श्री रक्षाबंधन पूजन(ब्र.श्री रविन्द्र जी ‘आत्मन्’ कृत) | Shri Rakshabandhan Pujan

(छन्द-वीर)
घोर उपसर्गजयी समतामय रत्नत्रय के साधक हैं।
काया से भी निस्पृह जो निज शुद्धातम आराधक हैं।।
अहो अकंपन आदि मुनीश्वर हृदय हमारे वास करो।
हो वात्सल्य विष्णु मुनिवर सम श्री जिनधर्म प्रकाश करो।।

ॐ ह्रीं श्रीविष्णुकुमारसहिताकम्पनाचार्यादिसप्तशतकमुनीश्वरसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् इत्याह्वाननम् । ॐ ह्रीं श्रीविष्णुकुमारसहिताकम्पनाचार्यादिसप्तशतकमुनीश्वरसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः इति स्थापनम। ॐ ह्रीं श्रीविष्णुकुमारसहिताकम्पनाचार्यादिसप्तशतकमुनीश्वरसमूह ! अत्र भव भव वषट् सन्निधिकरणम्।

(छन्द-ताटंक)
प्रासुक जल से पूजा करते, रोम-रोम हुलसाया है।
अहो सहज वात्सल्यमयी जिनशासन मन को भाया है।।
हुए अकम्पित श्री अकम्पन, आदि मुनीश्वर आतम में।
किया दूर उपसर्ग विष्णु मुनि, प्रीति धरी शुद्धातम में।।
ॐ ह्रीं श्रीविष्णुकुमारसहिताकम्पनाचार्यादिसप्तशतकमुनिश्वरेभ्यो जन्म-जरा-मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

देख प्रभाव शांत भावों का, बलि आदिक भी विनत हुए।
करें अर्चना हम चंदन से, मुक्ति मार्ग के पथिक हुए।।हुए… ।।
ॐ हीं श्रीविष्णुकुमारसहिताकम्पनाचार्यादिसप्तशतकमुनिश्वरेभ्यो संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।

क्षत् विक्षत् तन हुआ किन्तु, परिणाम आपके अक्षत ही।
अक्षत् से पूजा करते हम, करें भावना ऐसी ही।।हुए…।।
ॐ ह्रीं श्रीविष्णुकुमारसहिताकम्पनाचार्यादिसप्तशतकमुनिश्वरेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।

भायें हम निष्काम भावना, कामजयी हों आप समान।
पुष्पों से करते पूजा हम, जानें सहज ज्ञान में ज्ञान ।।
हुए अकम्पित श्री अकम्पन, आदि मुनीश्वर आतम में।
किया दूर उपसर्ग विष्णु मुनि, प्रीति धरी शुद्धातम में।।
ॐ ह्रीं श्रीविष्णुकुमारसहिताकम्पनाचार्यादिसप्तशतकमुनिश्वरेभ्यो कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

निजानन्द में तृप्त साधु, आदर्श हमारे सदा रहें।
अहो पूजते नैवेद्य से, शुद्ध भोजन में भी विरत रहें।।हुए…||
ॐ ह्रीं श्रीविष्णुकुमारसहिताकम्पनाचार्यादिसप्तशतकमुनिश्वरेभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

हे निर्मोही! उपसर्गों में, द्वेष नहीं तुमको आया।
ज्ञानमयी वैराग्य आप सम, पाने को दीपक लाया।।हुए…।।
ॐ ह्रीं श्रीविष्णुकुमारसहिताकम्पनाचार्यादिसप्तशतकमुनिश्वरेभ्यो मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

बाह्य अग्नि से तन झुलसा, अंतर अग्नि दुष्कर्म दहे।
धन्य महासमता के सागर, धूप चढ़ाकर पूज रहे ।।हुए… ।।
ॐ ह्रीं श्रीविष्णुकुमारसहिताकम्पनाचार्यादिसप्तशतकमुनिश्वरेभ्यो अष्टकर्मविध्वंसनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।

उदासीन हो कर्मफलों में, ज्ञाता दृष्टा आप रहे।
साम्यभाव के ही प्रभाव से, उपसर्गों से मुक्त रहे ।।हुए…।।
ॐ ह्रीं श्रीविष्णुकुमारसहिताकम्पनाचार्यादिसप्तशतकमुनिश्वरेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।

