श्री मुक्तागिरि सिद्धक्षेत्र पूजन
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श्री मुक्तागिरि सिद्धक्षेत्र पूजन
जयवन्तों भगवन्त सिद्ध सब नमन् हमारा।
जयवन्तों भगवन्त जनाया जाननहारा॥
मुक्तागिरि से मुक्त हुये जय धन्य मुनीश्वर।
साढ़े तीन करोड़ मुनीश्वर इस ही भू पर॥
धरती पर भी सिद्ध शिला हम सब आये हैं।
महाभाग्य से सिद्ध क्षेत्र दर्शन पाये हैं॥
स्वागत है जिनराज हमारे हृदय पधारो।
इस संसार महासागर से हमें उबारो॥
ऊँ ह्रीं श्री मुक्तागिर सिद्ध क्षेत्र अत्र अवतर अवतर संवोषट्। अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्। अत्र मम् सन्निहतो भव भव
वषट् सन्निधिकरणं॥
विषयों से सुख की अभिलाषा, वश हो प्राण गंवाये है।
देख आपकी शान्त सौम्य छबि, धर्म साधने आये है॥
मुक्तागिरि से मुक्ति न होगी, मुक्तागिरि समझाते हैं।
सदा मुक्त ही हूँ अनुभवता, मुक्ति मंत्र दर्शाती है॥
सिद्ध क्षेत्र है सिद्ध दशा हो, यह संकल्प हमारा है।
मुक्तागिरि मुनि मुक्ति पधारे, शत् शत् नमन हमारा है॥
ऊँ ह्रीं श्री मुक्तागिरिसिद्ध क्षेत्रेभ्यो जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीतिं स्वाहा।
भव सन्ताप सहा नहीं जाता, कैसे पीड़ा सहन करें।
शांति प्राप्ति कैसे हो भगवन, चंदन लाया यजन करे॥
सिद्ध क्षेत्र है सिद्ध दशा हो, यही विनय कर धारा हैं।
मुक्तागिरि मुनि मुक्ति पधारे, शत् शत् नमन हमारा है॥
ऊँ ह्रीं श्री मुक्तागिरि सिद्ध क्षेत्रेभ्यो भवाताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीतिं स्वाहा।
सिद्ध समान सदा पद मेरो, सुनकर अति आनंद हुआ।
अक्षय पद की प्राप्ति हेतु धुन जगी, नाथ यह भाव जगा॥
सिद्ध क्षेत्र है सिद्ध दशा हो, यह संकल्प हमारा है।
मुक्तागिरि से मुक्त हुये मुनि, शत् शत् नमन हमारा है॥
ऊँ ह्रीं श्री मुक्तागिरि सिद्ध क्षेत्रेभ्यो अक्षय पद प्राप्ताये अक्षतं निर्वपामीतिं स्वाहा।
भोग मधुर विष सम लगते क्यों, कितने प्राण गवांये।
तृप्ति हुई न होगी भगवन्, शरण तिहारी आये हैं।
सिद्ध क्षेत्र है सिद्ध दशा हो, यह संकल्प हमारा है।
मुक्तागिरि से मुक्त हुये मुनि, शत् शत् नमन हमारा है।
ऊँ ह्रीं श्री मुक्तागिरि सिद्ध क्षेत्रेभ्यो कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीतिं स्वाहा।
क्षुधा व्याधि को जीत मुनीश्वर, अनुभव रस में तृप्त हुये।
पडगाहूँ आहार कराउँ, कब दिन आवें ऐसे रे।
सिद्ध क्षेत्र है सिद्ध दशा हो, यह संकल्प हमारा है।
मुक्तागिरि से मुक्त हुये मुनि, शत् शत् नमन हमारा है।
ऊँ ह्रीं श्री मुक्तागिरि सिद्ध क्षेत्रेभ्यो क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीतिं स्वाहा।
भेद ज्ञान से जीव अनतानंत, सदा ही सिद्ध हुये।
जो जाने सो जाननहारा, यही दीप से जला गये।
सिद्ध क्षेत्र है सिद्ध दशा हो, यह संकल्प हमारा है।
मुक्तागिरि से मुक्त हुये मुनि, शत् शत् नमन हमारा है।
ऊँ ह्रीं श्री मुक्तागिरि सिद्ध क्षेत्रेभ्यो मोहांकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीतिं स्वाहा।
स्वयं महंत बना रहता था कर्मों को देता था दोष।
यह अनीति जिनशासन में प्रभु, चल न सकी पथ है निर्दोष।
सिद्ध क्षेत्र है सिद्ध दशा हो, यह संकल्प हमारा है।
मुक्तागिरि से मुक्त हुये मुनि, शत् शत् नमन हमारा है।
ऊँ ह्रीं श्री मुक्तागिरि सिद्ध क्षेत्रेभ्यो अष्टकर्म दहनाय धूपम् निर्वपामीतिं स्वाहा।
पंचमकाल लगा फिर भी मुनि, पंचम भाव बताते हैं।
पंचमगति की प्राप्ति हेतु सोया पुरूषार्थ जगाते हैं।
सिद्ध क्षेत्र है सिद्ध दशा हो, यह संकल्प हमारा है।
मुक्तागिरि से मुक्त हुये मुनि, शत् शत् नमन हमारा है।
ऊँ ह्रीं श्री मुक्तागिरि सिद्ध क्षेत्रेभ्यो मोक्ष फल प्राप्ताये फलं निर्वपामीतिं स्वाहा।
रत्नत्रय के तीरथ से ही मुक्ति श्री सबने पायी।
भक्ति भावों से अर्ध्य चढ़ाने लाया भक्ति मुझे लायी।
पलपल जीवन बीत रहा प्रभु सफल समाधि भटक रहे।
तत्त्वज्ञान श्रद्धान् न छूटे, शरण आपकी सदा रहे॥
ऊँ ह्रीं श्री मुक्तागिरि सिद्ध क्षेत्रेभ्यो अनर्घपद प्राप्ताये अर्घ्यं निर्वपामीतिं स्वाहा।
जयमाला
शुद्धातम की साधना सदा हुये भगवंत्।
गउं जयमाला सुखद, यही करे भव अंत॥
परम वीतरागी के दरबार आये, न तुम जैसा कोई जगत् में दिखाये।
महाभाग्य से प्रभु शरण तेरी आये, तुम्हें पाकर संसार अब न सुहाये।
मुक्तागिरि क्षेत्र परम पूज्य पावन, यहीं से हुये सिद्ध करोड़ों वो आंगन।
यहीं दिव्यध्वनि भी खिरी मन भावन, यहीं हुई समाधि सरस शांत भगवन्।
तीर्थंकर शीतलनाथ भी आये भू पर, समवशरण आया था इस ही जगह पर।
हुई होगी दीक्षायें कभी इस ही भू पर, कभी सन्त साधू थे विचरे यहीं पर।
कोई कर्ता धर्ता न हुआ है न होगा, प्रभु आपकी वाणी में यहीं गरजा होगा।
चैतन्य में ही मगन थे मुनीश्वर, यहीं मुक्ति का मार्ग दिखाया ऋषिश्वर।
करोंड़ों मुनि मुक्ति पाने पधारे, खोजो राजाओं का नाम, क्या थी पतारे।
शुद्धातम सरस नाम था मुनिवरों का, चिदानंद था नाम मुनियों का प्यारा।
कोई जीवराजा थे कोई ज्ञानचंद्र, सभी आत्मायें थी आनंद कंद॥
सभी समता धारी सभी अभिरामी, सभी की खिरी होगी मधुर प्यारी वाणी।
सभी एक से एक पुरूषार्थी मुनिवर, सभी जाननहारे थे मोक्षार्थी गुरूवर।
अहंकार तजकर तरे थे किनारे, समता के सागर थे गुरूजन हमारे।
सभी अपना परिचय जो देते गुरूवर, अहमिवको, शुद्धो, सदा दर्शज्ञानमयधर।
सभी जैन शासन के स्तंभ प्यारे, सतत स्वानुभव करते दुनिया से न्यारे।
मुक्तागिरि तीर्थ पर वंदना है, सभी मुनिवरों की सहज वंदना है।
ऊँ ह्रीं श्री मुक्तागिरि सिद्ध क्षेत्रेभ्यो जयमाला महाअर्घ्यं निर्वपामीतिं स्वाहा।
सिद्ध क्षेत्र की वंदना, शांति सिद्धि दातार।
सकल होय आराधना, चिन्तू बारंबार॥
मूल दस्तावेज़ (PDF):
- Shri_Muktagiri_Siddhkshetra_Pujan.pdf (0.0 MB, 2 पृष्ठ)
स्रोत: Jain Granth E Library (Telegram), t.me/jainegranth/59410।