श्री महावीर जिन पूजन (राजेश कासलीवाल, उज्जैन) | Shri Mahaveer Jin Pujan (Rajesh Kasliwal)

श्री महावीर जिन पूजन

रचयिता: राजेश कासलीवाल, उज्जैन

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॥ श्री महावीर जिन पूजन ॥
रचियता - राजेश कासलीवाल, उज्जैन

(स्थापना)
(छंद रोला)
सम्यक् रत्नत्रय धर भायी षोडश भावन ।
सर्व हितंकर पाया पद तीर्थंकर पावन ।
धर्म देशना धर्म चक्र का किया प्रवर्तन ।
हुआ अहो जयवंत जगत में श्री जिन शासन ।
(दोहा)
शासन नायक देव जिन, महावीर भगवान ।
आओ मम मन वेदी पर, तिष्ठो वीर महान ।
ॐ ह्रीं शासननायक श्रीमहावीरजिनेंद्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् इत्याह्नाननम् ।
ॐ ह्रीं शासननायक श्रीमहावीरजिनेंद्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः इति स्थापनम् ।
ॐ ह्रीं शासननायक श्रीमहावीरजिनेंद्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम् परि पुष्पांजलि क्षिपेत ।

(छंद गीतिका)
चिर से न तन चेतन हुआ, चिरकाल ना चेतन छुआ ।
चिरकाल तन चेतन कहा, चिरकाल ना समकित हुआ ।
चिरकाल जन्म-मरण हुए, चिरकाल मिथ्यामल रहा ।
जल से अतः हे वीर जिन, अर्चन तुम्हारी कर रहा ।
ॐ ह्रीं शासननायक श्रीमहावीर जिनेंद्राय जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामिती स्वाहा ।

संसार में शुभ अशुभ में अनुकूल में प्रतिकूल में ।
रे तपित व्याकुल आकुलित था मैं अनादि भूल में ।
तुम मिले आनंदकंद मेटो तपन मम परिणाम की ।
है वंदना चंदन लिये महावीर तुम गुणधाम की ।
ॐ ह्रीं शासननायक श्रीमहावीर जिनेंद्राय भवातापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामिती स्वाहा ।

चाहता मैं अमर होना अथिर पद चित में धरा ।
रे देह राग कषाय को निज मान क्षण-क्षण में मरा ।
परभाव तन सयोंग से तुम रहित ध्रुव परिणाम हो ।
है अर्चना रे अक्षतों से अतिवीर अक्षय धाम हो ।
ॐ ह्रीं शासननायक श्रीमहावीर जिनेंद्राय-अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामिती स्वाहा ।

रुचते नही ऋजुभाव मुझको काम-कंटक प्रिय रहे ।
निजब्रह्म को जाना नही परभाव रतिपति हिय रहे ।
गुण पुष्प की चिद् वाटिका में रमण करते वीर जिन ।
मन्मथ कटुक कुवास क्षय हो सु-मन अर्चन रात-दिन ।
ॐ ह्रीं शासननायक श्रीमहावीर जिनेंद्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामिती स्वाहा ।

ना देह निज थी ना क्षुधा एकत्व बुद्धि दोष था ।
अतएव विध-विध व्यंजनों से नित्य तन को पोषता ।
तन न पोषित हो सका रे क्षय क्षुधा भी ना कभी ।
हे वीर अर्चन व्यंजनों से नाश हो तृष्णा सभी ।
ॐ ह्रीं शासननायक श्रीमहावीर जिनेंद्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामिती स्वाहा ।

चैतन्य रवि पर मोह राहु ज्ञान अज्ञानी हुआ ।
निजज्ञान बिन जाना सभी भ्रमयुक्त सब पानी हुआ ।
हे दिव्य प्रज्ञावान जिनवर तम हरो परिणाम का ।
सन्मति हो भान-निज-पर दर्श हो गुणधाम का ।
ॐ ह्रीं शासननायक श्रीमहावीर जिनेंद्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामिती स्वाहा ।

निज दोष पर पर डालने की रीत चिरकालीन थी ।
अर्ध प्रज्ञा युक्त हो रज कर्म पर आसीन की ।
सब दोष मेरे ध्यान वन्हि में दहन हो वीर जिन ।
सुरभित चिदांगण में न रज ना वृत्ति निज की भानबिन ।
ॐ ह्रीं शासननायक श्रीमहावीर जिनेंद्राय-अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामिती स्वाहा ।

