श्री रक्षाबंधन पर्व पूजन
(ताटंक)
श्री अकम्पनाचार्य आदि मुनि, सप्त शतक को करूँ नमन ।
मेरू समान अकंप आपका, दृढ़ चारित्र करूँ वंदन ।।
धन्य-धन्य उपसर्गजयी मुनि, साधु दिगम्बर महा महान ।
सिद्धों की श्रेणी में आने, वाला है जिनका शुभ नाम ।।
जयवन्ते वात्सल्य अंगधारी श्री विष्णु कुमार मुनी ।
धन्य आपका महा समर्पण, सदा रहेगा जगत ऋणी ।।
हुये पुनर्दीक्षित प्रायश्चित, धर्मध्यान धर मोक्ष गये ।
साधर्मी रक्षा की शिक्षा, हम सबको भी सौंप गये ।।
रक्षा बंधन पर्व आज मिल, हम सब सहज मनायेंगे ।
मुक्ति श्री पाने का हम सब, शुभ संकल्प सजायेंगे ।।
आओ सब मुनिराज पधारो, हृदय कमल में आ जाओ ।
सब जीवों पर समता धारूँ, तत्त्वज्ञान वह दे जाओ ।।
ॐ ह्रीं श्री अकंपनाचार्य आदि सप्तशतक मुनि विष्णु कुमार मुनिवराः ! अत्र अवतर
अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री अकंपनाचार्य आदि सप्तशतक मुनि एवं विष्णु कुमार मुनिवराः ! अत्र
तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री अकंपनाचार्य आदि सप्तशतक मुनि विष्णु कुमार मुनिवराः ! अत्र मम
सन्निहितो भव भव वषट् । परिपुष्पांजलिं क्षिपामि ।
(मानव छंद)
ऋषि मुनि यति साधु समागम, बड़भागी सन्त हमारे ।
निर्मल जल चरण चढ़ाऊँ, भविजन के तुम्ही सहारे ॥
आचार्य अकंपन वन्दूँ, ऋषि सप्त शतक नित ध्याऊँ।
विष्णु कुमार अभिनन्दूँ, वात्सल्य अंग अपनाऊँ ।।
ॐ ह्रीं श्री अकंपनाचार्य एवं मुनि विष्णुकुमार आदि सप्तसतक मुनिभ्यो जलं
निर्वपामीति स्वाहा ।
जहाँ शत्रु मित्र न कोई, सब जीव हैं जाननहारे ।
भवताप मिटाने गुरुवर, तुमने दी सीख महा रे ॥
आचार्य अकंपन वन्दूँ, ऋषि सप्त शतक नित ध्याऊँ ।
विष्णु कुमार अभिनन्दूँ, वात्सल्य अंग अपनाऊँ ।।
ॐ ह्रीं श्री अकंपनाचार्य एवं मुनि विष्णुकुमार आदि सप्तसतक मुनिभ्यो चंदनम्
निर्वपामीति स्वाहा ।
चैतन्य-गुफा में मुनिवर, निर्भय हो मस्त विचरते ।
अक्षय पद दाता तुमही, अक्षय-निधि-की विधि देते ।।
आचार्य अकंपन वन्दूँ, ऋषि सप्त शतकनित ध्याऊँ ॥ विष्णु।।
ॐ ह्रीं श्री अकंपनाचार्य एवं मुनि विष्णुकुमार आदि सप्तसतक मुनिभ्यो अक्षतमं
निर्वपामीति स्वाहा ।
शुभ शील बाढ़ नव धारी, अन्तर में ब्रह्म निरखते ।
स्वर्गादिक के सुख वैभव, आकर्षित रंच न करते ॥
आचार्य अकंमन वन्दूँ, ऋषि सप्त शतकनित ध्याऊँ ॥ विष्णु।।
ॐ ह्रीं श्री अकंपनाचार्य एवं मुनि विष्णुकुमार आदि सप्तसतक मुनिभ्यो पुष्पं
निर्वपामीति स्वाहा ।
अब संयम रतन सम्भालूँ, सारी कल्मष धो डालूँ ।
फिर महत् पुरूष संग विचरूँ, अर क्षुधा व्याधि अघ टालूँ ।।
आचार्य अकंपन वन्दूँ, ऋषि सप्त शतकनित ध्याऊँ ॥ विष्णु॥
ॐ ह्रीं श्री अकंपनाचार्य एवं मुनि विष्णुकुमार आदि सप्तसतक मुनिभ्यो नैवेद्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।
अंधियारे में उजियारा, हो जाये जहां मुनि जाते ।
जहं चरण तुम्हारे पड़ते, वहीं तीर्थ क्षेत्र बन जाते ॥
आचार्य अकंपन वन्दूँ, ऋषि सप्त शतक नित ध्याऊँ ।
विष्णु कुमार अभिनन्दूँ, वात्सल्य अंग अपनाऊँ ।॥
ॐ ह्रीं श्री अकंपनाचार्य एवं मुनि विष्णुकुमार आदि सप्तसतक मुनिभ्यो दीपं
