पार्श्व प्रभु की जीवन गाथा सबको आनन्दाता है।
भेद-विज्ञान जगाती उर में समता भाव प्रदाता है ।। टेक ।।
देखो दोनों सगे भाई थे कमठ और मरुभूति नाम।
असि और कवच समान किन्तु थी दोनों की प्रकृति अति वाम ।।
योग्य जान मरुभूति को राजा ने मंत्री बना लिया।
ईर्ष्यावश अपमान समझ कर कमठ व्यर्थ ही खिन्न हुआ।।
व्यर्थ विकल्पों से अज्ञानी महा दुख ही पाता है।।1।।
भूपति एक बार मंत्री संग बाह्य युद्ध में गया हुआ।
समझ स्वयं को ही राजा तब कमठ महामदमत्त हुआ।।
मरुभूति की सुन्दर स्त्री देख दुष्ट था ललचाया।
बीमारी का छल करके तब लता कुंज में बुलवाया।।
धिक्-धिक् है इस काम भाव को महा अनर्थ कराता है ।। 2 ।।
शील भंग करके भी मूरख हरषाया अपने मन में।
पाप कमाया धर्म गँवाया अपयश पाया जन-जन में।।
नृप ने आकर जाना जब ही काला मुँह कर कढ़वाया।
जंगल में जा हुआ तापसी मिथ्यामत में भरमाया।।
जैसी करनी करता है वह फल वैसा ही पाता है।। ३।।
भावुकता वश कभी किसी की बातों में नहीं आ जाना।
सावधान रहना जिससे फिर पड़े न पीछे पछताना।।
नव बाढ़ों का पालन करना इकले कहीं नहीं जाना।
भूल चूक हो जाये कदाचित् सेठ सुदर्शन सम रहना।।
आत्मन् ! शील धर्म लोकोत्तम भाग्यवान ही पाता है।। ४।।
अरे! मोहवश मरुभूति फिर भी तो दुष्ट समीप गया।
घर चलने की करे प्रार्थना भ्रात-प्रेम में मूढ़ हुआ।।
क्रोधित होकर मरुभूति पर भारी पत्थर पटक दिया।
प्राण पखेरू उड़े तुरत ही वन में हाथी जाय हुआ।।
प्रीति नहीं दुर्जन के प्रति तो माध्यस्थ्य ही भाता है।। ५।।
इक मुनिवर से हाल जानकर राजा ने वैराग्य लिया।
संघ सहित सम्मेदशिखर वंदन के लिये प्रयाण किया।।
वन में जन समूह लखकर के हाथी अति अकुलाया था।
होकर मत्त उपद्रव करता जनसमूह घबराया था।।
मुद्रा सौम्य देख मुनिवर की सहज शान्त हो जाता है।। ६।।
मुनिवर संबोधे रे गज तू नर से तो तिर्यंच हुआ।
मिथ्या मोह छोड़ दे अब भी जिससे भव में दुःखी हुआ।।
तू तो स्वयंसिद्ध परमातम, नित्य निरंजन देव है।
परभावों से शून्य ज्ञान-आनन्दमयी स्वयमेव है।।
भिन्न स्वाँग हैं रागादिक दुर्भाव प्रगट दुःख़दाता है।।7।।
सम्यग्दर्शन मूल धर्म का समझ धार आनन्दमयी।
जिससे मोक्ष प्रदायक चारित्र प्रगटे ज्ञान-विरागमयी ।।
सुनकर दिव्य देशना गुरु की हाथी परम प्रसन्न हुआ।
हुआ स्वानुभव मंगलकारी सहज स्वयं में तृप्त हुआ।।
सहज उदास विषय भोगों से गज श्रावक हो जाता है ।। 8 ।।
भूल नहीं त्रस जीव संहारे करुणापूरित चित्त हुआ।
