श्री नमिनाथ जिन पूजन
रचयिता: राजेश कासलीवाल, उज्जैन
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॥ श्री नमिनाथ जिन पूजन ॥
रचियता - राजेश कासलीवाल, उज्जैन
स्थापना
(छंद रोला)
सम्यक रत्नत्रय धर भायी षोडश भावन ।
सर्व हितंकर पाया पद तीर्थंकर पावन ।
धर्म देशना धर्म चक्र का किया प्रवर्तन ।
हुआ अहो जयवंत जगत में श्री जिन शासन ।
(दोहा)
नमि जिन चरणन में नमि, करूँ विनय आव्हान ।
प्रभुवर मम सन्निकट रहो, हृदय विराजो आन ।
ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् इत्याह्नाननम् ।
ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः इति स्थापनम् ।
ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम् परि पुष्पांजलि क्षिपेत ।
(छंद पद्धरि)
जड़ चेतन भेद न जान प्रभो, तुमसे भी मैं अनजान विभो ।
गति चार चौरासी के चक्कर में, जन्म-मरण दुख भार भंवर में ।
फंसा हुआ प्रभु पार निकालो, भव दुख संकट को अब टालो ।
क्षीरोदधि जल से प्रभु अर्चन, नमि जिन चरणों का नित चर्चन ।
ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
तुम शांत निराकुल शीतल हो, निर्द्वंद्व निरामय निश्चल हो ।
मैं दुष्ट कषायों वश होकर, हूँ तपित भवातप से जिनवर ।
दुख ताप प्रभु अनिवार हरो, संवर की शीत बयार करो ।
चंदन से प्रभुवर है अर्चन, नमि जिन चरणों का नित चर्चन ।
ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
यह देह क्षणिक संयोग क्षणिक, परभाव क्षणिक विश्वास क्षणिक ।
खंडित यह सारे हो जाते, सपने सारे ही खो जाते ।
तुम अक्षय पद परिणति धरते, शरणागत की क्षतियां हरते ।
अक्षत से प्रभुवर है अर्चन, नमि जिन चरणों का नित चर्चन ।
ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय-अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
कृतकृत्य प्रभो निष्काम प्रभो, ऋजुभाव सहज परिणाम विभो ।
सुरभित चिद्पुष्पित केसर से, मैं पीड़ित रतिपति के शर से ।
प्रभु ब्रह्म भाव में रमण करो, मम अंतर छल-बल शमन करो ।
दिवसुमनों से करता अर्चन, नमि जिन चरणों का नित चर्चन ।
ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
परिणति में तुम परिपूर्ण प्रभो, क्षुत् तृष्णा को कर चूर्ण विभो ।
अन्तर अमिरस का पान करो, परितृप्त अनिच्छुक नाम धरो ।
मैं व्याकुल इच्छा ज्वाला से, हो शांत तुम्ही गुणमाला से ।
षटरस व्यंजन से है अर्चन, नमि जिन चरणों का नित चर्चन ।
ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
तुम लोकालोक प्रकाशक हो, तुम निज-पर के प्रतिभासक हो ।
तुम निज में ही थिर हो प्रभुवर, मैं अज्ञ तमा वश डगर-डगर ।
तम नाश करो मम अन्तर का, भ्रम नाश करो निज का पर का ।
दीपक से जिनवर का अर्चन, नमि जिन चरणों का नित चर्चन ।
ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
पर की ममता पर का करता, भोक्ता पर का पर का हरता ।
ये दूषित वृत्ति है चेतन की, ना रज कर्मों की ना तन की ।
परिशुद्ध ध्यान वन्हि से होकर, परिणति तेरी सुरभित जिनवर ।
मैं धूप लिये करता अर्चन, नमि जिन चरणों का नित चर्चन ।
ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय-अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
निज साधन से शिवफल पायो, तुमने जिन सुख अविचल पायो ।
मैंने जल मथ नवनीत चहा, जल व्यर्थ गया नवनीत कहां ।
तुम भले मिले प्रभु सुखसागर, दिखलाते हो शिवसौख्य डगर ।
अतएव फलों से है अर्चन, नमि जिन चरणों का नित चर्चन ।
ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
चिद् वैभव तेरा लख प्रभुवर, निज बोध मुझे हो हे जिनवर ।
जिस विधि परिणति में तुम पाए, रत्नत्रय कलियां खिल जाए ।
हो पूर्ण शुद्ध परिणाम प्रभो, पाऊं तुम सम शिवधाम विभो ।
है अर्घ्य समर्पण कर अर्चन, नमि जिन चरणों का नित चर्चन ।
ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय-अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पंचकल्याणक अर्घ्य
(छंद - धत्तानंद)
तीर्थंकर वंदें नित अभिनंदें, पद अरविंदे शीश धरें ।
पांचों कल्याणक समकित दायक, मोद बधायक भक्ति करें ।
पुष्पांजलि क्षिपेत्।
(छंद चौपाई)
अश्विन कृष्ण दूज नमि आए, मां वप्रा सुपने लख धाए ।
नभ से दिव्य रतन थे बरसे, मिथिलापुर में जन-मन हरषे ।
ॐ ह्रीं आश्विनकृष्णा द्वितीयां गर्भमंगलमण्डिताय श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दशमी कृष्ण षाढ़ नमि जन्मे, हर्ष हुआ था सब त्रिभुवन में ।
सुर सुमेरु पर नव्हन कराया, तांडव रच बहु हर्ष मनाया ।
ॐ ह्रीं आषाढ़कृष्णा दशम्यां जन्ममंगलमण्डिताय श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जन्मदिवस सब वसन उतारे, मुनि बन मौन महाव्रत धारे ।
निज में थिरता प्रचुर सुहाई, लौकांतिक अनुमोद कराई ।
ॐ ह्रीं आषाढ़कृष्णा दशम्यां तपोमंगलमण्डिताय श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
चार घातिया करम निवारे, नंत चतुष्टय निज गुण धारे ।
समवसरण में अमि बरसाया, मगसिर सित ग्यारस मन भाया ।
ॐ ह्रीं मार्गशीर्षशुक्लैकादश्यां ज्ञानमंगलमण्डिताय श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
वदि वैशाख चतुर्दशी आई, नमि तन तज पंचम गति पाई ।
परिणति ज्यों आतम अविकारा, कूट मित्रधर शिखर पहारा ।
ॐ ह्रीं वैशाखकृष्णा चतुर्दश्यां मोक्षमंगलमण्डिताय श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
(दोहा)
श्री जिन तीर्थ नमि नमूं, गाऊं गुण मणिमाल ।
उपदेशा जो तत्व तुम, ग्रहूं चरण नत भाल ।
(छंद हरिगीत)
देवाधिदेव जिनेश नमि प्रभु वंदना शतबार है ।
रागादि भाव विकार वर्जन कर हुए भवपार है ।
निजभाव में ही रत सदा तुम सर्वज्ञाता हो प्रभो ।
कर्ता नही हर्ता नही पर तुम विधाता हो विभो ।
दातार नही तुम पर दरश आनंद अमिरस भर रहा ।
तेरा विमल उपदेश हे जिन ! धन्य भवि को कर रहा ।
संसार का हो नाश कैसे जीव भवसागर तरे ।
इस विश्व वस्तु तत्व में है क्या प्रयोजन भूत रे ।
तुम जानते सब वस्तु को धर्मों सहित इक समय में ।
छद्मस्थ प्रज्ञा अरु कथन में भेद पड़ता विषय में ।
तव स्याद्वादी वचन में वस्तु अनेकान्ती कही ।
निर्बाध युक्ति वचन-प्रज्ञा में टिके भ्रान्ति नही ।
जल उष्णता के काल में भी धरे शीतल भाव है ।
क्रोधादि परिणमता भले हो जीव ज्ञानस्वभाव है ।
चलता हुआ भी चक्र रे ! कुम्हार का थिर है यथा ।
उत्पाद व्यय के संग ध्रुवता है अटल वस्तु कथा ।
सत्-असत् नित्य-अनित्य एक -अनेक तत् अरु अतत् को ।
कहकर कथंचित् कथन में सब प्रकट करते अकथ को ।
नय से प्रमाणों से तथा निक्षेप से सब सिद्ध है ।
जिनवर अबाधित देशना तिहुंलोक-काल प्रसिद्ध है ।
उपदेश करते भी प्रभो तुम मौन से संयुक्त थे ।
सकल भी तुम निकल थे संसार में भी मुक्त थे ।
तन से रहित तुम देव तन तज पंचमगति में कर गमन ।
लोकांत पर हो थिर सदा नमिनाथ चरणों में नमन ।
(छंद धत्तानंद)
तीर्थंकर प्रभुवर हितकर दुखहर, भवतर शिवकर सुहित विभो ।
तुमको नित ध्यावें तुम गुण गावें, शिवसुख पावें शीघ्र प्रभो ।
ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय-अनर्घ्यपदप्राप्तये जयमाला पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
नमिनाथ गुणगान कर, निज गुण करे मिलान ।
प्रभुवर पथ पर गमन करें, पावें शिवपुर थान ।
पुष्पांजलि क्षिपेत्।
मूल दस्तावेज़ (PDF):
- Shri_Naminath_Jin_Pujan_Rajesh_Kasliwal.pdf (0.2 MB, 5 पृष्ठ)
स्रोत: Jain Granth E Library (Telegram), t.me/jainegranth/60391।