श्री पपौराजी अतिशय क्षेत्र पूजन
(चांद्रायण)
श्री पपौरा तीर्थ क्षेत्र पर आइये ।
जिन मंदिर अति भव्य, दर्श सुख पाइये ॥
शांत छवि प्रभु अन्तरमुख मुद्रा महान् ।
रोम-रोम पुलकित हो जावे पा निधान ।।
एक शतक अर आठ, जिनालय शुभ जिनेन्द्र ।
धन्य - धन्य साधर्मी, पधराये जिनेन्द्र ।।
चौबीसों तीर्थेश, हृदय पधराऊँगा ।
भाव विशुद्धी जगे मुक्ति पद पाऊँगा ॥
ॐ ह्रीं श्री पपौरा अतिशय क्षेत्र स्थित सर्वजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषद् ।
ॐ ह्रीं श्री पपौरा अतिशय क्षेत्र स्थित सर्वजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री पपौरा अतिशय क्षेत्र स्थित सर्वजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
(मानव छंद)
जीवत्व शक्ति न जानी, चिति शक्ति नहीं पहचानी ।
जड़ प्राणों से जीवित हूँ, कैसी मति हुई बौरानी ।।
परसत्ता में प्रतिबंधित, होकर अनंत दुख पाये ।
नौ माह गर्भ दुख भोगे, जनमे तड़पे बिलखाये ।।
जिनदर्शन कर निज दर्शन, परमारथ अब साधूंगा ।
शुभ तीर्थ पपौरा आया, संकल्प सिद्ध पद लूंगा ।।
ॐ ह्रीं श्री पपौरा अतिशय क्षेत्र स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं
निर्वपामीति स्वाहा ।
दिन-रात काम की चिंता, पल भर भी चैन नहीं है।
क्रमबद्ध परिणमन सारा, फिर भी क्यों बेचैनी है ।।
जीवन अनमोल मिला है, जी रहा अर्थ के खातिर ।
कुछ साथ नहीं जाना है, पर मोह नचाता जी भर ॥
जिनदर्शन कर निज दर्शन, परमारथ अब साधूंगा। शुभ तीर्थ.।
ॐ ह्रीं श्री पपौरा अतिशय क्षेत्र स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो भवाताप विनाशनाय चंदनं
निर्वपामीति स्वाहा ।
कितने भव धार चुका हूँ, निज घर में कभी न आया।
कितनी गतियाँ बदली हैं, चेतन प्रभु कभी न भाया ।।
इन्द्रादिक पद क्षणभंगुर, सब राग आग में जलते ।
चक्री तीर्थंकर पद भी, थिर नहीं कहीं हैं दिखते ।।
जिनदर्शन कर निज दर्शन, परमारथ अब साधूंगा ।
शुभ तीर्थ पपौरा आया, संकल्प सिद्ध पद लूंगा ॥
ॐ ह्रीं श्री पपौरा अतिशय क्षेत्र स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो अक्षयपद प्राप्तये अक्षतं
निर्वपामीति स्वाहा ।
भोगे सब भोग घनेरे, यह पुण्य निरतिशय पाया ।
जो भोग रहे मुनिजन सुख, ऐसा पुरूषार्थ न जागा ।।
प्रभु काम भोग बंधन की, चर्चा अब नहीं सुहाती ।
यह काम-वासना जीतूँ, वो सीख आप से मिलती ॥
जिनदर्शन कर निज दर्शन, परमारथ अब साधूंगा ।
शुभ तीर्थ पपौरा आया, संकल्प सिद्ध पद लूंगा ।।
ॐ ह्रीं श्री पपौरा अतिशय क्षेत्र स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं
निर्वपामीति स्वाहा ।
विषयों से तृप्ति न होती, सन्तोष कभी नहिं आता ।
खारा जल पीने से तो, है कष्ट और बढ़ जाता ।।
भोगों में अति आसक्ति, कब होगी नाथ विरक्ति ?
सेये व्यंजन जीवन भर, नहीं हुई कभी भी तृप्ति ॥
जिनदर्शन कर निज दर्शन, परमारथ अब साधूंगा ।
शुभ तीर्थ पपौरा आया, संकल्प सिद्ध पद लूंगा ॥
ॐ ह्रीं श्री पपौरा अतिशय क्षेत्र स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।
ज्ञेयों को कितना जानूँ, पहचानूँ होड़ लगी है ।
यह ज्ञेय-लुब्धता की भी, बीमारी बहुत बड़ी है ॥
जिनवाणी मां कल्याणी, मिथ्यातम दूर भगावे ।
जब आतम अनुभव आवे, तब और न कछू सुहावे ॥
जिन दर्शन कर निज दर्शन, परमारथ अब साधूँगा ।
शुभ तीर्थ पपौरा आया, संकल्प सिद्ध पद लूँगा ॥
ॐ ह्रीं श्री पपौरा अतिशय क्षेत्र स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो मोहांधकार विनाशनाय दीपं
निर्वपामीति स्वाहा ।
मन राग-आग में जलता, तपता सहता दुख भारी ।
क्या धर्म ध्यान होवेगा, जाना ना ध्येय अविकारी ॥
कोल्हू का बैल बना मैं, दिन-रात दुःख सहता हूँ।
हँस - हँस कर्मों को बाँधे, रो - रो कर फिर कहता हूँ ॥
जिन दर्शन कर निज दर्शन, परमारथ अब साधूँगा ।
शुभ तीर्थ पपौरा आया, संकल्प सिद्ध पद लूँगा ॥
ॐ ह्रीं श्री पपौरा अतिशय क्षेत्र स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
सिर पर मृत्यु मंडराये, अर खबर नहीं है पल की ।
बेहोश जिंदगी जीता, फल क्या होगा चेतन जी ॥
प्रभु पुण्य निरतिशय बांधा, स्वर्गादिक फल भी पाये।
कहीं आत्म शांति न पाई, अब शरण तुम्हारी आये ॥
जिन दर्शन कर निज दर्शन, परमारथ अब साधूँगा ।
शुभ तीर्थ पपौरा आया, संकल्प सिद्ध पद लूँगा ॥
ॐ ह्रीं श्री पपौरा अतिशय क्षेत्र स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो मोक्षफल प्राप्तये फलं
निर्वपामीति स्वाहा ।
सुख-दुख की महाव्यथा यह, प्रभु तुमको कथा सुनायी ।
कुछ कहूँ ना कहूँ तो भी, तुम सब जानो जिनरायी ॥
मन हल्का हो जाये प्रभु, ऐसी अब दिशा दिखाओ ।
मुझे शिवपुर गैल दिखाओ, दुर्गति से शीघ्र बचाओ ॥
जिन दर्शन कर निज दर्शन, परमारथ अब साधूँगा ।
शुभ तीर्थ पपौरा आया, संकल्प सिद्ध पद लूँगा ॥
ॐ ह्रीं श्री पपौरा अतिशय क्षेत्र स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
(दोहा)
तीर्थ पपौरा क्षेत्र शुभ, वन्दूँ बारम्बार ।
अति मनोज्ञ जिनबिम्ब लख, होवे हर्ष अपार ।।
एक शतक अर आठ शुभ, जिन मंदिर अभिराम ।
धन्य हमारे पूर्वज जिनने, पधराये जिन धाम ।।
जुगों - जुगों तक भव्य जन, आयेंगे इस क्षेत्र ।
अन्तर्मुख हो जायेंगे, खोल ज्ञान के नेत्र ।।
अहो शताब्दी बारवीं, में पधराये बिम्ब ।
अचल विराजे जिन प्रभु, जिनवर मानस्तंभ ।।
यहाँ भोयरे भी बने, कूप बने शुभ सार ।
बर्तन मिलते थे यहाँ, आवेदन अनुसार ।।
महातेज आनंदमय, महाज्योति परताप ।
अविनाशी अनुपम प्रभु, भोगो शिवसुख आप ॥
श्री अर्हन्त जिनेन्द्र ही, अशरण शरण आधार ।
अनन्त चतुष्ट के धनी, वन्दूँ बारम्बार ।।
जिन मुद्रायें जगत् में, कृत्रिम-अकृत्रिम जान ।
सब ही वन्दूँ भाव से, मेटो अघ दुख-खान ॥
वत्थु सहावो धर्म का, उद्घोषक जिनधर्म ।
जो समझे वो ही तिरे, छूटे भवदुख कर्म ॥
रत्नत्रय जयवन्त हो, प्रगटे परिणति सार ।
यही मुक्ति का मार्ग है, दिव्य देशना धार ॥
छः आवश्यक पालकर, टालूँ पाप जिनेन्द्र ।
एकज आवश्यक परम, ध्याऊँ बनूँ मुनीन्द्र ।।
अन्तर्मुख मुद्रा सहित, शोभित श्री जिनराज ।
दर्शन से शांति मिले, मिटे भ्रांति संताप ।।
राग-द्वेष अर मोह वश, रूल्यो अनंतों काल ।
ज्ञान - विराग जगे प्रभू, आनंद हो तिहुंकाल ।।
आतम ही परमात्मा, आतम ही भगवान् ।
दिव्य देशना सुन प्रभू, जगा आज बहुमान ।।
आठ अंग प्रगटें प्रभू, आठ दोष टल जाय ।
अष्टम वसुधा प्राप्त हो, विनय यही जिनराय ।।
प्रभु वंदन पूजन भजन, सुरपति करें महान् ।
महाभाग्य वन्दूँ प्रभु, पाऊँ पद निर्माण ।।
ॐ ह्रीं श्री पपोरा अतिशय क्षेत्र स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो जयमाला पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति
स्वाहा ।
श्री जिनेन्द्र की अर्चना, संचित दुरित पलाय ।
भक्ति सहित करता विनय, शिवसुख दो जिनराय ।।
(पुष्पांजलिं क्षिपामि)
Artist: पं. राजेन्द्र कुमार जैन
स्रोत: जिनेन्द्र पूजन
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