श्री नैनागिरि जी सिद्ध क्षेत्र पूजन
(वीर छंद)
नैनागिरिजी सिद्ध क्षेत्र से, वरदत्तादि पंच ऋषिराज ।
मुक्त हुये प्रभु समश्रेणी में, सिद्ध शिला पर रहे विराज ॥
भेद ज्ञान का महामंत्र ले, आत्म ध्यान धर मुक्त हुये ।
पंचपरावर्तन परिभ्रम तज, पंचमगति से युक्त हुये ॥
पार्श्व प्रभु का समवशरण भी, इसी भूमि पर आया था।
धन्य - धन्य वे धर्मी श्रावक, जिनने लाभ उठाया था ।।
स्वयं सिद्ध सब जीव जिनेश्वर, शुद्ध बुद्ध प्रभु आतमराम ।
ऐसा बोध दिया भविजन को, कोटि-कोटि मैं करूँ प्रणाम ॥
(दोहा)
रेशंदीगिरि तीर्थ कहूँ, या नैनागिरि तीर्थ ।
ज्ञान-नैन मेरे खुले, प्रभु जी दो आशीष ।।
ॐ ह्रीं श्री नैनागिरिसिद्धक्षेत्रे वरदत्तादिपंचऋषिवराः सहित श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्र ! अत्र अवतर
अवतर संवौषट् । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।
(मानव छंद)
चैतन्य मग्न मुद्रा लख, चैतन्य रसिक बन जाऊँ ।
प्रभु देह-दृष्टि भव वर्धक, वो भूल न अब दुहराऊँ ।।
श्री पार्श्वनाथ जिन वन्दूँ, वरदत्तादि मुनि ध्याऊँ ।
नैनागिरि तीरथ वन्दूँ, निर्मल जल चरण चढ़ाऊँ ॥
ॐ ह्रीं श्री नैनागिरिसिद्धक्षेत्रे वरदत्तादि पंच ऋषिराजेभ्योसहित श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय
जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
चैतन्य भाव भवनाशी, ध्वनि सुनी तत्त्व पहचाना ।
पंचेन्द्रिय विषयों में तो, भव-ताप सहे दुख नाना ।।
श्री पार्श्वनाथ जिन वन्दूं, वरदत्तादि मुनि ध्याऊँ ।
नैनागिरि तीरथ वन्दूं, चंदन चरणाग्र चढ़ाऊँ ।।
ॐ ह्रीं श्री नैनागिरिसिद्धक्षेत्रे वरदत्तादि पंच ऋषिराजेभ्यो सहित श्री पार्श्वनाथ
जिनेन्द्राय भवाताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।
संयोग सभी क्षणभंगुर, चैतन्य भाव अविनाशी ।
कभी हुआ स्वर्ग का वासी, पर मिली न शांति जरा सी ॥
श्री पार्श्वनाथ जिन वन्दूँ, वरदत्तादि मुनि ध्याऊँ ।
नैनागिरि तीरथ वन्दूँ, अक्षत चरणाग्र चढ़ाऊँ ।।
ॐ ह्रीं श्री नैनागिरिसिद्धक्षेत्रे वरदत्तादि पंच ऋषिराजेभ्यो सहित श्री पार्श्वनाथ
जिनेन्द्राय अक्षय पद प्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।
विषयों की चिर अभिलाषा, किसकी कब पूर्ति हुई है ?
संस्कार बिना की सुविधा, में मिलती शांति नहीं है ।।
श्री पार्श्वनाथ जिन वन्दूँ, वरदत्तादि मुनि ध्याऊँ ।
नैनागिरि तीरथ वन्दूँ, श्रद्धा से सुमन चढ़ाऊँ ।।
ॐ ह्रीं श्री नैनागिरिसिद्धक्षेत्रे वरदत्तादि पंच ऋषिराजेभ्यो सहित श्री पार्श्वनाथ
जिनेन्द्राय कामबाण विध्वंशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
यह क्षुधा-वेदनी नागिन, कभी तृप्त नहीं दिखती है।
कभी तृष्णा-खाई भरी क्या, तृप्ति तो अंदर ही है ।।
श्री पार्श्वनाथ जिन वन्दूँ, वरदत्तादि मुनि ध्याऊँ ।
नैनागिरि तीरथ वन्दूँ, नेवज चरणाग्र चढ़ाऊँ ।।
ॐ ह्रीं श्री नैनागिरिसिद्धक्षेत्रे वरदत्तादि पंच ऋषिराजेभ्यो सहित श्री पार्श्वनाथ
जिनेन्द्राय क्षुधा रोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
हूँ ज्ञान मात्र ध्रुव ज्ञायक, जड़ देहादि से न्यारा ।
यह ज्ञानकला जब जागे, पा जाऊँजगत् किनारा ।।
श्री पार्श्वनाथ जिन वन्दूँ, वरदत्तादि मुनि ध्याऊँ ।
नैनागिरि तीरथ वन्दूँ, चरणों में दीप चढ़ाऊँ ।।
ॐ ह्रीं श्री नैनागिरिसिद्धक्षेत्रे वरदत्तादि पंच ऋषिराजेभ्यो सहित श्री पार्श्वनाथ
जिनेन्द्राय मोहांधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
कर्मों के बंधन बांधे, हँस-हँस कर कर्म कमाये ।
अब करूँ ज्ञान संचेतन, जिनध्वनि सुन साहस आये ॥
श्री पार्श्वनाथ जिन वन्दूँ, वरदत्तादि मुनि ध्याऊँ ।
नैनागिरि तीरथ वन्दूँ, यह धूप दशांगी चढ़ाऊँ ।॥
ॐ ह्रीं श्री नैनागिरिसिद्धक्षेत्रे वरदत्तादि पंच ऋषिराजेभ्यो सहित श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय
अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
फल चारगती दुख पाये, सुख शांति कहीं न पाया ।
भव बंधन अब न चाहूँ, मुझे पंचम भाव लुभाया ॥
श्री पार्श्वनाथ जिन वन्दूँ, वरदत्तादि मुनि ध्याऊँ ।
नैनागिरि तीरथ वन्दूँ, निर्मल फल चरण चढ़ाऊँ ॥
ॐ ह्रीं श्री नैनागिरिसिद्धक्षेत्रे वरदत्तादि पंच ऋषिराजेभ्यो सहित श्री पार्श्वनाथ
जिनेन्द्राय मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
अब अर्घ्य चढ़ाऊँ ऐसा, जो पंचमगति पहुँचाये ।
सब सिद्धों के स्वर में स्वर, मेरा प्रभु अब मिल जाये ॥
श्री पार्श्वनाथ जिन वन्दूं, वरदत्तादि मुनि ध्याऊँ ।
नैनागिरि तीरथ वन्दूं, भावों से अर्घ्य चढ़ाऊँ ॥
ॐ ह्रीं श्री नैनागिरिसिद्धक्षेत्रे वरदत्तादि पंच ऋषिराजेभ्यो सहित श्री पार्श्वनाथ
जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
(दोहा)
ऋषि मुनि यति साधू नमूँ, पद धारूँ निग्रंथ ।
आतम परमातम लखूँ, चलूँ सहज शिवपंथ ॥
(वीर छंद)
सम श्रेणी में सिद्ध प्रभु जी, सिद्धालय में रहे विराज ।
उन सबको हम वंदन करते, हम भी पायें निज पद राज ॥
पार्श्वनाथ तीर्थंकर प्रभु का, समवशरण यहाँ आया था।
दिव्य ध्वनि भी यहीं खिरी थी, अमृत यहीं बहाया था ।।
श्री वरदत्तराय इन्द्रदत्त, श्री गुणदत्त अर सागरदत्त ।
यहीं आपकी हुई साधना, ज्ञान-ध्यान में हुये प्रमत्त ।।
भव तन भोगों से विरक्त हो, श्रेणी मांड हुये अरिहन्त ।
इसी भूमि से मुक्तिश्री पा, सिर पर राज रहे भगवन्त ॥
पर्वत पर पैंतीस जिनालय, अति सुंदर पावन अभिराम ।
सत्रह जिन मंदिर नीचे हैं, जिन प्रतिमायें दिव्य ललाम ।।
महावीर स्वामी जिन मंदिर, जल मंदिर कहलाता है ।
पावापुर निर्वाण क्षेत्र की, ये ही याद दिलाता है ।।
पार्श्वनाथ तीर्थंकर प्रतिमा, अन्तरमुखी विराज रही ।
खडगासन नव हाथ है उन्नत, हमसे है कुछ बोल रही ?
हे भविजन ! मालूम तुम्हें क्या ? तुम निगोद से आये हो।
नरकादिक चारों गतियों में, कष्ट अनन्ते पाये हो ।।
आज हुये सैनी जैनी तुम, मोह-नींद से जग जाओ ।
अपनी प्रभुता को पहचानो, और न अब तुम भरमाओ ।।
सभी जीव परमात्म स्वरूपी, सिद्ध समान स्वभाव महान् ।
शुद्धातम है नाम सभी का, मात्र जानना अपना काम ।।
राग-द्वेष सब भाव औपाधिक, ये सब आते-जाते हैं।
अपने ज्ञान-रूप दर्पण में, मात्र झलक दिखलाते हैं ।।
स्वपर प्रकाशक शक्ति हमारी, कभी न दूषित होती है।
रत्न समान स्फटिक मणि सम, ऐसी पावन ज्योति है ।।
भेदज्ञान का महामंत्र ही, सच्ची शांति दिलाता है ।
शत्रु-मित्र अब कोई न दिखता, ऐसा ज्ञान जगाता है ।।
विषय-कषायों से बचने प्रभु, सिद्ध क्षेत्र पर हम आये ।
आत्म साधना साधें ऐसी, मुक्ति श्री हम भी पायें ।।
नैनागिरि में नैन हमारे, तत्त्व ज्ञान से खुल जायें ।
जैसे सिद्ध प्रभू समतारस, पीते हम भी सुख पावें ॥
मुनियों जैसा जीवन होवे, ज्ञान ध्यान में मग्न रहूँ ।
महल, मसान मरन अर जीवन, कंचन काँच समान गिनूँ ॥
कीच कनक में भेद न मानूँ, सबमें समता भाव धरूँ ।
चक्रवर्ती इन्द्रादिक पद की, कभी कामना नहीं करूँ ।।
इस तन का प्रभु कौन भरोसा, आज रहे या कल जावे ।
परिणामों का भी न भरोसा, इन्द्रिय ज्ञान न संग जावे ।।
ज्ञान मात्र जीवन है मेरा, रोम - रोम में वश जावे ।
सपने में भी यही दिखावे, मोह - क्षोभ सब विनसावे ।।
सच्चा सिद्ध क्षेत्र शुद्धातम, ध्यानी इससे सिद्ध हुये ।
जिसको निज गौरव आ जावे, वही जगत् से मुक्त हुये ।।
नैनागिर नयनाभिराम यह, क्षेत्र पार्श्व प्रभु को वंदन ।
वरदत्तादि मुनीश हुये जो, सिद्ध हुये नित अभिनंदन ॥
ॐ ह्रीं श्री नैनागिरिसिद्धक्षेत्रे वरदत्तादि पंच ऋषिराजेभ्यो सहित श्री पार्श्वनाथ
जिनेन्द्राय जयमाला पूर्णार्थ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(दोहा)
ज्ञान-नैन पावन हुये, दर्शत श्री जिनराज ।
सिद्ध क्षेत्र में सिद्धि हो, पाऊँ सिद्ध समाज ॥
(पुष्पांजलिं क्षिपामि)
Artist: पं. राजेन्द्र कुमार जैन
स्रोत: जिनेन्द्र पूजन
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