देखो निमित्त राग का असमर्थ ही रहा।
वैराग्य होने योग्य था वह सहज हो गया।।
सजधज कर दूल्हा बनकर निकले मल्लि कुमार।
नगरी की शोभा देख जागा प्रभु को यह विचार ।। टेक ।।
मैं तो हूँ स्वयंसिद्ध ज्ञानानन्दमय आतम।
परभावों से निरपेक्ष सहजपूर्ण परमातम ।।
आया अपराजित स्वर्ग से मैं मोक्ष के लिए।
क्यों चल दिया फँस राग में विवाह के लिए।।
विपरीत बाह्य रूप जिसके पीछे आह है।
लज्जा जनक चिन्ताओं का घर ये विवाह है ।।
धिक्कराने और त्यागने के योग्य यह विकार ।। नगरी. ।।
परिवार तो सिरभार है दुर्मोह का कारण।
मकड़ी के जाल सम अरे कुमरण का आयतन।।
जिसको माने जग वैभव वह परिग्रह तो धूल है।
आरम्भ हिंसा क्लेशमय जहरीला शूल है ।।
दाम्पत्य जीवन में अरे सुख का ही हो दमन ।
पड़ता रहे नित वासना की आग में ईंधन ।।
धनि धनि वे बालयती जिन कीना ही नहीं स्वीकार ।। नगरी. ।।
कहते हैं मूढ़ भोग भोग-काल में सुखकर।
हो जावें पीछे से भले परिपाक में दुःखकर ।।
पर भोग तृष्णारूप वे सुखरूप क्या होंगे।
घिनरूप जो तन अंग वे रमणीय क्या होंगे ?
इन भोगियों की दुर्दशा प्रत्यक्ष ही देखो।
मरते हैं तड़पते हुए लखकर जरा चेतो ।।
इन भोगों की तो कल्पना भी मात्र है दुःखकार ।। नगरी. ।।
अपने को आप भूलकर पर में ही भ्रमाया।
सब लोक में फिरता रहा सुख लेश ना पाया।।
सौभाग्य कुछ सुयोग से नर जन्म पाया था।
था वैश्रवण राजा सहज जिनधर्म भाया था।।
पाया रत्नत्रय धर्म आनन्द उर न समाया।
सम्यक् हुआ पुरुषार्थ जाननहार जनाया।।
धनि धनि सुगुप्ति मुनि अहो कीना परम उपकार ।। नगरी. ।।
वट का विशाल वृक्ष वन में देखते गया।
बिजली गिरी क्षण मात्र में ही नष्ट वह हुआ।।
लखकर विरक्त हो धरी मुनिधर्म की दीक्षा।
निरपेक्ष परमानन्दमय नहीं कोई अपेक्षा ।।
आनन्दमय आराधना, आनन्दमय जीवन।
आनन्दमय ही साध्य अरु, आनन्दमय साधन।।
आनन्दमय शुद्धात्मा आधेय अरु आधार ।। नगरी. ।।
था भाव जगाया कि जीव सर्व सुखी हों।
शुद्धात्म-बोध पाय जीव सर्व सुखी हों।।
जिनधर्म की होवे अहो अदभुत् प्रभावना।
भाई गयी ऐसे ही सोलहकारण भावना।।
तब बंध गयी तीर्थंकर नाम कर्म की प्रकृति।
नहीं हो सकी निःशेष फिर शुभ राग की विकृति ।।
पाया समाधिकर विमान स्वर्ग का असार ।। नगरी. ।।
अनुकूलताएँ सर्व थीं वैभव महान था।
संयम की शक्ति थी नहीं, सत् श्रद्धान ज्ञान था।।
शिवलोक था समीप पर नरलोक में आया।
कल्याणकों का पूज्यपना सहज ही पाया।।
होकर पवित्र पूज्य क्यों मैं हीनता लाऊँ?
तोडू़ँ ये राग बंध अब निज ध्येय को ध्याऊँ।।
अवसर मिला पूरी करूँ निज साधना शिवकार।। नगरी. ।।
शोभा स्वयं की देखते निहाल नित रहूँ।
निज में निजानन्द वेदते नित तृप्त मैं रहूँ।।
प्रगटे स्वयं प्रभुता अहो अक्षय अनन्त जो।
रत्नत्रयमय शिवमार्ग फिर मिल जावे सर्व को।।
धारूँ अभी निर्ग्रन्थ पद नहिं देर करूँगा।
होके जितेन्द्रिय ब्रह्मचारी मुक्ति वरूँगा।।
परभाव सर्व हेय हैं ब्रह्मचर्य ही है सार ।। नगरी. ।।
ब्रह्मचर्य ही निर्दोष है निष्पाप है निष्काम।
निःशल्य है निर्द्वन्द्व है स्वाधीन आनन्दधाम ।।
निस्ताप ब्रह्मचर्य में ही सर्व को अभय ।
निर्मान ब्रह्मचर्य में ही सर्व की विनय ।।
निःकषाय ब्रह्मचर्य ही है सत्य साधना।
तिहुँलोक पूज्य ब्रह्मचर्य सहज पावना ।।
है ब्रह्म जैसा ब्रह्मचर्य ही शिवमयी शिवकार ।। नगरी. ।।
तत्काल ही लौकान्तिक देव शोभते आये।
अनुमोदना करते भये बहु हर्ष बढ़ाये ।।
हे देव धन्य आपका उत्तम विचार है।
प्रभु ज्ञानमय वैराग्य ही तिहुँ जग में सार है।।
है भावना ऐसा सुअवसर हम सभी पावें।
आराधना ऐसी करें सब कर्म खिपावें ।।
हुए विरक्त मल्लि जिन शोभें परम अविकार ।। नगरी. ।।
लौकान्तिक तो निज थल गये इन्द्रादि सुर आये।
आनन्द में हो मग्न तप कल्याण मनाए।।
जब भाव बदले नाथ के सब रंग ही बदले।
शिविका चढ़े जब नाथ तब आनन्द रस उछले।।
वह पालकी पहले तो राजाओं ने उठाई।
विद्याधरों ने सात पग फिर देवों ने पाई।।
लेके चले आकाश में आनन्द हृदय धार।। नगरी.।।
वन में विराज नाथ सर्व संग परित्यागा।
कर केश लौंच भाव-निज, निज भाव में पागा।।
छह दिन रहे छद्मस्थ केवल लक्ष्मी प्रगटाई।
देवों ने समवशरण रचना की सबको सुखदाई।।
प्रगटाया दिव्य ध्वनि से धर्मतीर्थ सुखकारी।
हो कर्म मुक्त पायी पंचमगति मंगलकारी।।
हे जिनवर सहज नमन पावें ऐसा पद अविकार।। नगरी.।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह