श्री पंचमेरु पूजन (कवि राजमल पवैया) | Shri Panchmeru Pujan (Rajmal Pavaiya)

श्री पंचमेरु पूजन

मध्यलोक में ढाई द्वीप के पंच मेरु को करूँ प्रणाम ।
मेरु सुदर्शन, विजय, अचल, मंदर, विद्युन्माली अभिराम ।।
मेरु सुदर्शन एक लाख योजन ऊँचा है महिमावान ।
शेष मेरु योजन चौरासी सहस्त्र उच्च हैं दिव्य महान ।।

पाँचों मेरु अनादि निधन हैं स्वर्णमयी सुन्दर सुविशाल ।
इन पर अस्सी जिन चैत्यालय वन्दूँ सदा झुकाऊँ भाल ।।
इनका पूजन वन्दन करके मैं अनादि अघतिमिर हरूँ ।
मन वच काया शुद्धि पूर्वक श्री जिनवर को नमन करूँ ।।

ॐ ह्रीं श्री सुदर्शन, विजय, अचल, मन्दर, विधुन्माली पंचमेरु संबन्धि जिनचैत्यालयस्थ जिनप्रतिमा समूह ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शन, विजय, अचल, मन्दर, विधुन्माली पंचमेरु संबन्धि जिनचैत्यालयस्थ जिनप्रतिमा समूह ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शन, विजय, अचल, मन्दर, विधुन्माली पंचमेरु संबन्धि जिनचैत्यालयस्थ जिनप्रतिमा समूह ! अत्र मम् सन्निहितो भव भव वषट् ।

यह अथाह भव सागर जल पीकर भी तृषा न शांत हुई ।
जन्म मरण के चक्कर में पड़कर मेरी मति भ्रांत हुई ।।
पंचमेरु के अस्सी जिन चैत्यालय को वन्दन करलूँ ।
भक्ति भाव से पूजन करके मैं भव सागर दुख हरलूँ ।।

ॐ ह्रीं श्री पंचमेरु सम्बन्धि जिनचैत्यालयस्थ जिनबिम्बेभ्यो जलं नि. स्वाहा ।

भव दावानल की भीषण ज्वाला में जल-जल दुख पाया ।
ताप निकंदन निज गुण चन्दन शीतलता पाने आया ।।पंचमेरु०।।

ॐ ह्रीं श्री पंचमेरु सम्बन्धि जिनचैत्यालयस्थ जिनबिम्बेभ्यो चदनं नि. स्वाहा ।

भव समुद्र की चारों गतिमय भंवरों में गोता खाया ।
अक्षयपद पाने को हे प्रभु कभी न अक्षत गुण भाया ।।पंचमेरु०।।

ॐ ह्रीं श्री पंचमेरु सम्बन्धि जिनचैत्यालयस्थ जिनबिम्बेभ्यो अक्षतं नि. स्वाहा ।

कामभाव से भव दुख की श्रृंखला बढ़ाता ही आया ।
महाशील के सुमन प्राप्त करने को देवशरण आया ।।
पंचमेरु के अस्सी जिन चैत्यालय को वन्दन करलूँ ।
भक्ति भाव से पूजन करके मैं भव सागर दुख हरलूँ ।।

ॐ ह्रीं श्री पंचमेरु सम्बन्धि जिनचैत्यालयस्थ जिनबिम्बेभ्यो पुष्पं नि. स्वाहा ।

जग के अनगिनती द्रव्यों को पाकर तृप्त न हो पाया ।
इसीलिये निर्लोभ वृत्ति नैवेद्य प्राप्त करने आया ।।पंचमेरु०।।

ॐ ह्रीं श्री पंचमेरु सम्बन्धि जिनचैत्यालयस्थ जिनबिम्बेभ्यो नैवेद्यं नि. स्वाहा ।

अन्धकार में मार्ग भूलकर भटक भटक अति दुख पाया ।
सम्यक्ज्ञान प्रकाश प्राप्त करने को यह दीपक लाया ।।पंचमेरु०।।

ॐ ह्रीं श्री पंचमेरु सम्बन्धि जिनचैत्यालयस्थ जिनबिम्बेभ्यो दीपं नि. स्वाहा ।

विकट जगत जंजाल कर्ममय इसको तोड़ नहीं पाया ।
आत्म ध्यान की ध्यान अग्नि में कर्म जलाने मैं आया ।।पंचमेरु०।।

ॐ ह्रीं श्री पंचमेरु सम्बन्धि जिनचैत्यालयस्थ जिनबिम्बेभ्यो धूपं नि. स्वाहा ।

भव अटवी में अटका अब तक नहीं धर्म का फल पाया ।
चिदानन्द चैतन्य स्वभावी मोक्ष प्राप्त करने आया ।।पंचमेरु०।।

ॐ ह्रीं श्री पंचमेरु सम्बन्धि जिनचैत्यालयस्थ जिनबिम्बेभ्यो फलं नि. स्वाहा ।

क्षमा शील संयम व्रत तप शुचि विनय सत्य उर में लाया ।
निज अनंत सुख पाने को प्रभु मैं वसुद्रव्य अर्घ लाया ।।पंचमेरु०।।

ॐ ह्रीं श्री पंचमेरु सम्बन्धि जिनचैत्यालयस्थ जिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं नि. स्वाहा ।

