श्री णमोकार मंत्र पूजन (कवि राजमल पवैया) | Shri Namokar Mantra Pujan (Rajmal Pavaiya)

श्री णमोकार मंत्र पूजन

ॐ णमो अरिहंताणं जप अरिहंतों का ध्यान करूँ ।

णमो सिद्धाणं जप कर सिद्धों का गुणगान करूँ ।।

ॐ णमो आयरियाणं जप आचार्यों को नमन करूँ ।
ॐ णमो उवज्झायाणं जप उपाध्याय को नमन करूँ ।।

णमो लोय सव्वसाहूणं जप सर्व साधुओं को वन्दन ।
णमोकार का महा मन्त्र जप मिथ्यातम को करूँ वमन ।।

ऐसो पंच णमोयारो सर्व पाप अवसान करूँ ।
सर्व मंगलों में पहिला मंगल पढ़ मंगलगान करूँ ।।
णमोकार का मन्त्र जपूँ मैं णमोकार का ध्यान करूँ ।
णमोकार की महाशक्ति से निज आतम कल्याण करूँ ।।

ॐ ह्रीं श्री पंच नमस्कारमन्त्र अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री पंच नमस्कारमन्त्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री पंच नमस्कारमन्त्र अत्र मम् सन्निहितो भव भव वषट् ।

ज्ञानावरणी कर्मनाश हित मिथ्यातम का करूँ अभाव ।
जन्म मरण दुख क्षयकर डालूँ प्राप्त करूँ निज शुद्धस्वभाव ।।
णमोकार का मन्त्र जपूँ मैं णमोकार का ध्यान करूँ ।
णमोकार की महाशक्ति से नाथ आत्म कल्याण करूँ ।।

ॐ ह्रीं श्री पंचनमस्कार मंत्राय ज्ञानावरणी कर्म विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।

दर्शनावरणी क्षय करने चिर अविरति का करूँ अभाव ।
यह संसार ताप क्षयकरने प्राप्त करूँ निज शुद्धस्वभाव ।।णमो.।।

ॐ ह्रीं श्री पंचनमस्कार मंत्राय दर्शनावरणी कर्म विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा ।

वेदनीय की पीड़ा हरने करलूँ पंच प्रमाद अभाव ।
अक्षयपद पानेको स्वामी प्राप्त करूँ निज शुद्धस्वभाव ।।णमो.।।

ॐ ह्रीं श्री पंचनमस्कार मंत्राय वेदनीयकर्मविनाशनाय अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।

मोहनीय का दर्प कुचलदूँ करलूँ पूर्ण कषाय अभाव ।
कामबाण की व्याधि मिटाऊँ प्राप्त करूँ निज शुद्धस्वभाव ।।
णमोकार का मन्त्र जपूँ मैं णमोकार का ध्यान करूँ ।
णमोकार की महाशक्ति से नाथ आत्म कल्याण करूँ ।।

ॐ ह्रीं श्री पंचनमस्कार मंत्राय मोहनीयकर्म विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।

आयुकर्म के सर्वनाश हित शीघ्र करूँ त्रय योग अभाव ।
क्षुधा व्याधि का नाश करूँ मैं प्राप्त करूँ निज शुद्धस्वभाव ।।णमो.।।

ॐ ह्रीं श्री पंचनमस्कार मंत्राय आयुकर्मविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

नाम कर्म का मूल मिटादूँ नष्ट करूँ में सर्व विभाव ।
भ्रम अज्ञान विनाश करूँ मैं प्राप्त करूँ निज शुद्धस्वभाव ।।णमो.।।

ॐ ह्रीं श्री पंचनमस्कार मंत्राय नामकर्मविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।

गोत्रकर्म को दग्ध करूँ मैं कर्म प्रकृति सब करूँ अभाव ।
अष्टकर्म विध्वंस करूँ मैं प्राप्त करूँ निज शुद्धस्वभाव ।।णमो.।।

ॐ ह्रीं श्री पंचनमस्कार मंत्राय गोत्रकर्मविनाशनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।

अन्तराय मूलोच्छेद कर सर्व बंध का करूँ अभाव ।
परममोक्ष फल पाऊँ स्वामी प्राप्त करूँ निज शुद्धस्वभाव ।।णमो.।।

ॐ ह्रीं श्री पंचनमस्कार मंत्राय अन्तरायकर्मविनाशनाय फलं निर्वपामीति स्वाहा ।

परमभेद विज्ञान प्राप्त कर करलूँ मैं संसार अभाव ।
पद अनर्घ पाने को स्वामी प्राप्त करूँ निज शुद्धस्वभाव ।।णमो.।।

ॐ ह्रीं श्री पंचनमस्कारमंत्राय अनर्घ पद प्राप्ताय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

जयमाला

णमोकार जिन मंत्र का जाप करूँ दिन रात ।
पाप पुण्य को नाश कर पाऊँ मोक्ष प्रभात ।।
छयालीस गुणधारी स्वामी नमस्कार अरिहन्तों को ।
अष्ट स्वगुणधारी अनन्तगुण मंडित बन्दूँ सिद्धों को ।।

हैं छत्तीस गुणों से भूषित नमस्कार आचार्यों को ।
हैं पच्चीस गुणों से शोभित नमस्कार उपाध्यायों को ।।
अट्ठाईस मूल गुणधारी नमस्कार सब मुनियों को ।

ॐ शब्द में गर्भित पाँचों परमेष्ठी प्रभु गुणियों को ।।

सर्व मंगलों में सर्वोत्तम सर्वश्रेष्ठ मंगल दाता ।
ह्रीं शब्द में गर्भित चौबीसों तीर्थंकर विख्याता ।।

णमोकार पैंतीस अक्षर का मन्त्र पवित्र ध्यान कर लूँ ।
यह नवकार मन्त्र अड़सठ अक्षर से युक्त ज्ञान कर लूँ ।।
‘‘अर्हत् सिद्धाचार्योपाध्याय सर्व साधु नमः’’ भज लूँ ।
सोलह अक्षर का यह पावन मंत्र जपूँ दुष्कृत तज लूँ ।।

छह अक्षर का मंत्र जपूँ ‘‘अरहंत सिद्ध’’ को नमन करूँ ।
‘‘अ सि आ उ सा’’ पंचाक्षर का मन्त्र जपूँ अघशमन करूँ ।।
अक्षर चार मंत्र जप लूँ ‘‘अरहंत’’ देव का ध्यान करूँ ।
‘‘अर्हम्’’ अक्षर तीन, मन्त्र जप स्व पर भेद विज्ञान करूँ ।।

दो अक्षर का ‘सिद्ध’’ मन्त्र जप सर्व सिद्धियाँ प्रकट करूँ ।
अक्षर एक ‘‘ॐ’’ ही जपकर सब पापों को विघट करूँ ।।
सप्ताक्षर का मन्त्र ‘‘णमो अरहंताणं’’ का मैं जाप करूँ ।
छह अक्षर का मन्त्र ‘‘णमो सिद्धाणं’’ जप भव ताप हरूँ ।।

सप्ताक्षर का मन्त्र ‘‘णमो आइरियाणं’’ जप हर्षाऊँ ।
सप्ताक्षर का ‘‘णमो उवज्झायाणं’’ जप कर मुस्काऊँ ।।
नौ अक्षर का मंत्र ‘‘णमो लोए सव्वसाहूणं’’ ध्याऊँ ।
‘‘ऐसो पंच णमोयारो’’ जप सर्व पाप हर सुख पाऊँ ।।

नव पद या नवकार पाँच पद का मैं णमोकार ध्याऊँ ।
एक शतक सत्ताईस अक्षर का चत्तारि पाऊँ गाऊँ ।।
‘‘चत्तारि मंगलम्’’ श्रेष्ठ मंगल है जग में परम प्रधान ।
‘‘अरिहंता मंगलम्’’ पाठ कर गाऊँ निज आतम के गान ।।

‘‘सिद्धा मंगलम्’’ ‘‘साहू मंगलम्’’ का मैं भाव हृदय भरलूँ ।
‘‘केवली पण्णत्तों धम्मो मंगलम्’’ स्वधर्म प्राप्त करलूँ ।।
‘‘चत्तारि लोगोत्तमा’’ ही सर्वोत्तम है परम शरण ।
‘‘अरिहंता लोगोत्तमा’’ ही से होगा भव कष्ट हरण ।।

‘‘सिद्धा लोगोत्तमा’’ सु ‘‘साहु लोगोत्तमा’’ परम पावन ।
‘‘केवली पण्णतो धम्मो लोगोत्तमा’’ मोक्ष साधन ।।
‘‘चत्तारि शरणं पव्वज्जामि’’ का गूंजे जय जय गान ।
‘‘अरिहंतेशरणं पव्वज्जामि’’ का हो प्रभु लक्ष्य महान् ।।

‘‘सिद्धेशरणं पव्वज्जामि’’ मोक्ष सिद्ध को मैं पाऊँ ।
‘‘साहुशरणं पव्वज्जामि’’ शुद्ध भावना ही भाऊँ ।।
‘‘केवली पण्णत्तो धम्मो शरणं पव्वजामि’’ है ध्येय ।
महामोक्ष मंगल शिवदाता पाँचों परमेष्ठी प्रभु श्रेय ।।

महामन्त्र निःकाक्षित होकर शुद्ध भाव से नित ध्याऊँ ।
पंच परम परमेष्ठी का सम्यक् स्वरूप उर में लाऊँ ।।
णमों कार का मंत्र जपूं मैं णमोकार का ध्यान करूँ ।
महामन्त्र की महाशक्ति पा नाथ आत्म कल्याण करूँ ।।

अर्हं अर्हं अर्हं जपकर निज शुद्धातम करलूँ भान ।
नमः सर्व सिद्धेभ्यः जपकर मोक्ष मार्ग मे करूँ प्रयाण ।।

ॐ ह्रीं श्री पंचनमस्कारमंत्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

णमोकार के मन्त्र की महिमा अगम अपार ।
भाव सहित जो ध्यावते हो जाते भव पार ।।

।।पुष्पांजलिम् क्षिपेत्।।

जाप्य मंत्र :- ॐ ह्रीं श्री णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं,
णमो उवज्झायाणं, णमो लोएसव्वसाहूणं ।


Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ २६१ से २६४