है अनर्घ महिमा मुनिवर की, है अनर्घ ही शुद्धातम।
हों अनर्घ परिणाम हमारे, अर्घ चढ़ा ध्यावें आतम ।।हुए… ।।
ॐ ह्रीं श्रीविष्णुकुमारसहिताकम्पनाचार्यादिसप्तशतकमुनिश्वरेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

दोहा-
रक्षाबंधन पर्व दिन, याद करें मुनिराज।
गावें जयमाला सुखद, सफल होय सब काज।।

(छन्द-पद्धरि)
जय मुनि जीवन आनंदमयी, पर से निस्पृह शुद्धात्ममयी।
है परम जितेन्द्रिय ज्ञानमयी, है परम तृप्त वैराग्यमयी।।
आरम्भ परिग्रह के त्यागी, शिव सुख में ही वे अनुरागी।
विषयों की आशा भी न रही, संतुष्ट परिणति निज में ही।।
वर्ते अन्तर में भेदज्ञान, अनुशासन जिनका था महान।
रहते आज्ञा में गुरुवर की, मुद्रा जिनकी थी जिनवर सी।।
था संघ सात सौ मुनियों का, अद्भुत समूह था गुणियों का।
उज्जयिनी नगरी में आया, भूपति दर्शन कर हर्षाया।।
मुनि मौन रहे न विवाद हुआ, पर समय लौटते वाद हुआ।
श्रुतसागर से परास्त होकर, द्वेषी मंत्री क्रोधित होकर ।।
रात्रि में आये वध करने, पर कीना कीलित देवों ने।
यह देख नृपति ने दिया दण्ड, निर्वासित मंत्री हुए खिन्न।।
हस्तिनापुरी नगरी आकर, सेवा से नृप को हर्षाकर।
वरदान धरोहर रूप लिया, होकर नि:शंक वहाँ वास किया।।
फिर दैवयोग से वहाँ संघ, आया पावस में नया रंग।
सब नर नारी थे हर्षाये, पर मंत्री मन में घबराये ।।
था निमित्त एक ही अविकारी, परिणति सब की न्यारी न्यारी।
वरदान नृपति से लिया माँग पा राज्य रचाया क्रूर स्वाँग।।
मुनि संघ समीप ही यज्ञ किया, अग्नि प्रज्वलित कर कष्ट दिया।
मुनिवर समता धर लीन हुए, नृप और प्रजाजन खिन्न हुए।।
था हाहाकार मचा भारी, सुन समाचार अति दुःखकारी।
विष्णुकुमार मुनि द्रवित हुए, वात्सल्य भाव वश चलित हुए।।
वामन बनकर बलि ढिंग आए, डग तीन भूमि ले हर्षाये।
विक्रिया बना तन फैलाया, बलि देख रूप था चकराया।।
चरणों में मस्तक नवा दिया जिनधर्म सु अंगीकार किया।
उपसर्ग सहज ही दूर हुआ, घर घर में मंगलाचार हुआ।।
मुनियों को शुद्ध आहार दिया, वात्सल्य धर्म था सिखा दिया।
ले प्रायश्चित विष्णु मुनिवर, तप द्वारा कर्म नाश सत्वर ।।
पंचमगति पायी अविकारी, हम करें वंदना सुखकारी।
रक्षाबंधन का पर्व चला हमको भी शुभ संदेश मिला।।
वात्सल्य सहज ही विस्तारें, निःशंकित हो समता धारें।
निरपेक्ष मौन सबसे उत्तम, निर्ग्रन्थ मार्ग ही लोकोत्तम।।
तन-मन-धन सब अर्पण करके, युक्ति से विनय-विशुद्धि से।
जिनधर्म प्रभाव बढ़ावेंगे निज शुद्धातम आराधेगे।।
ॐ ह्रीं श्रीविष्णुकुमारसहिताकम्पनाचार्यादिसप्तशतकमुनिश्वरेभ्यो जयमाला पूर्णाध्य निर्वपामीति स्वाहा।

सोरठा-
वाद विवाद से दूर, करें सहज आराधना।
हो समता भरपूर, बढ़े सुधर्म प्रभावना।।
(पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि)

Artist - ब्र.श्री रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
Source: अध्यात्म पूजांजलि

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