श्री ऋषभदेव जिन पूजन (कवि राजमल पवैया) | Shri Rishabhdev Jin Pujan (Rajmal Pavaiya)

श्री ऋषभदेव जिन पूजन

श्री ऋषभदेव जिन पूजन - 3

जय आदिनाथ जिनेन्द्र जय जय प्रथम जिन तीर्थंकरम् ।
जय नाभि सुत मरुदेवी नन्दन ऋषभप्रभु जगदीश्वरम् ।।
जय जयति त्रिभुवन तिलक चूड़ामणि वृषभ विश्वेश्वरम् ।
देवाधि देव जिनेश जय जय, महाप्रभु परमेश्वरम् ।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री आदिनाथजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री आदिनाथजिनेन्द्र ! अत्र मम् सन्निहितो भव भव वषट् इति सन्निधिकरणम् ।

समकित जल दो प्रभु आदि निर्मल भाव धरूँ ।
दुख जन्म मरण मिट जाय जल से धार करूँ ।।
जय ऋषभदेव जिनराज शिव सुख के दाता ।
तुम सम हो जाता है स्वयं को जो ध्याता ।।

ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।

समकित चंदन दो नाथ भव संताप हरूँ ।
चरणों में मलय सुगन्ध हे प्रभु भेंट करूँ ।।जय ऋषभदेव।।

ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय संसारताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।

समकित तंदुल की चाह मन में मोद भरे ।
अक्षत से पूजूं देव अक्षय पद संवरे ।।जय ऋषभदेव।।

ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय अक्षयपद प्राप्तयें अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।

समकित के पुष्प सुरम्य दे दो हे स्वामी ।
यह काम भाव मिट जाय हे अन्तर्यामी ।।जय ऋषभदेव।।

ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।

समकित चरु करो प्रदान मेरी भूख मिटे ।
भव भव की तृष्णा ज्वाल उर से दूर हटे ।।जय ऋषभदेव।।

ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

समकित दीपक की ज्योति मिथ्यातम भागे ।
देखूं निज सहज स्वरूप निज परिणति जागे ।।जय ऋषभदेव।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।

समकित की धूप अनूप कर्म विनाश करे ।
निज ध्यान अग्नि के बीच आठों कर्म जरे ।।जय ऋषभदेव।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।

समकित फल मोक्ष महान् पाऊँ आदि प्रभो ।
हो जाऊँ सिद्ध समान सुखमय ऋषभ विभो ।।जय ऋषभदेव।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथजिनेन्द्राय महामोक्षफल प्राप्ताय फलं निर्वपामीति स्वाहा ।

वसु द्रव्य अर्घ जिनदेव चरणों में अर्पित ।
पाऊँ अनर्घपद नाथ अविकल सुख गर्भित ।।जय ऋषभदेव।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ पद प्राप्ताय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

पंच कल्याणक

शुभ आषाढ़ कृष्ण द्वितीया को मरुदेवी उर में आये ।
देवों ने छह मास पूर्व से रत्न अयोध्या बरसाये ।।
कर्म भूमि के प्रथम जिनेश्वर तज सर्वार्थसिद्ध आये ।
जय जय ऋषभनाथ तीर्थंकर तीन लोक ने सुख पाये ।।

ॐ ह्रीं श्री आषाढ़कृष्णाद्वितीया दिनेगर्भमंगल प्राप्ताय ऋषभदेवाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

चैत्र कृष्ण नवमी को राजा नाभिराय गृह जन्म लिया ।
इन्द्रादिक ने गिरि सुमेरु पर क्षीरोदधि अभिषेक किया ।।
नरक त्रिर्यंच सभी जीवों ने सुख अन्तर्मुहुर्त पाया ।
जय जय ऋषभनाथ तीर्थंकर जग में पूर्ण हर्ष छाया ।।

ॐ ह्रीं श्री चैत्रकृष्णनवमीदिने जन्ममंगल प्राप्ताय ऋषभदेवाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

चैत्र कृष्ण नवमी को ही वैराग्य भाव उर छाया था ।
लौकान्तिक सुर इन्द्रादिक ने तप कल्याण मनाया था ।।
पंच महाव्रत धारण करके पंच मुष्टि कच लोच किया ।
जय जय ऋषभनाथ तीर्थंकर तुमने मुनि पद धार लिया ।।

ॐ ह्रीं श्री चैत्रकृष्णनवमीदिने तपमंगल प्राप्ताय ऋषभदेवाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

एकादशी कृष्ण फागुन को कर्म घातिया नष्ट हुए ।
केवलज्ञान प्राप्त कर स्वामी वीतराग भगवन्त हुए ।।
दर्शन, ज्ञान, अनन्तवीर्य, सुख पूर्ण चतुष्टय को पाया ।
जयप्रभु ऋषभदेव जगती ने समवशरण लख सुख पाया ।।

ॐ ह्रीं श्री फाल्गुनवदी एकादशदिने ज्ञानमंगल प्राप्ताय ऋषभदेवाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

माघ वदी की चतुर्दशी को गिरि कैलाश हुआ पावन ।
आठों कर्म विनाशे पाया परम सिद्ध पद मन भावन ।।
मोक्ष लक्ष्मी पाई गिरि कैलाश शिखर, निर्वाण हुआ ।
जय जय ऋषभनाथ तीर्थंकर भव्य मोक्ष कल्याण हुआ ।।

ॐ ह्रीं श्री माघवदी चतुर्दश्याम् महामोक्षमंगल प्राप्ताय ऋषभदेवाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

जयमाला

जम्बूद्वीप सु भरतक्षेत्र में नगर अयोध्यापुरी विशाल ।
नाभिराय चौदहवें कुलकर के सुत मरुदेवी के लाल ।।
सोलह स्वप्न हुए माता को पन्द्रह मास रत्न बरसे ।
तुम आये सर्वार्थसिद्धि से माता उर मंगल सरसे ।।

मति श्रुत अवधिज्ञान के धारी जन्मे हुए जन्म कल्याण ।
इन्द्रसुरों ने हर्षित हो पाण्डुक शिला किया अभिषेक महान् ।।
राज्य अवस्था में तुमने जन जन के कष्ट मिटाये थे ।
असि, मसि, कृषि, वाणिज्य, शिल्प, विद्या षट्कर्म सिखाये थे ।।

एक दिवस जब नृत्यलीन सुरि नीलांजना विलीन हुई ।
है पर्याय अनित्य आयु उसकी पल भर में क्षीण हुई ।।
तुमने वस्तु स्वरूप विचारा जागा उर वैराग्य अपार ।
कर चिंतवन भावना द्वादश त्यागा राज्य और परिवार ।।

लौकान्तिक देवों ने आकर किया आपका जय जयकार ।
आस्रव हेय जानकर तुमने लिया हृदय में संवर धार ।।
वन सिद्धार्थ गये वट तरु नीचे वस्त्रों को त्याग दिया ।

ॐ नमः सिद्धेभ्यः कहकर मौन हुए तप ग्रहण किया ।।

स्वयं बुद्ध बन कर्मभूमि में प्रथम सुजिन दीक्षा धारी ।
ज्ञान मनःपर्यय पाया धर पंच महाव्रत सुख कारी ।।

धन्य हस्तिनापुर के राजा श्रेयांस ने दान दिया ।
एक वर्ष पश्चात् इक्षुरस से तुमने पारणा किया ।।
एक सहस्त्र वर्ष तप कर प्रभु शुक्ल ध्यान में हो तल्लीन ।
पाप पुण्य आस्रव विनाश कर हुए आत्मरस में लवलीन ।।

चार घातिया कर्म विनाशे पाया अनुपम केवलज्ञान ।
दिव्य ध्वनि के द्वारा तुमने किया सकलजग का कल्याण ।।
चौरासी गणधर थे प्रभु के पहले वृषभसेन गणधर ।
मुख्य आर्यिका श्री ब्राम्ही श्रोता मुख्य भरत नृपवर ।।

भरतक्षेत्र के आर्यखण्ड में नाथ आपका हुआ विहार ।
धर्मचक्र का हुआ प्रवर्तन सुखी हुआ सारा संसार ।।
अष्टापद कैलाश धन्य हो गया तुम्हारा कर गुणगान ।
बने अयोगी कर्म अघातिया नाश किये पाया निर्वाण ।।

आज तुम्हारे दर्शन करके मेरे मन आनन्द हुआ ।
जीवन सफल हुआ है स्वामी नष्ट पाप दुख द्वन्द हुआ ।।
यही प्रार्थना करता हूँ प्रभु उर में ज्ञान प्रकाश भरो ।
चारों गतियों के भव संकट का, हे जिनवर नाश करो ।।

तुम सम पद पा जाऊँ मैं भी यही भावना भाता हूँ ।
इसीलिए यह पूर्ण अर्घ चरणों में नाथ चढ़ाता हूँ ।।

ॐ ह्रीं श्री श्रीऋषभदेव जिनेन्द्राय महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

वृषभ चिह्न शोभित चरण ऋषभदेव उर धार ।
मन वच तन जो पूजते वे होते भव पार ।।

।।इत्याशीर्वाद।।


Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ १३६ से १४०