श्री पारसनाथ पूजन
(स्थापना)
पारस नाम, पारस नाम, मेरे प्रभु का पारस नाम ।
सब सुख धाम, प्रभु का नाम, मेरे प्रभु का पारस नाम ।।
समता सागर आप कहाये, कमठासुर का मान गलाये।
भक्त बने तेरे भगवान्, मेरे प्रभु का पारस नाम ।।
श्री सम्मेद शिखर पर आये, आत्म ध्यान धर शिवपद पाये।
पाया शाश्वत सुख विश्राम, मेरे प्रभु का पारस नाम ।।
अन्तर्मुख मुद्रा अति प्यारी, आत्म शांति दर्शावनहारी ।
आओ पधारो प्रभु अभिराम, मेरे प्रभु का पारस नाम ।।
ॐ ह्रीं श्री पारसनाथ जिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री पारसनाथ जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् ।
ॐ ह्रीं श्री पारसनाथ जिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणं
पुष्पांजलिं क्षिपेत्
(अवतार)
समता सागर जिननाथ, चरण शरण आया ।
अन्तर्मुख शान्त स्वरूप, लख प्रभु हर्षाया ।।
हे पार्श्वनाथ जिनराज, दर्शन सुखकारी ।
हे क्षमा मूर्ति भगवान्, भविजन हितकारी ।।
ॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
चंदन सी शीतल शान्त, दिव्य ध्वनि तेरी ।
लख नाग नागिनी पीर, मुक्त कियो तुम ही ।।
हे पार्श्वनाथ जिनराज, दर्शन सुखकारी ।
हे क्षमामूर्ति भगवान्, भविजन हितकारी ।।
ॐ ह्रीं श्री पारसनाथ जिनेन्द्राय संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
अक्षय पद दाता नाथ, अक्षय पद ध्याऊँ ।
क्षत का अभिमान असार, तज ऋजुता लाऊँ ।।
हे पार्श्वनाथ जिनराज, दर्शन सुखकारी ।
हे क्षमामूर्ति भगवान्, भविजन हितकारी ।।
ॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।
हे बालयति जिनदेव, काम-विजय पाई ।
है विकट वासना व्याधि, जीती दुखदाई ।।
हे पार्श्वनाथ भगवान्, दर्शन सुखकारी ।
हे क्षमामूर्ति जिनराज, भविजन हितकारी ।।
ॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
प्रभु क्षुधा-व्याधि को जीत, तुम अर्हन्त हुये ।
अष्टादश दोष निवार तुम भगंवत हुये ।।
हे पार्श्वनाथ भगवान्, दर्शन सुखकारी ।
हे क्षमामूर्ति जिनराज, भविजन हितकारी ।।
ॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
मणिदीप रतन-उद्योत, रवि - शशि तम न हरे।
प्रभु भेद विज्ञान प्रकाश, मोह महांध नशे ॥
हे पार्श्वनाथ भगवान्, दर्शन सुखकारी ।
हे क्षमामूर्ति जिनराज, भविजन हितकारी ।।
ॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
प्रभु किया क्रोध का त्याग, कर्म नशे कैसे ?
ज्यों शीतल पड़े तुषार, फसल जले जैसे ।
हे पार्श्वनाथ भगवान्, दर्शन सुखकारी ।
हे क्षमामूर्ति जिनराज, भविजन हितकारी ।।
ॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
विषमय विधि फल को त्याग, शिवफल प्राप्त किया।
फल पाऊँ तुम समनाथ, दर्शत भाव जगा ॥
हे पार्श्वनाथ भगवान्, दर्शन सुखकारी ।
हे क्षमामूर्ति जिनराज, भविजन हितकारी ।।
ॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
प्रभु कमठ किया उपसर्ग, दश दश भव भारी ।
बन गया जैन वह जीव, लख समता थारी ॥
प्रभु भक्ति भाव से आज, अर्घ्य लिये आया ।
पाऊँ अनर्घ पद नाथ, तुम सम प्रभु पाया ।।
हे पार्श्वनाथ भगवान्, दर्शन सुखकारी ।
हे क्षमामूर्ति जिनराज, भविजन हितकारी ।।
ॐ ह्रीं श्री पाश्वनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
(पंचकल्याणक अर्घ्य )
(सोरठा)
दोज वदी वैशाख, अंतिम गर्भ कल्याण शुभ ।
वामा माता धन्य, दिक्कुमारी सेवा करें ।॥
