यथाऽऽत्मानं न जीर्ण मन्यते तथा।
जीर्णे स्वदेहेऽप्यात्मानं न जीर्णं मन्यते बुधः ।। 64 ।।

अर्थ :- जैसे वस्त्रों के पुराना होते हुए कोई बुद्धिमान अपनी
देह को पुराना नहीं मानता वैसे ही अपनी देह के जीर्ण होने पर भी
बुद्धिमान ज्ञानी अपनी आत्मा को जीर्ण नहीं मानता।

64.ॐ ह्रीं जीर्णशरीरविकल्परहितसमतास्वरूपाय नमः ।

अजरोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

जीर्णवस्त्र हो जाने पर निज आत्मजीर्ण जानता नहीं।
देह जीर्ण होने पर ज्ञानी आत्म जीर्ण मानता नहीं।।
दुबली पतली नहीं आत्मा ना मोटी है ना बीमार।
एकमात्र निज दर्शन ज्ञान स्वरूपी गुण अनंत भंडार ।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 65 )
पुनः यही कहते हैं :-

नष्टे वस्त्रे यथाऽऽत्मानं न नष्टं मन्यते तथा।
नष्टे स्वदेहेऽप्यात्मानं न नष्टं मन्यते बुधः ।। 65 ।।

अर्थ :- जैसे वस्त्रों के पुराना होते हुए कोई बुद्धिमान अपनी
देह को पुराना नहीं मानता वैसे ही अपनी देh के जीर्ण होने पर भी
बुद्धिमान ज्ञानी अपनी आत्मा को जीर्ण नहीं मानता।

65.ॐ ह्रीं शरीरनाशादिविकल्परहितसमतास्वरूपाय नमः ।

अमरोऽहम् ।

(छंद-वीर)

जैसे वस्त्र नाश होने पर नहीं मानता अपना नाश।
नाश आत्मा का न मानता होता है जब देह विनाश।।
अजर अमर आत्मा का होता मरण कभी भी कहीं नहीं।
सदा अजन्मा अव्यय अक्षय तथा जन्म भी कभी नहीं।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 66 )
फिर से ऐसा कहते हैं :-

रक्ते वस्त्रे यथाऽऽत्मानं न रक्तं मन्यते तथा।
रक्ते स्वदेहेऽप्यात्मानं न रक्तं मन्यते बुधः ।। 66 ।।

अर्थ :- जैसे कपड़ों के लाल होते हुए भी लाल रंग के कपड़े
पहने हुए कोई अपनी देह को लाल नहीं मानता वैसे ही बुद्धिमान
लाल रंग की अपनी देह होने पर भी अपनी आत्मा को लाल नहीं मानता।

66.ॐ ह्रीं रक्तादिवर्णयुक्तशरीररहितसमतास्वरूपाय नमः ।

अवर्णस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

वस्त्र लाल होने पर कोई देह लाल मानता नहीं।
देह लाल होने पर ज्ञानी आत्म लाल जानता नहीं।।
उस प्रकार ज्यों राग सहित आत्मा होती न कभी रागी।
निजानंद का अनुभव करता होता परम वीतरागी।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 67 )
इस प्रकार आत्मा को शरीरादि से भिन्न जानने वाले अंतरात्मा
को जब ये शरीरादि काष्ठादि के समान मालूम होते हैं, तब इसे मुक्ति
की योग्यता होती है, ऐसा दर्शाते हुए कहते हैं :-
यस्य सस्पन्दमाभाति निःस्पन्देन समं जगत् ।
अप्रज्ञमक्रिया भोगं स शमं याति नेतरः ।। 67 ।।

अर्थ :- जिस आत्मा के विचार में हलन-चलनयुक्त यह
शरीरादि रूप जगत स्थिर के समान अर्थात् काष्ठ, पाषाणादि के बराबर,
प्रज्ञारहित अचेतन जड़ तथा पदार्थ की चंचलता रूप क्रिया से एवं
सुखादि के अनुभवरूप भोग से रहित मालूम होता है वह पुरुष परम
वीतराग भाव को प्राप्त हो जाता है अर्थात् उसे संसार, शरीर, भोगों से
वैराग्य हो जाता है और कोई दूसरा वैराग्य भाव को प्राप्त नहीं होता है।

67.ॐ ह्रीं इन्द्रियप्रणालिरूपविषयोत्सवरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

अक्रियाभोगस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

जिस आत्मा के विचार में यह हलन चलन युत सकल जगत।
प्रज्ञारहित अचेतन जड़ सब काष्ठ समान देखता गत।।
भव तन भोग विराग जिसे है उसे नहीं होता है राग।
वीतराग भावों से ओतः प्रोत सुहाता रंच न राग।।

भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 68 )
जब आत्मा शरीरादि से भिन्न है तथा इसका भिन्न अनुभव
करने से परम शांति प्राप्त होती है तब बहिरात्मा शरीरादि पुद्गल द्रव्यों
से भिन्न आत्मा को क्यों नहीं समझता, अब इस बात का आचार्य
समाधान करते हैं :-
शरीर कंचुकेनात्मा संवृत ज्ञान विग्रहः ।
नात्मानं बुध्यते तस्माद्भमत्यति चिरं भवे।। 68।।

अर्थ :- कार्माण शरीर रूपी कांचली से जिसका ज्ञान शरीर
ढक रहा है, ऐसा वह बहिरात्मा जीव अपनी आत्मा को, जैसा उसका
सच्चा स्वरूप है वैसा नहीं जानता है और इसी अज्ञान के कारण वह
दीर्घकाल तक इस संसार में भ्रमण किया करता है।

68. ॐ ह्रीं कार्मणादिशरीररहितसमतास्वरूपाय नमः ।

ज्ञानविग्रहस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

कार्माण तन रूप कांचली से ढक रहा निजात्म शरीर।
वह बहिरात्मा नहीं जानता शुद्ध आत्मा है अशरीर ।।
इस अज्ञान भाव के कारण भ्रमता रहता है संसार।
आत्मज्ञान के अभाव से ही पाता रहता कष्ट अपार।।
शुद्ध-बुद्ध ज्ञाता-दृष्टा आनंदमयी चैतन्य पदार्थ ।
नहीं जानता है बहिरात्मा भूले से भी वस्तु यथार्थ।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 69 )
शिष्य प्रश्न करता है कि जब बहिरात्मा जीव जैसा उस आत्मा
का स्वरूप है वैसा नहीं समझते तो वे उसका स्वरूप कैसा जानते हैं,
इसी का आचार्य समाधान करते हैं :-
प्रविशद्गलितां व्यूहे देहेऽणूनां समाकृतौ ।
स्थितिभ्रांत्या प्रपद्यन्ते तमात्मानमबुद्धयः ।। 69।।

अर्थ :- अज्ञानी बहिरात्मा जीव समान आकार में अर्थात् आत्मा
के साथ एक क्षेत्रावगाहरूप संबंध रखने वाले आते और जाते हुए
परमाणुओं के समुदायरूप देह की स्थिति रहने के भ्रम से अर्थात् देह
सदा बनी रहेगी, इस भ्रम से उस देह को आत्मा ही समझ लेते हैं अर्थात्
उन्हें देह और आत्मा एक रूप ही हैं, ऐसा मिथ्याश्रद्धान होता है।

69. ॐ ह्रीं देहे स्थितिभ्रान्तिरूपाध्यवसायरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

अनाद्यनन्तस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

एक क्षेत्र अवगाह रूप संबंध आत्मा का तन से।
आते जाते पुद्गल के परमाणु सदा ही जड़ तन से।।
देह आत्मा एक मानकर देहस्थिति का करता यत्न।
इस भ्रम से मिथ्यात्व नाश का करता कभी न रंच प्रयत्न ।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 70 )
अब आचार्य कहते हैं कि जिस अज्ञानी जीव को आत्मा का
यथार्थ स्वभाव मालूम नहीं है उसे अपनी आत्मा को देह से भिन्न
जानने के लिए इस तरह की भावना करनी चाहिए :-
गौरः स्थूलः कृशो वाऽमित्यंगेनाविशेषयन् ।
आत्मानं धारयेन्नित्यं केवलज्ञप्तिविग्रहम् ।। 70 ।।

अर्थ :- मैं गोरा, मोटा या दुबला हूँ इस प्रकार की मान्यता को
शरीर के साथ एक रूप मानता हुआ अर्थात् गोरापना, मोटापना या
दुबलापना आदि रूप अवस्था मुझ आत्मा की नहीं है, किन्तु इस शरीर
की है, ऐसा जानता हुआ सर्वदा अपनी आत्मा को मात्र ज्ञानस्वरूप ही
अर्थात् रूपादि रहित ज्ञानरूप ही है स्वरूप जिसका, ऐसा अपने चित्त
में धारण करें।

70.ॐ ह्रीं गौरस्थूलादिरूपशरीरविकल्परहितसमतास्वरूपाय नमः ।

केवलज्ञानस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

मैं गौरा हूँ मैं मोटा हूँ दुबली-पतली मेरी देह।
नहीं मानता ज्ञानी प्राणी तन से करता नहीं सनेह ।।
अतः आत्मा ज्ञान स्वरूपी को ही उर में धारण कर।
पुनः पुनः तू भेदज्ञान कर पर प्रवृत्ति का जारण कर।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 71 )
आचार्य कहते हैं कि इस प्रकार आत्मा को जो एकाग्र मन से
भाता है उसकी ही मुक्ति होती है, दूसरे की नहीं :-
मुक्तिरेकान्तिकी तस्य चित्ते यस्याचला धृतिः ।
तस्य नैकान्तिकी मुक्तिर्यस्य नास्त्यचला धृतिः ।। 71 ।।

अर्थ :- जिस अंतरात्मा के चित्त में आत्मस्वरूप की निश्चल
धारणा है अर्थात् जिसकी स्वस्वरूप में लवलीनता है उस महापुरुष
की मुक्ति होना अथवा उसका कर्मों से छूटकर स्वाधीन, स्वतंत्र होना
अवश्यम्भावी यानि अवश्य सिद्ध है तथा जिसकी आत्मस्वरूप में
निश्चलता से थिरता नहीं है उस समाधिरहित पुरुष की मुक्ति होना
अवश्य असिद्ध है।

71. ॐ ह्रीं अविचलज्ञानरूपसमतास्वरूपाय नमः ।

निश्चलबोधस्वरूपोऽहं ।

(छंद-वीर)

जिस ज्ञानी के उर में आत्मस्वरूप धारणा निश्चल है।
जो स्वरूप साधना लीन है उसकी मुक्ति सहज फल है ।।
आत्मतत्त्व में जो न अचल है वह न मुक्त हो सकता है।
पुरुष समाधि रहित तो सुख से नहीं युक्त हो सकता है ।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 72 )
आचार्य कहते हैं कि अपने स्वरूप में चित्त निश्चलता के साथ
प्रवृत्ति उसी वक्त होगी जब लोगों के साथ मिलना-जुलना छोड़कर
आत्मस्वरूप का अनुभव किया जावे। बिना जन-संसर्ग छोड़े स्वानुभव
न होगा और बिना स्वानुभव के मुक्ति का समर्थ कारण न बनेगा :-
जनेभ्यो वाक् ततः स्पन्दो मनसश्चित्तविभ्रमाः।
भवन्ति तस्मात्संसर्ग जनैर्योगी ततस्त्यजेत् ।। 72 ।।

अर्थ :- मनुष्यों के साथ संगम होने से वचन की प्रवृत्ति होती
है, उस वचन विलास से मन की चंचलता होती है और उस चंचलता
से मन में नाना प्रकार के विकल्प होते हैं इसीलिए ध्यान करने का
इच्छुक योगी मनुष्यों के साथ संपर्क को छोड़ देवे ।

72.ॐ ह्रीं चित्तविभ्रमकारणलोकसंसर्गरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

असंगोऽहम् ।

(छंद-वीर)

मनुजों के संगम से होती वचन प्रवृत्ति व वचन विलास ।
उससे मन चंचल होता है चंचलता से चित्त विनाश।।
बहु प्रकार के विकल्प होते अतः उन्हें तू योगी त्याग।
आत्मध्यान इच्छुक हे योगी सब मनुजों का संग दे त्याग ।।

योग्य शिष्य के प्रति भी आकर्षण है तो वह बाधक है।
एकमात्र अद्वैतभाव ही आत्म सिद्धि में साधक है।।
नगर छोड़कर वन पर्वत उपवन आदिक में रहना योग्य ।
नगर मध्य या नगर निकट रहना तो मुनि को सदा अयोग्य ।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 73 )
यहाँ शिष्य शंका करता है कि तब क्या मनुष्यों का संगम
छोड़कर तत्त्वज्ञानी को जंगल में रहना चाहिए ? अब इसका समाधान
आचार्य करते हैं :-
ग्रामोऽरण्यमिति द्वेधा, निवासोऽनात्मदर्शिनाम् ।
दृष्टात्मनां निवासस्तु विविक्तात्मैव निश्चलः ।। 73 ।।

अर्थ :- जिन्होंने आत्म-स्वरूप के अनुभव की प्राप्ति नहीं
की है उन्हें ही ऐसा विकल्प होता है कि गाँव व वन दो प्रकार के
निवास होते हैं पर जिन्होंने आत्मा के स्वरूप का अनुभव कर लिया
है उनका रहने का स्थान तो निश्चल अर्थात् चित्त की आकुलता रहित
एवं विविक्त अर्थात् रागादि रहित विशुद्ध आत्मा ही होता है।

73.ॐ ह्रीं अरण्यग्रामादिविकल्परहितसमतास्वरूपाय नमः ।

चैतन्यधामस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

तत्त्व बोधि जिसको हो जाती वही चाहता है एकान्त।
मनुज भीड़ को पास न आने देता होता कभी न भ्रान्त।।
योगी वार्तालाप छोड़कर करता है निज का ही ध्यान।
यदि कुछ कहना पड़े अल्प कह, हो जाता है मौन प्रधान ।।

आत्मा का अनुभव न जिसे है वह करता है विविध विकल्प।
ग्राम तथा वन दोनों में करता निवास जाते न विजल्प।।
जिसने अनुभव किया आत्म का वह निश्चल ही रहता है।
आकुलता से रहित राग से रहित दिशा में बहता है।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 74 )
अब आचार्य बताते हैं कि जो आत्मानुभवी है उन्हें अंत में क्या फल
होता है व जो आत्मज्ञानी नहीं किन्तु मिथ्यादृष्टि हैं, उन्हें क्या फल होता हैं :-
देहान्तरगतेर्बीजं देहेऽस्मिन्नात्म भावना।
बीजं विदेह निष्पत्तेरात्मन्येवात्म भावना ।। 74।।

अर्थ :- कर्मों के उदय से ग्रहण किये हुए इस शरीर में आत्मा
की इस रूप भावना करना कि यह शरीर है सो ही मैं हूँ तथा इसके
सिवाय अन्य कोई शुद्ध, बुद्ध, वीतराग व अमूर्तिक आत्मा मैं नहीं हूँ,
अन्य जन्म में भी देह के प्राप्त होते रहने का कारण है। इसके विरुद्ध
आत्मा के स्वरूप में ही आत्मपने की इस तरह भावना करना कि
परमात्मा के समान जो कोई शुद्ध-बुद्ध, अविनाशी एक चैतन्य पदार्थ
है सो ही मैं हूँ, देहरहित होकर मुक्ति प्राप्त करने का कारण है।

74.ॐ ह्रीं देहान्तरगमनबीजरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

विदेहस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

देह प्राप्ति का बीज देह से ममता ही है अति दुखरूप।
आत्म भावना से विरहित है नहीं जानता आत्मस्वरूप ।।
जो ध्याता है शुद्ध-बुद्ध चैतन्य आत्मा ही पल-पल।
देह रहित हो मुक्ति प्राप्ति का बीज वही बोता प्रतिफल ।।

भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 75 )
शिष्य प्रश्न करता है कि जिस आत्मज्ञान व आत्म-भावना से
यह जीव दुःखों से छूट जाता है उस आत्मज्ञान के लिए किसी गुरु की
तो आवश्यकता होनी ही चाहिए, बिना गुरु के आत्मज्ञान कौन बतावे ?
इसका समाधान आचार्य करते हैं :-
नयत्यात्मानमात्मैव जन्मनिर्वाणमेव च।
गुरुरात्मात्मनस्तस्मान्नान्योऽस्ति परमार्थतः ।। 75।।

अर्थ :- देह आदि पर-पदार्थों में अपनेपने की भावना की दृढ़
मिथ्याबुद्धि के वश से आत्मा ही अपने आपको संसार में ले जाता है
अर्थात् जन्म-जन्मातर में भ्रमण कराता है तथा वही आत्मा अपनी
आत्मा में ही अपनेपने की बुद्धि की महिमा के वश से अपने को निर्वाण
में ले जाता हैं अर्थात् कर्मों से छुड़ा लेता है अतः निश्चय से आत्मा का
गुरु अर्थात् हितकारी शिक्षक वा प्रवर्त्तक आत्मा ही है दूसरा कोई नहीं।

75.ॐ ह्रीं गुरुशिष्यादिसम्बन्धरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