जम्बूद्वीप सुमेरु सुदर्शन परम पूज्य अति मन भावन ।
भू पर भद्रशाल वन, पाँच शतक योजन पर नन्दन वन ।।
साढ़े बासठ सहस्त्र योजन ऊँचा है सौमनस सुवन ।
फिर छत्तीस सहस्त्र योजन की ऊँचाई पर पाण्डुक वन ।।

चारों वन की चार दिशा में एक एक जिन चैत्यालय ।
सोलह चैत्यालय हैं अनुपम विनय सहित वन्दूँ जय जय ।।

ॐ ह्रीं श्री जम्बूद्वीपसुदर्शनमेरु सम्बन्धि षोडशजिनचैत्यालयस्थ जिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं नि. स्वाहा ।

खण्ड धातकी पूर्व दिशा में विजय मेरु पर्वत पावन ।
भूपरभद्रशाल वन पाँच शतक योजन पर नंदन वन ।।

साढ़े पचपन सहस्त्र योजन ऊँचा है सौमनस सुवन ।
अट्ठाईस सहस्त्र योजन की ऊँचाई पर पांडुक वन ।।चारों०।।

ॐ ह्रीं श्री धातकीखण्डद्वीप पूर्व दिशा विजयमेरु सम्बन्धि षोडश जिन चैत्यालयस्थ जिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं नि. स्वाहा ।

खण्ड धातकी पश्चिम दिशि में अचल मेरु पर्वत सुन्दर ।
विजयमेरु सम इस पर भी हैं सोलह चैत्यालय मन हर ।।
प्रातिहार्य आठों वसुमंगल द्रव्यों से जिनगृह शोभित ।
देव इन्द्र विद्याधर चक्री दर्शन कर होते हर्षित ।।चारों०।।

ॐ ह्रीं श्री धातकीखण्डद्वीप पश्चिमदिशा अचलमेरु सम्बन्धि षोडश जिन चैत्यालयस्थ जिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं नि. स्वाहा ।

पुष्करार्ध की पूर्व दिशा में मंदिर मेरु महासुखमय ।
विजयमेरु सम इसकी रचना सोलह चैत्यालय जय जय ।।
चन्द्र सूर्य सम कान्ति सहित हैं रत्नमयी प्रतिमा से युक्त ।
दश प्रकार के कल्प वृक्ष की मालाओं से हैं संयुक्त ।।चारों०।।

ॐ ह्रीं श्री पुष्करार्धद्वीपपूर्वदिशा मंदिरमेरुसम्बन्धि षोडशजिनचैत्यालयस्थ जिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं नि. स्वाहा ।

पुष्करार्ध की पश्चिम दिशि में विद्युन्माली मेरु महान ।
विजयमेरु सम ही रचना है सोलह चैत्यालय छविमान ।।
सुर विद्याधर असुर सदा ही पूजन करने आते हैं ।
चारण ऋद्धि धारि मुनि भी दर्शन को आते जाते हैं ।।चारों०।।

ॐ ह्रीं श्री पुष्करार्धद्वीप पश्चिम दिशा विद्युन्माली मेरु सम्बन्धि जिन चैत्यालयस्थ जिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं नि. स्वाहा ।

जयमाला

एक लाख योजन का जम्बूद्वीप लोक के मध्य प्रधान ।
चार लाख योजन का सुन्दर द्वीप धात की खण्ड महान ।।
सोलह लाख सुयोजन का है पुष्कर द्वीप अपूर्व ललाम ।
इनमें पंचमेरु हैं अनुपम परम सुहावन हैं शुभ नाम ।।

सूर्य चन्द्र देते प्रदक्षिणा करते निश दिन सतत प्रणाम ।
एक मेरु सम्बन्धी सोलह पंचमेरु अस्सी जिन धाम ।।
एक शतक अर अर्ध शतक योजन लम्बे चौड़े जिन धाम ।
पौन शतक योजन ऊँचे हैं बने अकृत्रिम भव्य ललाम ।।

एक एक में बिम्ब एकसौ आठ विराजित हैं मनहर ।
आठ सहस्त्र छः सौ चालीस हैं श्री अरहन्त मूर्ति सुन्दर ।।
धनुष पांच सौ पद्मासन हैं गूंज रहा है जय जयगान ।
नृत्य वाद्य गीतों से झंकृत दशों दिशायें महिमावान ।।

तीर्थंकर के जन्मोत्सव की सदा गूँजती जय जयकार ।
धन्य धन्य श्री जिन शासन की महिमा जग में अपरम्पार ।।
नहीं शक्ति हममें जाने की यहीं भाव पूजन करते ।
पुष्पांजलि व्रत की महिमा से भव भव के पातक हरते ।।

पंचमेरु की पूजा करके निज स्वभाव में आजाऊँ ।
भेद ज्ञान की नवल ज्योति से सम्यग्दर्शन प्रगटाऊँ ।।
सम्यक्ज्ञान चरित्र धार मुनि बन स्वरूप में रम जाऊँ ।
वसु कर्मों का सर्वनाश कर सिद्ध शिला पर जम जाऊँ ।।

ॐ ह्रीं श्री ढाईद्वीपसम्बन्धि सुदर्शन, विजय, अचल, मन्दिर, विधुन्माली पंचमेरुसंबन्धी अस्सीजिनचैत्यालयस्थ जिनबिम्बेभ्यो पूर्णार्घ्यं नि. स्वाहा ।

(दोहा)
पंचमेरु जिन धाम की महिमा अगम अपार ।
पुष्पांजलि व्रत जो करें हो जायें भव पार ।।


Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ ३५४ से ३५७