श्री पंच-बालयति तीर्थंकर विधान पीठिका
(दोहा)
अनेकान्तमय ब्रह्मचर्य, सर्व गुणों की खान।
दुर्भावों से विरत हो, प्रगटे आतम ध्यान॥1॥
इन्द्रिय सुख की वासना, सर्व दुःखों का मूल।
विषयों में आसक्त तो, शिवपथ जाये भूल॥2॥
तातैं ज्ञानाभ्यास कर, विषय कषाय विडार।
भाऊँ सम्यक् भावना, संयम का आधार॥3॥
आराधन करके हुए, अहो स्वयं आराध्य।
भाव सहित कर वंदना, पाऊँ अक्षय साध्य॥4॥
बालयती तीर्थेश को, नमहूँ त्रियोग सम्हार।
मंगलमयी विधान शुभ, रचूँ सु मंगलकार॥5॥
(पुष्पांजलिं क्षिपामि)
श्री पंच-बालयति पूजन
(छन्द-मत्तसवैया)
हे ब्रह्मचर्य के धनी ब्रह्ममय, परम पूज्य त्रिभुवन स्वामी।
हे पंच बालयति तीर्थंकर, तुम सम परिणति हो जगनामी॥
आनन्दमयी निज परम ब्रह्म, मैंने प्रत्यक्ष निहारा है।
उल्लास हृदय में छाया प्रभु, जब मैंने तुम्हें चितारा है॥
ज्यों दर्पण सन्मुख हो जग में, मोही तन रूप सजाते हैं।
त्यों तुम पूजन कर हे विभुवर, हम अपना भाव बढ़ाते हैं॥
(सोरठा)
वासुपूज्य, मल्लि, नेमि, पार्श्व प्रभु, महावीर जिन।
नमत होय सुख चैन, द्रव्य-दृष्टि धर पूज हूँ॥
ॐ ह्रीं श्रीवासुपूज्य-मल्लिनाथ-नेमिनाथ-पार्श्वनाथ-महावीरपंचबालयतितीर्थंकरसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् इत्याह्वाननम्।
ॐ ह्रीं श्रीवासुपूज्य-मल्लिनाथ-नेमिनाथ-पार्श्वनाथ-महावीरपंचबालयतितीर्थंकरसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः इति स्थापनम्।
ॐ ह्रीं श्रीवासुपूज्य-मल्लिनाथ-नेमिनाथ-पार्श्वनाथ-महावीरपंचबालयतितीर्थंकरसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम्।
(वीरछन्द)
निज में जुड़ती है दृष्टि जभी, समता का सहज प्रवाह बहे।
आनन्द अपूर्व प्रकट होवे, तब जन्म-जरा-मृत नहीं रहे॥
है जन्म-जरा-मृत रहित प्रभु! मम आज दृष्टि में आया है।
समरस से तृप्त रहूँ विभुवर, मैंने जल यहाँ चढ़ाया है॥
अतिशय है ब्रह्म भाव मेरा, कामादिक दुर्मति भागी है।
प्रभु ब्रह्मचर्य परमानन्द पा, अतिशय प्रतीति उर जागी है॥
ॐ ह्रीं श्री पंचबालयतितीर्थंकरेभ्यो जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
निज परम शांति शीतलता से, आपूर्ण सरोवर मम प्रभु है।
भव रहित जहाँ भव ताप नहीं, सर्वोत्कृष्ट सुखमय विभु है॥
जब ताप नहीं तब चन्दन का भी, काम नहीं कुछ शेष रहा।
चन्दन प्रभु यहीं चढ़ाया है, निष्पाप-ताप निज रूप गहा॥अतिशय.॥
ॐ ह्रीं श्री पंचबालयतितीर्थंकरेभ्यः संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
छिलके से ढका हुआ अक्षत, छिलका हटते ही प्रकट हुआ।
पर्याय दृष्टि हटते ही त्यों, मम अक्षय प्रभु प्रत्यक्ष हुआ॥
निज अक्षय प्रभु के आश्रय से ही, राग-द्वेष का होवे क्षय।
ये अक्षत यहाँ चढ़ाये हैं, मैंने पाया है पद अक्षय॥अतिशय.॥
ॐ ह्रीं श्री पंचबालयतितीर्थंकरेभ्योऽक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
निष्काम पूर्ण निज वैभव का, मैं तृप्त हो गया दर्शन कर।
संकल्प विकल्प प्रवेश न हों, रहते सीमा से ही बाहर॥
अद्भुत रहस्य यह पाया है, इच्छाओं की उत्पत्ति नहीं।
बस निज स्वभाव में मग्न रहूँ, ये पुष्प चढ़ाता आज यहीं॥
अतिशय है ब्रह्मभाव मेरा, कामादिक दुर्मति भागी है।
प्रभु ब्रह्मचर्य परमानन्द पा, अतिशय प्रतीति उर जागी है॥
ॐ ह्रीं श्री पंचबालयतितीर्थंकरेभ्यः कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
समरस अमृत का सागर है, क्षुत् पीड़ा का अस्तित्व नहीं।
त्यागोपादान शून्य पर से, कुछ ग्रहण त्याग कर्तृत्व नहीं॥
जो निज स्वभाव से च्युत होकर, तन के आश्रय से भूख लगी।
नैवेद्य समर्पित यहीं प्रभो! स्वाश्रय से भव की भूख भगी॥अतिशय.॥
ॐ ह्रीं श्री पंचबालयतितीर्थंकरेभ्यः क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
प्रकाशत्व शक्ति शाश्वत् मेरी, है सहज प्रकाशित मम स्वभाव।
सब बाह्य प्रकाश अनावश्यक्, उसमें नहिं दिखता निजस्वभाव॥
बाहर की दृष्टि छोड़ अहो! स्वसन्मुख चिन्मय ज्योति जगे।
ये दीपक यहाँ विसर्जित है, अन्तर लौ से तम मोह भगे॥अतिशय.॥
ॐ ह्रीं श्री पंचबालयतितीर्थंकरेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
दश धर्ममयी शाश्वत सुगन्ध चेतन नंदन में महक रही।
दुर्गन्धित भाव विकारों का, किंचित् भी है अस्तित्व नहीं॥
यह धूप यहीं प्रभु छोड़ रहा, अब पर से दृष्टि हटाई है।
स्वसन्मुख होकर अब प्रभु सम, स्वधर्म सुरभि शुभ पायी है॥अतिशय.॥
ॐ ह्रीं श्री पंचबालयतितीर्थंकरेभ्योऽष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
प्रभु मुक्त स्वरूप सहज पाया, आनन्द अपूरव छाया है।
शिवफल की भी वांछा न रही, अन्तर पुरुषार्थ जगाया है॥
ज्ञानी तो फल वाँछा त्यागे, पर मूढ़ त्याग का फल चाहे।
फल चढ़ा रहा हूँ हे जिनवर, बस ये विकल्प भी नहिं आये॥अतिशय.॥
ॐ ह्रीं श्री पंचबालयतितीर्थंकरेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
प्रभु सर्व विशुद्ध स्वतत्त्व लखा, अब दृष्टि न पल भी हटती है।
होता उपयोग जभी बाहर, एकाग्र भावना जगती है॥
एकाग्र रहे उपयोग सदा, यह ही निश्चय से अर्घ्य कहा।
जिससे अविचल अनर्घ्यपद हो, प्रभु बाह्य अर्घ्य इसलिए तजा॥
अतिशय है ब्रह्मभाव मेरा, कामादिक दुर्मति भागी है।
प्रभु ब्रह्मचर्य परमानन्द पा, अतिशय प्रतीति उर जागी है॥
ॐ ह्रीं श्री पंचबालयतितीर्थंकरेभ्योऽनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
दोहा- वासुपूज्य श्री मल्लिजिन, नेमि पार्श्व महावीर।
बाल ब्रह्मचारी सुजिन, नमत मिटै भवपीर॥
(छन्द-पद्धरि)
जय वासुपूज्य देवाधिदेव, मंगलमय मंगलकरन एव।
जय चिदानन्द चिद्रूप सार, धारी निज महिमा निर्विकार॥
पूरवभव में तुमने स्वामी, सुन युगमंधर प्रभु की वाणी।
नित आतमभावना भाई थी, तीर्थंकर प्रकृति बंधाई थी॥
तप कर महाशुक्र विमान गये, चय नृप वासुपूज्य के पुत्र भये।
कल्याणक देव मनाये थे, पर निज में आप समाये थे॥
भोगों को नहीं स्वीकार किया, दूरहि से प्रभुवर छोड़ दिया।
हो बालयति दीक्षा धारी, प्रकटाया निज पद सुखकारी॥
कर रहा अर्चना मल्लिनाथ, भवि दर्शन कर होते सनाथ।
वट वृक्ष विशाल गिरा लख कर, पूरव भव में दीक्षा धरकर॥
तीर्थंकर पद का बन्ध किया, अपराजित स्वर्ग प्रयाण किया।
तँहतैं चयकर अवतार लिया, शादी के समय वैराग लिया॥
छह दिन छद्मस्थ रहे स्वामी, नव-केवललब्धि रमा पायी।
भव्यों को शिवपथ दर्शाया, सम्मेदशिखर से शिव पाया॥
जय नेमीश्वर महिमा महान, सुन पशु क्रन्दन वैराग्य ठान।
छोड़े पशु अरु राजुल छोड़ी, भवबन्धन की कड़ियाँ तोड़ीं॥
जग को अनुपम आदर्श दिया, प्रभु धर्म अहिंसा प्रकट किया।
गिरनार शिखर से शिव पाया, प्रभु चरणों में हम सिर नाया॥
जय पार्श्वनाथ तव गुण अपार, गणधर भी पावें नहीं पार।
इक दिवस सभा में विराज रहे, साकेत नरेश की भेंट लिए॥
इक दूत वहाँ पर आया था, साकेत विभव दरशाया था।
ऋषभादि प्रभु स्मरण हुआ, वैराग्य हृदय में जाग उठा॥
दीक्षा ले निज में मग्न हुए, तब कमठ घोर उपसर्ग किये।
अप्रभावित अचल रहे जिनवर, परमात्म दशा प्रगटी सत्वर॥
ऐसी स्थिरता प्रभु पाऊँ, बस परम ब्रह्म में रम जाऊँ।
हे महावीर विभु परम धीर, महिमा सागर से भी गम्भीर॥
शादी प्रसंग जब आया था, प्रभुवर तुमने ठुकराया था।
दीक्षा ले द्वादश वर्ष प्रभो, दुर्द्धर तप धारा आप विभो॥
निज ध्यान अग्नि द्वारा जिनेश, कर्मों को ध्वस्त किया अशेष।
अन्तिम तीर्थंकर अभिरामी, मैं करूँ वन्दना जगनामी॥
तव दर्शन करके हे स्वामी, मैंने निज महिमा पहिचानी।
प्रभु प्रबल पराक्रम प्रगटाऊँ, रागादि भाव पर जय पाऊँ॥
जो तीर्थ आपने प्रगटाया, वह ही स्वामी मुझको भाया।
कीचड़ लपेट तन धोना क्या, अरु कूद अग्नि में रोना क्या॥
श्रद्धान परम जागा मन में, सुख शान्ति सदा है अन्तर में।
परमाणु मात्र भी नहीं पर में, मेरा सर्वस्व सदा मुझमें॥
उपयोग नहीं पर में भागे, अतिचार नहीं किंचित् लागे।
प्रभुवर! निज में ही रम जाऊँ, निज परम ब्रह्मचर्य प्रगटाऊँ॥
ॐ ह्रीं श्री पंचबालयतितीर्थंकरेभ्योऽनर्घ्यपदप्राप्तये जयमालापूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दोहा- परम ब्रह्म आनन्दमय, चित् स्वभाव अविकार।
समयसार में लीन हो, होऊँ भव से पार॥
(पुष्पांजलिं क्षिपामि)
श्री उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म पूजन
स्थापना (छन्द-अडिल्ल)
क्षमा आदि अन्तर्गर्भित जिसमें अहा,
विषय कषायों से विरक्ति लक्षण कहा।
आत्मलीनता ब्रह्मचर्य सुखकार है,
पूजूँ-धारूँ सहज भक्ति उर धार है॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमब्रह्मचर्यधर्म! अत्र अवतर अवतर संवौषट् इत्याह्वाननम्।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमब्रह्मचर्यधर्म! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः इति स्थापनम्।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमब्रह्मचर्यधर्म! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम्।
(छन्द-अवतार)
ले समकित जल अविकारी, धोऊँ मिथ्यामल भारी।
भक्ति से पूज रचाऊँ, व्रत ब्रह्मचर्य प्रगटाऊँ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमब्रह्मचर्यधर्माय जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