अपूर्वचित्स्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

देह आदि पर पदार्थ में अपनेपन की है बुद्धि हृदय।
मिथ्याबुद्धि विवश होकर के पाता है संसार निलय।।
जन्म तथा जन्मांतर तक यह भ्रमण मूल अज्ञान विभाव।
आत्मा में ही अपनेपन की बुद्धि वही है ज्ञान स्वभाव ।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 76 )
आगे कहते हैं कि जो देह में ही आत्मपने की बुद्धि रखता है
वह मरण निकट आने पर क्या विचार करता है :-
दृढ़ात्मबुद्धिर्देहादावुत्पश्यन्नाशमात्मनः

मित्रादिभिर्वियोगं च बिभेति मरणाभृशम् ।। 76 ।।

अर्थ :- शरीर आदि पदार्थों में दृढ़ता से आतमपने की बुद्धि
रखने वाला बहिरात्मा मृत्यु में अपना नाश और मित्रादिकों से वियोग
देखता हुआ मरण से अतिशय करके डरता हैं।

76. ॐ ह्रीं देहे स्वबुद्धिरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

मरणभयरहितोऽहम् ।

(छंद-वीर)

शरीरादि पर पदार्थ में जो अपनेपन की रखता बुद्धि ।
मित्रादिक के वियोग से अरु मरने से डरता भ्रमबुद्धि ।।
ज्ञानी को न मरण भय होता वह अमरत्व जानता है।
शाश्वत् त्रैकालिक ध्रुव आत्मा को ही श्रेष्ठ मानता है ।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 77 )
जिसका अपनी आत्मा के स्वरूप में ही अपनापना है ऐसा
अंतरात्मा मरण के निकट आने पर क्या मानता है इस बात को आचार्य
कहते हैं :-
आत्मन्येवात्मधीरन्यां
शरीरगतिमात्मनः ।
मन्यते निर्भयं त्यक्त्वा वस्त्रं वस्त्रांतरग्रहम् ।। 77 ।।

अर्थ :- आत्मा के सच्चे स्वरूप में ही आत्मपने की बुद्धि
रखने वाला अंतरात्मा निर्भय रूप से शरीर की अवस्था को अर्थात्

मरण को व बाल, युवा, वृद्धादि अवस्थाओं को आत्मा से भिन्न और एक
वस्त्र को छोड़कर अन्य दूसरे वस्त्र को ग्रहण करने के समान मानता है।

77.ॐ ह्रीं बालाद्यावस्थारहितसमतास्वरूपाय नमः ।

अक्षरस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

आत्मा के सच्चे स्वरूप में अपनेपन की जो है बुद्धि ।
वह निर्भय हो मरण अवस्था पाकर करता समाधि शुद्धि ।।
बाल युवा वृद्धावस्था या मरण समय जागता है।
एक वस्त्र तज नये वस्त्र को पहिन आत्म में रहता है ।।
जैसे जीर्ण वस्त्र परिवर्तित होता नए वस्त्र द्वारा।
वैसे प्राणी हर्ष मानता क्षय करता है भवकारा।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(78)
अब आचार्य कहते हैं कि इस तत्त्वज्ञान की बात को वही
जानता है जिसका व्यवहार-कार्यों में अनादर है पर जो व्यवहार में
आदरवान् है वह इस निश्चयस्वरूप को नहीं समझता :-
व्यवहारे सुषुप्तो यः स जागर्त्यात्मगोचरे ।
जागर्तिव्यवहारेऽस्मिन् सुषुप्तश्चात्मगोचरे ।। 78।।

अर्थ :- जो कोई व्यवहार में अर्थात् लेने- धरने आदि के
विकल्पों में, शरीरादि जड़ वस्तुओं व उसकी पर्यायों में एवं व्यापार-
वणिज आदि में सोया हुआ है अर्थात उनमें अंतरंगसे रागी नहीं है
किन्तु विरागी है वह आत्मा के स्वरूप में जाग रहा है अथवा उसी के
अनुभव में रुचिवान है तथा इस जगत के व्यवहार में जो जाग रहा है
अर्थात् भली प्रकार सावधान व तन्मय है वह आत्मा के अनुभव में
सोया हुआ है, गाफिल है।

78.ॐ ह्रीं प्रवृत्तिनिवृत्त्यादिरूपव्यवहाररहितसमतास्वरूपाय नमः ।

ध्रुवचैतन्यस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

जो व्यवहार विकल्पों में सोता है करता रंच न राग।
वही विरागी जाग रहा है आत्म तत्त्व से कर अनुराग ।।
जो व्यवहार मध्य जगते हैं निज स्वभाव में सोते है।
ज्ञानभाव को क्षय करते हैं जन्म-मरण में रोते है ।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 79 )
आगे कहते हैं कि जो अपनी आत्मा के स्वभाव में जागता है
वह मोक्ष को प्राप्त करता है :-
आत्मानमन्तरे दृष्ट्वा दृष्ट्वा देहादिकं बहिः ।
तयोरन्तर विज्ञानादभ्यासादच्युतो भवेत् ।। 79।।

अर्थ :- अपनी आत्मा के असली स्वरूप को अपने भीतर
देखकर तथा शरीर आदि पर वस्तुओं को अपनी आत्मा से बाहर
देखकर इन दोनों के भेद-विज्ञान होने से तथा उस भेद-विज्ञान का
बार-बार अभ्यास करने से जीव मुक्त हो जाता है।

79.ॐ ह्रीं अच्युतज्ञानरूपसमतास्वरूपाय नमः ।

अवबोधसौधस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

आत्मा के असली स्वरूप को भीतर जाकर जो देखे।
देहादिक पर वस्तु आत्मा से जो भिन्न सतत् देखे ।।
वही भेदविज्ञान प्राप्तकर करता है उसका अभ्यास ।
वही मुक्त हो जाता इक दिन इस पर करो पूर्ण विश्वास ।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 80 )
जिसे देह और आत्मा का भेद-ज्ञान हो गया है वह योगाभ्यास
के आरम्भ में जगत का कैसा देखता है तथा जब योगाभ्यास में निपुण
हो जाता है तब उसे जगत कैसा दिखता है तथा जब योगाभ्यास में
निपुण हो जाता है तब उसे जगत कैसा दिखता है, वही बताते हैं :-
पूर्वं दृष्टात्म तत्त्वस्य विभात्युनमत्तवज्जगत् ।
स्वभ्यस्तात्मधियः पश्चात् काष्ठपाषाणरूपवत् ।। 8० ।।

अर्थ :- जिसने आत्मतत्त्व का निश्चय कर लिया है ऐसे
तत्त्वज्ञानी को पहले अर्थात् योगाभ्यास शुरू करने के समय यह जगत
अर्थात् जगत के प्राणी नाना प्रकार के बाहरी विकल्पों से भरपूर पागल
व्यक्ति की तरह प्रतिभासित होते हैं और पीछे, योगाभ्यास में निपुण हो
जाने पर आत्मा के स्वरूप की भली प्रकार भावना कर लेने वाले को यह
जगत काष्ठ वा पत्थर के स्वभाव के समान मालूम होता है।

80. ॐ ह्रीं जगद्विषयचिन्तारहितसमतास्वरूपाय नमः ।

परमज्ञानस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

आत्म तत्त्व का दृढ़ निश्चय करने वाले ही हैं ज्ञानी।
योगाभ्यास लीन होते हैं बन जाते है निजध्यानी ।।
जग के प्राणी उनको पागल प्रतिभासित होते हर क्षण।
योगाभ्यासी को पत्थर भासित होता जग का कण-कण।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 81 )
यहाँ शिष्य शंका करता है कि आपने आत्मा के भली प्रकार
अभ्यास की जो बात कही सो व्यर्थ मालूम होती है, क्योंकि 'शरीर से

आत्मा का स्वरूप भिन्न है’ ऐसा चैतन्य-स्वरूप के ज्ञानियों द्वारा सुने
जाने से अथवा दूसरों को भिन्न आत्मा के स्वरूप का व्याख्यान करने
से ही मुक्ति हो जाएगी, अभ्यास करने की कोई आवश्यकता नहीं है ?
अब इस शंका का आचार्य समाधान करते हैं :-
श्रृण्वन्नप्यन्यतः कामं वदन्नपि कलेवरात् ।
नात्मानं भावयेद् भिन्नं यावत्तावन्न मोक्षभाक् ।। 81 ।।

अर्थ :- गुरु आदि के द्वारा अतिशय करके, भिन्न आत्मा का
स्वरूप सुनने पर भी तथा मुँह से उसे कहने पर भी जब तक आत्मा
का सर्व पर अनात्माओं से भिन्न नहीं भाया जाता तब तक जीव मोक्ष
का पात्र नहीं हो सकता।

81. ॐ ह्रीं कलेवरविकल्परहितसमतास्वरूपाय नमः ।

अत्यानंदस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

गुरु आदिक के द्वारा अतिशय करके जाना आत्म स्वरूप ।
मुख से वैसा ही कहने पर भी न किया अनुभव निज रूप ।।
अनात्मा से पृथक आत्मा जिसको आता नहीं कभी।
मोक्ष सौख्य का पात्र नहीं हो सकता है वह जीव कभी ।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 82 )
आत्म-भावना का अभ्यास करने में जो प्रवर्ते उसे क्या करना
चाहिए, यह बताते हैं :-
तथैव भावयेद् देहाद् व्यावृत्यात्मानमात्मनि ।
यथा न पुनरात्मानं देहे स्वप्नेऽपि योजयेत् ।। 82 ।।

अर्थ :- इस शरीर से अपने स्वरूप को अलग करके अपनी
आत्मा के भीतर उस तरह भावे अर्थात् ‘यह आत्मा पुद्गलादि सर्व
जड़ पदार्थों से व रागादि अवस्थाओं से भिन्न हैं’ ऐसी दृढ़तर भावना
करे जिससे फिर कभी स्वप्न की अवस्था में भी शरीर के स्वरूप में
आत्मा को न जोड़े अर्थात् स्वप्न में भी कभी देह को आत्मा न माने।

82.ॐ ह्रीं स्वप्नावस्थदेहोपलब्धिरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

सदाशिवस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

इस शरीर से भिन्न आत्मा के स्वरूप को ही तू ध्या।
पुद्गलादि जड़ पदार्थों से भिन्न आत्मा अपनी भा।।
रागादिक भावों से मैं हूँ भिन्न सदा ही शुद्ध त्रिकाल ।
सपने में भी देह नहीं है शुद्ध आत्मा परम विशाल।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 83 )
आगे आचार्य कहते हैं कि परम उदासीन अवस्था में जैसे स्व-
पर के विचार का विकल्प छोड़ना उचित है वैसे ही व्रतों के पालने का
विकल्प भी छोड़ना उचित हैं :-
अपुण्यमव्रतैः पुण्यं व्रतैर्मोक्षस्तयोर्व्ययः ।
अव्रतानीव मोक्षार्थी व्रतान्यपि ततस्त्यजेत् ।। 83 ।।

अर्थ :- हिंसादि पाँच अव्रतों के द्वारा पापबंध तथा अहिंसादि
पाँच व्रतों के विकल्प में परिणमन करने से पुण्य बंध होता है और इन
पाप व पुण्य दोनों कर्मों के नष्ट हो जाने से मोक्ष होता है। पाप-बंध लोहे
की ओर पुण्य-बंध सुवर्ण की बेड़ी है तथा मुक्ति इन दोनों ही बेड़ियों
के कटने से होती है इसीलिए जो संसार से मुक्ति चाहता है वह अव्रतों
के समान अर्थात् जैसे अव्रतों को छोड़े वैसे व्रतों को भी छोड़ देवें।

83.ॐ ह्रीं पुण्यापुण्यविकल्परहितसमतास्वरूपाय नमः ।

सदासौख्यस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

हिंसादिक पाँचों अव्रत के द्वारा हैं पापों का बंध।
अहिंसादि पाँचों व्रत द्वारा होता पुण्य कर्म का बंध ।।
पाप-पुण्य दोनों कर्मों के क्षय होने पर होता मोक्ष।
जब अपने निज शुद्ध आत्म का आश्रय लेते पाते मोक्ष ।।
पाप बंध लोहे की बेड़ी पुण्य बंध स्वर्ण बेड़ी।
मुक्ति प्राप्ति में ये बाधक है दोनों ही समान बेड़ी ।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 84 )
‘इन विकल्पों के त्याग का क्या क्रम है’ ऐसा शिष्य के द्वारा
पूछे जाने पर आचार्य कहते हैं :-
अव्रतानि परित्यज्य व्रतेषु परिनिष्ठितः ।
त्यजेत्तान्यपि सम्प्राप्य परमं पदमात्मनः ।। 84 ।।

अर्थ :- पहले हिंसादि पाँचों पापों को छोड़कर व्रतों में तल्लीन
होवे और फिर आत्मा के उत्कृष्ट वीतरागता लक्षणमयी पद को प्राप्त
करके उन व्रतों को भी छोड़ देवे।

84. ॐ ह्रीं परमविरागज्ञानरूपसमतास्वरूपाय नमः ।

निरवद्यस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

हिंसादिक पाँचों पापों को तजकर हो जा तू व्रत लीन।
फिर उत्कृष्ट वीतराग भावों में ही हो जा तल्लीन।।
पमर स्वपद की प्राप्ति हेतु तू सभी व्रतों को दे तू छोड़।
एकमात्र शुद्धात्म तत्त्व से केवल अपना नाता जोड़।।

भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 85 )
शिष्य कहता है कि अव्रत व व्रतों के विकल्पों को छोड़ने से
किस तरह परमपद की प्राप्ति होगी ? इसका समाधान आचार्य करते हैं:-
यदन्तर्जल्पसंपृक्तमुत्प्रेक्षा जालमात्मनः ।
मूलं दुःखस्य तन्नाशे शिष्टमिष्टं परं पदम् ।। 85 ।।

अर्थ :- अंतरंग में वचनों के व्यापार सहित जो कल्पनाओं की
तरंगों का जाल है सो आत्मा के दुःखों का मूल कारण है क्योंकि
विकल्पों के कारण निर्विकल्प अवस्था न होने से ही सुख व शांति का
लाभ न होकर आकुलता और अशांति होती है। उस विकल्पजाल के
नष्ट हो जाने पर ही आत्मा को परम हितकारी एवं प्यारे उत्कृष्ट पद
की प्राप्ति होना कहा गया है।

85. ॐ ह्रीं दुःखमूलकारणोत्प्रेक्षाजालरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

अन्तर्वचनव्यापाररहितोऽहम् ।

(छंद-वीर)

अंतरंग वचनों का जो व्यापार कल्पनाओं का जाल।
उसकी सभी तरंगें दुख का मूल हेतु हैं अति विकराल ।।
जब विकल्प हो तब अविकल्प दशा होती है कभी न प्राप्त ।
जो विकल्प को क्षय करते हैं वे ही सुख पाते उर व्याप्त ।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्री समाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 86 )
आत्मोन्नति के अभिलाषी को इन विकल्पों का किस क्रम से
नाश करना चाहिए, सो कहते हैं :-
अव्रती व्रतमादाय व्रती ज्ञानपरायणः ।
परात्मज्ञान सम्पन्नः स्वयमेव परो भवेत् ।। 86 ।।

अर्थ :- हिंसादि पाँच अव्रतों के विकल्प में पड़ा हुआ जीव
अहिंसादि पाँच व्रतों को ग्रहण करके, अव्रतों के विकल्प को नष्ट कर
व्रती हो जावे और फिर आत्म-अनुभव में लीन होकर, ज्ञान-भावना
में परिणमन करता हुआ परम वीतराग अवस्था में व्रतों के विकल्पों
का भी नाश करे और क्रमशः संयोगी जिनकी अवस्था में उत्कृष्ट
आत्मज्ञान अर्थात् केवलज्ञान को प्राप्त करके स्वयं ही अन्य किसी गुरु
आदि की अपेक्षा के बिना उत्कृष्ट परमात्मा सिद्ध हो जावे।

86.ॐ ह्रीं व्रताव्रतविकल्परहितसमतास्वरूपाय नमः।

स्वरूपसिद्धोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

हिंसादिक पाँचों अव्रत के विकल्प में यह जीव सुलीन।
अहिंसादि पाँचो व्रत करता ग्रहण पुण्य में होता लीन।।
अव्रत के विकल्प क्षय करके जीव व्रती हो जाता है।
ज्ञान परायण अनुभव युत हो ज्ञान भावना भाता है।।
फिर व्रत के भी विकल्प क्षय कर आत्मज्ञान पा हो संतुष्ट ।
शीघ्र सयोगी जिन हो जाता पूर्णज्ञान से होता पुष्ट ।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्री समाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 87 )
आगे कहते हैं कि जैसे व्रतों का विकल्प मोक्ष का कारण नहीं
वैसे ही बाहरी भेष का विकल्प भी मोक्ष का कारण नहीं हैं :-

लिंगं देहाश्रितं दृष्टं देह एवात्मनो भवः।
न मुच्यन्ते भवात्तस्मात्ते ये लिंग कृताग्रहाः ।। 87 ।।

अर्थ :- जटाधारण आदि अन्यमत के भेष व नग्नपना आदि
जैन धर्म के वेष शरीराश्रित हैं और शरीर ही आत्मा का संसार है
इसीलिए जो वेष को धारने से ही मुक्ति-प्राप्ति का पक्ष रखने वाले हैं
अर्थात् जो बाहरी वेष को ही मोक्ष का कारण मानते हैं वे पुरुष संसार
से कभी नहीं छूटते ।

87. ॐ ह्रीं जटाधारणनग्नत्वदिदेहाश्रितलिङ्गरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

चैतन्यलिङ्गस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

परमत के या जिनमत के ये वेश सभी जु शरीराश्रित ।
आत्मा का संसार ज्ञान है नहीं वेश से होना युत ।।
बाह्य वेश है नहीं मुक्ति का कारण वह तो है संसार।
बाह्य वेश से कोई प्राणी हो सकता है कभी न पार।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्री समाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 88 )
आगे कहते हैं कि जिनका ऐसा हठ है कि ‘वर्णों में ब्राह्मण वर्ण
बड़ा है अतएव उसी वर्ण वाले परमपद के योग्य हैं’ वे कभी भी मुक्ति
के पात्र नहीं होते :-
जातिर्देहाश्रिता दृष्टा देह एवात्मनो भवः।
न मुच्यन्ते भवात्तस्मात्ते ये जातिकृताग्रहाः ।। 88 ।।

अर्थ :- ब्राह्मण, शूद्र, क्षत्रिय व वैश्य वर्ण देह के आश्रित देखे
गये हैं और देह ही आत्मा का संसार है इसलिए जो अज्ञानी ‘जाति ही
मोक्ष का कारण है’ ऐसा हठ करते हैं वे इस संसार से कभी नहीं छूटते ।

88. ॐ ह्रीं देहाश्रितब्राह्मणादिजातिरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

निर्जातिस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

ब्राह्मण क्षत्री वैश्य शूद्र ये वर्ण देह के हैं आधीन।
आत्मा का संसार देह लख अज्ञानी इसमें है लीन।।
जाति मोक्ष का कारण कहना यह तो दुख का दाता है।
जो ऐसे विकल्प तज देता वही मुक्ति सुख पाता है।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 89 )
आगे कहते हैं कि जो ऐसा विकल्प करते हैं कि ‘ब्राह्मणादि
जाति का धारी वा साधु वेष का धारी मात्र होने से ही जीव मोक्ष पा
सकता है’ उनकी भी मुक्ति नहीं हो सकती :-
जातिलिंगविकल्पेन येषां च समयाग्रहः ।
तेऽपि न प्राप्नुवन्त्येव परमं पदमात्मनः ।। 89।।

अर्थ :- और जिनका ‘जाति और वेष के विकल्प से ही मोक्ष
होता है’ ऐसा आगम संबंधी आग्रह है अर्थात् ‘ऐसा आगम कहा है कि
उत्तम जातिविशिष्ट होने से वा साधु वेषधारी मात्र होने से ही जीव
मुक्ति प्राप्त कर सकता है’ ऐसा जिनका हठ है वे भी आत्मा के उत्कृष्ट
पद को प्राप्त नहीं कर पाते।

89.ॐ ह्रीं जातिलिङ्गविकल्परहितसमतास्वरूपाय नमः ।

बोधचिन्हस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

जाति वेश के विकल्प से तो मोक्ष प्राप्ति होती न कभी।
साधु वेश धारी होने से मुक्त न होता जीव कभी ।।

जड़ वेशों में क्या रक्खा है ये सब हैं भव के जंजाल।
ज्ञान वेश ही परमोत्तम है मोक्ष सौख्यप्रद परम विशाल ।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 90 )
परमपद की प्राप्ति के लिए व उत्तम जाति आदि सहित शरीर
में ममत्व-त्याग के लिए भोगों को छोड़ा जाता है पर जो कोई इन
इन्द्रिय भोगों को छोड़कर भी फिर से मोह के आधीन हो शरीर में ही
प्रगति करते हैं, उनके लिए आचार्य कहते हैं :-
यत्त्यागाय निवर्तन्ते भोगेभ्यो यदवाप्तये ।
प्रीतिं तत्रैव कुर्वन्ति द्वेषमन्यत्र मोहिनः ।। १० ।।

अर्थ :- शरीर से ममता के त्याग के लिए तथा परम वीतराग
स्वरूप के लाभ के लिए प्राणी इन्द्रियों के भोगों से हटते हैं पर उनसे
हटकर भी वे मोही जीव पुनः उस ही शरीर में राग तथा दूसरे अर्थात्
वीतरागभाव में द्वेष किया करते हैं।

90.ॐ ह्रीं स्त्रग्वनितादिभोगप्रीत्यनुबन्धरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

निर्ममत्वस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

तन से ममता त्यागे यदि तू वीतरागता का हो लाभ।
इन्द्रिय भोगों से जो हटते पाते हैं वे शुद्ध विराग।।
मोही प्राणी पुनः देह में राग आदि कर पाते दुख।
वीतराग भावों से द्वेष किया कर वे पाते ना सुख।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 91 )
मोही जीव शरीर में किस प्रकार का श्रद्धान रखते हैं, वह बताते हैं:-
अनन्तरज्ञः संधत्ते दृष्टिं पगोर्यथाऽन्धके ।
संयोगात् दृष्टिमङगेऽपि सन्धते तद्वदात्मनः ।। 91 ।।

अर्थ :- जैसे भेद को न जानने वाला पुरुष पंगु और अन्धे के
संयोग के कारण पंगु की दृष्टि को अंधे पुरुष में मान लेता है वैसे ही
बहिरात्मा मोही अज्ञानी जीव आत्मा और शरीर के संयोग के कारण
आत्मा की दृष्टि को अर्थात् आत्मा के ज्ञानदर्शन स्वरूप को शरीर में
ही मान लेता है।

91.ॐ ह्रीं देहात्मसंयोगरूपविपर्यासदृष्टिरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

मोहाभिभूतरहितोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

जैसे भेद न जाने कोई पुरुष पंगु अरु अंध संयोग।
पंगु दृष्टि को अंधे में ही मान रहा है जो है रोग।।
बहिरात्मा मोही अज्ञानी जीव आत्मा देह संयोग।
शरीर में ही मान रहा है दर्शन ज्ञान शक्ति का योग।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 92 )
आगे कहते हैं कि अंतरात्मा इस विषय में क्या समझता हैं :-
दृष्टभेदो यथा दृष्टिं पङ्गोरन्धे न योजयेत्।
तथा न योजयेत् देहे दृष्टात्मा दृष्टिमात्मनः ।। 92 ।।

अर्थ :- जैसे लंगड़े और अंधे के भेद को देखने वाला पुरुष
लंगड़े की दृष्टि को अंधे पुरुष में नहीं लगाता अर्थात् अंधे को दृष्टिहीन
जानकर पंगु को ही दृष्टि वाला समझता है वैसे ही शरीरादि पर-पदार्थों

से भिन्न आत्मा को देखने वाला पुरुष आत्मा के दर्शनज्ञान स्वरूप को
शरीर में नहीं जोड़ता।

92.ॐ ह्रीं अन्तरात्माद्यवस्थारहितसमतास्वरूपाय नमः ।

नित्यचित्स्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

पंगु और अंधे का भेद जानने वाला पुरुष प्रधान।
पंगु दृष्टि को अंधे में ना अंध दृष्टि को पंगु समान।।
शरीरादि पर पदार्थ विरहित आत्मा को ही जान रहा।
दर्शन ज्ञान स्वरूप आत्मा को शरीर ना मान रहा।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 93 )
आगे कहते हैं कि बहिरात्मा मिथ्यादृष्टि तथा अंतरात्मा
सम्यग्दृष्टि के लिए कौन-कौन सी अवस्थाएँ भ्रमरूप व कौन-कौन
सी भ्रमरहित हैं:-
सुप्तोन्मत्ताद्यवस्थैव विभ्रमोऽनात्मदर्शिनाम् ।
विभ्रमोऽक्षीणदोषस्य सर्वावस्थाऽऽत्मदर्शिनः ।। 93 ।।

अर्थ :- जिन्हें आत्मस्वरूप का यथावत् ज्ञान नहीं है ऐसे
बहिरात्माओं को निद्रा की, उन्मत्तपने की व मूर्च्छा आदि की अवस्थाएँ
ही भ्रमरूप मालूम होती हैं पर आत्मदर्शी अंतरात्मा को बहिरात्मा
संबंधी सारी ही अवस्थाएँ भ्रमरूप दिखाई देती हैं।

93.ॐ ह्रीं सुप्तोन्मत्तादिरूपावस्थारहितसमतास्वरूपाय नमः ।

निरामयस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

ज्ञान स्वरूपी का तो ज्ञान नहीं है ऐसा बहिरात्मा।
निद्रा में उन्मत्तपने को मूर्छा रूप हुई आत्मा।।