सत्य अचौर्य शीलदृढ़ पाले परिग्रह माँहि विरक्त हुआ।।
यथायोग्य प्रासुक जल पीवे सूखे तृण पल्लव खावे।
देख शोध कर मारग चाले, नहीं दुर्भाव हृदय लावे ।।
पाँच परम गुरु सुमरै निशदिन चित्स्वरूप निज भाता है ।। ९ ।।
जल पीते इक दिन कीचड़ में फँसा निकल नहीं पाया था।
लिया समाधिमरण तब ज्ञानी भेद-विज्ञान सु भाया था।।
डसा सर्प कुर्कट ने आकर जो था अरे कमठ का जीव।
बैर महादुःख़दायी जग में जान भव्यजन तजो सदीव।।
स्वर्ग बारहवें हाथी पहुँचा, सर्प नरक दुःख़ पाता है।। 10।।
सम्यग्दर्शन का बल देखो, नहीं वहाँ आसक्त हुआ।
जिनपूजा तत्त्वों की चर्चा करते काल व्यतीत हुआ।।
संयम की नित करे भावना नहीं योग्यता सुरगति में।
अग्निवेग विद्याधर हुआ, हुई विरक्ति यौवन में ।।
धारी सहज दिगम्बर दीक्षा परमानन्द विधाता है।। 11 ।।
कमठ जीव ने अजगर होकर ध्यानमग्न मुनि को मारा।
स्वर्ग सोलवें गये मुनीश्वर पाई कमठ नरक कारा।।
तहँ तें चय कर विदेहक्षेत्र में वज्रवीर्य गृह जन्म लिया।
वज्रनाभि चक्री पद पाकर षट् खण्डों का राज्य किया।।
एक दिवस क्षेमंकर मुनि की दिव्य देशना पाता है।। 12।।
नहीं परमाणु मात्र भी मेरा, भोग रोग सम दुःखकारी।
निजानंद अमृतरस भोजी साधु दशा मंगलकारी।।
ब्रह्मचर्यमय जीवन ही है पाप शून्य, निर्द्वन्द्व सहज।
करें कष्ट की व्यर्थ कल्पना मोही, ज्ञानी धरें सहज।।
तृप्त स्वयं में चक्री चिन्ते मेरा पद तो ज्ञाता है।।13।।
राग तन्तु टूटा तत्क्षण ही निर्ग्रन्थ पद अपनाया था।
परम जितेन्द्रिय हुए महामुनि आतम ध्यान लगाया था।।
देह पार्श्ववर्ती जो देखे बाहर की कुछ सुधबुध नाहिं।
कमठ जीव जो भील हुआ था मारा तीर लगा तन माँहि।।
हुआ समाधिमरण ग्रेवैयिक में अहमिन्द्र पदवी पाता है।। 14।।
शुभ भावों का दण्ड समझकर आत्म भावना दृढ़ करके।
नगर अयोध्या में जन्मा था सुर आयु पूरी करके।।
अहो! अहो!! आनन्द कुँवर था महामांडलिक पद धारी।
श्वेत बाल लखते ही फिर भी मुनिपद को दीक्षा धारी।।
हुई भावना सोलहकारण, जगत जीव निज पद पावें।
निज स्वभाव आराधन करके, अविनाशी शिव सुख पावें।।
बँधी प्रकृति तहँ तीर्थंकर की जग को धर्म प्रदाता है।। 15।।
ध्यानमग्न आनन्द मुनीश्वर को इक दिन वन में पाया।
कमठ जीव जो सिंह हुआ था क्रूर भाव धर तन खाया।।
देखो भावों की स्वतंत्रता, परम धर्म के जो कारण।
उन्हीं साधु को देख सिंह ने बैर विचारा दुखःकारण।।
मुनिवर स्वर्ग सोलवें पहुँचे सिंह नरक में जाता है।।16।।
छह महिना पहले काशी में रत्न सुरों ने वर्षाये।
कलि वैशाख द्वितीया के दिन वामा माता उर आये।।
देवों ने अति उत्सव कीना हर्षित सारा जगत हुआ।
पौष कृष्ण एकादशि को फिर पार्श्व प्रभु का जन्म हुआ।।
उदासीन गम्भीर ज्ञानमय बचपन भी सुखदाता है।।17।।
इक दिन वन में इक तपसी को लक्कड़ सुलगाते देखा।
नाग नागिनी का जोड़ा था उस लक्कड़ अंदर बैठा।।
करुणापूरित हृदय हुआ तपसी को सहज बताया था।
किन्तु कमठ का जीव तपस्वी सुनकर अति गुर्राया था।।
लक्कड़ फाड़ा क्रोध भाव से, नाग नागिनी तड़फ रहे।
सम्बोधन पाकर प्रभुवर का शान्तभाव से देव हुए।।
लौटे घर को किन्तु प्रभु का मन उदास हो जाता है।।18।।
इक दिन राजसभा में बैठे आया दूत अयोध्या का।
नाम अयोध्या का सुनते ही हुआ ध्यान आदीश्वर का।।
काललब्धि दीक्षा की आई चित में गाढ़ विराग हुआ।
लौकान्तिक देवों का अनुमोदन अति ही सुखकार हुआ।।
तत्क्षण इन्द्र स्वर्ग से आकर तप कल्याण मनाता है।।19।।
ध्यान मग्न थे पार्श्व मुनीश्वर संवरारि उपसर्ग किया।
सात दिवस तक क्रोध भाव से व्यर्थ स्वयं को खिन्न किया।।
हारा बैर अरे दश भव का, क्षमा भाव ने जय पाई।
आ धरणेन्द्र उपसर्ग निवारा केवल लक्ष्मी प्रगटाई।।
समवशरण में अन्तरीक्ष प्रभु अर्हत् रूप सुहाता है।। 20।।
ध्वनित हो रही दिव्यध्वनि थी अद्भुत तत्त्वमयी सुखरूप।
सुनकर भव्य जीव आनन्द में समझ रहे थे शुद्ध चिद्रूप।।
कोई धन्य भाग्य तो तत्क्षण मुनिपद की दीक्षा लेते।
कोई सम्यग्दर्शन पाते, कोई थे श्रावक व्रत होते।।
कमठ जीव भी शान्त चित्त हो सम्यग्दर्शन पाता है।। 21।।
देखो भावों की विचित्रता भ्रात! दीनता छोड़ दो।
आनन्दमय निवृत्ति पथ में स्वयं-स्वयं को जोड़ लो।।
नहीं कोई है संगी साथी, भोगों का सुख कल्पना।
शांत चित्त हो साधो निजपद लाओ अन्य विकल्प ना।।
अहो! अहो!! निर्द्वन्द्व आत्म आराधन ही शिव दाता है।। 22।।
बालयती श्री पार्श्व प्रभो सम्मेदशिखर से मोक्ष हुआ।
क्षमा भाव अरु ब्रह्मचर्य का इक आदर्श प्रसिद्ध हुआ।।
भाव विभोर हुआ चरणों में नमन करूँ त्रिभुवन नामी।
ब्रह्मचर्य निर्दोष पूर्ण हो यही भावना है स्वामी।।
परमब्रह्म शाश्वत् परमातम, बाहर कुछ न सुहाता है।। 23।।
सर्व समर्पण हो स्वभाव में निर्विकार निर्ग्रन्थ रहूँ।
निर्वाछक निर्भय जीवन हो स्वयं स्वयं में तृप्त रहूँ।।
निजानन्द रस का आस्वादी, पर दुर्वेदन में असमर्थ ।
निश्चय हुआ सधेगा निज में निज से ही मंगल मोक्षार्थ ।।
बस हो बहुत कथन से भाई अपना भाव सु ज्ञाता है।। 24।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह