मत्त सवैया
हे ब्रह्मचर्य के धनी ब्रह्ममय, परमपूज्य त्रिभुवन स्वामी।
हे पंचबालयति तीर्थंकर, तुम-सम परिणति हो जगनामी॥
आनन्दमयी निज परमब्रह्म, मैंने प्रत्यक्ष निहारा है।
उल्लास हृदय में छाया प्रभु, जब मैंने तुम्हें चितारा है॥
ज्यों दर्पण सन्मुख हो जग में, मोही तन-रूप सजाते हैं।
त्यों तुम पूजन कर हे विभुवर, हम अपना भाव बढ़ाते हैं॥
सोरठा
वासुपूज्य, मल्लि, नेमि, पार्श्व प्रभु, महावीर जिन।
नमत होय सुख चैन, द्रव्य-दृष्टि धर पूज हूँ॥
ॐ ह्रीं श्रीवासुपूज्य-मल्लिनाथ-नेमिनाथ-पार्श्वनाथ-महावीर-पंचबालयति-
तीर्थंकराः अत्र अवतरन्तु अवतरन्तु संवौषट् इत्यह्वाननम् । अत्र तिष्ठन्तु तिष्ठन्तु ठः
ठः स्थापनम् । अत्र मम सन्निहिता भवन्तु भवन्तु वषट् सन्निधिकरणम् ।
निज में जुड़ती है दृष्टि जभी, समता का सहज प्रवाह बहे।
आनन्द अपूर्व प्रकट होवे, तब जन्म-जरा-मृत नहीं रहे।
है जन्म-जरा-मृत रहित प्रभू ! मम आज दृष्टि में आया है।
समरस से तृप्त रहूँ विभुवर, मैंने जल यहाँ चढ़ाया है।
अतिशय है ब्रह्म-भाव मेरा, कामादिक दुर्मति भागी है।
प्रभु ब्रह्मचर्य परमानन्द पा, अतिशय प्रतीति उर जागी है।
ॐ ह्रीं श्रीपंचबालयति-तीर्थंकरेभ्यो जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति।
निज परमशांति शीतलता से, आपूर्ण सरोवर मम प्रभु है।
भवरहित जहाँ भवताप नहीं, सर्वोत्कृष्ट सुखमय विभु है।
जब ताप नहीं तब चन्दन का भी, काम नहीं कुछ शेष रहा।
चन्दन प्रभु यहीं चढ़ाया है, निष्पाप-ताप निजरूप गहा ।।अतिशय..।।
ॐ ह्रीं श्रीपंचबालयति-तीर्थंकरेभ्यो संसारताप-विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
छिलके से ढका हुआ अक्षत, छिलका हटते ही प्रकट हुआ।
पर्याय दृष्टि हटते ही त्यों, मम अक्षय प्रभु प्रत्यक्ष हुआ ॥
निज अक्षय प्रभु के आश्रय से ही, राग-द्वेष का होवे क्षय।
ये अक्षत यहाँ चढ़ाये हैं, मैंने पाया है पद अक्षय ॥ अतिशय..।।
ॐ ह्रीं श्रीपंचबालयति-तीर्थंकरेभ्योऽक्षयपद-प्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।
निष्काम पूर्ण निज वैभव का, मैं तृप्त हो गया दर्शन कर।
संकल्प-विकल्प प्रवेश न हों, रहते सीमा से ही बाहर ॥
अद्भुत रहस्य यह पाया है, इच्छाओं की उत्पत्ति नहीं।
बस निजस्वभाव में मग्न रहूँ, ये पुष्प चढ़ाता आज यहीं ।।अतिशय..।।
ॐ ह्रीं श्रीपंचबालयति-तीर्थंकरेभ्यः कामबाण-विध्वंशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
समरस अमृत का सागर है, क्षुत् पीड़ा का अस्तित्व नहीं।
त्यागोपादान शून्य पर से, कुछ ग्रहण-त्याग कर्तृत्व नहीं ।।
जो निजस्वभाव से च्युत होकर, तन के आश्रय से भूख लगी।
ये नैवेद्य समर्पित यहीं प्रभो ! स्वाश्रय से भव की भूख भगी ।। अतिशय..।।
ॐ ह्रीं श्रीपंचबालयति-तीर्थंकरेभ्यो क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।.
प्रकाशत्व शक्ति शाश्वत है, सहज प्रकाशित मम स्वभाव।
सब बाह्य प्रकाश अनावश्यक, उसमें नहिं दिखता निजस्वभाव ।।
बाहर की दृष्टि छोड़ अहो ! स्वसन्मुख चिन्मय ज्योति जगे।
ये दीपक यहीं विसर्जित है, अन्तर लौ से तम-मोह भगे ॥
अतिशय है ब्रह्म-भाव मेरा, कामादिक दुर्मति भागी है।
प्रभु ब्रह्मचर्य परमानन्द पा, अतिशय प्रतीति उर जागी है।
ॐ ह्रीं श्रीपंचबालयति-तीर्थंकरेभ्यो मोहांधकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
दश-धर्ममयी शाश्वत सुगन्ध चेतन नन्दन में महक रही।
दुर्गन्धित भाव विकारों का, किंचित् भी जहाँ अस्तित्व नहीं ।।
यह धूप यहीं प्रभु छोड़ रहा, अब पर से दृष्टि हटाई है।
स्वसन्मुख होकर अब प्रभुसम, स्वधर्म सुरभि शुभ पायी है ।। अतिशय..।।
ॐ ह्रीं श्रीपंचबालयति-तीर्थंकरेभ्योऽष्टकर्म-विध्वंसनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
प्रभु मुक्त स्वरूप सहज पाया, आनन्द अपूरव छाया है।
शिवफल की भी वाँछा न रही, अन्तर पुरुषार्थ जगाया है ।।
ज्ञानी तो फल वाँछा त्यागे, पर मूढ त्याग का फल चाहे।
फल चढ़ा रहा हूँ हे जिनवर, बस ये विकल्प भी नहिं आये ।।अतिशय..।।
ॐ ह्रीं श्रीपंचबालयति-तीर्थंकरेभ्यो मोक्षफल-प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
प्रभु सर्वविशुद्ध स्वतत्त्व लखा, अब दृष्टि न पल भी हटती है।
होता उपयोग जभी बाहर, एकाग्र भावना जगती है।
एकाग्र रहे उपयोग सदा, यह ही निश्चय से अर्घ्य कहा।
जिससे अविचल अनर्घ्यपद हो, प्रभु बाह्य अर्घ्य इसलिए तजा ॥ अतिशय. ।।
ॐ ह्रीं श्रीपंचबालयति-तीर्थंकरेभ्योऽनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
दोहा
वासुपूज्य श्री मल्लिजिन, नेमि पार्श्व महावीर।
बाल ब्रह्मचारी सुजिन, नमत मिटै भवपीर ।।
पद्धरि
जय वासुपूज्य देवाधिदेव, मंगलमय मंगलकरन एव।
जय चिदानन्द चिद्रूप सार, धारी निज महिमा निर्विकार।
पूरवभव में तुमने स्वामी, सुन युगमंधर प्रभु की वाणी।
नित आत्मभावना भाई थी, तीर्थंकर प्रकृति बंधाई थी।
तप कर महाशुक्र विमान गये, चय नृप वसुपूज्य के पुत्र भये।
कल्याणक देव मनाये थे, पर निज में आप समाये थे।
भोगों को नहिं स्वीकार किया, दूरहि से प्रभुवर छोड़ दिया।
हो बालयति दीक्षा धारी, प्रकटाया निजपद सुखकारी।
कर रहा अर्चना मल्लिनाथ, भवि दर्शन कर होते सनाथ।
वट वृक्ष विशाल गिरा लख कर, पूरब भव में दीक्षा धरकर।
तीर्थंकर पद का बन्ध किया, अपराजित स्वर्ग प्रयाण किया।
तँहतैं चयकर अवतार लिया, शादी के समय वैराग लिया ।
छह दिन छद्मस्थ रहे स्वामी, नव-केवललब्धि रमा पायी।
भव्यों को शिवपथ दर्शाया, सम्मेदशिखर से शिव पाया।
जय नेमीश्वर महिमा महान, सुन पशु क्रन्दन वैराग्य ठान।
छोड़े पशु अरु राजुल छोड़ी, भवबन्धन की कड़ियाँ तोड़ी।
जग को अनुपम आदर्श दिया, प्रभु धर्म अहिंसा प्रकट किया।
गिरनार शिखर से शिव पाया, प्रभु चरणों में हम सिर नाया।
जय पार्श्वनाथ तव गुण अपार, गणधर भी पावें नहीं पार।
इक दिवस सभा में विराज रहे, साकेत नरेश की भेंट लिए।
इक दूत वहाँ पर आया था, साकेत विभव दरशाया था।
ऋषभादि प्रभु स्मरण हुआ, वैराग्य हृदय में जाग उठा।
दीक्षा ले निज में मग्न हुए, तब कमठ घोर उपसर्ग किए।
अप्रभावित अचल रहे जिनवर, परमात्मदशा प्रगटी सत्वर ।
ऐसी स्थिरता प्रभु पाऊँ, बस परमब्रह्म में रम जाऊँ।
हे महावीर विभु परम धीर, महिमा सागर से भी गम्भीर।
शादी प्रसंग जब आया था, प्रभुवर तुमने ठुकराया था।
दीक्षा ले द्वादश वर्ष प्रभो, दुर्द्धर तप धारा आप विभो।
निजध्यान अग्नि द्वारा जिनेश, कर्मों को ध्वस्त किया अशेष।
अन्तिम तीर्थंकर अभिरामी, मैं करूँ वन्दना जगनामी।
तव दर्शन करके हे स्वामी, मैंने निज महिमा पहिचानी।
प्रभु प्रबल पराक्रम प्रगटाऊँ, रागादिभाव पर जय पाऊँ।
जो तीर्थ आपने प्रगटाया, वह भी स्वामी मुझको भाया।
कीचड़ लपेट तन धोना क्या, अरु कूद अग्नि में रोना क्या ?।
श्रद्धान परम जागा मन में, सुख शांति सदा है अन्तर में।
परमाणु मात्र भी नहीं पर में, मेरा सर्वस्व सदा मुझ में।
उपयोग नहीं पर में भागे, अतिचार नहीं किञ्चित् लागे।
प्रभुवर ! निज में ही रम जाऊँ, निज परम ब्रह्मचर्य प्रगटाऊँ।
ॐ ह्रीं श्रीपंचबालयति-तीर्थंकरेभ्योऽनर्घ्यपदप्राप्तये जयमालाऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
परम ब्रह्म आनन्दमय, चित् स्वभाव अविकार ।
समयसार में लीन हो, होऊँ भव से पार ॥
।। पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि ।।
Artist: रवींद्र जी आत्मन
स्रोत: जिनेन्द्र आराधना संग्रह