भ्रम विहीन आत्मदर्शी ही अन्तरात्मा है बलवान।
बहिरात्मा पन से विरहित है जान रहा भ्रम रूप सुजान।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 94 )
यहाँ शिष्य शंका करता है कि जो बाल, वृद्ध व युवा आदि सर्व
अवस्थाओं में आत्मपना मानता है वह यदि सारे शास्त्रों को जान जावे
और निद्रारहित होकर जागता ही रहे तो मुक्त हो जाएगा कि नहीं ?
आचार्य इसका समाधान करते हैं :-
विदिताशेषशास्त्रोऽपि न जाग्रदपि मुच्यते ।
देहात्मदृष्टिर्ज्ञातात्मा सुप्तोन्मत्तोऽपि मुच्यते ।। 94 ।।

अर्थ :- शरीरादि पर वस्तुओं को आत्मा मानने वाला बहिरात्मा
बहुत से शास्त्रों का जानने वाला होने पर भी तथा जागता हुआ रहने
पर भी देह और आत्मा के भिन्न-भिन्न श्रद्धान के बिना मुक्त नहीं होता
पर आत्मा के स्वरूप को अच्छी तरह जानने वाला अंतरात्मा सुप्त वा
उन्मत्तादि अवस्थाओं में भी आत्मा के दृढ़तर अभ्यास के बल से कर्मों
से छूट जाता है क्योंकि उसके अंतरंग में आत्मा की श्रद्धा ऐसी जड़
पकड़ जाती है कि निद्रादि अवस्थाओं में भी आत्म-रुचि से खाली
नहीं होता और इस प्रकार कर्मों की निर्जरा ही किया करता है।

94.ॐ ह्रीं अशेषशास्त्रज्ञानपर्यायविकल्परहितसमतास्वरूपाय नमः ।

पूर्णबोधस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

शरीरादि पर पदार्थ को ही आत्मा माने बहिरात्मा।
बहुत शास्त्र का ज्ञाता होकर भी है यह अज्ञानात्मा।।

ज्ञानात्मा को ज्ञान रूप ही जान रहा अन्तर्रात्मा।
वह उन्मत्त दशा को तजकर बन जाता है परमात्मा।।
निद्रा में भी आत्म सुरुचि उसकी जाग्रत ही रहती है।
कर्म निर्जरा करता प्रतिफल दशा सुअनुभव होती है।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 95 )

सम्यग्दृष्टि के निद्रित अवस्था में भी आत्मविचार कैसे बना
रहता है, इसी का समाधान करते हैं :-

यत्रैव हितधीः पुंसः श्रद्धा तत्रैव जायते ।
यत्रैव जायते श्रद्धा चित्तः तत्रैव लीयते ।। 95।।

अर्थ :- जिस विषय में पुरुष की बुद्धि जुड़ जाती है उस
विषय में ही रुचि पैदा हो जाती है और जिस विषय में रुचि पैदा हो
जाती है उस विषय में मन लय हो जाता है।

95.ॐ ह्रीं परद्रव्यासक्तबुद्धिरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

निरासक्तस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

जिसमें पुरुष बुद्धि जुड़ जाती उसमें ही रुचि होती है।
जिसमें श्रद्धा हो जाती उसमें ही मति रत होती है ।।
मचल रहा शशि पाने को ज्यों बालक उसमें ही है लीन।
त्यों ही अंतरात्मा होता शुद्ध रूप में ही तल्लीन ।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 96 )
‘चित्त कहाँ पर आसक्त नहीं होता’ इस प्रश्न का आचार्य उत्तर देते हैं:-
यत्रानाहित धीः पुंसः श्रद्धा तस्मान्निवर्तते ।
यस्मान्निवर्तते श्रद्धा कुतश्चित्तस्य तल्लयः ।। 96 ।।

अर्थ :- जहाँ पर मनुष्य की बुद्धि नहीं जमती वहाँ से रुचि हट
जाती है और जिससे रुचि हट जाती है उसमें फिर किस तरह से चित्त
की लीनता हो सकती है अर्थात् नहीं हो सकती।

96.ॐ ह्रीं आहितानाहितधीविकल्परहितसमतास्वरूपाय नमः ।

चित्श्रद्धास्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

जहाँ मनुज की बुद्धि न थमती तत्क्षण रुचि हट जाती है।
जिसकी श्रद्धा हट जाती उसकी रुचि कभी न आती है ।।
निज चैतन्य स्वरूप न श्रद्धा में हो तो सब कुछ बेकार।
नहीं ध्यान आत्मा में लगता जाता कभी न भव के पार ।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 97 )
ध्याता का चित्त जिसमें लय होता है, वह ध्येय अपने से भिन्न
तथा अभिन्न दो प्रकार का होता है। उनमें से भिन्न आत्मा को ध्येय
बनाकर ध्याने का क्या फल होता है, यह बताते हुए आचार्य कहते हैं:-
भिन्नत्मानमुपास्यात्मा परो भवति तादृशः ।
वर्तिर्दीपं यथोपास्य भिन्ना भवति तादृशी ।। 97 ।।

अर्थ :- जैसे दीपक से भिन्न बत्ती दीपक की उपासना करके
दीपक रूप हो जाती है वैसे ही यह आत्मा अपने से भिन्न अरहंत सिद्ध
परमात्मा का ध्यान करके उन ही जैसा अर्हत सिद्ध परमात्मा हो जाता है।

97.ॐ ह्रीं उपास्योपासक भावरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

अखंडचित्स्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

भिन्न दीये से बत्ती भी दीपक के संग दीपक होती।
यह आत्मा भी अरहंतों के संग रहकर अर्हत् होती ।।
अरहंतों सिद्धों की उपासना से होता अर्हत सिद्ध ।
शुद्धस्वानुभव सफलित होता निज स्वभाव से होता सिद्ध ।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 98 )

अब अपनी ही आत्मा की उपासना का फल कहते हैं :-
उपास्यात्मानमेवात्मा जायते परमो ऽथवा ।
मथित्वाऽऽत्मानमात्मैव जायतेऽग्निर्यथातरुः ।। १8 ।।

अर्थ :- अथवा आत्मा अपने को ही ध्याकर उसी प्रकार
परमात्मा हो जाता है जिस प्रकार वृक्ष अपने को ही घिसकर आप ही
अग्नि रूप हो जाता है।

98.ॐ ह्रीं दृष्टान्तदाष्र्टान्तविकल्परहितसमतास्वरूपाय नमः ।

अभेदस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

आत्मा अपने को ही ध्याकर परमात्मा हो जाता है।
जिस प्रकार तरु घिस अपने को अग्नि रूप हो जाता है ।।
मोक्ष स्वरूपी निज आत्मा से ही तो मोक्ष प्राप्त होता।
जो न मोक्ष का रूप जानता चारों गतियों में रोता ।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 99 )
ऊपर के ही भाव को संकुचित करके फिर कहते हैं :-
इतीदं भावयेन्नित्यमवाचांगोचरं पदम् ।
स्वत एव तदाप्नोति यतो नावर्तते पुनः ।। ११ ।।

अर्थ :- ऊपर कहे प्रकार इस भिन्न व अभिन्न स्वरूप आत्म
स्वभाव की नित्य ही भावना करने से जीव उस वचनों से नहीं कहे जा
सकने वाले किंतु मात्र अनुभव करने योग्य पद को अर्थात् परमात्मा
के स्वरूप को अपने आप ही प्राप्त कर लेता है और फिर उस प्राप्त
किए हुए पद से पुनः वापिस नहीं लौटता।

99.ॐ ह्रीं गुर्वादिबाह्यनिमित्तरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

स्वयंज्ञानज्योतिः स्वरूपोऽहं ।

(छंद-ताटंक)

इस प्रकार से भिन्न अभिन्न स्वरूप स्वयं का ले तू जान।
वचन अगोचर अनुभव गोचर निजआत्मा को ले पहचान ।।
अनुभव करने वाला निज परमात्म स्वरूप प्राप्त करता।
फिर वह वापस नहीं लौटता निजानंद रस उर भरता।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 100 )
शिष्य शंका करता है कि ‘पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु व आकाश-
ऐसे पाँच तत्त्वों से शरीर बना है और आत्मा उसी में अन्तर्भूत है, उससे
अलग कोई पदार्थ नहीं’ ऐसा चार्वाक कहते है तथा ‘आत्मा सदा ही मुक्त
है’ ऐसा सांख्य लोग कहते हैं तो फिर आत्मध्यान की तो कोई आवश्यकता
रह ही नहीं जाती ? आचार्य इस शंका का समाधान करते हुए कहते हैं:-
अयत्न साध्यं निर्वाणं चित्तत्वं भूतजं यदि।
अन्यथा योगतस्तस्मान्न दुःखं योगिनां क्वचित् ।। 100 ।।

अर्थ :- यदि चार्वाक के मतानुसार पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु
व आकाश-इन पाँच भूतों से आत्मपना माना जाए तो मोक्ष यत्न से
साधने योग्य नहीं ठहरता क्योंकि पाँच भूतों के विनष्ट हो जाने पर जब
आत्मा ही विनष्ट हो जाएगा तो फिर मोक्ष किसका ? तथा सांख्य
मतानुसार आत्मा स्वभाव से शुद्ध आत्मतत्त्वरूप है अतः वहाँ भी मोक्ष
के लिए यत्न की आवश्यकता नहीं बनती ? वास्तव में आत्मा तो उक्त
दोनों मतों से विपरीत है अर्थात् वह पंचभूत निर्मित न होकर एक नित्य
स्वतंत्र द्रव्य है और अनादि से अशुद्ध दशा में है इसी कारण उसे शुद्ध
करने के लिए योगियों को आत्मानुभूति व चित्तवृत्ति के निरोध स्वरूप
योग का अभ्यास करने में किसी भी प्रकार का कोई दुःख नहीं होता
अर्थात् वे सहर्ष मुक्ति का यत्न किया करते हैं।

100.ॐ ह्रीं दुःखरूपयोगरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

परमानंदघनस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

पृथ्वी जल अरु अग्नि वायु आकाश पाँच भूत जानो।
इनमें आत्मपना होगा तो मोक्ष कभी भी मत मानो ।।
पंच भूत जब नष्ट हो गए तो आत्मा भी होगा नष्ट।
मोक्ष बताओ किसका होगा किसको होगा भव का कष्ट ।।
अगर स्वभाव त्रिकाल शुद्ध है तो फिर यत्न मोक्ष का क्यों।
भेदज्ञान भाव साधना व्यर्थ हुई सब बोलो क्यों ।।
है स्वाधीन द्रव्य आत्मा पर अनादि से दशा अशुद्ध ।
स्वानुभूति के द्वारा योगी कर लेते हैं उसको शुद्ध ।।
इसमें कोई दुःख न कहीं है हर्ष सहित यह करते हैं।
महामोक्ष की लब्धि प्राप्तकर सौख्य कलश निज भरते हैं ।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 101 )
‘मरण होने पर जब आत्मा का अभाव ही हो जाता है तब कैसे
उसका अस्तित्व मोक्ष में भी कायम रह सकता है’ ऐसा प्रश्न करने
वाले के प्रति आचार्य उत्तर कहते हैं:-
स्वप्नेदृष्टे विनष्टेऽपि न नाशोऽस्ति यथात्मनः ।
तथा जागरदृष्टेऽपि विपर्यासाविशेषतः ।। 101 ।।

अर्थ :- जैसे स्वप्न की अवस्था में शरीर का नाश दिखाई देते
हुए भी अपना नाश नहीं होता वैसे ही जाग्रत अवस्था में देखे हुए
शरीरादि का नाश होते हुए भी आत्मा का नाश नहीं होता और इस
प्रकार स्वप्न और जाग्रत दोनों ही अवस्थाओं में शरीरादि का नाश
दिखाई देते हुए भी नाश न होने रूप विरोध की समानता है।

101.ॐ ह्रीं देहमरणरूपात्मविनाशरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

अमृतस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

स्वप्न अवस्था में शरीर का नाश देख लेने पर भी।
नाश नहीं होता शरीर का क्षण भर की थी भ्रान्ति सभी ।।
त्यों ही देह नाश होने पर नहीं आत्म का होता नाश।
स्वप्न दशा या जाग्रत दशा मध्य नहीं आत्मा का नाश।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 102 )
शिष्य शंका करता है कि उस प्रसिद्ध अनादि अनंत आत्मा की
मुक्ति के लिए कठिन तप का कष्ट उठाना व्यर्थ है क्योंकि ज्ञान मात्र
की भावना करने से ही मुक्ति की सिद्धि हो जाएगी ? इसका आचार्य
समाधान करते हैं:-

अदुःखभावितं ज्ञानं क्षीयते दुःखसन्निधौ ।
तस्माद्यथाबलं दुःखैरात्मानं भावयेन्मुनिः ।। 102 ।।

अर्थ :- कायकष्टों के बिना सुकुमार भाव से भाया हुआ
शरीरादि से भिन्न आत्मा का ज्ञान दुःखों के पड़ने पर नाश को प्राप्त हो
जाता है इसीलिए योगी, ध्यानी यति अपनी शक्ति को न छिपाकर
कायक्लेशादि कष्टों के द्वारा अपनी आत्मा को भावे अर्थात् उसकी
भावना करे।

102.ॐ ह्रीं कायक्लेशादिदुःखरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

अनंतवीर्यस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

काय कष्ट के बिना अगर सुकुमार भाव से जो भाया।
तन से भिन्न आत्मा जाना दुख पड़ने पर बिल्लाया।।
शक्ति छिपाए बिना तपस्या करते हैं मुनि साधु महान।
कायक्लेश कष्टों को सहकर भाते हैं शुद्धात्म प्रधान।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 103 )
आगे शिष्य शंका करता है कि यदि आत्मा शरीर से सर्वथा
भिन्न है तब आत्मा के चलते हुए शरीर नियम से किस प्रकार चलने
लगता है तथा आत्मा के ठहरने पर शरीर कैसे ठहर जाता है, इसका
समाधान आचार्य करते हैं:-
प्रयत्नादात्मनो वायुरिच्छा द्वेष प्रवर्तितात्।
वायोः शरीरयंत्राणि वर्तन्ते स्वेषु कर्मसु ।। 103 ।।

अर्थ :- आत्मा के राग और द्वेष से होने वाले उद्योग के कारण
शरीर में वायु चलती हैं और वायु के चलने से शरीर के यंत्र अपने-
अपने कार्यों में वर्तने लगते हैं।

103.ॐ ह्रीं इच्छाद्वेषजनितशरीरयन्त्रक्रियारहितसमतास्वरूपाय नमः ।

निर्देषस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

रागद्वेष से होने वाले उद्योगों के कारण ही।
तन से वायु चला करती है देह यंत्र भी चलते ही।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 104 )
मूर्ख इन शरीर के यंत्रों की क्रिया को आत्मा की क्रिया मानता है तथा
विवेकी ऐसा नहीं समझकर मुक्ति प्राप्त कर लेता है, यह बताते हैं :-
तान्यात्मनि समारोप्य साक्षाण्यास्ते सुखं जडः ।
त्यक्त्त्वाऽरोपं पुनर्विद्वान प्राप्नोति परमं पदम् ।। 104 ।।

अर्थ :- मूर्ख अज्ञानी बहिरात्मा इन्द्रियों सहित इन शरीर के
यंत्रों का आत्मा में समारोप कर अर्थात् इन्द्रिययुक्त इन शरीरादिकों को
ही आत्मा मानकर सुख से वा परमार्थतः दुःख से जीवन बिताता है पर
विद्वान् अन्तरात्मा इस आरोप को छोड़कर अर्थात् शरीरादि में आत्मपने
की मान्यता को त्यागकर तथा सबसे भिन्न अपनी आत्मा के सच्चे
स्वभाव का अनुभव कर परमपद रूप मोक्ष को प्राप्त कर लेता है।

104.ॐ ह्रीं इन्द्रियसहितशरीरारोपरहितसमतास्वरूपाय नमः ।

निष्कलस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

अज्ञानी बहिरात्मा इन्द्रिय सहित शरीर यंत्र को रोप।
आत्मा को पर मान रहा यह पर पै करता है आरोप।।
जो विद्वान अंतरात्मा यह आरोप छोड़ते हैं।
वे ही परममोक्ष पद पाते सुख से आत्म जोड़ते है।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 105 )
‘अंतरात्मा किस प्रकार पर को छोड़ देता है’ यह बताते हुए अब ग्रंथकर्ता
अपने ग्रंथ को संकुचित कर उसका फल दिखाते हुए कहते हैं:-
मुक्त्वा परत्र पर बुद्धिमहंधियं च
संसारदुःखजननीं जननाद्विमुक्तः ।
ज्योतिर्मयं सुखमुपैति परात्मनिष्ठः
स्तन्मार्गमेतदधिगम्य समाधितन्त्रम् ।। 105 ।।

अर्थ :- अतीन्द्रिय सुख के उपाय को बताने वाले एवं परमात्म
स्वरूप के अनुभव में एकाग्रता व परम वीतरागता के साधन रूप इस
‘समाधितंत्र’ शास्त्र को जानकर तथा शरीरादि पर-पदार्थों में चतुर्गति
रूप संसार के दुःखों को पैदा करने वाली ममकार की बुद्धि को और
अहंकार की बुद्धि को छोड़कर परमात्म-स्वरूप में तिष्ठने वाला भव्य
जीव संसार से छूटकर ज्ञानमयी आनंद को प्राप्त कर लेता है।

