श्री नमिनाथ जिन पूजन (कवि राजमल पवैया) | Shri Naminath Jin Pujan (Rajmal Pavaiya)

श्री नमिनाथ जिन पूजन

जय नमिनाथ निरायुध निर्गत निष्कषाय निर्भय निर्द्वंद ।
निष्कलंक निश्चल निष्कामी नित्य नमस्कृत नित्यानंद ।।
मिथ्यातम अविरति प्रमाद कषाय योग बंध कर नाश ।
कर्म प्रकृतियाँ पूर्ण नष्टकर लिया सूर्य शुद्धात्म प्रकाश ।।
मैं चौरासी के चक्कर में पड चहुँगति भरमाया हूँ ।
भव का चक्र मिटाने को मैं पूजन करने आया हूँ ।।
यह विचित्र संसार और इसकी माया का करूँ अभाव ।
आत्म ज्ञान की दिव्य प्रभा से हे प्रभु पाऊँ शुद्ध स्वभाव ।।
भाव शुभाशुभ रहित हृदय को गहन शान्ति होती है प्राप्त ।
निर्मलता बढती जाती है हो जाता उर सुख से व्याप्त ।।

ॐ ह्रीं श्री नमिनाथ जिनेन्द्र अत्र अवतर अवतर संवौष्ट्, ॐ ह्रीं श्री नमिनाथ जिनेन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ , ॐ ह्रीं श्री नमिनाथ जिनेन्द्र अत्र मम सन्निहितो भव भव ।

निज की उज्ज्वलता का मुझे कुछ ज्ञान नहीं ।
इस जन्म मरण के रोग की पहचान नहीं ।।
नमिनाथ जिनेन्द्र महान् त्रिभुवन के स्वामी ।
दो मुझे भेद विज्ञान हे अन्तर्यामी ।।१।।

ॐ ह्रीं श्री नमिनाथ जिनेन्द्राय जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जल नि ।

निज की शीतलता का मुझे कुछ ध्यान नहीं ।
इस भव आतप के ताप की पहचान नहीं ।।नमिनाथजिनेन्द्र।।२ ।।

ॐ ह्रीं श्री नमिनाथ जिनेंद्राय संसारताप विनाशनाय चंदन नि ।

निज की अखंडता का मुझे प्रभु भान नहीं ।
अक्षय पद की भी तो मुझे पहचान नहीं ।।नमिनाथजिनेन्द्र।।३ ।।

ॐ ह्रीं श्री नमिनाथ जिनेंद्राय अक्षयपद प्राप्ताय अक्षत नि

निज शील स्वभावी द्रव्य का भी ज्ञान नहीं ।
इस काम व्याधि विकराल की पहचान नहीं ।।नमिनाथजिनेन्द्र।।४ ।।

ॐ ह्रीं श्री नमिनाथ जिनेंद्राय कामवाण विध्वंसनाय पुष्प नि ।

निज आत्मतत्त्व परिपूर्ण का भी ध्यान नहीं ।
इस क्षुधारोग दुखपूर्ण की पहचान नहीं ।।नमिनाथजिनेन्द्र।।५ ।।

ॐ ह्रीं श्री नमिनाथ जिनेंद्राय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्य नि ।

निज ज्ञान प्रकाशक सूर्य का भी ज्ञान नहीं ।
मिथ्यात्व मोह के व्योम की पहचान नहीं ।।नमिनाथजिनेन्द्र।।६ ।।

ॐ ह्रीं श्री नमिनाथ जिनेंद्राय मोहान्धकार विनाशनाय दीप नि ।

निर्दोष निरंजन रूप का भी भान नहीं ।
यह कर्म कलंक अनादि की पहचान नहीं ।।नमिनाथजिनेन्द्र।।७ ।।

ॐ ह्रीं श्री नमिनाथ जिनेंद्राय अष्टकर्म विध्वंसनाय धूप नि ।

निज अनुभव मोक्षस्वरूप का प्रभु ध्यान नहीं ।
निज द्रव्य अनादि अनंत की पहचान नहीं ।।नमिनाथजिनेन्द्र।।८ ।।

ॐ ह्रीं श्री नमिनाथ जिनेंद्राय महा मोक्षफल प्राप्ताय फल नि ।

जो चलता है वह समीप है जो न चला वह तो है दूर ।
आत्मा के साक्षात्कार की विधि है ज्ञान कला भरपूर ।।
निज चिदानन्द चैतन्य पद का ज्ञान नहीं ।
अकलंक अडोल अनर्घ की पहचान नहीं ।।नमिनाथजिनेन्द्र।।९ ।।

ॐ ह्रीं श्री नमिनाथ जिनेंद्रायअनर्घपद प्राप्तायअर्घ्य नि ।

श्री पंचकल्याणक

हुआ आगमन मात महादेवी उर में अपराजित त्याग ।
स्वप्नफलों को जानजगा नृप विजयराज को अतिअनुराग ।।
आश्विन कृष्णा द्वितीया के दिन हुआ गर्भ मंगल विख्यात ।
जय नमि जिनवर रत्न वृष्टि से होता नित आनन्दप्रभात ।।१।।

ॐ ह्रीं श्री आश्विन कृष्णद्वितीयागर्भमंगलप्राप्ताय श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य नि ।

चार प्रकार सुरों के गृह में आनन्द वाद्य हुए झंकृत ।
सिंहासन हिल उठा इन्द्र का तीनों लोक हुए क्षोभित ।।
नमिजिन जन्म पुरीमिथिला में जान हुए सुरगण पुलकित ।
शुभ अषाढ कृष्ण दशमी को जिन अभिषेक किया हर्षित ।।२।।

ॐ ह्रीं श्री अषाढकृष्णदशम्याजन्ममंगलप्राप्ताय श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य नि

शुभ आषाढ कृष्ण दशमी को नमिजिन उर वैराग्य जगा ।
उल्कापात देखकर प्रभु के मन से भव का राग भगा ।।
लौकान्तिक ने अभिनन्दनकर प्रभु का जय जयकार किया ।
वन जा मौलश्री तरु नीचे संयम अंगीकार किया ।।३।।

ॐ ह्रीं श्री अषाढ कृष्ण दशम्याया तपोमंगलप्राप्ताय श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं नि

मगसिर सुदि एकादशी प्रभु ने शुक्ल ध्यानध्याया ।
वीतराग सर्वज्ञ हुए प्रभु केवल ज्ञान पूर्ण पाया ।।
समवशरण में सतरह गणधरप्रमुख सुप्रभ गणधर गुणवान ।
मुख्यार्यिका मार्गिणी, नमिजिनवर का सब गाते जयगान ।।४।।

ॐ ह्रीं श्री मगसिरसुदीएकादशी दिने ज्ञानमंगलप्राप्ताय श्री नमिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य नि

चतुर्दशी वैशाख कृष्ण की धारा प्रतिमायोग महान् ।
सर्व कर्म क्षयकर नमिजिन ने पाया मोक्ष स्वपद निर्माण ।।
धर्मात्मा को जग में अपना केवल शुद्धातम प्रिय है ।
निज स्वभाव ही उपादेय है और सभी कुछ अप्रिय है ।।
गिरि सम्मेदशिखर पर गूँजा इन्द्रादिकं सुर का जयकार ।
कूट मित्रधर से पद पाया अविनाशी अनन्त अविकार ।।५।।

ॐ ह्रीं श्री वैशाखकृष्णचतुर्दश्या मोक्षमंगलप्राप्ताय श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं नि ।

जयमाला

इक्कीसवें तीर्थंकर नमिनाथ देव हैं आप महान् ।
मतिश्रुत अवधिज्ञान के धारीजन्मे जय जय दयानिधान ।।१।।