ॐ ह्रीं श्री वैशाख कृष्ण द्वितीयायां गर्भ मंगल विभूषिताय श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्य निर्वापामीति ।
तिथि एकादशि पौष, अंतिम जन्म लियो प्रभू ।
तीन भुवन आनंद, गिरि सुमेर तीरथ हुआ ।।
ॐ ह्रीं श्री पौष कृष्ण एकादश्यां जन्म मंगल विभूषिताय श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्य निर्वापामीति ।
लख संसार असार, साकेत वैभव श्रवण कर ।
एकादशि तिथि पौष, पारस प्रभु दीक्षा धरी ।।
ॐ ह्रीं श्री पौष कृष्ण एकादश्यां तपो मंगल विभूषिताय पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्य
निर्वापामीति ।
चैत्र चतुर्थी धन्य, ज्ञान ज्योति जगमग जली ।
खिरी देशना दिव्य, भाग्य विधाता भविक के ॥
ॐ ह्रीं श्री चैत्र कृष्ण चतुर्थी केवलज्ञान मंडिताय श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्य
निर्वापामीति ।
शिखर सम्मेद महान्, टोंक सुवर्णभद्र नित नमूं ।
प्राप्त कियो निर्वाण, श्रावण शुक्ला सप्तमी ।।
ॐ ह्रीं श्री श्रावण शुक्ल सप्तमी मोक्ष मंगल मंडिताय पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्य
निर्वापामीति ।
जयमाला
(दोहा)
गुण अनंत के हो धनी, प्रभु पारस भगवान् ।
भक्ति हृदय में गूंजती, करूँ सहज गुणगान ।।
(वीर छंद)
हे पार्श्वनाथ, करूणानिधान, महिमा महान् मंगलकारी ।
हे क्षमामूर्ति ! जयवंत रहो ! हे सौम्यमूर्ति ! महिमा धारी ।।
हे अश्वसेन वामानंदन, तुम नगर बनारस जन्म लिया ।
अपना जीवन तो धन्य किया, सारी जगती को धन्य किया ।।
गजराज योनि में हे भगवन्, तुमने सम्यक् दर्शन पाया ।
संयम धारण कर लिया प्रभो, विषयों का रस सब ठुकराया ।।
प्रभु जुगल नाग नागिन जलते, देखा संबोधन उन्हें दिया ।
वो पदमावति धरणेन्द्र हुये, अपना जीवन उन धन्य किया ।।
प्रभु विषय-वासना जय पाने, हुई उदासीन परणति प्यारी ।
भर यौवन में दीक्षा धारी, शिव रमणी वरने तैयारी ।।
प्रभु आप ध्यान में मग्न रहे, लख कमठ क्रूर अति बौराया ।
प्रभु पर उपसर्ग किया भारी, ओले पत्थर जल बरसाया ।।
श्रेणी आरोहण हुआ तभी, कैवल्य ज्ञान प्रभु ने पाया ।
हुई समवशरण रचना सुंदर, भविजन अमृत पीने आया॥
कोई अन्तरिक्ष पारस कहता, कोई चिन्तामणि पारस जाने ।
सांवंलिया पारसनाथ तुम्हें, कह गाते भक्त सदा गाने ॥
तुम तो प्रभु वीतराग जिनवर, सर्वज्ञ हितैषी तीर्थंकर ।
भव-भव की करुण कथा बीती, तुम तो प्रभु मुक्त हुये दिनकर ॥
भौतिक पारसमणि तो केवल, लोहे को स्वर्ण बनाता है।
लेकिन जो पार्श्व शरण आता, वह स्वयं पार्श्व बन जाता है॥
जो भक्ति भावना से प्रभु की, हर्षित हो पूजन करते हैं।
वो सर्व सिद्धियाँ पाते हैं, सेवा को देव तरसते हैं॥
कुछ भोले प्राणी प्रभु सम्मुख, धन-धान्य मांगने आते हैं।
तुमने निःसार समझ त्यागा, वो इसमें लाभ समझते हैं॥
प्रभु के विहार करने से ही, भूमि बिहार यह कहलाई।
लाखों ऋषि मुनि यति सन्तों ने, यहीं दिव्य देशना बरसाई ॥
सांवंलिया पारसनाथ शिखर जी, भले विराजे कहते हैं।
तुम सम ही मुक्त दशा पायें, हम शत-शत वंदन करते हैं॥
ॐ ह्रीं श्रीं पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये जयमाला महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
सर्प चिह्न प्रभु पग बसे, पार्श्वनाथ भगवान्।
चेतन चिन्ह हृदय बसे, क्यो न होय निर्वाण॥
(परिपुष्पांजलिं क्षिपामि)
Artist: पं. राजेन्द्र कुमार जैन
स्रोत: जिनेन्द्र पूजन
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