श्री ऋषभजयन्ती पूजन (कवि राजमल पवैया) | Shri Rishabhajayanti Pujan (Rajmal Pavaiya)

श्री ऋषभजयन्ती पूजन

जम्बूद्वीप सुभरत क्षेत्र में है उत्तरप्रदेश शुभ नाम ।
सरयूतट पर नगर अयोध्या प्रभु की जन्मभूमि अभिराम ।।
कर्मभूमि के प्रथम जिनेश्वर आदिनाथ मंगलदाता ।
जो भी शरण आपकी आता सम्यकदर्शन प्रगटाता ।।
वर्तमान चौबीसी के तीर्थंकर आदीश्वर भगवान् ।
विनयसहित पूजनकरता हूँ निजस्वभाव को लूँ पहचान ।।
ऋषभदेव के जन्मदिवस पर वृषभनाथ प्रभु को ध्याऊँ ।
आदिब्रहा वृषभेश्वर जिनप्रभु महादेव के गुण गाऊँ ।।

ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्र अत्र अवतर अवतर संवौषट् अत्र तिष्ठ- तिष्ठ ठ’ ठ, अत्र मम सन्निहितो भव-भव वषट् ।

शुद्धनीर प्रभु चरण चढाऊं जन्म जरादिक विनशाऊँ ।
वीतराग विज्ञान ज्ञानधन निजस्वभाव में आ जाऊँ ।ऋषभ ।।१।।

अपने स्वरूप में रहता तो यह प्राणी परमेश्वर होता ।
ज्ञायक स्वभाव के आश्रय से यह जीव स्वभावेश्वर होता ।।

ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जलं नि ।

सहज सुगन्धित चंदन लाऊं भवाताप सब विनशाऊँ ।
वीतराग विज्ञान ज्ञानघन निजस्वभाव में आजाऊँ ।।ऋषभ।।२ ।।

ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय संसारताप विनाशनाय चन्दनं नि ।

सर्वोत्तम भावों के अक्षत लाऊँ अक्षय पद पाऊँ ।
वीतराग विज्ञान ज्ञानघन निजस्वभाव में आजाऊँ ।।ऋषभ.।।३ ।।

ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय अक्षयपद प्राप्ताय अक्षतं नि ।

सुरतरु पुष्प सुवासित लाऊँ कामव्याधि सब विनशाऊँ ।
वीतराग विज्ञान ज्ञानघन निजस्वभाव में आजाऊँ ।।ऋषभ।।४ ।।

ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय कामवाण विध्वंसनाय पुष्प नि ।

पुण्यभाव नैवद्य त्याग कर क्षुधारोग पर जय पाऊँ ।
वीतराग विज्ञान ज्ञानघन निज स्वभाव में आ जाऊँ ।।ऋषभ।।५ ।।

ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेवजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य नि ।

अन्तरतम के नाश हेतु हे नाथ ज्ञान दीपक लाऊँ ।
वीतराग विज्ञान ज्ञानघन निजस्वभाव में आ जाऊँ ।।ऋषभ।।६ ।।

ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीप नि ।

अष्टकर्म की धूप जलाऊँ शुक्ल ध्यान अनुपम ध्याऊँ ।
वीतराग विज्ञान ज्ञानघन निजस्वभाव में आ जाऊँ ।।ऋषभ।।७ ।।

ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय अष्टकर्मविध्वंसनाय धूप नि ।

महामोक्ष फल प्राप्त करूँ निश्चय रत्नत्रय उर लाऊँ ।
वीतराग विज्ञान ज्ञानघन निज स्वभाव में आ जाऊँ ।।ऋषभ।।८ ।।

ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय महा मोक्षफलप्राप्तये फल नि ।

शुद्धभाव का अर्घ्य बनाऊँ पद अनर्घ्य अविचल पाऊँ ।
वीतराग विज्ञान ज्ञानघन निजस्वभाव में आ जाऊँ ।।ऋषभ।।९ ।।

ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय अनर्घ पद प्राप्ताय अर्घ्यं नि. ।

जो निश्चय को भूले भटके भी न कभी अपनाते हैं ।
मोह, राग, द्वेषादि भाव से निज को जान न पाते हैं ।।

जयमाला

ऋषभ देव जिनराज को नित प्रति करूँ प्रणाम ।
भाव सहित पूजन करु पाऊँ निज ध्रुवधाम ।।१।।

भोग भूमि का अन्त हुआ जब कल्पवृक्ष सब हुए विलीन ।
ज्योति मद होते ही नभ में दृष्टित रवि शशि हुए प्रवीण ।।२।।

चौदह कुलकर हुए जिन्हों से कर्म भूमि प्रारम्भ हुई ।
अन्तिम कुलकर नाभिराय से नई दिशा आरम्भ हुई ।।३।।

तृतीय काल के अन्त समय में भरत क्षेत्र को धन्य किया ।
सर्वार्थसिद्धि से चयकर तुमने मरुदेवी उरवास लिया ।।४।।

चैत्र कृष्ण नवमी को प्रात नगर अयोध्या जन्म लिया ।
तब स्वर्गों में बजी बधाई जग ने जय जय गान किया ।।५।।

सुरपति ने स्वर्णिम सुमेरु पर क्षीरोदधि अभिषेक किया ।
पग में वृषभ चिह्न लखते ही वृषभनाथ यह नाम दिया ।।६।।

लक्ष चुरासी वर्षों का होता पूर्वांग एक जानो ।
लक्ष चुरासी पूर्वांग का होता एक पूर्व जानो ।।७।।

लाख चुरासी पूर्व आयु थी धनुष पांच सौ पाया तन ।
लाख तिरासी पूर्व राज्य कर हुए जगत् से उदास मन ।।८।।

नीलांजना मरण लखते ही भव तन भोग उदास हुए ।
कर चिन्तवन भावना द्वादश निज स्वभाव के पास हुए ।।९।।

मात पिता से आज्ञा लेकर पुत्र भरत को राज्य दिया ।
बाहुबली ने प्रभु आज्ञा से पोदनपुर का राज्य लिया ।।१०।।

लौकांतिक सुर साधुवाद देने प्रभु चरणों में आये ।
तपकल्याण मनाने को इन्द्रादिक सुर आ हर्षाये ।।११।।

अन्य नृपति भी दीक्षित होने प्रभु के साथ गए वनवास ।
वन में जाकर प्रभु ने दीक्षाधारी निज मे कियानिवास ।।१२।।

दर्शन ज्ञान चरित्र नियम है, जो कि नियम से करने योग्य ।
कारण नियम त्रिकाल शुद्ध ध्रुव, सहज स्वभाव आश्रय योग्य । ।
एक सहस्त्र वर्ष तप करके निज स्वभाव का ध्यान किया ।
पाप पुण्य परभाव नाशकर अद्भुत केवलज्ञान लिया ।।१३।।

समवशरण रच इन्द्रसुरों ने किया अपूर्व ज्ञानकल्याण ।
मोक्ष मार्ग संदेश आपने दिया जगत् को श्रेष्ठ प्रधान ।।१४।।

भरत क्षेत्र में बन्द मोक्ष का मार्ग पुन प्रारम्भ किया ।
पुत्र अनन्तवीर्य ने शिव पद पा यह क्रम आरम्भ किया ।।१५।।

प्रभु ने एक लाख पूरब तक भरत क्षेत्र में किया विहार ।
अष्टापद कैलाश शिखर से आप हुए भव सागर पार ।।१६।।

योग निरोध पूर्ण करके प्रभु ने पाया पद निर्वाण ।
सिद्ध स्वपद सिंहासन पाया वसु कर्मों का कर अवसान ।।१७।।

वृषभसेन गणधर चौरासी गणधर में थे मुख्य प्रधान ।
कर रचना अन्तमुहुर्त में द्वादशांग की हुए महान् ।।१८।।

नाथ तत्त्व उपदेश आपका हम भी हृदयंगम कर लें ।
आत्मतत्त्व निज की प्रतीति कर हम सब मिथ्यातम हरले ।।१९।।

तज पर्याय दृष्टि दुखदायी द्रव्य दृष्टि ही बन जाये ।
ध्रुव स्वरूप का अवलंबन ले सादि अनन स्वपद पाये ।।२०।।

अपने अपने परिणामों के द्वारा पाये आत्म प्रकाश ।
वीतराग निर्ग्रन्थ मार्ग का जागा है उर में विश्वास ।।२१।।

ॐ ह्रीं श्री ऋषभनाथ जिनेन्द्राय पूर्णार्घ्यं नि ।

ऋषभ जयन्ती पर्व की गूँज रही जयकार ।
वीतराग जिनमार्ग ही एक जगत् में सार ।।२२।।

इत्याशीर्वाद

जाप्ययन्त्र-ॐ ह्रीं श्री ऋषभनाथ जिनेन्द्राय नम


Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), पृष्ठ १३८ से १४१