श्री महावीर का गृह त्याग | Shri Mahavir ka Grih Tyag

निर्ग्रन्थ दीक्षा लेने को महावीर चल दिए।
भोगों की सब सामग्री तजकर वीर चल दिए।। टेक।।

सिद्धार्थ जी कहते थे, बेटा राज्य संभारो।
सुन्दर कन्याएँ शादी को आयी हैं स्वीकारो ।।
आया है अवसर भाग्य से निराश ना करो।
मत सबका आग्रह ठुकराकर मुनिपद अभी धरो ।।
यौवन भरी ये देह कोमल दीक्षा है कठिन।
लेना तो संयम सहज है निर्वाह है कठिन ।।
सुन करके ये विकथाएँ प्रभु गम्भीर हो गये ।। 1 ।।

इस मोह की दुनियाँ में होते हैं अनर्थ ही।
मोहीजनों की भाषा भी निस्सार व्यर्थ ही ।।
सब रोते राग को हित की चिन्ता किसी को ना।
मुक्ति के मार्ग में करो परवाह इनकी ना।।
रहकर निशंक राग तज शिव मार्ग में बढ़ो।
निज बल से ही हो अप्रमत्त मुक्ति गिरि चढ़ो।।
यों सोचते प्रभुवर सहज विरक्तता लिए।। 2 ।।

बोले ये राज्य क्या करूँ ये तो विनाशी है।
मेरा अविनाशी राज्य तो मेरे अंदर ही है।।
अद्भुत अनन्त गुणों का निज में ही खजाना।
कामादिक शत्रु जीतकर शिवपद मुझे पाना ।।
यहाँ सर्व योग मिल गये, काललब्धि भी आयी।
आनन्दमग्न मुनिदीक्षा की अब शुभ घड़ी आयी।।
ये स्वर्णिम अवसर है, नहीं भववृद्धि के लिए।। 3।।

झूठे प्रलोभन भोगों के नहिं मुझको दिखाओ।
वैराग्यमय अमृत पिऊँ मत जहर पिलाओ।।
विषयों के दावानल से निकला कैसे-कैसे मैं।
जिनवर का मार्ग पाकर फिर फँस जाऊँ कैसे मैं ।।
कठिनाई से भव सागर का तट मैंने पाया।
क्यों धक्का देते तात मुझको क्या ये फरमाया ।।
जिनमार्ग तो है भवसागर से तिरने के लिए।।4।।

ये भोग दीमक सम ही जीवन खोखला करते।
भोगी मकड़ी सम जाल में अपने ही फँस मरते ।।
दलदल में फँसने वाले वृद्ध बैल की तरह।
नित तड़फ-तड़फ दुःख सहते भोगी कैद की तरह ।।
भोगी हो देवादिक भी मरते जौंक की तरह।
पीड़ित करते हैं भोग बाण-नोंक की तरह ।।
दुर्बुद्धि ही नित क्लेश सहता भोगों के लिए।।5।।

संयोग हैं अनित्य बाहर कोई ना शरण।
पर प्रीति से संसार में हो दुःखमय मरण।।
साथी नहीं कोई अकेला ही सुख-दुःख सहे।
अन्यत्व देह से भी देह नित अशुचि रहे।।
दुःख कारण आश्रव बंध, सुखकर संवर निर्जरा।
बिन ज्ञान के तिहुँ लोक में ही डोलता फिरा।।
दुर्लभ है बोधि, धर्म ही सुख शान्ति के लिए।। 6।।

संयम का पंथ ही अहो ! आनन्दरूप है।
निश्चय संयम ही निश्चय से मुक्ति स्वरूप है।।
संयम के मार्ग में यदि उपसर्ग भी होवे।
समता रहे ना क्लेश हो अरु निर्जरा होवे ।।
भोगों की राह में तो पुण्योदय में भी दुःख हो ।
संयम की साधना में पापोदय में भी सुख हो।।
निर्द्वन्द्व-निरापद संयम ही है मुक्ति के लिए।।7।।

यों चिन्तते विरक्ति ना अंतर में समाई ।
लौकान्तिकों से भी तभी अनुमोदना पाई ।।
निज आत्म महिमा में मगन अति शान्त चित्त था।
महावीर का वह रूप सचमुच दर्शनीय था।।
खुशियाँ मनाते जय-जयकार करते सुर आये।
अति सुन्दर पालकी में प्रभु को इन्द्र पधराये ।।
सब मिलकर पालकी लेकर वनखण्ड चल दिए।।8।।

वस्त्राभूषण तज पंचमुष्ठि केश उखारे।
मानो प्रभु ने कर्म ही समूल विडारे ।।
सब धनि-धनि कहते ही रहे प्रभु धन्य हो गये।
टूटी त्रय-चौकड़ी प्रभु निर्ग्रन्थ हो गये।।
बारह बरस मुनिवर रहे फिर केवली हुए।
प्रगटाया धर्मतीर्थ अन्तिम तीर्थंकर हुए।।
अब भी प्रवर्ते तीर्थ प्रभु तो मुक्त हो गये।।१।।

सौभाग्य से वह तीर्थ प्राप्त आज भी हमें।
कर्त्तव्य है पुरुषार्थ कर शिवमार्ग में लगें।।
तत्त्वों का निर्णय करके निज-पर भेदज्ञान कर।
जीवन सफल करें सु आत्मानुभूति कर।।
त्यागें विषय-कषाय तत्त्वभावना करें।
आनन्दमय संयम अहो आनन्द से धरें।।
निर्द्वन्द्व हो महावीर-पथ पर हम भी चल दिए।।10।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह