श्री पिसनहारी मढ़िया जिन मंदिर पूजन
(चलो सम्मेद शिखर चालो)
पिसनहारी मढ़िया आओ, पिसनहारी मढ़िया आओ ।
नंदीश्वर दर्शन कर चेतन, निज दर्शन पाओ ।।
मानस्तंभ मान हरता है, मान शान तज लो ।
महावीर प्रभु की मुद्रा लख, अन्तर्मुख हो लो ॥
ऊँचे-ऊँचे शिखरों वाला, मढ़िया तीरथ धाम ।
चौबीसों प्रभु दर्शन करलो, धरलो आतम ध्यान ।।पिसनहारी मढ़िया. ।।
बाहुबली की सुन्दर मुद्रा, देखो बुला रही ।
चेतो चेतन मोह नींद से, जागो जगा रही ।
पिसनहारी का श्रम तो देखो, प्रभुवर पधराये ।
संस्कृति के ये तीर्थ धरोहर, समता लुटा रहे ।। ।।पिसनहारी मढ़िया. ।।
ॐ ह्रीं श्री पिसनहारी मढ़िया तीर्थ स्थित सर्व जिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्।
ॐ ह्रीं श्री पिसनहारी मढ़िया तीर्थ स्थित सर्व जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री पिसनहारी मढ़िया तीर्थ स्थित सर्व जिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
(मानव छंद)
प्रभु शरण तिहारी आये, अन्तर्मुख छबि मन भाये ।
प्रभु परम शान्त मुद्रा लख, अन्तर्दृष्टि हो जावे ॥
मढ़ियाजी तीर्थ हमारा, हमको प्राणों से प्यारा ।
निर्मल जल चरण चढ़ाऊँ, जिन शासन मिला सहारा ॥
ॐ ह्रीं श्री पिसनहारी मढ़िया तीर्थस्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय
जलं निर्वपामीति स्वाहा।
जो सोचा कभी न होता, जो होता कभी न भाता ।
जो भाता नहीं ठहरता, भव ताप सहा नहिं जाता ।।
मढ़ियाजी तीर्थ हमारा, हमको प्राणों से प्यारा ।
चंदन प्रभु चरण चढ़ाऊँ, जिन शासन मिला सहारा ।।
ॐ ह्रीं श्री पिसनहारी मढ़िया तीर्थस्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो भवाताप विनाशनाय चंदनं
निर्वपामीति स्वाहा ।
मैं चेतन देह अचेतन, समझाते ज्ञानी ध्यानी ।
मुक्ती की राह निराली, समझाती माँ जिनवाणी ॥
मढ़ियाजी तीर्थ हमारा, हमको प्राणों से प्यारा ।
अक्षत पद प्रभु श्रृंगारा, जिन शासन मिला सहारा ।।
ॐ ह्रीं श्री पिसनहारी मढ़िया तीर्थस्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो अक्षयपद प्राप्तये अक्षतं
निर्वपामीति स्वाहा ।
चैतन्य ब्रह्म बिन जाने, चहुँगति भ्रमते दुख पाये ।
विषयों वश भव-भव भटके, तिलभर भी शांति न पाये ॥
मढ़ियाजी तीर्थ हमारा, हमको प्राणों से प्यारा ।
चरणों में सुमन चढ़ाऊँ, जिन शासन मिला सहारा ।।
ॐ ह्रीं श्री पिसनहारी मढ़िया तीर्थस्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं
निर्वपामीति स्वाहा ।
नेवज से तृप्ति किसी की, क्या हुई कभी क्या होगी ?
आनंद रसामृत पीते, तुम तृप्त हुये हे योगी ॥
मढ़ियाजी तीर्थ हमारा, हमको प्राणों से प्यारा ।
नेवज प्रभु चरण चढ़ाऊँ, जिन शासन मिला सहारा ॥
ॐ ह्रीं श्री पिसनहारी मढ़िया तीर्थस्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो क्षुधा रोग विनाशनाय नैवेद्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।
क्या भेद ज्ञान बिन होगा, इस जीवन में उजियारा ।
निज पर को भिन्न पिछानूँ, भटकूँ न भव गलियारा ॥
मढ़िया जी तीर्थ हमारा, हमको प्राणों से प्यारा ।
चरणों में दीप चढ़ाऊँ, जिन शासन मिला सहारा ।।
ॐ ह्रीं श्री पिसनहारी मढ़िया तीर्थस्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो मोहांधकार विनाशनाय
दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
आठों कर्मों से न्यारा, यह आतम राम हमारा ।
बंधन-दृष्टि से बंधन, मैं तो हूँ जाननहारा ॥
मढ़ियाजी तीर्थ हमारा, हमको प्राणों से प्यारा ।
चरणों में धूप चढ़ाऊँ, जिन शासन मिला सहारा ॥
ॐ ह्रीं श्री पिसनहारी मढ़िया तीर्थस्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूपं
निर्वपामीति स्वाहा ।
प्रभु निज स्वभाव साधन से, फल पंचमगति जिन पायी।
मैं भी निज में रम जाऊँ, हो भ्रमण अंत दुखदायी ।।॥
मढ़ियाजी तीर्थ हमारा, हमको प्राणों से प्यारा ।
मैं फल चरणाग्र चढ़ाऊँ, जिन शासन मिला सहारा ।।
ॐ ह्रीं श्री पिसनहारी मढ़िया तीर्थस्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो मोक्षफल प्राप्तये फलं
निर्वपामीति स्वाहा ।
प्रभु शांत सौम्य मुद्रा लख, निज की महिमा आ जाती ।
परिणाम शान्त हो जाते, परिणति अंतर ढल जाती ।
सम्यकदर्शन हो जाता, मुनि मुद्रा भी खिल जाती ।।
श्रेणी आरोहण होता, अर सिद्ध दशा मुस्काती ।
मढ़ियाजी तीर्थ हमारा, हमको प्राणों से प्यारा ।।
भावों के अर्घ्य चढ़ाऊँ, जिन शासन मिला सहारा ।।
ॐ ह्रीं श्री पिसनहारी मढ़िया तीर्थस्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
(दोहा)
संस्कारधानी तिलक, तीरथ मढ़िया क्षेत्र ।
दर्शन कर लो भाव से, खुलें ज्ञान के नेत्र ।।
(चौपाई)
जय तीर्थ क्षेत्र मढ़िया महान, भविजन धारो यहाँ आत्म ध्यान ।
जिन मुद्रायें मनहर ललाम, अन्तर्मुख छबि दैदीप्यमान ।।
नंदीश्वर जिन मंदिर विशाल, आनंद आनंद चित हो खुशाल ।
चौबीसों प्रभु पर्वत मंझार, भविजन दर्शन कर हों निहाल ।।
श्री आदीश्वर जिनवर महान, छबि निरखत होवे आत्म ज्ञान ।
शासन नायक श्री महावीर, दर्शन कर पाऊँ जलधि तीर ।।
जय हो जय बाहुबलि महान, गोम्मटेश्वर की छबि तुल्य जान ।
माँ धन्य पिसनहारी कमाल, पधराये प्रभु सुन्दर विशाल ।।
अनुमोदन करता बार-बार, माँ तेरा श्रम सार्थक सुसार ।
नव निर्मित जिन मंदिर विशाल, पारस प्रभु शोभें अति खुशाल ॥
जय जय पारस जय जय महान, तुम क्षमामूर्ति अतिशय निधान ।
अनगिनत जनम धारे अपार, दुख मेंटन समरथ आप द्वार ।।
तुम बिन प्रभु कौन कहे हूँ जीव, ज्ञायक परमातम हूँ सदैव ।
देखूँ निज शाश्वत आत्मदेव, जिन आज्ञा मानूँ तज कुटेव ।।
ये भोग-भुजंग समान जान, कंपित मन मेरा मृग-समान ।
कैवल्य ज्ञान सबसे महान, प्रभु पाऊँ मैं कब यह निधान ॥
शक्ति तो है सिद्धों समान, भूला हूँ भगवन निज निधान ।
प्रभु पूर्व जन्म दुखमय अपार, भटका चहुँगति अज्ञान धार ।।
मुनि भगवन्तों के दर्श पाय, सुनी दिव्य ध्वनि तत्वार्थ सार ।
तन से चेतन को भिन्न जान, श्रावक पद धारूं आत्म ध्यान ।।
अब सफल करूँ प्रभु जनम सार, समझें समझाऊँ समयसार ।
मैं वंदूँ बारम्बार नाथ, शिवपथ दीजे कीजे सनाथ ।।
ॐ ह्रीं श्री पिसनहारी मढ़िया तीर्थस्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये
महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(दोहा)
शुद्धातम को साधकर, हुये अनंतों पार ।
दिव्य देशना दे गये, वंदूँ तारण हार ।।
(पुष्पांजलिं क्षिपामि)
Artist: पं. राजेन्द्र कुमार जैन
स्रोत: जिनेन्द्र पूजन
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