श्री मुनिराज पूजन
(स्थापना)
(भुजंगप्रयात)
समता के सागर, गुरुवर हमारे ।
संसार-सागर, से अगणित उबारे ।।
शुद्धात्म सेवी, हे सन्मति प्रदाता ।
हमको भी तारो न हम आये द्वारे ।।
विषयों की भाषा भी, जिनको न भाती ।
बस आत्म - आराधना ही सुहाती ।।
आचार्य उवज्झाय साधू दिगम्बर ।
सबको है वंदन, अगणित हमारे ।।
शिवमार्ग-श्रृंगार संवर तुम्हारा ।
सतत आत्म अनुभव ही परिचय है प्यारा ।।
तुम्ही ज्ञान-सागर प्रभु तारणारे ।
पधारो मुनीश्वर चरण मन पखारे ।।
ॐ ह्रीं त्रिकालवर्ती सर्व आचार्य उपाध्याय साधु मुनीश्वराः ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्
ॐ ह्रीं त्रिकालवर्ती सर्व आचार्य उपाध्याय साधु मुनीश्वराः ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः
ॐ ह्रीं त्रिकालवर्ती सर्व आचार्य उपाध्याय साधु मुनीश्वराः ! अत्र मम सन्निहितो
भव भव वषट् । पुष्पांजलिं क्षिपेत् ।
(सार छंद)
नीर लिये मुनिमन सम उज्ज्वल, मुनि पद पंकज धोवे ।
हूँ अनादि अनिधन श्रद्धा ही, जन्म-मरण दुख खोवे ॥
जीव राज चैतन्य विलासी, शाश्वत प्रभु अविनाशी ।
निज स्वभाव की भूल मुझे, भटकाती लख चौरासी ॥
तीन काल के सकल मुनीश्वर, आया शरण तिहारी ।
दुविध संग-बिन शुद्ध उपयोगी, तिन पद धोक हमारी ॥
ॐ ह्रीं त्रिकालवर्ती सर्वआचार्यउपाध्यायसाधु मुनीश्वरेभ्यो जन्मजरामृत्यु विनाशनाय
जलं निर्वपामीति स्वाहा।
भव-आताप विनाशी अमृत, अनुभव मुनिवर पाये ।
भाव शुभाशुभ की ज्वाला से बचने प्रभु ढिंग आये ॥
महामोह की कुटिल कालिमा, पल-पल मुझे रुलाती ।
परमागम परमामृत सेवन, से ही समता आती ।।
तीनकाल के सकल मुनीश्वर, आया शरण तिहारी ।
दुविध संग-बिन शुद्ध उपयोगी, तिन पद धोक हमारी ॥
ॐ ह्रीं त्रिकालवर्ती सर्वआचार्यउपाध्यायसाधु मुनीश्वरेभ्यो भवाताप विनाशनाय
चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।
चारगति चौरासी योनी, घोर महा दुख पायो ।
यह संसार महा दुख सागर, आज समझ में आयो ।
निज चैतन्य विलासी प्रभुवर, अक्षत धाम समाये ।
अक्षयपद पाने हे मुनिवर, शरण आपकी आये ।।
तीनकाल के सकल मुनीश्वर, आया शरण तिहारी ।
दुविध संग-बिन शुद्ध उपयोगी, तिन पद धोक हमारी ॥
ॐ ह्रीं त्रिकालवर्ती सर्वआचार्यउपाध्यायसाधु मुनीश्वरेभ्यो अक्षयपद प्राप्तये अक्षतं
निर्वपामीति स्वाहा ।
विषय वासना के छूटे बिन, कौन सुखी हो पाया ।
मृगतृष्णा में भ्रमा चर्तुगति कौन बचाने आया ।।
धन्य-धन्य निर्ग्रर्थ मुनीश्वर, आतम अनुभव करते ।
कामबाण की दुष्ट सर्पिणी, कीलित करके रखते ।।
तीनकाल के सकल मुनीश्वर, आया शरण तिहारी ।
दुविध संग-बिन शुद्ध उपयोगी, तिन पद धोक हमारी ॥
ॐ ह्रीं त्रिकालवर्ती सर्वआचार्यउपाध्यायसाधु मुनीश्वरेभ्यो कामबाण विध्वंसनाय
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
क्षुधा-नागिनी जब जब डसती, निज रस स्वाद न आवे ।
भक्ष्य-अभक्ष्य गिने बिन परणति, भव-भव में दुखपावे ॥
परमानंद सुधारस पीते, मुनिवर नहीं अघाते ।
आप बनाते आपहि खाते, षट रस उन्हें न भाते ।।
तीनकाल के सकल मुनीश्वर, आया शरण तिहारी ।
दुविध संग-बिन शुद्ध उपयोगी, तिन पद धोक हमारी ।।
ॐ ह्रीं त्रिकालवर्ती सर्वआचार्यउपाध्यायसाधु मुनीश्वरेभ्यो क्षुधा रोग विनाशनाय
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
ज्ञान मात्र हूँ जाननहारा, बात यही मन भायी ।
निज को निज पर को पर जानूँ, सीख यही सुखदाई ॥
अन्तर दीप जलाने प्रभुवर, मिले दीप जग नामी ।
शाश्वत चेतन दीप दिखाया, तुमने त्रिभुवन स्वामी ।।
तीनकाल के सकल मुनीश्वर, आया शरण तिहारी ।
दुविध संग-बिन शुद्ध उपयोगी, तिन पद धोक हमारी ॥
ॐ ह्रीं त्रिकालवर्ती सर्वआचार्यउपाध्यायसाधु मुनीश्वरेभ्यो मोहांधकार विनाशनाय
दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
मंगल उत्तम शरण स्वयं हूँ, बोधि कौन दर्शावे ?
ध्यान ध्येय श्रद्धेय स्वयं हूँ, तुम बिन कौन बतावे ।।
शुक्ल ध्यान की अग्नि प्रज्वलित, हो प्रभू कर्म निवारे ।
शुद्धि की श्रद्धा ही खोले, बंद मुक्ति के द्वारे ।।
तीनकाल के सकल मुनीश्वर, आया शरण तिहारी ।
दुविध संग-बिन शुद्ध उपयोगी, तिन पद धोक हमारी ॥
ॐ ह्रीं त्रिकालवर्ती सर्वआचार्यउपाध्यायसाधु मुनीश्वरेभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूपं
निर्वपामीति…
जंगल में मंगल हो जाता, जहां मुनीश्वर जाते ।
समता शुचिता के पग पड़ते, तीर्थ वहीं बन जाते ॥
पुण्य फला अर्हन्त प्रभू का, समवशरण सुखकारी ।
मार्ग मार्गफल जिनशासन में, दर्शाया अविकारी ।।
तीनकाल के सकल मुनीश्वर, आया शरण तिहारी ।
दुविध संग-बिन शुद्ध उपयोगी, तिन पद धोक हमारी ॥
ॐ ह्रीं त्रिकालवर्ती सर्वआचार्यउपाध्यायसाधु मुनीश्वरेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं
निर्वपामीति…
निजानंद वैभव की मस्ती में, मुनिमस्त विचरते ।
तीन लोक के धनी स्वयं को सबसे बड़ा समझते ॥
ऋद्धि - सिद्धियाँ हाथ जोड़कर, खड़ीं अर्घ्य ले द्वारे ।
उदासीन निज रूप मगन मन, निज निधि निरखनहारे ॥
तीनकाल के सकल मुनीश्वर, आया शरण तिहारी ।
दुविध संग-बिन शुद्ध उपयोगी, तिन पद धोक हमारी ॥
ॐ ह्रीं त्रिकालवर्ती सर्वआचार्यउपाध्यायसाधु मुनीश्वरेभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये
अर्घ्य निर्वपामीति…
जयमाला