निर्वपामीति स्वाहा ।
प्रभु ज्ञान- ध्यान-अध्ययन में, मुनिराज मगन मन रहते ।
कर्मों की वंशावलि ही, सारी क्षण-क्षण में दहते ॥
आचार्य अकंपन वन्दूँ ऋषि सप्त शतक नित ध्याऊँ ।
विष्णु कुमार अभिनन्दूँ, वात्सल्य अंग अपनाऊँ ।।
ॐ ह्रीं श्रीं अकंपनाचार्य एवं मुनि विष्णुकुमार आदि सप्तसतक मुनिभ्यो धूपं
निर्वपामीति स्वाहा ।
भवफल अनन्त हम पाये, कहीं शांति नहीं दिखलाये ।
जिस पंथ चले योगीश्वर, वह पंथ आज मन भाये ।।
आचार्य अकंपन वन्दूँ, ऋषि सप्त शतकनित ध्याऊँ ॥ विष्णु॥
ॐ ह्रीं श्री अकंपनाचार्य एवं मुनि विष्णुकुमार आदि सप्तसतक मुनिभ्यो फलं
निर्वपामीति स्वाहा ।
जल चंदन चरण चढ़ाऊँ, मुनि भक्ति हृदय में लाऊँ ।
करुणा के सागर तुमसे, बस मुक्ति श्री ही चाहूँ ॥
आचार्य अकंपन वन्दूँ, ऋषि सप्त शतकनित ध्याऊँ ॥ विष्णु।।
ॐ ह्रीं श्री अकंपनाचार्य एवं मुनि विष्णुकुमार आदि सप्तसतक मुनिभ्यो अनर्घ्यपद
प्राप्तये अर्घ्यपद निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
(दोहा)
वात्सल्य अंग के धनी, मुनि श्री विष्णुकुमार ।
विजय हुई मुनि धर्म की, गूंजी जय-जयकार ॥
(वीर)
आया पर्व महामंगलमय, घर-घर मंगलाचार हुआ ।
आज हुआ उपसर्ग निवारण, जन-जन हर्ष अपारं हुआ ।।
धन्य-धन्य उपसर्गजयी मुनि, श्री अकंपनाचार्य महान ।
प्राण भले जायें तो जायें, छोड़ा नहीं धरम अर ध्यान ।।
उज्जैनी नगरी में इक दिन, संघ मुनीश्वर का आया ।
वर्मा राजा ने दर्शन कर, महाभाग्य अपना पाया ।।
लेकिन जिन शासन की महिमा, नहीं मंत्रियों को भायी।
बलि मंत्री ने मुनि निंदा कर, मानी अपनी चतुरायी ॥
श्रुतसागर मुनि श्रुत के सागर, ने जवाब भरपूर दिया।
साधर्मी से बहस न करना, भाषा समिति को गौण किया ॥
श्री अकम्पनाचार्य मुनीश्वर, नहिं बोले गंभीर हुये ।
संकट में अब संघ पड़ेगा, गुरु गंभीर विचार रहे ॥
श्रुतसागर को भूल समझ, आई बोले प्रभु क्षमा करें।
प्रायश्चित देना सो देवें, हुई भूल जो माफ करें ॥
महा ज्ञान के सागर से भी जब ऐसी थी भूल हुयी ।
वाणी के अनुचित प्रयोग से, भारी विपदा खड़ी हुयी ।।
श्रुतसागर जी स्वयं संघ से, उस विवाद थल पर आये ।
बलि ने वार किया उन ऋषि पर, यक्ष ने कीलित हाथ किये ॥
अपमानित हो गया बलि पर, अकल ठिकाने न आई ।
देश निकाला हुआ कषायें, किन्तु और ही हरयायी ॥
नगर हस्तिनापुर के नृप श्री, पद्मराय जी कहलाये ।
अपनी चतुराई से बलि फिर, उनके मंत्री बन आये ॥
सप्त दिवस का राज्य लिया, जब संघ यहाँ पर फिर आया।
किया घोर उपसर्ग दुष्ट ने, सारा जग फिर थर्राया ॥
घास उगायी मुनी के चारों ओर गमन न कर पावें ।
काँटो की बाड़ी लगवाई, यज्ञ रचाया तड़फाने ।।
चर्म केश तो जले असंख्यों, सूक्ष्म जीव भी जलते थे ।
धुआँ मुनीश्वर के रंध्रों में गया कंठ सब छिलते थे ।।
मौन लिया उपसर्ग समय तक, आत्म ध्यान में मग्न हुये ।
पंच परम परमेष्ठी प्रभु अर, शुद्धातम ही शरण दिखे ॥
जितना भी उपसर्ग हुआ सब, साम्यभाव से सहन किया ।
दोष लगाया नहीं बली को, कर्मोदय है जान लिया ।।
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हाहाकार मचा अवनि पर, बलि तूने क्या कर डाला ?
महा क्षमा-सागर सन्तों पर, क्रूर जाल क्यों रच डाला ?
सच पूछो तो बली स्वयं ही, आर्त ध्यान में जलता था।
शीतल शांत ध्यान में बैठे, मुनि का क्या कर सकता था ?
विष्णुकुमार ऋद्धिधारी मुनि, वामन वेष बना आये ।
तीन पांव बलि से धरती ले, फिर विराट छबि दिखलाये ॥
दो पग में भूमंडल नापा, तीजा पग अब कहाँ रखें ।
बलि ने कहा पीठ नापो प्रभु, बड़ी भूल हुई क्षमा करें ॥
बलि पर रखा पैर ज्यों ही तो, अवनि अम्बर कांप गया।
दूर किया उपसर्ग मुनिश्वर, जग में जय-जयकार हुआ ।।
विष्णुकुमार मुनिश्वर मुनि पद, मुनि रक्षा करने छोड़ा ।
ऊँचे पद को त्याग दिया था, गृहस्थपने नाता जोड़ा ॥
इसीलिये यह पर्व आज, “रक्षा बन्धन” कहलाता है।
रक्षा के भावों में बंधन भी जिन धर्म बताता है ।।
धन्य-धन्य वे धर्मी श्रावक, जिन छोड़ा भोजन पानी ।
जब तक मुनि उपसर्ग टले नहिं, पढ़ते मन में जिनवाणी ।।
जैसे ही उपसर्ग निवारण हुआ, मंगलाचार हुआ ।
घर-घर में पड़गाहन करने, हर श्रावक तैयार हुआ ।।
लिये कजलियाँ श्रावक आये, मानो सच उपसर्ग टला ।
लिये जवारे आये जब जन, खुशी आज सब उदय टला ।।
घोर हुआ उपसर्ग मुनिश्वर, लेकिन क्रोध नहीं लाये ।
सभी जीव भगवान आत्मा, सिद्ध समान नजर आये ।।
धन्य-धन्य मुनिराज अकंपन, महा साहसी वज्र समान ।
रहे मेरु सम ही अकंप तुम, महा तपस्वी मुनि भगवान ।।
हे मित्रो ! जिनधर्म और, धर्मायतनों पर कभी कहीं।
दुष्ट लोग आक्रमण करें, तो पीछे हटना कभी नहीं ॥
चाहे धन वैभव लुट जाये, ताने सुनना पड़ें तुम्हें ।
तन-मन-धन सर्वस्व लुटाकर, रक्षा करना सदा तुम्हें ॥
साधर्मी वात्सल्य निभाना, कभी उपेक्षा न करना ।
उपगूहन करना दोषों का, दुर्लभ साधर्मी मिलना ।
जयवन्ते जिनशासन प्यारा, जयवन्ते मुनि धर्म महान ।।
वात्सल्य हो सब जीवों में, सबका हो आदर सम्मान ।
जिनदर्शन पूजन नित करना, छः आवश्यक आचरना ।।
सर्व समर्पण करके भी जिन शासन की रक्षा करना ।।
रक्षाबंधन पर्व यही शिक्षा देने, को आया है ।
आत्मधर्म की रक्षा करना, गुरु ने यही सिखाया है ॥
ॐ ह्रीं श्री अकंपनाचार्य एवं मुनि विष्णुकुमार आदि सप्तसतक मुनिभ्यो अनर्घ्यपद
प्राप्तये अर्घ्यपद निर्वपामीति स्वाहा ।
(दोहा)
मंगलमय मंगल करन - श्री जिनधर्म महान ।
तत्त्व ज्ञान की प्राप्ति हो, रक्षक श्री भगवान ।।
।। परिपुष्पांजलिं क्षिपामि ।।
Artist: पं. राजेन्द्र कुमार जैन
स्रोत: जिनेन्द्र पूजन
प्रूफरीडिंग बाकी है