श्री पुष्पदन्त जिन पूजन (कवि राजमल पवैया) | Shri Pushpadant Jin Pujan (Rajmal Pavaiya)

श्री पुष्पदन्त जिन पूजन

जय जय पुष्पदंत पुरुषोत्तम परम पवित्र पुनीत प्रधान ।
नवम तीर्थंकर हे स्वामी सुविधिनाथ सर्वज्ञ महान् ।।
अनुपम महिमावंत मुक्ति के कंत पतित, पावन भगवान् ।
पूर्ण प्रतिष्ठित शाश्वत शिवमय परमोत्तम अनंत गुणवान ।।
समकित रूपी जलप्रवाह जब बहता है अभ्यंतर में ।
कर्मधूल आवरण नहीं रहता है लेश मात्र उर में । ।
सिद्धवधू से परिणयकरके प्राप्त किया सिद्धों का धाम ।
नित्य निरन्जन भवभय भंजन भाव पूर्वक तुम्हें प्रणाम ।।

ॐ ह्रीं श्री पुष्पदंत जिनेन्द्र अत्र अवतर अवतर संवौषट्, ॐ ह्रीं श्री पुष्पदंत जिनेंद्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, ॐ ह्रीं श्री पुष्पदंत जिनेंद्रअत्रमम सन्निहितो भव भव वषट् ।

निज स्वभावमय सलिल नीर की धारा अन्तर में लाऊँ ।
जन्म जरा अघ दोषनाशकर अविनश्वर पद को पाऊँ । ।
परम ध्यानरत पुष्पदंत प्रभुसी पवित्रता उर लाऊँ ।
चिदानन्द चैतन्य शुद्ध परिपूर्ण ज्ञान रवि प्रगटाऊँ ।।१।।

ॐ ह्रीं श्री पुष्पदंत जिनेंद्रायजन्मजरामृत्यु विनाशनायजल नि ।

निज स्वभावमय शीतलचंदन निज अंतस्तल में लाऊँ ।
भव आताप दोष को हरकर अविनश्वर पद को पाऊँ ।।परम।।२ ।।

ॐ ह्रीं श्री पुष्पदंत जिनेन्द्राय कामवाण विध्वंसनाय पुष्प नि

जिन स्वभावमय अक्षय तंदुल निज अभेद उर में लाऊँ ।
अमल अखंड अतुल अविकारी अविनश्वर पद को पाऊँ ।।परम।।३ ।।

ॐ ह्रीं श्री पुष्पदंत जिनेन्द्राय अक्षय पद प्राप्ताय अक्षत नि ।

निजस्वभाव मय पुष्प सुवासित निज अन्तर मन में लाऊँ ।
काम कलंक कालिमा हरकर अविनश्वर पद को पाऊँ ।।परम।।४ ।।

ॐ ह्रीं श्री पुष्पदंत जिनेंद्राय कामबाण विध्वंसनाय पुष्प नि

निज स्वभावमय संवर के चरु निज गागर में भर लाऊँ ।
पुण्य फलों की भूख नाशकर अविनश्वर पद को पाऊँ ।।परम।।५ ।।

ॐ ह्रीं श्री पुष्पदंत जिनेंद्राय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्य नि ।

निज स्वभावमय ज्ञानदीप प्रज्ज्वलित करूँ उर में लाऊँ ।
मोह तिमिर अज्ञान नाशकर अविनश्वर पद को पाऊँ ।।परम।।६ ।।

ॐ ह्रीं श्री पुष्पदंत जिनेंद्राय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं नि ।

निज स्वभावमय धूप निर्जरातपमय अन्तर में लाऊँ ।
अरिरज रहस विहीन बनूं मैं अविनश्वर पद को पाऊँ ।।परम।।७ ।।

ॐ ह्रीं श्री पुष्पदंत जिनेंद्राय अष्टकर्म विध्वंसनाय धूपं नि. ।

जाग जाग रे जाग अभी तू निज आतम का करले भान ।
धर्म नहीं दुखरुप धर्म तो परमानंद स्वरुप महान् । ।
निजस्वभावमय शुक्लध्यान फल परमोत्तम उर में लाऊँ ।
शुद्ध बुद्ध अविरुद्ध मोक्ष पा अविनश्वर पद को पाऊँ ।।परम.।।८ ।।

ॐ ह्रीं श्री पुष्पदंत जिनेन्द्राय महामोक्षफल प्राप्ताय फल नि. ।

निज स्वभावमय शुक्लध्यानफल परमोत्तम उर में लाऊँ ।
निश्चर रत्नत्रय की महिमा से अनर्घ पद को पाऊँ ।।परम.।।९ ।।

ॐ ह्रीं श्री पुष्पदंत जिनेन्द्राय अनर्घपद प्राप्ताय अर्घ्यं नि ।

श्री पंचकल्याणक

फागुन कृष्णा नवमी को प्रभु आरण स्वर्ग त्याग आए ।
रानी जयरामा उर में अवतार लिया सब हर्षाए ।।
पन्द्रहमास रत्न वर्षाकर धनपति मन में मुसकाए ।
पुष्पदंत के गर्भोत्सव पर सुरांगना मंगल गाए ।।१।।

ॐ ह्रीं श्रीफागुनकृष्णनवम्या गर्भमंगलप्राप्ताय पुष्पदंत जिनेंद्राय अर्घ्यं नि ।

मगसिर शुक्ला एकम को काकंदीपुर अति धन्य हुआ ।
नृप सुग्रीवराज प्रांगण में सुख का ही साम्राज्य हुआ । ।
मेरु सुदर्शन पांडुकवन में क्षीरोदधि से नव्हन हुआ ।
देवों द्वारा पुष्पदंत का दिव्य जन्म कल्याण हुआ ।।२।।

ॐ ह्रीं मगसिर शुक्ला प्रतिपदादिनेजन्ममंगलप्राप्ताय पुष्पदंतजिनेंद्राय अर्घ्यं नि ।

मगसिर शुक्ला एकम के दिन अन्तर में वैराग्य हुआ ।
मेघविलय लख वैभव त्यागा वन की ओर प्रयाणकिया ।।
पंच महाव्रत धारे लौकातिक देवों का गान हुआ ।
जय जय पुष्पदंत परमेश्वर अनुपम तप कल्याण हुआ ।।३।।

ॐ ह्रीं मगसिरशीर्ष शुक्लाप्रतिपदादिने तपोमंगलप्राप्ताय पुष्पदंत जिनेन्द्राय अर्घ्यं नि ।

कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन तुमने पाया केवलज्ञान ।
चार घातिया, त्रेसठ कर्म प्रकृतियों का करके अवसान ।।
समवशरण की रचना करके हुआ इन्द्र को हर्ष महान् ।
खिरी दिव्य ध्वनि जनकल्याणी जय जय पुष्पदंत भगवान् ।।४।।

ॐ ह्रीं कार्तिकशुक्लाद्वितियायां ज्ञानमंगल प्राप्ताय पुष्पदंतजिनेन्द्राय अर्घ्यं नि स्वाहा ।

भादों शुक्ल अष्टमी के दिन सम्मेदाचल पर जयगान ।
शेष प्रकृति पच्चासी को हर सुप्रभ कूट लिया निर्वाण ।।
सिद्धशिला लोकाग्रशिखर पर आप विराजे हैं गुणधाम ।
महामोक्ष मंगल के स्वामी पुष्पदंत को करूँ प्रणाम ।।५।।

ॐ ह्रीं भाद्रशुक्लअष्टम्या मोक्षमंगलप्राप्ताय पुष्पदन्त जिनेन्द्राय अर्घ्यं नि स्वाहा ।

जयमाला

जय जय पुष्पदंत परमेश्वर परम धर्म सारथी प्रमाण ।
पुण्या पुण्य निरोधक पुष्कल प्रथमोंकार रूप विभुवान ।।१।।

निजस्वभाव साधन से तुमने परविभाव का हरण किया ।
शुद्ध बुद्ध चैतन्य स्वपद भज महामोक्ष का वरण किया ।।२।।

अट्ठासी गणधर थे प्रभु के प्रमुख श्री विदर्भ गणधर ।
प्रमुख आर्यिका श्री घोषा थीं समवशरण पवित्र मनहर ।।३।।

तुमने चौदह गुणस्थान गुणवृद्धि रूप हैं बतलाए ।
जीवों के परिणामों की इनसे पहचान सहज आए ।।४।।

पहिला है मिथ्यात्व दूसरा सासादन कहलाता है ।
मिश्र तीसरा चौथा अविरत सम्यक्दृष्टि कहाता है ।।५।।

पंचम देश विरत छठवाँ सुप्रमत्त विरत कहलाता है ।
सप्तम अप्रमत्त है अष्टम अपूर्व करण कहलाता है ।।६।।

नवमा है अनिवृत्ति करण दशम सूक्ष्म सांपराय होता ।
ग्यारहवाँ उपशांतमोह बारहवां क्षीणमोह होता ।।७।।

तेरहवाँ सयोग चौदहवाँ है अयोग केवलि गुणथान ।
निज परिणामों से श्रेणी चढ़ जीव स्वयं पाता निर्वाण ।।८।।

कर्म जनित सुख के समूह का जो भी करता है परिहार ।
वही भव्य निष्कर्म अवस्था को पाकर होता भव पार । ।
दर्श मोह के उदय आत्म परिणाम सदा मिथ्या होता ।
हैं अतत्त्व श्रद्धान जहां वह पहिल गुणस्थान होता ।।९।।

दुजा है मिथ्यात्त्व और सम्यक्त्व अपेक्षा अनुदय रूप ।
समकित नहीं मिथ्यात्व उदय भी नहीं यही सासादनरूप ।।१०।।

तीजा सम्यक् मिथ्या दर्शन मोहोदय से होता है ।
अनंतानुबंधी कषाय परिणाम जीव का होता है ।।११।।

चौथादर्शमोह के क्षय, उपशम, क्षमोपशम से होता ।
सम्यक्‌दर्शन गुण का इसमें प्रादुर्भाव सहज होता ।।१२।।

चरित मोह के क्षयोपशम से पंचम से दशवॉ तक है ।
सम्यक्‌चारित गुण को क्रम से वृद्धि रूप छह थानक है ।।१३।।

चरितमोह के उपशम से ग्यारहवाँ गुणस्थान होता ।
सूक्ष्म लोभ सद्‌भाव यहॉ अन्तमुहुर्त रहना होता ।।१४।।

मोहनीय के उदय निमित्त से जिय निश्चित गिर जाता ।
यदि परिणाम संभाल न पाये तो पहिले तक आ जाता ।।१५।।

चरित मोह के क्षय से तो बारहवां क्षीणमोह होता ।
पूर्ण अभाव कषायों का हो, यथाख्यातचारित होता ।।१६।।

केवलज्ञान प्राप्त कर तेरहवाँ सयोग केवलि होता ।
सम्यक्‌ज्ञान प्राप्त हो जाता चारित गुण न पूर्ण होता ।।१७।।

योगों के अभाव से चौदहवॉ अयोग केवलि होता ।
हो जाता चारित्र पूर्ण रत्नत्रय शुद्ध मोक्ष होता ।।१८।।

क्षपक श्रेणि चढ अष्टम से जब चौदहवें तक जाता है ।
गुणस्थान से हो अतीत निज सिद्ध स्वपद पा जाता है ।।१९।।

मोहफंद में पडकर मैंने पर परणति में रमण किया ।
परद्रव्यों की चिंता में रह चहुगति में परिभ्रमण किया ।।२०।।

निजस्वरूप का ध्यान न आया कभी न निजस्मरण किया ।
चिदानंद चिद्रूप आत्मा का अब तक विस्मरण किया ।।२१।।

निज कल्याण भावना से प्रभु आज आपका शरण लिया ।
बिना आपकी शरण अनन्तान्त भवों में भ्रमण किया ।।२२।।

निजस्वरूप की ओर निहारूँ शुभ अरु अशुभ विकार तजूँ ।
पद पदार्थ से मैं ममत्व तज परम शुद्ध चिद्रूप भजूँ ।।२३।।

ॐ ह्रीं पुष्पदंत जिनेन्द्राय पूर्णार्घ्यं नि स्वाहा ।

मगर चिह्न शोभित चरण पुष्पदंत उरधार ।
मन वचतन जो पूजते वे होते भवपार ।।

इत्याशीर्वाद

जाप्यमंत्र- ॐ ह्रीं श्री पुष्पदंत जिनेन्द्राय नम ।


Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), पृष्ठ २०२ से २०७