श्री महावीरजयन्ती पूजन (कवि राजमल पवैया) | Shri Mahavirajayanti Pujan (Rajmal Pavaiya)

श्री महावीरजयन्ती पूजन

महावीर की जन्म जयन्ती का दिन जग में है विख्यात ।
चैत्र शुक्ल की त्रयोदशी को हुआ विश्व में नवल प्रभात ।।
भावना भवनाशिनी ।
मोह भ्रम अज्ञान वश यह आत्मा भव वासिनी । ।
कुण्डलपुर वैशाली नृप सिद्धार्थराज गृह जन्म लिया ।
माता त्रिशला धन्य हो गई वर्धमान रवि उदय हुआ ।।
इन्द्रादिक ने मंगल गाये गिरि सुमेरु पर कर नर्तन ।
एक सहस्त्र आठ कलशों से क्षीरोदधि से किया न्हवन ।।
तीन लोक में आनन्द छाया घर-घर मंगलाचार हुआ ।
दशों दिशायें हुई सुगन्धित प्रभु का जय जयकार हुआ ।।
दुखी जगत के जीवों का प्रभु के द्वारा उपकार हुआ ।
निज स्वभाव जप मोक्ष गये प्रभु सिद्ध स्वपद साकार हुआ ।।
मैं भी प्रभु के जन्म महोत्सव पर पुलकित हो गुण गाऊँ ।
अष्ट द्रव्य से प्रभु चरणों की पूजन करके हर्षाऊँ ।।

ॐ ह्रीं चैत्र शुक्ल त्रयोदश्या जन्ममंगलप्राप्त श्री महावीर जिनेन्द्र अत्र अवतर अवतर संवौषट्, अत्र तिष्ट तिष्ठ ठ ठ अत्र मम सन्निहितो भव-भव वषट् ।

क्षीरोदधि का क्षीर वर्ण सम भाव नीर लेकर आऊँ ।
प्रभु चरणों में भेंट चढाऊँपरम शांत जीवन पाऊँ ।।
महावीर के जन्म दिवस पर महावीर प्रभु को ध्याऊँ ।
महावीर के पथ पर चल कर महावीर सम बन जाऊँ ।।१।।

ॐ ह्रीं चैत्र शुक्ल त्रयोदश्यो जन्ममंगलप्राप्त श्री महावीर जिनेन्द्राय जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जल नि ।

मलयागिरि चन्दन से उत्तम गंध स्वयं की प्रगटाऊँ ।
निज स्वभाव साधन से स्वामी शाश्वत शीतलता पाऊँ ।।महा।।२ ।।

ॐ ह्रीं श्री चैत्र शुक्ल त्रयोदश्या जन्ममंगलप्राप्त श्रीमहावीर जिनेन्द्राय संसारताप विनाशनाय चन्दन नि ।

शुभ्र अखण्डित धवलाक्षत ले भावसहित प्रभु गुणगाऊँ ।
निज स्वरुप की महिमा गाऊँअनुपम अक्षय पद पाऊँ ।।महा।।३ ।।

ॐ ह्रीं श्री चैत्र शुक्ल त्रयो दश्या जन्ममंगलप्राप्त श्रीमहावीर जिनेन्द्राय अक्षयपद प्राप्त ये अक्षत नि स्वाहा ।

कल्पवृक्ष के पुष्प मनोहर भावमयी लेकर आऊँ ।
पर परणति से विमुख बनूँ निष्काम नाथ मैं बन जाऊँ ।।महा।।४ ।।

ॐ ह्रीं श्री चैत्र शुक्ल त्रयोदश्या जन्ममंगलप्राप्त श्रीमहावीर जिनेन्द्राय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं नि. ।

षट रस नैवेद्य अनूठे भाव पूर्ण लेकर आऊँ ।
निज परणति में रमण करूँ मैं पूर्णतृप्त प्रभु बन जाऊँ ।।महा.।।५ ।।

ॐ ह्रीं श्री चैत्र शुक्ल त्रयोदश्या जन्ममंगलप्राप्त श्रीमाहवीर जिनेन्द्राय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं नि ।

स्वर्ण थाल में रत्नदीप निज भावों को लेकर आऊँ ।
केवलज्ञान प्रकाश सूर्य की ज्योति किरण निजप्रगटाऊँ ।।महा।।६ ।।

ॐ ह्रीं श्री चैत्रशुक्ल त्रयोदश्या जन्ममंगलप्राप्त श्रीमहावीर जिनेन्द्राय मोहांधकार विनाशनाय दीपं नि ।

दशगन्धों की दिव्य धूप मैं शुद्ध भाव की ही लाऊँ ।
दश धर्मों की परम शक्ति से अष्ट कर्म रज विघटाऊँ । । महा ।।७।।

ॐ ह्रीं श्री चैत्र शुक्ल त्रयोदश्या जन्ममंगलप्राप्त श्रीमहावीर जिनेन्द्राय अष्ट कर्म दहनाय धूप नि स्वाहा ।

विविध भाँति के सुर फल प्रभु परम भावना मय लाऊँ ।
महामोक्ष फल पाऊँ स्वामी फिर न लौट भव में आऊँ । । महा ।।८।।

ॐ ह्रीं श्री चैत्र शुक्ल त्रयोदश्या जन्ममंगलप्राप्त श्रीमहावीर जिनेन्द्राय मोक्ष फल प्राप्तये फल नि ।

जल फलादि वसु द्रव्य अर्घ शुभ ज्ञानभाव का ही लाऊँ ।
साम्य भाव चारित्र धर्म पा निज अनर्घ पदवी पाऊँ । । महा ।।९।।

जयमाला

जन्म दिवस श्री वीर का गाओ मंगल गान ।
आत्म ज्ञान की शक्ति से होता निज कल्याण ।।१।।

इस अखिल विश्व में जब प्रभु हिंसा का राज्य रहा था ।
तब सत्य शांति सुख विलय कर पापों का स्रोत बहा था ।।२।।

ले ओट धर्म की पापी अन्याय पाप करते अति ।
वे धर्म बताते थे “वैदिक हिंसा हिंसा न भवति” ।।३।।

अगर जगत में सुख होता तो तीर्थंकर क्यों इसको तजते ।
पुण्यों का आनन्द छोड़कर निज स्वभाव चेतन क्यों भजते ।।
पशु बलि, जन बलि, यज्ञों में होती थी जब अति भारी ।
“स्त्री शौद्रनाधीयताम्” का आधिपत्य था भारी ।।४।।

जगती तल पर होता था हिंसा का तांडव नर्तन ।
उत्पीडित विश्व हुआ लख पापों का भीषण गर्जन ।।५।।

जब-जग ने त्राहि त्राहि की अरु पृथ्वी काँपी थर थर ।
तब दिव्य ज्योति दिखलाई आशा के नभ मण्डल पर ।।६।।

भारत के स्वर्ण सदन में अवतरित हुए करुणामय ।
श्री वीर दिवाकर प्रगटे तब विश्व हुआ ज्योतिर्मय ।।७।।

आगमन वीर का लखकर सन्तुष्ट हुआ जग सारा ।
अन्यायी हुए प्रकम्पित पापों का तजा सहारा ।।८।।

पतितों दलितों दीनों को तब प्रभु ने शीघ्र उठाया ।
अरु दिव्य अलौकिक अनुपम जग को सन्देश सुनाया ।।९।।

पापी को गले लगाना पर घृणा पाप से करना ।
प्रभु ने शुभ धर्म बताया दुख कष्ट विश्व के हरना ।।१०।।

ये पुण्य पाप की छाया ही जग में सदा भ्रमाती ।
पर द्रव्यों की ममता ही चारों गति में अटकाती ।।११।।

अब मोह ममत्व विनाशो समकित निज उर में लाओ ।
तप संयम धारण करके निर्वाण परम पद पाओ ।।१२।।

हे धर्म अहिंसामय ही रागादिक भाव है हिंसा ।
रत्नत्रय सफल तभी है उर में हो पूर्ण अहिंसा ।।१३।।

निज के स्वरूप को देखो निज का ही लो अवलम्बन ।
निज के स्वभाव से निश्चित कट जायेंगे भव बन्धन ।।१४।।

है जीव समान सभी ही एकेन्द्रिय या पंचेन्द्रिय ।
हैं शुद्ध सिद्ध निश्चय से चैतन्य स्वरुप अनिन्द्रिय ।।१५।।

“केवलि पण्णंतं धम्मं शरण पव्वज्जामी” से ।
जग हुआ मधुर गुंजारित प्रभु की निर्मल वाणी से ।।१६।।

तत्वों के सम्यक् निर्णय का यह स्वर्णिम अवसर आया है ।
संसार दुखों का सागर है दिन दो दिन नश्वर काया है । ।
पर हाय सदा हम भूले उपदेश वीर के अनुपम ।
जाते अधर्म के पथ पर छाया अज्ञान निविड़तम ।।१७।।

हम रूढ़िवाद के बन्धन में जकड़े हुए खड़े हैं ।
अवनति के गहरे गड्ढे में बेसुध हुए पड़े हैं ।।१८।।

इससे अब तो हम चेतें श्री वीर जयन्ती आयी ।
भूमण्डल के जीवों को नूतन सन्देशा लायी ।।१९।।

चेतो चेतो हे वीरों अब नहीं समय सोने का ।
आलस्य मोह निद्रा में अवसर है न खोने का ।।२०।।

कर्तव्य धर्ममय पालों अरु त्यागो कर्म निरर्थक ।
तब वीर जयन्ति मनाना होगा अनुपम सार्थक ।।२१।।

श्री वर्धमान सन्मति को अतिवीर वीर को वन्दन ।
है महावीरस्वामी का अति विनय भाव से अर्चन ।।२२।।

आशीर्वाद दो हे प्रभु हम द्रव्य दृष्टि बन जायें ।
रागादि भाव को जयकर परमात्म परमपद पायें ।।२३।।

ॐ ह्रीं श्री चैत्रशुक्लत्रयोदश्यां जन्ममंगलप्राप्त श्री महावीराय अर्घ्यं नि

वीर जयन्ती दे रही शुभ संदेश महान ।
प्राणिमात्र में प्रेमकर करो आत्म कल्याण ।।

इत्याशीर्वाद:

जाप्यमंत्र- ॐ ह्रीं श्री महावीर जिनेन्द्राय नम: ।


Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), पृष्ठ १४१ से १४५