सिद्धों की श्रेणी में आने वाला जिनका नाम है ।
जग के उन सब मुनिराजों को मेरा नम्र प्रणाम है ॥ टेक ॥
परम दिगम्बर मुद्रा देखी, हर्षित हृदय हमारा है ।
रत्नत्रय धारी हे गुरुवर, तेरा एक सहारा है ॥
सोने का सूरज ऊगा ज्यों, निरख आपको लगता है।
ज्ञानध्यान वैराग्यमूर्ति को, परख शान्त रस झरता है ॥
निज चैतन्य गुफा में बसते, शाश्वत यही मुकाम है।
जग के उन सब मुनिराजों को, मेरा नम्र प्रणाम है ॥1॥
मोह महा रिपु समझ आपने, छोड़ी गृहस्थ अवस्था है।
सिद्धों जैसी शुद्धि पाने, ले ली परम प्रवज्या है ॥
भोग भुजंग समान देखकर, काँप गया तन-मन सारा ।
कदली तरु संसार लेखकर, सिमट गई जीवन धारा ॥
रत्नत्रय निधि की रक्षारत, रहते आठों याम हैं ।
जग के उन सब मुनिराजों को, मेरा नम्र प्रणाम है ॥ 2 ॥
दीक्षा लेते समय बोलते, माँ तू तन की जननी है ।
है अनादि जननी शुद्धातम, दूजी माँ जिनवाणी है ॥
देह रमाने वाली रमणी, तू नहिं रमणी मेरी है ।
शाश्वत रमण कराने वाली, मुक्ति-वधू ही मेरी है ॥
पंच महाव्रत पंच समिति का, पहना सुन्दर जाम है ।
जग के उन सब मुनिराजों को, मेरा नम्र प्रणाम है ।। 3 ।।
दश धर्मों के धनी आप ही, शूरवीर परिषह विजयी ।
हे त्रिगुप्ती धारी ऋषि मुनिवर, शुद्ध उपयोगी ज्ञानमयी ।।
पूरब भोग न चिन्तन करते, सुर पदवी की चाह नहीं ।
नहीं कोई प्रतिबंध है जिनको, सिर पर कोई भार नहीं ।।
आतम अनुभव अति आवश्यक, एक यही बस काम है।
जग के उन सब मुनिराजों को, मेरा नम्र प्रणाम है ।। 4 ।।
बड़े पुत्र सर्वज्ञ प्रभु के, आनंद अमृत पीते हैं ।
प्रचुर स्वात्म रस संवेदन से, सच्चा जीवन जीते हैं ।।
चक्री शीश झुकाता फिर भी, रंच मान नहिं आता है।
स्वर्गों जैसा वैभव भी प्रभु, तुमको लुभा न पाता है ।।
विषय कषायारम्भ न जिनके, ज्ञान ध्यान ही काम है ।
जग के उन सब मुनिराजों को, मेरा नम्र प्रणाम है ।। 5 ।।
यह अपूर्व अवसर कब पाऊँ, बाह्यान्तर निर्ग्रन्थ बनूँ ।
सर्व बंध-सम्बन्ध छोड़कर, महत् पुरुष के पंथ चलूँ ।
यही प्रतिज्ञा है हे भगवन, दूजी माँ न दुखी करूँ ।।
परम समाधि-मरण धारणकर, मृत्यु मेहात्सव सफल करूँ ।
मुक्ति-वधू ले जाये वहीं पर, जहाँ पूर्ण विश्राम है ।
जग के उन सब मुनिराजों को, मेरा नम्र प्रणाम है ।। 6 ।।
ॐ ह्रीं त्रिकालवर्ती सर्वआचार्यउपाध्यायसाधु मुनीश्वरेभ्यो जयमाला महार्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।
(दोहा)
मुनिवर-भक्ति हृदय बसे, देती पद निर्वाण ।
वन-वन विचरूँ नगन हो, कब दिन आवे धन्य ।।
।। पुष्पांजलि क्षिपामि ॥
Artist: पं. राजेन्द्र कुमार जैन
स्रोत: जिनेन्द्र पूजन
प्रूफरीडिंग बाकी है