गृह परिवार राज्य सुख से वैगग्य जगा अंतस्तल में ।
शुद्ध भावना द्वादश भा सब कुछ त्यागा प्रभु दो पल में ।।२।।

वस्त्राभूषण त्याग आपने पंचमुष्टि कचलोच किया ।
उन केशों को क्षीरोदधि में सुरपति ने जा क्षेप दिया ।।३।।

नगर वीरपुर दत्तराज नृप ने प्रभु को आहार दिया ।
प्रभु कर में पयधारा दे सारा पातक संहार किया ।।४।।

ज्ञान मनपर्यय को पाया प्रभु छद्मस्थ रहे नवमास ।
केवलज्ञान लब्धि को पाया शुक्ल ध्यानधर कियाविकास ।।५।।

दे उपदेश भव्य जीवों को मोक्षमार्ग प्रभु दिख लाया ।
शेष अघाति कर्म भी नाशे सिद्ध स्वपद को प्रगटाया ।।६।।

यह संसार भ्रमण का चक्कर सदासदा है अतिदुखदाय ।
अशुभ कर्म परिणामों में ही मिलती है नारक पर्याय ।।७।।

किंचित शुभ मिश्रित माया परिणामों से होता तिर्यन्च ।
शुभपरिणामों से सुर होता उसमें भी सुख कहीं न रंच ।।८।।

मिश्र शुभाशुभ परिणामों से होती है मनुष्य पर्याय ।
शुद्ध आत्म परिणामों से होती है प्रकट सिद्ध पर्याय ।।९।।

मैं अपने परिणाम सुधारूँ पंच महाव्रत ग्रहण करूँ ।
उग्रतपस्या संवरमय कर कर्म निर्जरा शीघ्र करूँ ।।१०।।

धर्म ध्यान चारों प्रकार का अन्तर में प्रत्यक्ष धरूँ ।
चौसठ ऋद्धि सहजमिल जाती किन्तु न उनका लक्ष्यकरूँ ।।११।।

इन्द्रिय सुख दुखमयी जानकर चलो अतीन्द्रिय सुख के देश ।
पूर्ण अतीन्द्रिय शुद्ध आत्मा के भीतर अब करो प्रवेश ।।
बुद्धि ऋद्धि अष्टादश होतीं क्रिया ऋद्धि नव मिल जाती ।
ऋद्धि विक्रिया ग्यारह होती तीन ऋद्धि बल की आती ।।१२।।

सात ऋद्धियाँ-तप की मिलती अष्टऋद्धि औषधिहोती ।
छहरस क्रिद्धि शीघ्र मिल जातीं दो अक्षीण क्रिद्धि होती ।।१३।।

क्रिद्धि सिद्धियों में ना अटकूँ शुक्लध्यानमय ध्यान धरूँ ।
दोष अठारह रहित बनूँ मैं चार घाति अवसान करूँ ।।१४।।

पा नव केवल लब्धि रमा प्रभु वीतराग अरहन्त बनूँ ।
बनूँ पूर्ण सर्वज्ञत्व मैं मुक्तिकन्त भगवंत बनूँ ।।१५।।

यही विनय है यही भावना यही लक्षय है अब मेरा ।
निज सिद्धत्वरुप प्रगटाऊँगा जो है त्रिकाल मेरा ।।१६।।

ॐ ह्रीं श्री नमिनाथ जिनेन्द्राय पूर्णार्घ्यं नि स्वाहा ।

उत्पलनील कमल शोभित हैं चरणचिह नमिनाथ ललाम ।
निज स्वभाव का जो आश्रय लेते वे पाते शिव सुखधाम ।।

इत्याशीर्वाद

जाप्यमंत्र - ॐ ह्रीं श्री नमिनाथ जिनेन्द्राय नम ।


Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), पृष्ठ २५४ से २५८