ले क्षमा भावमय चन्दन, करता नित ही अभिनन्दन।
पूजन करि क्रोध नशाऊँ, व्रत ब्रह्मचर्य प्रगटाऊँ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमब्रह्मचर्यधर्माय संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
क्षतरूप विभाव नशाऊँ, अक्षय स्वरूप ही ध्याऊँ।
अक्षत से पूज रचाऊँ, व्रत ब्रह्मचर्य प्रगटाऊँ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमब्रह्मचर्यधर्माय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
ज्ञानामृत जल बरसावे, विषयों की चाह नशावें।
भावों के पुष्प चढ़ाऊँ, व्रत ब्रह्मचर्य प्रगटाऊँ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमब्रह्मचर्यधर्माय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
जब आतम अनुभव आवे, अद्भुत तृप्ति प्रगटावे।
चरु सरस भावमय लाऊँ, व्रत ब्रह्मचर्य प्रगटाऊँ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमब्रह्मचर्यधर्माय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जहँ सम्यग्ज्ञान विलसता, मिथ्यातम सहज विनशता।
प्रभु अन्तर्दीप जलाऊँ, व्रत ब्रह्मचर्य प्रगटाऊँ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमब्रह्मचर्यधर्माय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
दुर्ध्यान मिटे दुखकारी, हो आत्मध्यान सुखकारी।
मैं कर्म कलंक जलाऊँ, व्रत ब्रह्मचर्य प्रगटाऊँ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमब्रह्मचर्यधर्माय अष्टकर्मविध्वंसनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
कर्मों के फल नहिं चाहूँ, मैं मुक्ति महाफल पाऊँ।
प्रभु प्रासुक फल ले आऊँ, व्रत ब्रह्मचर्य प्रगटाऊँ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमब्रह्मचर्यधर्माय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
प्रभुता अनर्घ्य अविकारी, मैंने प्रत्यक्ष निहारी।
भक्तिमय अर्घ्य चढ़ाऊँ, व्रत ब्रह्मचर्य प्रगटाऊँ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमब्रह्मचर्यधर्माय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
नवधाशील अर्घ्यावलि
(दोहा)
ब्रह्मचर्य अद्भुत निधि, राखो सदा बचाय।
विषयी तस्कर जग फिरे, दृढ़ नव बाढ़ लगाय॥
ॐ ह्रीं श्री नवधाशीलपालनरूपोत्तम-ब्रह्मचर्यधर्माय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(चौपाई)
स्त्री संग तजो दुखकारी, भजो असंग भाव अविकारी।
सत्संगति में रहकर भाई, ब्रह्मचर्य पालो सुखदाई॥
ॐ ह्रीं श्री स्त्रीसहवासवर्जनरूपोत्तम-ब्रह्मचर्यधर्माय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
मंगलमय निज धर्म सम्हारो, नहीं वासना सहित निहारो।
खोटे भाव नहीं हों भाई, ब्रह्मचर्य पालो सुखदाई॥
ॐ ह्रीं श्री स्त्रीमनोहरांगनिरीक्षणवर्जनरूपोत्तम-ब्रह्मचर्यधर्माय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जिनसे हो विषयों का पोषण, ऐसे वचनशील के दूषण।
सुनो न बोलो मेरे भाई, ब्रह्मचर्य पालो सुखदाई॥
ॐ ह्रीं श्री रागवचनवर्जनरूपोत्तम-ब्रह्मचर्यधर्माय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
करो सदा तत्त्वों का चिन्तन, भोगों का नहिं होय स्मरण।
सावधान नित रहकर भाई, ब्रह्मचर्य पालो सुखदाई॥
ॐ ह्रीं श्री पूर्वभोगानुस्मरणवर्जनरूपोत्तम-ब्रह्मचर्यधर्माय अर्घ्यं निर्व. स्वाहा।
करो सदा सात्विक आहार, सादा जीवन-श्रेष्ठ विचार।
धर निर्ग्रन्थ भावना भाई, ब्रह्मचर्य पालो सुखदाई॥
ॐ ह्रीं श्री वृष्येष्टरसवर्जनरूपोत्तम-ब्रह्मचर्यधर्माय अर्घ्यं निर्व. स्वाहा।
कर रत्नत्रयमय शृंगार, तजो अध्रुव तन का शृंगार।
शील स्वयं आभूषण भाई, ब्रह्मचर्य पालो सुखदाई॥
ॐ ह्रीं श्री स्वशरीरसंस्कारवर्जनरूपोत्तम-ब्रह्मचर्यधर्माय अर्घ्यं निर्व. स्वाहा।
नारी की शय्या और वस्त्र, करें विकार भाव हों त्रस्त।
विविक्त शय्यासन तप भाई, ब्रह्मचर्य पालो सुखदाई॥
ॐ ह्रीं श्री स्त्रीशय्यासनवर्जनरूपोत्तम-ब्रह्मचर्यधर्माय अर्घ्यं निर्व. स्वाहा।
अति भोजन प्रमाद उपजाय, कामादिक दुर्भाव कराय।
युक्ताहारी होकर भाई, ब्रह्मचर्य पालो सुखदाई॥
ॐ ह्रीं श्री उदरपूर्णासनवर्जनरूपोत्तम-ब्रह्मचर्यधर्माय अर्घ्यं निर्व. स्वाहा।
विकथा त्याग करो स्वाध्याय, आतम अनुभव रस विलसाय।
चेष्टाएं निर्मल हों भाई, ब्रह्मचर्य पालो सुखदाई॥
ॐ ह्रीं श्री कामकथावर्जनरूपोत्तम-ब्रह्मचर्यधर्माय अर्घ्यं निर्व. स्वाहा।
जयमाला
सोरठा- अब्रह्मभाव विडार, ब्रह्मस्वरूप निहारते।
रहें सहज अविकार, तिन गुण चिन्तत अघ नशैं॥
(छन्द-पद्धरि)
जिन परम ब्रह्म को पहिचाना, अपना सुख अपने में जाना।
अपनी प्रभुता प्रतिभासी हो, उनको नित सहज उदासी हो॥
धनि धन्य जिनेश्वर के नन्दन, करते शुद्धात्म अभिनन्दन।
नित तत्त्वभावना भाते हैं, अपना वैराग्य बढ़ाते हैं॥
ज्ञानानन्द ही जगमाँहि सार, है शिवस्वरूप शिव सुखकार।
निजपद ही तृप्तिदायक है, निजपद संतुष्टि प्रदायक है॥
भोगों का चिन्तन, अभिलाषा, संतापकरण दुःखमय भासा।
चर्चा अरु चेष्टा महानिंद्य, से होय जीव को पापबंध॥
विषयों के वश जो होंय दीन, वे रहें सदा ही पराधीन।
जो विषयों से होवें उदास, उनका सब जग हो जाय दास॥
व्रत ब्रह्मचर्य सबसे महान, अन्तर्गर्भित सब सुगुण जान।
प्रगटाने योग्य सु उपादेय, इससे भवि पावें परम श्रेय॥
अति पुण्योदय अवसर आया, नरभव अरु जिनशासन पाया।
स्वाध्याय करो मंगलकारी, तत्त्वों का निर्णय हितकारी॥
अपने को ध्रुव आतम जानो, देहादिक भिन्न सु पहिचानो।
रागादिक जानो दुःखदायी, रत्नत्रय ही आनन्ददायी॥
समझो चारों गति ही दुःखमय, है मात्र मोक्ष ही मंगलमय।
आतम अनुभव कर श्रद्धाधर, वैराग्य भावना फिर भाकर॥
इन्द्रिय विषयों का त्याग करो, अब जगत्पूज्य ब्रह्मचर्य धरो।
बाधाओं से नहीं घबराओ, दृढ़ता पूर्वक बढ़ते जाओ॥
लोकोत्तम ज्ञायक आराध्यो, समदर्शी हो शिवपद साधो।
