मल्लिनाथ के चरण कमल को नित प्रति बारम्बार प्रणाम ।
बालब्रह्मचारी योगीश्वर महामंगलात्मक गुणधाम ।।
अष्टकर्म विध्वंसक मिथ्यातिमिर विनाशक प्रभु निष्काम ।
महाध्यानपति शुद्ध बुद्ध अविरुद्ध वीतरागी अभिराम ।।
आज आपकी पूजन करके रोकूं रागादिक परिणाम ।
ज्ञानावरणादि कर्मों की संतति को नाशूँ अविराम ।।
ॐ ह्रीं श्री मल्लिनाथ जिनेन्द्र अत्र अवतर-अवतर संवोषट्, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।
परम पारिणामिक भावों का जल पवित्र कब पाऊँगा ।
जन्म मरण दुख का विनाशकर वीत दोष बन जाऊँगा ।।
ॐ ह्रीं मल्लिनाथ जिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जल नि ।
परम पारिणामिक भावों का शिवचन्दन कब पाऊँगा ।
इस संसारतापको क्षयकर वीतक्षोभ बन जाऊँगा ।।मल्लिनाथ।।२ ।।
ॐ ह्रीं श्री मल्लिनाथ जिनेन्द्राय संसारताप विनाशनाय चंदन नि ।
परम पारिणामिक भावों के निज अक्षत कब पाऊँगा ।
भवसमुद्र से पार उतरकर वीतद्वेष बन जाऊँगा ।।मल्लिनाथ।।३ ।।
ॐ ह्रीं श्री मल्लिनाथ जिनेन्द्राय अक्षयपद प्राप्ताय अक्षत नि ।
परम पारिणामिक भावों के नव प्रसून कब पाऊँगा ।
महाशीलकी सुरभि प्राप्तकर वीतकाम बनजाऊँगा ।।मल्लिनाथ।।४ ।।
ॐ ह्रीं श्री मल्लिनाथ जिनेंद्राय काम बाण विध्वंसनाय पुष्प नि ।
परम पारिणामिक भावों के उत्तम चरु कब पाऊँगा ।
क्षुधा रोग संपूर्ण नाशकर वीतलोभ बन जाऊँगा ।।मल्लिनाथ।।५ ।।
ॐ ह्रीं श्री मल्लिनाथ जिनेंद्राय क्षुधा विनाशनाय नैवेद्य नि ।
साम्यभाव रस की धारा से अंतर को प्रक्षालित कर ।
तम को हर ज्योतिमंय बन अमरत्व शक्ति संचालित कर ।।
परम पारिणामिक भावों की ज्ञान ज्योति कब पाऊँगा ।
स्वपर प्रकाशक ज्ञान प्राप्तकर वीत मोह बनजाऊँगा ।।मल्लिनाथ।।६ ।।
ॐ ह्रीं श्री मल्लिनाथ जिनेन्द्राय मोहान्धकार विनाशनाय दीप नि ।
परम पारिणामिक भावों की शुद्ध धूप कब पाऊँगा ।
अष्टकर्म अरि का विनाशकर वीत कर्म बन जाऊँगा ।।मल्लिनाथ।।७ ।।
ॐ ह्रीं श्री मल्लिनाथ जिनेन्द्राय अष्टकर्म विध्वंसनाय धूप नि ।
परम पारिणामिक भावों का उत्तम फल कब पाऊँगा ।
महामोक्ष फल प्राप्त करूँगा वीतराग बन जाऊँगा ।।मल्लिनाथ।।८ ।।
ॐ ह्रीं श्री मल्लिनाथ जिनेंद्राय महा मोक्ष फल प्राप्ताय फल नि ।
परम परिणामिक भावों का विमल अर्घ्य कब पाऊँगा ।
निज अनर्घ्य पदवी को पाकर स्वयं सिद्धबन जाऊँगा ।।मल्लिनाथ।।९ ।।
ॐ ह्रीं श्री मल्लिनाथ जिनेंद्राय अनर्घपद प्राप्ताय अर्घ्यं ।
श्री पंचकल्याणक
मिथलापुरी नगर के राजा कुम्भराज भूपति गुणधाम ।
रानी प्रभावती माता ने देखे सोलह स्वप्न ललाम ।।
चैत्र शुक्ल एकम को त्याग अपराजित स्वर्ग विमान ।
मल्लिनाथ आगमन जान सुर रत्नवृष्टि करते नित आन ।।१।।
ॐ ह्रीं चैत्रशुक्ल प्रतिपदायां गर्भमंगलप्राप्ताय श्रीमल्लिनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं नि ।
मगसिर शुक्ला एकादशमी कुम्भराज नृप धन्य हुए ।
जिनके आंगन में सुर सुरपति इन्द्राणी के नृत्य हुए ।।
जन्मोत्सव के मंगल उत्सव गिरि सुमेरु पर धन्य हुए ।
जय जय मल्लिनाथ जिन स्वामी पूजन कर सब धन्य हुए ।।२।।
ॐ ह्रीं मगसिर शुक्लएकादश्यां जन्ममंगल प्राप्ताय श्री मल्लिनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं नि ।
एकादशी शुक्ल मगसिर के दिन उरमें वैराग्य जगा ।
जग का वैभव भोग नाशमय क्षण भंगुर निस्सार लगा ।।
नैसर्गिक अधिकार जीव का पूर्ण निराकुल सुख की प्राप्ति ।
एक शुद्ध चैतन्य ज्ञान घन सुख सागर में दुख की नास्ति ।।
तरु अशोक के निकट महाव्रत धारण कर दीक्षाधारी ।
पंचमुष्टि कचलोच किया प्रभु मल्लिनाथ कीबलिहारी ।।३।।
ॐ ह्रीं श्री मगसिरशुक्ला एकादशम्यां तपोमंगल प्राप्ताय श्री मल्लिनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं नि
छह दिन ही छहमस्थ रहे प्रभु, आत्मध्यान में हो तल्लीन ।
कर्मघाति चारों को क्षयकर पाया केवलज्ञान प्रवीण ।।
समवशरण में पौष कृष्ण द्वितीया को शुभ उपदेश दिया ।
मल्लिनाथ तीर्थंकर प्रभु ने मोक्ष मार्ग संदेश दिया ।।४।।
ॐ ह्रीं श्री पौषवदी द्वितीया ज्ञानमंगल प्राप्ताय अर्घ्य श्री मल्लिनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं नि ।
फाल्गुन शुक्ल पंचमी को अपरान्ह समय पाया निर्वाण ।
सबलकूट शिखर सम्मेदाचल से हुए सिद्ध भगवान् ।।
महामोक्ष कल्याण महोत्सव इन्द्रादिक ने किया महान् ।
जयजय मल्लिजिनेश्वर सिद्धपति चहुंदिशि में गूंजा जयगान ।।५।।
ॐ ह्रीं श्री फागुन शुक्ल पंचमीदिने मोक्षमंगल प्राप्ताय श्री मल्लिनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं नि ।
जयमाला
महाकारुणिक महागुणाकर महाशिष्ट मोहारि जयी ।
मल्लिनाथ मुनि ज्येष्ठ मुक्ति प्रियमुक्ति प्ररूपक मृत्युंजयी ।।१।।
तुम कुमार वय में दीक्षा धर वीतराग भगवान् हुए ।
शत इन्द्रों से वन्दनीक प्रभु केवलज्ञान निधान हुए ।।२।।
अट्ठाईस हुए गणधर प्रभु मुख्य हुए विशाख गणधर ।
मुख्यार्यिका बंधुसेना थी, श्रोता सार्वभौम नृपवर ।।३।।
भव्य दिव्य उपदेश आपने दिया सकलजग को तत्काल ।
जो निजात्म की शरण प्राप्तकरता हो जाता स्वयंनिहाल ।।४।।
क्रोधमान दोनों कषाय हैं द्वेषरूप अतिक्रूर विभाव ।
दोनों का जब क्षय होता है तो होता है द्वेष अभाव ।।५।।
व्यसन मुक्त होते ही तेरा अंतरंग उज्ज्वल होगा ।
स्वपर दृष्टि होते ही तेरा अंतरमन निर्मल होगा ।।
मायालोभ कषाय राग की वृद्धि नित्य करती जाती ।
इनके क्षय होने पर ही तो वीतरागता है आती ।।६।।
इनकी चार चौकडी के चक्कर में चहुंगति दुख भरता ।
द्रव्य क्षेत्र अरु कालभाव भव परिवर्तन पाँचों करता ।।७।।
अनन्तानुबन्धी कषाय तो घात स्वरूपाचरण करे ।
घात देशसंयम का यह अप्रत्याख्यानीवरण करे ।।८।।
घात सकल संयम का करती प्रत्यख्यानावरण कषाय ।
यथाख्यात चारित्र घात करती है यह संज्वलन कषाय ।।९।।
नरक त्रिर्यन्च देव नरगति की पाई आयु अनंतीबार ।
सम्यक् ज्ञान बिना यह प्राणी अबतक भटका है संसार ।।१०।।
मनुज ओर त्रिर्यच आयु उत्कृष्ट तीन पल्यों की है ।
मनुज त्रिर्यच जघन्य आयु केवल अन्तमुहूर्त की है ।।११।।
देव नरक गति की उत्कृष्ट आयु सागर तैंतिस की है ।
देव नरक की जघन्य आयु दस सहस्त्र वर्षों की है ।।१२।।
पंचेन्द्रिय के पंचविषय अरु चार कषाय चार विकथा ।
निद्रा नेह प्रमाद भेद पंदरह के क्षय से मिटे व्यथा ।।१३।।
जो प्रमाद का नाश करेगा अप्रमत्त बन जायेगा ।
सप्तम गुणस्थान पायेगा श्रेणी चढ सुख पायेगा ।।१४।।
यह उपदेश हृदय में धारूँ सर्व कषाय विनाश करूँ ।
मोहमल्ल को जीतूँ स्वामी सम्यक् ज्ञान प्रकाश करूँ ।।१५।।
मैं मिथ्यात्वतिमिर को हरकर अविरत को भी दूरकरूँ ।
क्रम क्रम से योगों को हरकर अष्टकर्म चकचूर करूँ ।।१६।।
यही भावना है अन्तर में कब प्रभु पद निर्ग्रन्थ वरूँ ।
पद निर्ग्रन्थ पथ पर चलकर मैं अनंत भव अन्त करूँ ।।१७।।
ॐ ह्रीं श्री मल्लिनाथ जिनेंद्राय गर्भ जन्मतप ज्ञानमोक्ष कल्याणक प्राप्ताय पूर्णार्घ्यं नि ।
सभी जीव हों सुखी जगत् के सभी निरोगी हों सानन्द ।
सबका हो कल्याण पूर्णत सब ही पाएं पर मानन्द ।।
मल्लिनाथपद कलशचिह्न लख चरणकमल जो ले उरधार ।
मन वच तन जो ध्यान लगाते वे हो जाते हैं भव पार ।।
इत्याशीर्वाद
जाप्यमन्त्र - ॐ ह्रीं श्री मल्लिनाथ जिनेन्द्राय नम ।
Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), पृष्ठ २४६ से २५०