श्री नेमिकुमार निष्क्रमण | Shri Nemikumar Nishkraman

श्री नेमि प्रभु की वंदना कर, भक्ति भाव से।
प्रभु-सम ही भाऊँ भावना, छूटूँ विभाव से।। टेक।।

देखा पशुओं को रुका हुआ, प्रभु हो गये गम्भीर।
धिक्-धिक् ऐसी विषयांधता, दीखे न पराई पीर।।
इन भोगों की अग्नि में, कितने जीव हैं जलते।
और भोगी भी परिपाक में, भव-भव में दुःख सहते।।
पीड़ा है विषय-कषायों की, मृत्यु से भंयकर।
हो सहने में असमर्थ तड़फे, मूढ़ जन फँसकर।।
दोई भव नाशें, मोही व्यर्थ मोह भाव से।
प्रभु सम ही भाऊँ भावना, छूटूँ विभाव से।। 1।।

ऐसी शोभा से क्या जिसमें, निज-पर का पीड़न हो ।
ऐसी शादी से क्या जिसमें, दुःखमय भव बंधन हो ।।
स्वतंत्रता का हो हनन, आराधना का घात।
परिग्रह के ग्रहण में होते, अगणित दुखःमय उत्पात ।।
रहता है चंचल चित्त सदा, ही परिग्रहवान का।
विषयों में जो आसक्त उनके, नित ही मलिनता।।
सुख लेश भी पावे नहीं, अज्ञानभाव से ।।प्रभु…।। 2।।

पापों के बीज इन्द्रिय-सुख, तो दुःखमय ही अरे।
परलक्षी इन्द्रिय-ज्ञान भी, अज्ञान जान रे।।
अतीन्द्रिय सुख ही सुख, जो पाते हैं जितेन्द्रिय।
वे ही शिवसाधक हों, जिन्हें हो ज्ञान अतीन्द्रिय ।।
अतीन्द्रिय ज्ञानानंदमय, शुद्धातम ही है सार।
है सहज ज्ञेय-ध्येय रूप, मुक्ति का आधार ।।
शुद्धात्मा प्रभु नित्य निरंजन स्वभाव से ।। प्रभु.. ।। 3 ।।

तृप्ति सहज ही प्राप्य निज में, निज से ही सदा।
है झूठी कल्पना भोगों से, तृप्ति न कदा ।।
रहते अतृप्त, मूढ़ आत्मज्ञान के बिना।
कितने भव यूँ ही बीत जावें संयम के बिना।।
होते हैं हास्य पात्र जो ले दीप भी गिरते।
पाकर भी आत्मज्ञान फिर जग-जाल में फँसते ।।
कल्याण का अवसर गँवावे, मूढ़ भाव से ।।
प्रभु-सम ही भाऊँ भावना, छूटूं विभाव से।। 4।।

संयममय जीवन ही अहो, ज्ञानी को शोभता ।
बढ़ती प्रभावना सहज, होती है पूज्यता ।।
जो त्यागने के योग्य ही, फिर क्यों करूँ स्वीकार।
इससे अधिक क्या कायरता, नरभव की जिसमें हार ।।
क्षण भी विलम्ब योग्य नहीं, कल्याणमार्ग में।
निरपेक्ष हो बढ़ना मुझे, अब मुक्तिमार्ग में।।
निर्ग्रन्थ हो आराधू निज पद सहजभाव से।।।। प्रभु..।।5।।

तोड़े कंगन के बंधन, सिर का मौर उतारा।
धनि-धनि प्रभुवर का भाव, जिससे काम था हारा।।
जिन-भावना भाते हुए, गिरनार चल दिए।
आसन्नभव्य दीक्षा लेने साथ चल दिए।।
गूँजा था जय-जयकार उत्सव धर्ममय हुआ।
तपकल्याणक का शुभ नियोग देवों ने किया।।
साक्षात् दिगम्बर हुए, अत्यन्त चाव से ।। प्रभु.. ।। 6 ।।

ज्यों ही जाना यह हाल, राजुल हो गयी विह्वल।
होकर सचेत शीघ्र ही, जागृत किया निज बल।।
परिवारी जन तो रागवश, अति खिन्न चित्त थे।
शादी करें किसी और से, समझावते यों थे।।
बोली राजुल मत गालियाँ, मम शील को तुम दो।
सतवंती नारियों का केवल, एक पति ही हो।।
नाता जोड़ा मैंने अब केवल, ज्ञायकभाव से।।प्रभु..।।7।।

व्यवहार में भी भाव से, श्री नेमि स्वीकारे।
दर्शाकर श्रेयोमार्ग वे, गिरनार पधारे।।
उनका ही पावन मार्ग, अंगीकार है मुझे।
उनके द्वारा त्यागे भोगों, की चाह नहीं मुझे।।
आनंदित हो मोदन करो, मैं होऊँ आर्यिका।
छेदूँ स्त्रीलिंग नाशें, दुखमय बीज पाप का।।
धारूँ निवृत्तिमय दीक्षा अति हर्षभाव से।। प्रभु…।।8।।

मंगलमय ऐसे अवसर में, आँसू ना बहाओ।
परमानंदमय जिनमार्ग, कुछ विकल्प मत लाओ।।
आदर्श रूप नेमि प्रभु का अनुसरण करो।
परभावों से है भिन्न आतम अनुभवन करो।।
होता नहीं स्त्री-पुरुष व क्लीव आत्मा।
ध्रुव एक रूप ज्ञानमय है शुद्ध आत्मा।।
परमार्थ प्रतिक्रमण करो, सहज भाव से।
प्रभु सम ही भाऊँ भावना, छूटँ विभाव से।।9।।

कुछ मोहवश संकोचवश, भवि चूक ना जाना।
साधो परम उत्साह से, शंका नहीं लाना।।
उत्कृष्ट समयसार से, कुछ अन्य नहीं है।।
अनुभव प्रमाण स्वयं करो, धोखा नहीं है।।
शुद्धात्मा के ध्यान में, सब कर्म नशायें।
आत्मा बने परमात्मा गुण सर्व विलसायें ।।
अनुभूत-मग दर्शाया प्रभु, वीतरागभाव से ।। प्रभु.. ।। 10 ।।

सम्बोधन करके यों राजुल, गिरनार को गई।
वन्दन कर नेमिनाथ को, वह आर्यिका हुई ।।
नेमीश्वर तो मुक्ति गये, वह स्वर्ग को गई।
पावन गाथा वैराग्यमय, विख्यात है हुई ।।
प्रेरित करे भव्यों को, सम्यक् निवृत्ति मार्ग में।
मैं भी विचरूँ साक्षात् प्रभु निर्ग्रन्थ मार्ग में।।
ये सहज सफल हो, भावना अंतरंग भाव से ।। प्रभु… ।। 11 ।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह