श्री मुनिसुव्रतनाथ जिन पूजन (कवि राजमल पवैया) | Shri Munisuvratanath Jin Pujan (Rajmal Pavaiya)

श्री मुनिसुव्रतनाथ जिन पूजन

हे मुनिसुव्रत भगवान् तुमने कर्म घाति स्वयं हने ।
कैवल्यज्ञान प्रकाशकर पाया परम पद आपने ।।
निज पर विवेक जगा हृदय में पूर्ण शुद्धात्मा बने ।
संसार को सन्मार्ग दिखला सिद्ध परमात्मा बने ।।
भव सिंधु की मझधार में डूबा मुझे तारो प्रभो ।
दो भेद ज्ञान प्रकाश मुझको शीघ्र उद्धारो प्रभो ।।

ॐ ह्रीं श्री मुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्र अत्र अवतर अवतर संवौषट्, ॐ ह्रीं मुनिसुव्रतनाथ जिनेंद्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ , ॐ ह्रीं श्री मुनिसुव्रतनाथ जिनेंद्र अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।

अब आत्म जल की सलिल धारा शुद्ध अन्तर में धरूँ ।
यह जन्म मरण अभाव करके स्वपद अजरामर वरूँ ।।
मैं मुनिसुव्रत भगवान् का पूजन करूँ अर्चन करूँ ।
निज आत्मा में आपके ही रूप का दर्शन करूँ ।।१।।

ॐ ह्रीं श्री मुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जल नि

अब आत्म चन्दन दुख निकन्दन शुद्ध अन्तर में धरूँ ।
भव भ्रमण ताप अभाव करके स्वपद अजरामर वरूँ ।।मैं मुनि।।२ ।।

ॐ ह्रीं श्री मुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय संसारताप विनाशनाय चंदन नि ।

अब आत्म अक्षत धवल उज्ज्वल शुद्ध अन्तर में धरूँ ।
अक्षय अनंत स्वरूप पाकर स्वपद अजरामर वरूँ ।।मैं मुनि।।३ ।।

ॐ ह्रीं श्री मुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय अक्षयपद प्राप्ताय अक्षत नि

अब आत्म पुष्प सुवासशिवमय शुद्ध अन्तर में धरूँ ।
दुष्काम हर निष्काम बनकर स्वपद अजरामर वरूँ ।।मैं मुनि।।४ ।।

आत्म संस्थित होना ही है मानव जीवन का उद्देश्य ।
अनुसंधाता बनो सत्य के उसके भीतर करो प्रवेश । ।

ॐ ह्रीं श्री मुनिसुव्रतनाथ जिनेंद्राय कामबाण विध्वंसनाय पुष्प नि ।

अब आत्ममय नैवेद्य पावन शुद्ध अन्तर में धरूँ ।
यह क्षुधाव्याधि अभाव करके स्वपद अजरामर वरूँ ।।मैं मुनि।।५ ।।

ॐ ह्रीं श्री मुनिसुव्रतनाथ जिनेंद्राय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्य नि ।

अब आत्म दीपक ज्योति झिलमिल शुद्धअन्तर में धरूँ ।
मिथ्यात्वमोह अभाव करके स्वपद अजरामर वरूँ ।।मैं मुनि।।६ ।।

ॐ ह्रीं श्री मुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय मोहाधार विनाशनाय दीप नि ।

अब आत्म धूप अनूप अविकल शुद्ध अन्तर में धरूँ ।
घनघाति कर्म अभाव करके स्वपद अजरामर वरूँ ।।मैं मुनि।।७ ।।

ॐ ह्रीं श्री मुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय अष्टकर्म विध्वंसनाय धूप नि ।

निजआत्म की अनुभूति का फल शुद्ध अन्तर में धरूँ ।
सर्वोत्कृष्ट सुमोक्षफल ले स्वपद अजरामर वरूँ ।।मैं मुनि।।८ ।।

ॐ ह्रीं श्री मुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तय फल नि ।

वसु गुणमयी शुद्धात्मा का अर्घ अन्तर में धरूँ ।
सब परविभाव अभाव करके स्वपद अजरामर वरूँ ।।मैं मुनि।।९ ।।

ॐ ह्रीं श्री मुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय अनर्घपद प्राप्ताय अर्घ्य नि ।

श्री पंचकल्याणक

आनत स्वर्ग त्यागकर आए माता सोमा के उर में ।
श्रावण कृष्णा दूज हुआ गर्भोत्सव मंगल घर घर में ।।
छप्पन देवी माता की सेवा करती अंत पुर में ।
सुव्रतनाथ प्रभु बजी बधाई मधुर राजगृह के पुर में ।।१।।

ॐ ह्रीं श्री श्रावण कृष्ण द्वितीयायां गर्भमंगल प्राप्ताय श्री मुनिसव्रतनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्य नि

शुभ वैशाख कृष्ण दशमी को जन्ममहोत्सव हुआ महान् ।
नृपति सुमित्र हर्ष से पुलकित देते हैं मुँह माँगा दान ।।
सुरपति प्रभु को शीश विराजित कर पांडुकवन ले जाते ।
सुव्रतनाथ अभिषेक क्षीरसागर जल से कर हर्षाते ।।२।।

यदि अमरत्व प्राप्त करना है मृत्युन्जयी बनो सत्वर ।
इन्द्रिय निग्रह सहित मनोनिग्रह से लो पापों को हर ।।

ॐ बैशाख कृष्णदशाम्यां जन्म मंगल प्राप्ताय श्री मुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं नि

प्रभु बैशाख कृष्ण दशमी को भव भोगों से हुए विरक्त ।
यह संसार असार जानकर त्यागगृह परिवार समस्त ।।
स्वयंबुद्ध हो चंपकतरू के नीचे जिन दीक्षा धारी ।
नाथ मुनिसुव्रत व्रत के स्वामी साधुहो गए अनगारी ।।३।।

ॐ ह्रीं श्री बैशाख कृष्णदशम्यां तपोमंगल प्राप्ताय श्री मुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्य नि

ग्यारह मास रहे छद्मस्थ तपस्वी मौन, सुव्रत भगवान् ।
त्रेसठ कर्म प्रकृति क्षय करके प्रभु ने पाया केवलज्ञान ।।
गुगस्थान तेरहवाँ पाकर देव हुए सर्वज्ञ महान् ।
वैशाख कृष्णनवमी को गूँजा समवशरण में जयजयगान ।।४।।

ॐ ह्रीं श्री बैशाखवदी नवम्यां 'ज्ञानमंगल प्राप्ताय श्रीमनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्य नि

फाल्गुन कृष्ण द्वादशी को प्रभु गिरि सम्मेद पवित्र हुआ ।
मुनिसुव्रत निर्वाण महोत्सव सवलकूट सचित्र हुआ ।।
तन परमाणु उडे कपूरवत सब जग ने मंगल गाये ।
ऊर्ध्वलोक में गमन कर गए सिद्धशिला भी मुस्काए ।।५।।

ॐ ह्रीं श्री फाल्गुन कृष्ण द्वादश्यां मोक्षमंगल प्राप्ताय मुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्य नि

जयमाला

जय मुनिसुव्रत तीर्थंकर बीसवें जिनेश पूर्ण परमेश ।
महातात्विक महाधार्मिक महापूज्य मुनि महामहेश ।।१।।

राजगृही में गर्भ जन्म तप ज्ञात हुए चारों कल्याण ।
जय थल नभ में दशोदिशा में गूँजा प्रभु का जयजयगान ।।२।।

अष्टादश गणधर थे प्रभु के प्रमुख मल्लिगणधर विद्वान् ।
मुख्यार्यिका पुष्पदत्ता थी श्रोता अजितजय गुणवान ।।३।।

शौर्य प्रदर्शन करना है तो क्रोध त्याग कर हो जा शांत ।
विनय भाव से मान विजय कर ऋजुता से माया कर ध्वांत ।।
समवशरण में नाथ आपकी खिरी दिव्य ध्वनि कल्याणी ।
द्रव्यदृष्टि ही ज्ञानी हैं, पर्याय दृष्टि है अज्ञानी ।।४।।

गुण पर्यायों सहित द्रव्य है लक्षण जिसका शाश्वत सत् ।
द्रव्य ध्रौव्य उत्पाद व्यय सहित है स्वतंत्र सत्ता निश्चित ।।५।।

द्रव्य स्वतंत्र सदा अपने में कोई लेश नहीं परतंत्र ।
गुण स्वतन्त्र प्रत्येक द्रव्य के पर्यायें भी सदा स्वतंत्र ।।६।।

कोई नहीं परिणमाता, परिणमन शील है द्रव्य स्वयं ।
पर परिणमन कराने का जो भाव वही मिथ्यात्व स्वयं ।।७।।

अपनी अपनी मर्यादा, स्वचतुष्टय में है द्रव्य सभी ।
सदा परिणमित होते रहते बिना परिणमन नहीं कभी ।।८।।

जीव द्रव्य तो है अनन्त अरु पुद्गल द्रव्य अनन्तानन्त ।
धर्म अधर्म आकाश एक इक, काल असंख्य स्वमहिमावंत ।।९।।

है परिपूर्ण छहों द्रव्यों से पुरालोक अनादि अनंत ।
जो स्वद्रव्य का आश्रय लेता वही जीव होता भगवंत ।।१०।।

जीव समास मार्गणा चौदह चौदह गुणस्थान जानो ।
यह व्यवहार, जीव की सत्ता निश्चय से अतीत मानो ।।११।।

सभी जीव द्रव्यार्थिकनय से सदाशुद्ध हैं सिद्धसमान ।
पर्यायर्थिकनय से देखो तो है जग जीव अशुद्ध महान् ।।१२।।

आत्म द्रव्य है परमशुद्ध त्रैकालिक ध्रुव अनंतगुणवान ।
दर्शन ज्ञानवीर्य सुखगुण से पूरित है त्रिकाल भगवान् ।।१३।।

जो पर्यायों में उलझा है वही जीव है मूढअजान ।
द्रव्यदृष्टि ही निजस्वद्रव्य का आश्रय ले होता भगवान् ।।१४।।

अब तक प्रभु पर्यायदृष्टि रह मैंने जग में दुख पाया ।
द्रव्यदृष्टि बनने का स्वामी अब अपूर्व अवसर आया ।।१५।।

यह अवसर यदि चूका तो प्रभु पुन जगत् में भटकूँगा ।
भवसागर की भँवरों में ही दुख पाऊँगा अटकूँगा ।।१६।।

लोभ जीत संतोष शक्ति से तू फिर होगा कभी न क्लाँत ।
मोह क्षोभ के क्षय होते ही कर्मों का होगा प्राणांत ।।
मैं भी स्वामी द्रव्यदृष्टि बन निजस्वभाव को प्रगटाऊँ ।
अष्टकर्म अरि पर जयपाकर सादिअनंत स्वपद पाऊँ ।।१७।।

मैं अनादि मिथ्यात्व पापहर द्रव्यदृष्टि बन करूँ प्रकाश ।
ध्रुव ध्रुव ध्रुव चैतन्यद्रव्य मैं, परभावों का करूँ विनाश ।।१८।।

पर्यायों से दृष्टि हटाकर निज स्वभाव में आ जाऊँ ।
तुम चरणों की पूजन का फल द्रव्यदृष्टि अब बन जाऊँ ।।१९।।

महापुण्य संयोग मिला तो शरण आपकी आया हूँ ।
मैं अनादि से पर्यायों में मूढ बना भरमाया हूँ ।।२०।।

पाप ताप सन्ताप नष्ट हो मेरे हे मुनिसुव्रतनाथ ।
तुम चरणों की महाकृपा आशीर्वाद से बनूँ सनाथ ।।२१।।

संकटहरण मुनिसुव्रत स्वामी मेरे संकट दूर करो ।
द्रव्यदृष्टि दो प्रभु मेरी पर्याय दृष्टि चकचूर करो ।।२२।।

ॐ ह्रीं श्री मुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय पूर्णार्घ्यं नि ।

कछुवा चिह्न सुशोभित मुनिसुव्रतके चरणाम्बुज उरधार ।
भाव सहित जो पूजन करते वे हो जाते हैं भवपार ।।

इत्याशीर्वाद

जाप्यमंत्र -ॐ ह्रीं श्री मुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय नम


Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), पृष्ठ २५० से २५४