ॐ
मङ्गलाचरण
(छंद-अनुष्टुप)
मंगलं पंच परमेष्ठी मंगलं तीर्थंकरं ।
मंगलं शुद्ध चैतन्यं आत्मधर्मोस्तु मंगलं ।।
(छंद-पंचचामर)
वीतराग श्री जिनेन्द्र ज्ञानरूप मंगलं ।
गणधरादि सर्व साधु ध्यान रूप मंगलं ।।
आत्म धर्म विश्वधर्म सार्वधर्म मंगलं ।
वस्तु का स्वभाव ही आनाद्यनंत मंगलं ।।
(छंद-गीतिका)
पंचपरमेष्ठी जिनालय बिम्ब जिनवंदन करूँ।
मात जिनवाणी तथा जिनधर्म वन्दूँ दुख हरूँ ।।
पूज्यपाद आचार्य पद मैं विनय से अर्चन करूँ।
श्री समाधि शतक पढ़कर मोह भ्रमतम को हरूँ ।।
शुद्ध सम्यग्दृष्टि होकर स्वरूपाचरणी बनूँ ।
आत्मतत्त्व स्वरूप समझूँ अनात्मा से नहीं जुड़ूँ।।
(छंद-दोहा)
जयति पंचपरमेष्ठी जिनप्रतिमा जिनधाम ।
जय जगदम्बे दिव्यध्वनि श्री जिनधर्म प्रणाम ।।
पीठिका
(छंद-गीतिका)
पूज्यपाद आचार्यश्री मंगलमयी द्वारा रचित।
प्रभाचंद्राचार्य की टीका मनोहर गुण खचित ।।
यह समाधि शतक अथवा नाम द्वितीय समाधि तंत्र।
कर्मबंधन नाश हित है यही उत्तम श्रेष्ठ मंत्र।।
एकशत अरु पाँच हैं श्लोक इसके ज्ञानमय।
श्लोक टीका ज्ञानवर्धक यही है निज ध्यानमय।।
व्याकरण जैनेन्द्र और समाधि तंत्र स्वज्ञान ऋद्धि।
रचा था इष्टोपदेश सु रची थी सर्वार्थ सिद्धि ।।
शताब्दी षष्टम हुई थी धन्य तुमको प्राप्त कर।
फिर श्री गुरु गए सुरपुर ज्ञान उर में व्याप्त कर।।
भेद ज्ञान महान पाकर सर्वभव बंधन हरूँ।
पूज्यपाद आचार्यपद मैं विनय से वन्दन करूँ ।।
हृदय समता भाव लाऊँ साम्य भावी ही रहूँ।
ज्ञान सागर धार में ही सतत् हे स्वामी बहूँ ।।
प्रभाचंद्राचार्य को भी नमन मेरा बार-बार ।
सभी मुनियों को नमन कर बनूँ स्वामी निर्विकार ।।
(छन्द-वीर)
धन्य समाधितंत्र के कर्त्ता पूज्यपाद आचार्य प्रधान।
करुणा करके भेदज्ञान का दिया दिव्य संदेश महान ।।
टीका लिख मुनि प्रभाचंद ने किया सभी का ही कल्याण।
मैं भी लिखता ग्रंथ समाधि शतक का उत्तम श्रेष्ठ विधान ।।
मंगल कृपा आपकी पाकर करते हम सब आज विधान।
इस विधान का फल हम पाएँ निर्मल वीतराग विज्ञान ।।
(पुष्पांजलिं क्षिपामि)
समुच्चय पूजन
स्थापना
(छंद-रोला)
ग्रंथ समाधि शतक की पूजन भव दुखहारी।
आत्म समाधि प्राप्त होती है शिव सुखकारी ।।
पूज्यपाद आचार्य रचित यह शास्त्र मनोरम।
भेदज्ञान की निधि मिलती है बिना परिश्रम ।।
आत्मत्त्व को शरीरादि से भिन्न जान लूँ।
मोक्षमार्ग श्रम ही सर्वोत्तम श्रेष्ठ मान लूँ ।।
करूं विनय से शास्त्र समाधि शतक की पूजन।
भेदज्ञान विज्ञान प्राप्त कर काटूँ बंधन ।।
सर्व अमंगलहारी सम्यग्दर्शन पाऊँ।
रत्नत्रय तरणी पर चढ़कर शिवपुर जाऊँ।।
यह विधान कर काललब्धि अपनी निज पाऊँ।
स्व-पर विवेक जगा अंतर में समकित लाऊँ ।।
ॐ ह्रीं भेदज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्र अत्र अवतर अवतर संवौषट आह्वाननं ।
ॐ ह्रीं भेदज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं।
ॐ ह्रीं भेदज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्र अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणं।
(पुष्पांजलिं क्षिपामि)
अष्टक
(छंद-ताटंक)
आधि-व्याधि पर की उपाधि से रहित समाधि दशा पाऊँ।
जन्म-जरा मरणादि नाश हित शुद्धभाव जल ही लाऊँ।।
शास्त्र समाधि शतक को पूजूँ करूँ आत्मा का चिन्तन।
आत्म तत्त्व की प्रतीति करके क्षय कर दूँ भव दुख क्रन्दन ।।
ॐ ह्रीं भेदज्ञानप्ररूपकश्रीसमाधिशतकशास्त्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्व. ।
आधि-व्याधि पर की उपाधि से रहित समाधि दशा पाऊँ।
भव आतप का नाश करूँ मैं ध्रुव शीतलता उर लाऊँ ।। शास्त्र. ।।
ॐ ह्रीं भेदज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्व. ।
आधि-व्याधि पर की उपाधि से रहित समाधि दशा पाऊँ।
अक्षय पद की प्राप्ति हेतु उर ज्ञान भाव अक्षत लाऊँ ।। शास्त्र. ।।
ॐ ह्रीं भेदज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अक्षयपदप्राप्ताय अक्षतं निर्वपामीति. ।
आधि-व्याधि पर की उपाधि से रहित समाधि दशा पाऊँ।
कामबाण विध्वंस करूँ मैं महाशील उर में लाऊँ ।। शास्त्र. ।।
ॐ ह्रीं भेदज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्व. ।
आधि-व्याधि पर की उपाधि से रहित समाधि दशा पाऊँ।
क्षुधा रोग विध्वंस करूँ प्रभु परम तृप्त निजपद पाऊँ ।। शास्त्र. ।।
ॐ ह्रीं भेदज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति ।
आधि-व्याधि पर की उपाधि से रहित समाधि दशा पाऊँ।
मोहतिमिर सर्वांश नाशकर सम्यक्ज्ञान पूर्ण पाऊँ।। शास्त्र. ।।
ॐ ह्रीं भेदज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्व. ।
आधि-व्याधि पर की उपाधि से रहित समाधि दशा पाऊँ।
अष्टकर्म विध्वंस करूँ प्रभु शुक्ल ध्यान उर में लाऊँ ।। शास्त्र. ।।
ॐ ह्रीं भेदज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अष्टकर्मविध्वंसनाय धूपं निर्वपामीति ।
आधि-व्याधि पर की उपाधि से रहित समाधि दशा पाऊँ।
महा मोक्षफल परम सुखमयी लाऊँ ज्ञान सुतरु पाऊँ।।
शास्त्र समाधि शतक को पूजूँ करूँ आत्मा का चिन्तन।
आत्म तत्त्व की प्रतीति करके क्षय कर दूँ भव दुख क्रन्दन ।।
ॐ ह्रीं भेदज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय मोक्षफलप्राप्ताय फलं निर्वपामीति ।
आधि-व्याधि पर की उपाधि से रहित समाधि दशा पाऊँ।
पद अनर्घ्य पाने को निर्मल अर्घ्य अष्ट विधिवत् लाऊँ ।।
दिव्य ध्वनि का सार भरा है, ग्रंथ समाधि शतक के मध्य ।
एकमात्र निज ध्रौव्य त्रिकाली का ही हो प्रभु उर में लक्ष्य ।। शास्त्र. ।।
ॐ ह्रीं भेदज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अनर्घ्यपदप्राप्ताय अर्घ्यं निर्वपामीति ।
महार्घ्य
(छंद-वीर)
मैं तो सदा शुद्ध निर्मल चैतन्य चंद्र हूँ ज्योति स्वरूप।
शाश्वत् मुक्ति प्राप्ति में सक्षम मेरा दर्शनज्ञान अनूप।।
ज्ञानस्वभावी होकर भी मैं हो न सका हूँ स्याद्वादी।
अंधा बना विवादों में ही निज मत या परमत वादी ।।
जल में रहकर मगर अगर प्यासा है तो आश्चर्य महान।
सुख समुद्र में रहकर आत्मा प्यासा हैं आश्चर्य प्रधान।।
नाशवान पर्याय दृष्टि का विषय विकारमयी परयोग।
द्रव्य दृष्टि का विषय त्रिकाली ध्रुव आत्मा ही है अवियोग ।।
ज्ञाता-दृष्टा आत्म स्वभाव नहीं अनुभव करता जब जीव।
जड़ अनात्मा में रत होकर बन जाता ज्यों तत्त्व अजीव ।।
जल स्वभाव शीतल संयोग से जल हो जाता ऊष्ण प्रसिद्ध ।
पृथक ऊष्णता के होते ही होता शीतल सहज स्व सिद्ध ।।
महाअर्घ्य अर्पित करता हूँ विनयभाव से हो स्वीकार।
आत्म समाधि सहज मैं पाऊँ हो जाऊँ भव सागर पार।।
ॐ ह्रीं श्रीभेदज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
(छंद-वीर)
मैं अमूर्त्तिक पिंड आत्मा दर्शन-ज्ञान स्वभावी रूप।
अष्ट कर्म संयोगों को पा बना हुआ हूँ मैं विद्रूप ।।
पर में परिवर्तन करने का ही पुरुषार्थ किया अब तक।
ज्ञाता बनने का उपाय यह जीव न कर पाया अब तक।।
पर का कर्त्तापना तथा स्वामित्वपना अरु अहंपना।
अरे बावरे इन्हें छोड़ दे पाले अपना ज्ञानपना।।
ज्ञान स्वरूप धरातल से तू देख अरे निज ध्रुव चैतन्य।
निज को निज पर को पर जानेगा तो हो जायेगा धन्य ।।
सकल वस्तुएँ ज्ञेय जानकर अपना ज्ञान स्वरूप निरख।
ज्ञान-ज्ञेय-ज्ञाता विकल्प तज शाश्वत् आत्म स्वरूप परख ।।
आत्म ज्ञान का सूर्य प्रकाशित होते ही होगा कल्याण।
जो इससे वंचित रहता है वह न कभी पाता निर्वाण।।
निजानंद आनंदकंद आत्मत्व प्राप्ति का ही पुरुषार्थ ।
आज अभी प्रारम्भ करूँगा पाऊँगा निश्चय भूतार्थ ।।
व्यवहाराभासी न बनूँगा ना निश्चयाभासी भगवान।
मात्र भाव भासना करूँगा पाऊँगा समाधि निर्वाण।।
ॐ ह्रीं श्रीभेदज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय जयमाला पूर्णार्घ्य निर्वपामीति ।
आशीर्वाद
(छंद-दोहा)
सिद्ध स्वरूप महान की, जागी उर में चाह।
करूँ विधान महान यह, उर में भर उत्साह ।।
(इत्याशीर्वादः)
अर्ध्यावलि
(1)
अब श्री समाधि-शतक ग्रन्थ की भाषा वचनिका लिखी जाती
है प्रथम मंगलाचरण कहते हैं :-
येनात्माऽबुद्धयतात्मैव परत्वेनैव चापरम्।
अक्षयानंतबोधाय तस्मै सिद्धात्मने नमः ।। 1।।
अर्थ :- जिसके द्वारा आत्मा आत्मा रूप से ही और आत्मा से
भिन्न सर्व जो कुछ पर है सो पररूप से ही जाना गया है उस अविनाशी
अनन्तज्ञान स्वरूप सिद्धात्मा को नमस्कार हो।
1.ॐ ह्रीं अक्षयानन्तबोधरूपसमतास्वरूपाय नमः ।
अक्षयज्ञानस्वरूपोऽहम् ।
(छंद-वीर)
जिसके द्वारा आत्मा आत्मरूप जानने में आता।
आत्मा से जो भिन्न सर्व पर रूप मानने में आता।।
उस अक्षय अनंत अविनाशी सिद्धात्मा को करूँ प्रणाम ।
गुण अनंतपति समभावी सर्वज्ञ देव वन्दूँ वसु याम।।
उनके द्वारा कहे गए छह द्रव्यों का मैं ज्ञान करूँ।
आत्म द्रव्य की प्रतीति करके स्वामी सम्यक्ज्ञान करूँ ।।
जीव रु पुद्गल धर्म अधर्म आकाश काल छह द्रव्य पिछान।
आत्म द्रव्य का ज्ञान करूँ मैं हो जाऊँ अरहंत समान।।
सिद्ध स्वरूप प्राप्ति के ही पावन उपाय को लूँ मैं जान।
फिर उसका पालनकर स्वामी पाऊँ सिद्ध स्वपद निर्वाण।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ प्रभु निज पद निर्वाण।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
( 2 )
इस तरह कहे हुए सिद्ध स्वरूप का व उसकी प्राप्ति के उपाय
का उपदेश करने वाले जो सकलात्मा अर्थात् शरीर सहित अरहंत
परमेष्ठी हैं उनकी स्तुति करते हुए श्री पूज्यपाद भगवान कहते हैं :-
जयन्ति यस्यावदतोऽपि भारती,
विभूतयस्तीर्थ कृतोऽप्यनीहितुः ।
शिवाय धात्रे सुगताय विष्णवे,
जिनाय तस्मै सकलात्मनेनमः ।। 2।।
अर्थ :- तालु ओष्ठ से हम लोगों के समान न बोलते हुए भी
तथा किसी प्रकार की इच्छा न रखते हुए भी जिस तीर्थंकर की वाणी
रूपी विभूतियाँ जयवन्त हैं उस परम कल्याणमयी, सन्मार्गोपदेशक,
सम्यग्ज्ञान रूप, ज्ञानापेक्षा सर्वव्यापक व कर्मों को जीतने वाले सकल
परमात्मा अर्थात् अर्हत को नमस्कार हो।
2. ॐ ह्रीं शिवचैतन्यरूपसमतास्वरूपाय नमः ।
विष्णुस्वरूपोऽहम् ।
(छंद-वीर)
बिन इच्छा के ओष्ट तालु बिन खिरती तीर्थंकर वाणी।
वे सर्वज्ञ जिनेश्वर वन्दूँ जो जयवंत पूर्ण ज्ञानी ।।
परम पूज्य कल्याणमयी सन्मार्गोपदेशक श्री अरहंत।
सुगत ज्ञानमय कर्मजयी जिन बार-बार वन्दूँ भगवंत ।।
जीवरु पुद्गल धर्म अधर्म आकाशकाल छहद्रव्य पिछान ।
आत्म द्रव्य का ज्ञान करूँ मैं हो जाऊँ अरहंत समान।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ प्रभु निज पद निर्वाण ।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(3)
सिद्ध तथा अरहंत को नमस्कार रूप मंगलाचरण करके अब
आचार्य अपनी ज्ञानशक्ति को दिखाते हुए आत्मा का स्वरूप कहने की
प्रतिज्ञा करते हैं :-
श्रुतेन लिंगेन यथात्मशक्तिः,
समाहितान्तः करणेन सम्यक् ।
समीक्ष्य कैवल्यसुखस्पृहाणां,
विविक्तमात्मानमथाभिधास्ये ।। ३ ।।
अर्थ :- अब नमस्कार के पीछे मैं शास्त्र के द्वारा, अनुमान रूप
युक्ति के द्वारा तथा एकाग्र मन के द्वारा भली प्रकार जान करके तथा
अनुभव में ले करके अतीन्द्रिय आनंद की वांछा करने वालों के लिए
अन्य सबसे भिन्न आत्मा के स्वरूप को अपनी शक्ति के अनुसार कहूँगा।
3. ॐ ह्रीं अनंतशक्तिरूपसमतास्वरूपाय नमः ।
अनंतज्ञानस्वरूपोऽहम् ।
(छंद-गीतिका)
शास्त्र से अनुमान से अरु युक्ति से अनुभव करूँ।
एकाग्र होकर आत्मा का ज्ञान अंतर में धरूँ ।।
अतीन्द्रिय आनंद की वांछा हृदय में हो जिसे ।
आत्म बल से अनात्मा का रूप समझाऊँ उसे ।।
इस समाधि शतक उत्तम ग्रंथ का कर स्वाध्याय।
आत्म का अनुभव करूँ मैं करूँ अपनी ही सहाय ।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(4)
‘जब शुद्ध आत्मा की इतनी विशेषता कही तो क्या आत्मा के
कई भेद होते हैं’, इस शंका को दूर करने के लिए अब आचार्य आत्मा
के भेदों को बताते हैं :-
बहिरन्तः परश्चेति त्रिधात्मा सर्वदेहिषु ।
उपेयात्तत्र परमं मध्योपायाद्बहिस्त्यजेत् । ।4 ।।
अर्थ :- सर्व प्राणियों में बहिरात्मा, अन्तरात्मा और परमात्मा
इस तरह तीन प्रकार की आत्मा है। उनमें से बहिरात्मपने को छोड़ना चाहिये
और अंतरात्मा रूप उपाय से परमात्मपने का साधन करना चाहिये।
4. ॐ ह्रीं बहिरात्मावस्थारहितसमतास्वरूपाय नमः ।
शाश्वत्स्वरूपोऽहम् ।
(छंद-गीतिका)
सर्व जीवात्मा रहे हैं सदा से बहिरात्मा।
ज्ञान जिनने किया वे ही हुए अन्तर्रात्मा ।।
फिर किया पुरुषार्थ तो वे हो गए परमात्मा।
बहिरात्मापन छोड़ होऊँ आज अन्तर्रात्मा ।।
इसी एक उपाय से हो जाऊँगा परमात्मा ।
फिर न भटकेगा कभी भी कहीं मेरा आत्मा।।
इस समाधि शतक उत्तम ग्रंथ का कर स्वाध्याय ।
आत्मा का अनुभव करूँ मैं करूँ अपनी ही सहाय ।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(5)
अब आचार्य आत्मा की अवस्थाओं को लक्षण से प्रकार कहते हैं :-
बहिरात्मा शरीरादौ जातात्मभ्रान्तिरान्तरः ।
चित्तदोषात्मविभ्रान्तिः परमात्माऽतिनिर्मलः ।। 5 ।।
अर्थ :- शरीर, वचन, मन आदि में आत्मा के होने की जिसके
भ्रांति या भ्रम है वह मिथ्यादृष्टि अज्ञानी बहिरात्मा है, संकल्प विकल्प रूप
चित्त तथा रागादि दोषों को आत्मा मानने की भ्रान्ति जिसके नहीं रही
है वह अन्तरात्मा है तथा जो अति शुद्ध व कर्ममलरहित है वह परमात्मा है।
5. ॐ ह्रीं आत्मभ्रांतिरहितसमतास्वरूपाय नमः ।
निर्मलस्वरूपोऽहम् ।
(छंद-गीतिका)
मन-वचन-तन को समझ निज आज तक यह आत्मा।
भूल से अब तक बना अज्ञान मय बहिरात्मा ।।
रहित जो संकल्प आदि विकल्प से अन्तर्रात्मा।
कर्म मल से रहित केवल शुद्ध है परमात्मा ।।
इस समाधि शतक उत्तम ग्रंथ का कर स्वाध्याय।
आत्मा का अनुभव करूँ मैं करूँ अपनी ही सहाय ।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(6)
अब आचार्य परमात्मा के अन्य प्रसिद्ध नामों को कहते हैं :-
निर्मलः केवलः शुद्धो विविक्तः प्रभुरव्ययः ।
परमेष्ठी परात्मेति परमात्मेश्वरो जिनः ।। 6 ।।
अर्थ :- कर्मों के मल से रहित होने से वे निर्मल हैं; शरीरादिकों
के संबंध से रहित हैं अर्थात् केवल मात्र आप ही हैं इससे केवल हैं;
द्रव्य कर्म और भाव कर्मों के अभाव से परम शुद्धि को रखने वाले हैं
इस कारण शुद्ध हैं; शरीर तथा कर्म आदि का स्पर्श उनके आत्म प्रदेशों
से नहीं है अतः अस्पर्श और अबन्ध होने से विविक्त हैं; इन्द्रादि तथा
गणधरादि मुनियों के स्वामी हैं अतः प्रभु हैं; जिस अनंत ज्ञान-दर्शन
सुख और वीर्यमय स्वभाव को प्राप्त किया है उससे कभी छूटने वाले
नहीं हैं इससे अव्यय हैं; इन्द्रादिकों से वन्दने योग्य परम अर्थात्
उत्कृष्ट पद में विराजमान हैं इस कारण परमेष्ठी हैं; संसारी जीवों से
विलक्षण आत्मा रूप होने से परमात्मा हैं; संसारी जीवों को असम्भव
ऐसे आत्मिक परम ऐश्वर्य को रखने वाले हैं इससे ईश्वर हैं और
मोहनीयादि कर्मों पर विजय प्राप्त कर लेने के कारण जिन हैं-इस
प्रकार ये परमात्मा के वाचक नाम हैं।
6. ॐ ह्रीं शुद्धात्मरूपसमतास्वरूपाय नमः ।
अव्ययस्वरूपोऽहम् ।
(छंद-वीर)
कर्म मल रहित अतः सुनिर्मल शरीरादि संबंध विहीन।।
द्रव्य-भाव कर्मों से विरहित पूर्ण शुद्ध है ज्ञान प्रवीण।।
अस्पर्शी निर्बंध अव्ययी विविक्त परमेष्ठी ईश्वर ।।
घाति जयी जिन परमात्मा प्रभु सिद्ध स्वपद पति जगदीश्वर ।।
परम अनुभवी गुणनिधान सर्वज्ञ सर्वदर्शी ज्ञानी।।
महामोह संपूर्ण नाशकर नाथ हुए केवलज्ञानी ।।
सम्यक्ज्ञानी ज्ञानमूर्त्ति चैतन्य स्वरूपासक्त महान।।
अनंत ज्ञानी केवल ज्ञायक परम तत्त्व वेदी विद्वान।।
परमात्मा के गुण अनंत का मनन चिन्तवन सुखकारी।।
सकल व्याधियां हर लेता है सकल विश्व को हितकारी ।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मैं निज पद निर्वाण।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(7)
अब कहते हैं कि इसका क्या कारण है जो बहिरात्मा देहादि
को आत्मा मान लेता हैं :-
बहिरात्मेन्द्रिय-द्वारैरात्मज्ञान-पराङ्मुखः ।
स्फुरितः स्वात्मनो देहमात्मत्वेनाध्यवस्यति ।। 7 ।।
अर्थ :- आत्मा का सच्चा स्वरूप क्या है- इस ज्ञान से जो
शून्य है ऐसा मिथ्यादृष्टि अज्ञानी जीव अपनी इंद्रियों के द्वारा विषयों
के ग्रहण में व्यापार करता हुआ अपनी आत्मा की देह को आत्मा रूप
से माना करता है।
7. ॐ ह्रीं इन्द्रियज्ञानरहितसमतास्वरूपाय नमः ।
निर्देहस्वरूपोऽहम् ।
(छंद-वीर)