है यही जगत में एक सार, शाश्वत् आनन्दमय समयसार॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमब्रह्मचर्यधर्माय अनर्घ्यपदप्राप्तये जयमालापूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दोहा- समयसारमय परिणति, नियमसार हो जाय।
यही परम ब्रह्मचर्य है, धारे सो शिव पाय॥
(पुष्पांजलिं क्षिपामि)
श्री पंच-बालयति तीर्थंकर-समुच्चय-महाजयमाला
(दोहा)
यह विधि प्रभु पूजा करी, भुक्ति मुक्ति दातार।
जयमाला गाऊँ सुखद, काम विनाशन हार॥
(छन्द-रोला)
अहो परम ब्रह्मचर्य धर्म नित मंगलकारी।
लोकोत्तम है अनन्य शरण सबको हितकारी॥
इन्द्रादिक से पूजित वासुपूज्य जिनस्वामी।
मल्लिनाथ हे मोहमल्ल नाशक जगनामी॥
पशुओं पर करुणा दर्शाकर नेमि विरत हो।
दीक्षा लेकर जिनपद पाया निज में रत हो॥
नाग नागिनी भी सम्बोधे पार्श्व कुंवर ने।
दीक्षा ले परमातम पद पाया फिर प्रभु ने॥
शासन नायक वर्द्धमान आदर्श हमारे।
यौवन में ही निजबल से कामादि विदारे॥
बिन भोगे ही विषय-भोग प्रभुवर ठुकराये।
सहज परम स्वाधीन ज्ञान सुख निज में पाये॥
यही भावना मैं भी प्रभु निष्काम रहाऊँ।
छोड़ सकल जग द्वन्द-फन्द शुद्धात्म ध्याऊँ॥
सार भूत निज आतम जग असार दिखाया।
अन्तर्मुख जब हुआ अतीन्द्रिय निज रस पाया॥
भक्ति उर न समावे प्रभु विधान रचाया।
भाव जोड़ने का उपक्रम अल्पज्ञ कराया॥
हे अचिन्त्य महिमाधारी कैसे गुण गाऊँ।
भाव पुष्प अर्पितकर चरणों शीश नवाऊँ॥
सब व्रत गर्भित ब्रह्मचर्य व्रत भव दुःखहारी।
होय परम निर्ग्रन्थ सहज ज्ञानी ब्रह्मचारी॥
ब्रह्मचर्य की महिमा नित जयवन्त प्रवर्ते।
ब्रह्मचर्य धारण कर जग शिवमग में वर्ते॥
(दोहा)
परम ब्रह्म आनन्दमय, परम ध्येय अभिराम।
सहज लीनता ब्रह्मचर्य, नित प्रति करूँ प्रणाम्॥
ॐ ह्रीं श्री पंचबालयतितीर्थंकरेभ्योऽनर्घ्यपदप्राप्तये महाजयमालापूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
भूल चूक जो भी दिखे, सुधी सुधारो सोय।
जिनभक्ति हृदय वसे, भाव सफल सब होय॥
(पुष्पांजलिं क्षिपामि)
विधान समापन पाठ
तर्ज : श्री सिद्धचक्र का पाठ…
मैं चिदानन्द चिद्रूप सहज सुखरूप।
परम अविकारी, समझो भवि मंगलकारी॥टेक॥
अब तक नहिं निज को पहिचाना, पर में ही अपनापन जाना।
पर्यायदृष्टि से सहे दुःख अतिभारी, समझो भवि मंगलकारी॥1॥
तुम करो व्यर्थ ही रोष नहीं, पर का किंचित भी दोष नहीं।
निज भूल छोड़कर हो चैतन्य विहारी, समझो भवि मंगलकारी॥2॥
अति उत्तम अवसर आया है, श्री जिनवर दर्शन पाया है।
अब करो भेद विज्ञान सहज सुखकारी, समझो भवि मंगलकारी॥3॥
जड़ देह कर्म रागादि अरे, सबसे न्यारा चिद्रूप धरे।
है स्वयंसिद्ध परमातम आनन्दकारी, समझो भवि मंगलकारी॥4॥
स्वाभाविक शक्ति अनंत अहो, प्रभुता का भी कहीं अन्त न हो।
अद्भुत से भी अद्भुत वैभव का धारी, समझो भवि मंगलकारी॥5॥
ध्रुव मंगल उत्तम शरण यही, श्रद्धेय यही है ध्येय यही।
निज प्रभु ध्याता ही पावे शिव सुखकारी, समझो भवि मंगलकारी॥6॥
स्रोत: अध्यात्म पूजाञ्जलि (डॉ. मुकेश तन्मय शास्त्री), पृष्ठ १८१ (अध्यात्म पूजाञ्जलि (डॉ. मुकेश तन्मय शास्त्री) | Adhyatma Pujanjali (Dr. Mukesh Tanmay Shastri))