श्री पार्श्वनाथ स्तोत्र (भाषा) | Shri Parshvanath Stotra (Bhasha)

लोहा पारस संगति पाकर, स्वर्ण बने पारस न बने।
पार्श्व प्रभो तव दर्शन से, मम उर में सम्यक् ज्योति जगे ॥
तुझ-सी प्रभुता निज अन्तर में ही, होती है साक्षात् मुझे ।
निज में ही स्थिरता पाऊँ, वन्दन प्रभु निष्काम तुझे ॥

(दोहा)

कर जिनपूजा अष्टविधि, भावभक्ति जिन भाय।
अब सुरेश परमेश थुति, करौं शीश निज नाय॥१॥

प्रभु इस जग समरथ ना कोय, जासों तुम यश वर्णन होय।
चार ज्ञान धारी मुनि थकैं, हमसे मन्द कहा कर सकें ॥२॥

यह उर जानत निश्चय हीन, जिनमहिमा वर्णन हम कीन।
पर तुम भक्ति थकी वाचाल, तिसवस होय कहूँ गुणमाल ॥३॥

जय तीर्थंकर त्रिभुवन धनी, जय चंद्रोपम चूड़ामनी।
*जय-जय परम धाम दातार, कर्मकुलाचल चूरनहार ॥४॥

जय शिव कामिनि कंत महन्त, अतुल अनन्त चतुष्टयवंत।
जय-जय आशभरण बड़भाग, तप लक्ष्मी के सुभग सुहाग ॥५॥

जय-जय धर्मध्वजाधर धीर, स्वर्ग-मोक्ष दाता वरवीर।
जय रत्नत्रय रत्नकरण्ड, जय जिन तारण तरण तरंड ॥६॥

जय-जय समवशरण श्रृंगार, जय संशय-वन-दहन तुषार।
जय-जय निर्विकार निर्दोष, जय अनन्त गुणमाणिक कोष ॥७॥

जय-जय ब्रह्मचर्यदल साज, काम सुभट विजयी भटराज।
जय-जय मोहमहातरु करी, जय-जय मदकुँजर-केहरी ॥८॥

क्रोध-महानल मेघप्रचण्ड, मान-महीधर दामिनदण्ड।
माया-बेल धनंजयदाह, लोभ-सलिल शोषण दिननाह ॥९॥

तुम गुणसागर अगम अपार, ज्ञान जहाज न पहुँचे पार।
तट ही तट पर डौले सोय, कारन सिद्ध तहाँ ही होय ॥१०॥

तुमरी कीर्तिबेल बहु बढ़ी, यत्न बिना जग मंडप चढ़ी।
अवर कुदेव सुयस निज चहैं, प्रभु ! अपने थल ही यश लहैं ॥११॥

जगत् जीव घूमैं बिन ज्ञान, कीना मोहमहाविष पान।
तुम सेवा विषनाशक जरी, तिंह मुनिजन मिल निश्चय करी ॥१२॥

जन्म जरा मिथ्यामत-मूल, जन्म-मरण लागे तहँ फूल।
सो कबहूँ बिन भक्ति कुठार, कटै नहीं दुखफल दातार॥१३॥

कल्पसरोवर चित्रा बेल, कामपोरवा नवनिधि मेल।
चिन्तामणि पारस पाषान, पुण्यपदारथ और महान् ॥१४॥

*ये सब एक जन्म-संयोग, किंचित् सुखदातार नियोग।
*त्रिभुवननाथ तुम्हारी सेव, जन्म-जन्म सुखदायक देव ॥१५॥

तुम जगबाँधव तुम जगतात, अशरण-शरण विरद विख्यात।*
तुम सब जीवन के रखवाल, तुम दाता तुम परमदयाल ॥१६॥

तुम पुनीत तुम पुरुष पुरान, तुम समदर्शी तुम सब जान।
जय मुनि-यज्ञ-पुरुष परमेश, तुम ब्रह्मा तुम विष्णु महेश ॥१७॥

तुम जगभर्त्ता तुम जगजान, स्वामि स्वयंभू तुम अमलान।
तुम बिन तीनकाल तिहुँ लोय, नाहीं शरण जीव को होय ॥१८॥

यातें अब करुणानिधि नाथ, तुम सन्मुख हम जोड़ें हाथ।
जबलौं निकट होय निर्वान, जग निवास छूटै दुखदान ॥१९॥

तबलौं तुम चरणांबुज वास, हम उर होय यही अरदास।
और न कछु वाँछा भगवान्, है दयालु दीजे वरदान ॥२०॥

(दोहा)

इहिविधि इन्द्रादिक अमर, कर बहु-भक्तिविधान।
निज कोठे बैठे सकल, प्रभु सनमुख सुख मान ॥
जीति कर्मरिपु जे भये, केवललब्धि निवास ।
सो श्री पार्श्वप्रभु सदा, करो विघ्नघन नाश ॥

Artist: बा.ब्र. रवीन्द्र जी आत्मन्

1 Like