आत्म ज्ञान से जो पराङ्गमुख वे अज्ञानी मिथ्यादृष्टि ।
इन्द्रिय विषय ग्रहण करते हैं अनात्मा पर ही है दृष्टि ।।
अंतरंग की बुद्धि मंद है वैभाविक परिणति के दास।
नहीं ज्ञान एकत्व विभक्त आत्मा का है पर के दास ।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मैं निज पद निर्वाण ।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(8)
देह को ही आत्मा मानता हुआ वह अज्ञानी जीव मनुष्यादि चारों
गतियों के शरीरों को अभेद रूप से आत्मा मानता है ऐसा दिखाते हैं :-
नरदेहस्थमात्मानमविद्वान् मन्यते नरम् ।
तिर्यंचं तिर्यगङ्गस्थं सुरांगस्थं सुरं तथा ।। 8 ।।
अर्थ :- अज्ञानी बहिरात्मा मनुष्य देह में तिष्ठी हुई आत्मा को
मनुष्य, तिर्यंच शरीर में ठहरी हुई आत्मा को पशु और देव के शरीर में
ठहरी हुई आत्मा को देव मानता है।
8. ॐ ह्रीं नरादिदेहस्थावस्थारहितसमतास्वरूपाय नमः ।
निजगुणधामस्वरूपोऽहम् ।
(छंद-ताटंक)
बहिरात्मा तो देह विराजित आत्मा को समझा है नर।
तिर्यञ्च तन में जो आत्मा है उसको माना है पशु भर।।
सुरतन में जो आत्मा राजित उसको भी जाना है सुर।
भेद ज्ञान के बिना यही अज्ञान दशा में है तत्पर ।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मैं निज पद निर्वाण।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(9)
और कहते हैं :-
नारकं नारकाङ्गस्थं न स्वयं तत्त्वतस्तथा ।
अनन्तानन्तधीशक्तिः स्वसंवेद्योऽचलस्थितिः ।। १ ।।
अर्थ :- नारकी के देह में ठहरी हुई आत्मा को वह नारकी
मानता है परन्तु निश्चय से उस रूप अर्थात् मनुष्य, तिर्यंच, देव तथा
नारकी रूप अपने आप अर्थात् कर्म की उपाधि के बिना नहीं होता
क्योंकि निश्चय से यह आत्मा अनन्तानन्त ज्ञान और वीर्य की धारी है,
अपने से ही अंतरंग में अनुभव करने योग्य है तथा निश्चल रूप से
रहने के स्वभाव वाली हैं।
9. ॐ ह्रीं नारकाङ्गरहितसमतास्वरूपाय नमः ।
अचलबोधस्वरूपोऽहम् ।
(छंद-ताटंक)
देह व्यवस्थित निज आत्मा को माना है नारकी सदा।
यह सब कर्मोपाधि जनित है ऐसा माना नहीं कदा।।
निश्चय से तो ज्ञान वीर्य का धारी सौख्य स्वभावी है।
अंतरंग में अनुभवन योग्य है स्वसंवेद्य समभावी है।।
जब तक है बहिरात्म बुद्धि तब तक ही यह अज्ञानी है।
जब बहिरात्म अवस्था जाती हो जाता तब ज्ञानी है।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मैं निजपद निर्वाण।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
( 10 )
अपनी देह में ही आत्मा की मान्यता करने वाला बहिरात्मा
दूसरे की देह में कैसी बुद्धि रखता है, इस बात को कहते हैं :-
स्वदेहसदृशं दृष्ट्वा परदेहमचेतनम् ।
परात्माधिष्ठितं मूढः परत्वेनाध्यवस्यति ।। 10 ।।
अर्थ :- अज्ञानी बहिरात्मा अपनी देह के समान अर्थात् अपनी
देह के व्यापार, वचन-व्यवहार व आकार आदि के समान दूसरे की
देह को अर्थात् दूसरे की देह के व्यापार आदि को देखकर अन्य की
आत्मा को अपने में रखने वाली ऐसी उस देह को अथवा परात्मा
अर्थात् आत्मा से परस्वरूप जो कर्म, उसके द्वारा अधिष्ठित अर्थात्
प्राप्त हुई ऐसी देह को जो चेतन सहित है तथा स्वयं जड़ है पररूप
अर्थात् पर की आत्मा रूप मान लेता है।
10.ॐ ह्रीं पराधिष्ठानरहितसमतास्वरूपाय नमः ।
स्वाधीनस्वरूपोऽहम् ।
(छंद-वीर)
कर्मोदय से प्राप्त देह को ही अज्ञानी अपनी जान।
सतत् देह व्यापार लीन है यह बहिरात्मा मूढ़ अजान ।।
जड़ तन पूर्ण अचेतन पुद्गल को ही मान रहा आत्मा।
अन्य दूसरे तन लखकर भी मान रहा है पर आत्मा।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मैं निजपद निर्वाण।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
( 11 )
इस तरह की मान्यता से युक्त बहिरात्मा और क्या करता है,
यह बताते हैं :-
स्वपराध्यवसायेन देहेष्वविदितात्मनाम् ।
वर्तते विभ्रमः पुंसां पुत्रभार्यादिगोचरः।। 11।।
अर्थ :- अपनी या दूसरों को देहों में स्व-पर की आत्मा की
मान्यता के कारण आत्मा को न जानने वाले पुरुषों के पुत्र, स्त्री आदि
संबंधी भ्रम वर्तन करता है।
11.ॐ ह्रीं पुत्रभार्यादिसङ्गरहितसमतास्वरूपाय नमः ।
निःसङ्गस्वरूपोऽहम् ।
(छंद-ताटंक)
अपने या पर के तन को ही स्वपर आत्मा मान रहा।।
स्त्री पुरुष आदि सबको ही भ्रम से आत्मा जान रहा।।
पर्यायों में आत्म बुद्धि है इसीलिए है बहिरात्मा।।
तज दे यह पर्याय बुद्धि तो हो जाएगा परमात्मा।।
पहिले जीते यह विभ्रम को सर्व भ्रान्तियां क्षय कर दे।।
फिर यह अपनी शुद्ध आत्मा को गुण रत्नों से भर दे।।
जैसे पंछी रैन बसेरा करते किसी वृक्ष पर आ।।
विविध दिशाओं से आते हैं प्रात समय यहाँ जा वहाँ जा।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मैं निज पद निर्वाण ।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
( 12 )
इस प्रकार स्त्री-पुत्रादिकों में अपनेपने का भ्रम हो जाने का
क्या फल होता है सो कहते हैं :-
अविद्या संज्ञितस्तस्मात्संस्कारो जायते दृढः ।
येन लोकोऽङ्गमेव स्वं पुनरप्यभिमन्यते ।। 12 ।।
अर्थ :- इस मिथ्या मान्यता या भ्रम बुद्धि से बहिरात्मा के
भीतर अविद्या है नाम जिसका ऐसा संस्कार अर्थात् असर मजबूत या
गाढ़ा हो जाता है जिसके द्वारा यह अविवेकी मनुष्य शरीर को ही फिर-
फिर भी यहाँ तक कि अन्य-अन्य जन्म में भी आत्मा माना करता हैं।
12.ॐ ह्रीं स्वानन्तगुणलक्ष्मीरूपसमतास्वरूपाय नमः ।
चैतन्यस्वरूपोऽहम् ।
(छंद-ताटंक)
मिथ्या है मान्यता तथा भ्रम बुद्धि अविद्या है भीतर।
अविवेकी बहिरात्मा को ही मान रहा है आत्मा भर।।
मैं मनुष्य हूँ ब्राह्मण क्षत्री वैश्य शूद्र निर्बल बलवान।
मैं पशु हूँ गज अश्व सिंह हूँ दाता पंडित हूँ विद्वान।।
मैं निग्रंथ तपस्वी भिक्षुक साधु संत श्रावक गुणवान।
इत्यादिक मान्यता सर्व ही मिथ्या भ्रम की है पहचान।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मैं निज पद निर्वाण ।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(13)
बहिरात्मा उपर्युक्त प्रकार मानता हुआ क्या करता है तथा
अंतरात्मा कैसे इस भ्रम से बचता है सो दिखाते हैं :-
देहे स्वबुद्धिरात्मानं युनक्त्येतेन निश्चयात् ।
स्वात्मन्येवात्मधीस्तस्माद्वियोजयति देहिनम् ।। 13 ।।
अर्थ :- इस शरीर में व अन्य पर वस्तु और भावों में आत्मा
की बुद्धि रखने वाला बहिरात्मा अपनी आत्मा को इस देह से या
पुद्गल कर्मादि से बंधनरूप कर देता हैं अर्थात् कर्म बंधन में पड़कर
दीर्घ संसारी हो जाता है एवं अपनी आत्मा के सच्चे स्वरूप में ही
आत्मा की बुद्धि रखने वाला अंतरात्मा अपनी आत्मा को निश्चय ही
देह से या पुद्गल कर्म बंध से छुड़ा लेता है।
13. ॐ ह्रीं अनंतधीसमतास्वरूपाय नमः ।
ज्ञानपुंजस्वरूपोऽहम् ।
(छंद-वीर)
बहिरात्मा अपनी आत्मा को कर्मादिक से करता युक्त।
बना दीर्घ संसारी अब तक अतः न हो पाया है मुक्त।।
आत्मा में आत्मत्व बुद्धि रखने वाला ही होता मुक्त।
अंतरात्मा कर्म बंध क्षयहित न देह से होता युक्त ।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो, पाऊँ मैं निज पद निर्वाण ।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
( 14 )
देह के साथ अपनापना जोड़ने वाले बहिरात्मा के निन्दनीय
व्यापार को दिखाते हुए आचार्य खेद प्रगट करते हैं :-
देहेष्वात्मधिया जाताः पुत्रभार्यादिकल्पनाः ।
सम्पत्तिमात्मनस्ताभिर्मन्यते हा हतं जगत्।। 14।।
अर्थ :- अपनी या दूसरों की देहों में आत्मा की बुद्धि रखने
से ही पुत्र, स्त्री आदि की कल्पनाएँ पैदा होती है। खेद है कि यह जगत्
उन्हीं स्त्री पुत्रादि से अपनी सम्पदा मानता है, इसलिए नष्ट-भ्रष्ट
हुआ है।
14. ॐ ह्रीं पुत्रभार्यादिकल्पनारहितसमतास्वरूपाय नमः ।
स्वगुणसंपत्तिस्वरूपोऽहम् ।
(छंद-ताटंक)
अपनी या पर की देहों में आत्म बुद्धि से भ्रमित हुआ।
स्त्री पुरुष आदि संबंधों में ही पड़कर चकित हुआ।।
विविध कल्पनाएँ करता है उन्हें संपदा मान रहा।
नष्ट भ्रष्ट हो दुखी बना है आत्म स्वरूप न जान रहा।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मैं निज पद निर्वाण ।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
( 15 )
आगे बहिरात्मा के स्वरूप को संकोचते हुए यह बताते हैं कि
इस बहिरात्मपने को छोड़कर अंतरात्मा को अपनी आत्मा में प्रवेश
करना चाहिए :-
मूल संसारदुःखस्य देहे एवात्मधीस्ततः ।
त्यक्त्वैनां प्रविशेदन्तर्बहिरव्यापृतेन्द्रियः ।। 15।।
अर्थ :- संसार के दुःखों का मूल कारण शरीर में अर्थात् पुद्गल
व पुद्गल संबंधी पर्यायों में ही आत्मपने की बुद्धि है इस कारण से इस
मिथ्या बुद्धि को छोड़कर ज्ञानी पुरुष आत्मा से बाहर बाहरी इन्द्रियों के
विषय रूप पदार्थों में इन्द्रियों के व्यापार में न प्रवर्तता हुआ अपने
अन्दर जावे अर्थात् अपनी आत्मा में ही आत्मबुद्धि करे और अंतरात्मा
होकर अपनी आत्मा का अनुभव करे।
15. ॐ ह्रीं इन्द्रियव्यापाररहितसमतास्वरूपाय नमः ।
अनंतसुखस्वरूपोऽहम् ।
(छंद-वीर)
पुद्गल संबंधी पर्यायों में है आत्मपने की बुद्धि ।
अब तो तज दे ज्ञानी बनकर इस प्रकार की मिथ्याबुद्धि ।।
इन्द्रिय विषय पदार्थो में इन्द्रिय व्यापार सदा को छोड़।
आत्मा में आत्मत्व बुद्धिकर निज को निज आत्मा से जोड़।।
अंतरात्मा बनकर अपनी आत्मा का अनुभव कर ले।
सर्व भ्रान्तियाँ तथा व्याधियाँ अन्तर्मुख होकर हर ले।।
होगी एक अपूर्व लब्धि बस अंतरात्मा बनते ही।
आत्म शुद्धि होगी भीतर में बहिरात्मा मति हनते ही।।
नाथ समाधि शतक के द्वारा करूँ आत्मा का कल्याण।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित हो पाऊँ मैं निज पद निर्वाण।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीसमाधिशतकशास्त्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।