105.ॐ ह्रीं चातुर्गतिकदुःखोत्पत्तिहेतुभूतात्मबुद्धि रहितसमतास्वरूपाय नमः ।

चित्बोधस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

निजानन्द अतीन्द्रिय सुख का जो उपाय बतलाया है।
निज परमात्म स्वरूप स्वानुभव द्वारा होगा गाया है।।
शुद्ध समाधितंत्र शास्त्र को अच्छी तरह समझ ले जो।
चहुँगति रूपी भ्रमण बुद्धि को तत्क्षण तज देता है वो ।।
अहंकार की बुद्धि छोड़कर निज आत्मा के भीतर जा।
पा संसार दुखों को क्षयकर ज्ञानमयी आनंद सुधा ।।
इसके पढ़ने से अतिपावन सम्यक् बुद्धि उपजती है।
वह संसार भाव क्षय करती जो निज को ही भजती है ।।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्ति हित शास्त्र समाधि शतक पढ़ना।
निज को पर से भिन्न जानकर गुणस्थान श्रेणी चढ़ना।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अन्त्यमंगल
ग्रन्थ के संस्कृत टीकाकार आचार्य प्रभाचन्द्र का अंतिम मंगलाचरण:-
येनात्मा बहिरन्तरुत्तमभिदा त्रेधा विवृत्योदितो
मोक्षोऽनन्तचतुष्टयामलवपुः सद्धयानतः कीर्तितः ।
जीयात्सोऽत्र जिनः समस्तविषयः श्रीपूज्यपादोऽमलो
भव्यानन्दकरः समाधिशतक श्रीमत्प्रभेन्दुः प्रभुः ।।
अर्थ :- जिन्होंने बहिरात्मा अंतरात्मा और परमात्मा ऐसे तीन
भेद से आत्मा को अलग करके बताया है तथा सत्य आत्मध्यान के
द्वारा अनंतदर्शन, अनंतज्ञान, अनंतसुख, अनंतवीर्यमयी निर्मल देह
रूपी मोक्ष की प्राप्ति का वर्णन किया है ऐसे वे सर्व विषयों की वासना
को जीतने वाले, निर्मल, भव्य जीवों को आनंदकर्ता परमैश्वर्यधारी
एवं समाधिशतक की लक्ष्मी की प्रभा को बढ़ाने के लिए चन्द्रमा के
तुल्य श्री पूज्यपाद आचार्य इस लोक में जयवंत हों।

ॐ ह्रीं निर्मलज्ञानानंदस्वरूपाय नमः ।

निजविमलधर्म स्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

बहिरात्मा अरु अंतरात्मा परमात्मा ये हैं त्रय भेद।
अलग-अलग सबको बतलाया आत्मतत्त्व है सदा अभेद ।।
आत्म ज्ञान के द्वारा प्राप्त अनंत चतुष्टय होता है।
विषय-वासना जो क्षय करता वही मुक्तिपति होता है ।।
भव्य जीव को आनंद कर्त्ता परमैश्वर्य विभवधारी।
पूज्यपाद आचार्य समाधि शतक के कर्त्ता अविकारी ।।
प्रभाचन्द्र मुनि कहते है श्री पूज्यपाद जयवंत महान।
सम्यक् मार्ग बताने वाले श्री मुनिवर भगवंत प्रधान।।
जय हो पूज्यपाद स्वामी की रचा समाधि शतक पावन।
जय हो प्रभाचंद्र मुनिवर की टीका की अतिमनभावन ।।
दोनों को मेरा वंदन है दोनों को ही सतत् प्रणाम।
आप कृपा से विधान रचकर मैंने भी पाया शुभधाम।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अंतिम महाअर्घ्य

(छंद-वीर)

शास्त्र समाधि शतक को वन्दूँ या वन्दूँ निज आत्म स्वरूप ।
स्वामी पूज्यपाद को पूजूँ या पूजूँ निज ज्ञानस्वरूप ।।
है उपदेश पूज्यपाद का निज आत्मा को ही भजले।
हों प्रशस्त या अप्रशस्त सारे परभावों को तजले ।।
मुक्ति पंथ पाना है तो तू पहिले स्व-पर विवेक जगा।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्तकर मिथ्याभ्रम को त्वरित भगा।।
पहिले पाप वासना को तज पुण्य भूमि पर चरण बढ़ा।
फिर तू शुद्धभाव पर्वत पर निज को निज में त्वरित अड़ा ।।
मुक्तिमार्ग पाते ही तज दे पुण्य-पाप के भी भवद्वंद।
मुक्तिमार्ग पूरा होते ही हो पाएगा पूर्ण अबंध ।।
बस इतना भर ही करना है अपने में सक्रिय हो जा।
परद्रव्यों में परभावों में पूर्णतया निष्क्रिय हो जा।।
सिद्धिशिला के आमंत्रण को भक्तिभाव से कर स्वीकार।
निर्मल दशा प्राप्त होते ही हो जाएगा तू अविकार ।।
मोक्ष प्राप्ति की इच्छा मत कर तू ही तो है मुक्त स्वरूप।
मुक्त स्वरूप नहीं है पर में निरखो आपना शुद्ध स्वरूप।।
यथाख्यात जिनमुद्रा ही ले पूज्यपाद को कर वन्दन्।
अपर नाम मुनि देवनन्दि है भाव सहित कर ले अर्चन ।।

ॐ ह्रीं श्रीभेदज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

महाजयमाला

(छंद-मानव)

श्री पूज्यपाद मुनिवर को, सादर करता हूँ वन्दन्।
जिन मुनि बनने की आशा, लेकर आया हूँ भगवन् ।।
मुनिपद पाने के पहिले श्रुत अभ्यासी बन जाऊँ।
स्वाध्याय करूँ शास्त्रों का जिन प्रवचन महिमा गाऊँ ।।

फिर भेदज्ञान का स्वामी अभ्यास करूँ मैं प्रतिदिन।
हो स्वपर विवेक हृदय में निजहित ही जागे छिन-छिन ।।
सम्यग्दर्शन को पाकर दृढ़ श्रद्धानी बन जाऊँ ।
पा सम्यक्ज्ञान हृदय में ज्ञानी-ध्यानी हो जाऊँ ।।
सम्यक्चारित्र ग्रहण कर फिर रत्नत्रय निधि पाऊँ।
बन नाथ स्वरूपाचरणी अविरति का दोष मिटाऊँ।।
संयम की तरणी पाकर शिवपथ पर चरण बढाऊँ।
श्रेणी चढ़ने का उद्यम अंतर में सहज जगाऊँ ।।
बारहवाँ गुणस्थान पा मैं मोह क्षीण पद पाऊँ।
तेरहवें को पाकर मैं अरहंत दशा प्रगटाऊँ ।।
मैं सकल ज्ञेय को जानूँ अनुभव रस फल ही चाखूँ।
नित निजानंद रस पीकर निज को निज में ही राखूँ ।।
अब नयातीत हो जाऊँ पक्षातिक्रान्त हो जाऊँ ।
अपने स्वचतुष्टय गुण ले निज सिद्ध स्वपद प्रभु पाऊँ ।।
पा सुफल समाधि शतक का अपने वैभव को पाऊँ।
आनंद अतीन्द्रिय पाकर शाश्वत ध्रुव शिवसुख पाऊँ ।।

ॐ ह्रीं परमसुखस्वरूप परमानंदस्वरूप समाधिरूप समता स्वरूपाय जयमाला पूर्णार्घ्य

निर्वपामीति स्वाहा।

आशीर्वाद

(छंद-दोहा)

पूज्यपाद आचार्य की परम कृपा कर प्राप्त।
निजानंद निर्झर मिले निज सुख हो उर व्याप्त।।
जिन मुनियों को नमन कर करूँ भेद विज्ञान ।
इसके द्वारा ही हुए सभी सिद्ध भगवान।।
(इत्याशीर्वाद)

शान्ति पाठ

(छंद-वीर)

परम शान्ति पाऊँ हे स्वामी परम समाधि प्राप्ति के हित ।
अखिल विश्व के सबजीवों को प्राप्त सौख्य हो नाथ अमित ।।
कोई दुखी नहीं हो जग में सातामय हो यह संसार।
सब अपना कल्याण करें प्रभु सभी जीव पाएँ भवपार।।

पुष्पांजलि

( नौ बार णमोकार मंत्र का जाप )

क्षमापना

(छंद-दोहा)

भूल चूक कीजे क्षमा आप क्षमा के स्रोत ।
क्षमा भाव से हों सभी प्राणी ओतः प्रोत ।।
यही प्रार्थना है प्रभो क्षमाभाव हो प्राप्त।
निज अनुभव रस से प्रभो हो जाएँ सब व्याप्त ।।

पुष्पांजलि क्षिपामि ।

जाप्यमंत्र-ॐ ह्रीं श्री समाधिशतकाय नमः ।


Artist: कविवर राजमल पवैया, भोपाल
स्रोत: श्री समाधि शतक मण्डल विधान