सुख प्राप्ति हेतु यत्न सब पर द्रव्य में पर भाव में ।
कैसे सफल होते वहां जिनके न सुक्ख स्वभाव में ।
निज लक्ष्य ले तुमने लिया परिपूर्ण सुख परिणाम में ।
हे वीर अर्चन दिव्य फल से रे लहुं शिवधाम मैं ।
ॐ ह्रीं शासननायक श्रीमहावीर जिनेंद्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामिती स्वाहा ।

मोहमल भवताप क्षयकर अक्षय रहूं निष्काम मैं ।
इच्छा रहित हो ज्ञान निर्मल ध्यान नित ध्रुवधाम में ।
पूर्णता का लक्ष्य मेरा हो सफल पद सिद्ध हो ।
है अर्घ्य से अर्चन सदा ही वर्धमान प्रसिद्ध हो ।
ॐ ह्रीं शासननायक श्रीमहावीर जिनेंद्राय-अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामिती स्वाहा ।

पंचकल्याणक अर्घ्य

(छंद धत्तानंद)
तीर्थंकर वंदें नित अभिनंदें, पद अरविंदे शीश धरें ।
पांचों कल्याणक समकित दायक, मोद बधायक भक्ति करें ।

पुष्पांजलि क्षिपेत्।

(छंद भुजंगप्रयात)
गगन से रतन थे बरसते निरंतर, लखे मात त्रिशला सुपन सोल सुंदर ।
सुकल साढ़ छठमी को माता गरभ में, श्री वीर आए हरष भू में नभ में ।
रतनत्रय गरभ में रहे मोख जैसे, अहो तीर्थ उर में धरा मात वैसे ।
करे देवी सेवा छप्पन कुमारी, करे मां से चरचा धरम तत्त्व सारी ।
ॐ ह्रीं अषाढ़शुक्लषष्टम्यां गर्भमंगल मंडिताय शासननायक श्रीमहावीर जिनेंद्राय अर्घ्यं निर्वपामिती स्वाहा ।

तिहुंलोक शांति कंपा इंद्र आसन, धरा भाल भू पर चले सात पासन ।
चढ़े गज इरावत चले पुर रे कुंडल, शचि साथ सब ही लिए देव के दल ।
सुकल चैत्र तेरस श्री वीर जन्मे, सहित तीन प्रज्ञा सुसम्यक् हृदय में ।
पांडुक कलस नृत्य तांडव रचाया, महोत्सव पुरंदर मनुज सुर मनाया ।
ॐ ह्रीं चैत्रशुक्लत्रयोदशम्यां जन्ममंगल मंडिताय शासननायक श्रीमहावीर जिनेंद्राय अर्घ्यं निर्वपामिती स्वाहा ।

उदासीन जग से रे अन्तर उछाही, विरागी दशा बढ़ चली भाववाही ।
अनुमोदने देव ब्रह्मर्षि आए, उठाई मनुज पालकी देव लाए ।
अगहन मास दशमी वदी वन गमन कर, किया केश लुंचन वसन तन धरा धर ।
मुनि मौन साधन निजानन्द निर्भय, प्रचुर आत्मथिरता कषाएं तजी त्रय ।
ॐ ह्रीं मगसिरकृष्णदशम्यां तपोमंगल मंडिताय शासननायक श्रीमहावीर जिनेंद्राय अर्घ्यं निर्वपामिती स्वाहा ।

किये घात घाति अनंती चतुष्टय, धरे पूर्ण प्रज्ञा लोकालोक हो पय ।
दशम शुक्ल वैशाख अरिहंत होकर, ध्वनि दिव्य छाछठ दिवस और उपर ।
समोसर्ण मध्य सभी मौन राजे, प्रभु गंधकुटी अधर थे विराजे ।
वदी श्रावणी एक अमृत पिलाया, द्वादश सभा भव्य अन्तर खिलाया ।
ॐ ह्रीं वैशाखशुक्लदशम्यां ज्ञानमंगल मंडिताय शासननायक श्रीमहावीर जिनेंद्राय अर्घ्यं निर्वपामिती स्वाहा ।

निकल हो गए वे सकल कर्म क्षय कर, चले अष्ट भू पर भवार्णव विजय कर ।
रे कार्तिक अमावस बनी पूर्णमासी, निजातम कला चंद्र पूरण विलासी ।
धरा पावापुर की बनी तीर्थ पावन, चले गए रे तीरथ विरह के बचे क्षण ।
अहो वीर ध्रुव हो अचल हो अनुपम, रहो मेरे आतम प्रतिच्छंद रुपम ।
ॐ ह्रीं कार्तिककृष्णअमावस्यां मोक्षमंगल मंडिताय शासननायक श्रीमहावीर जिनेंद्राय अर्घ्यं निर्वपामिती स्वाहा ।

जयमाला
(दोहा)
जिनवर सब जग जय किया, मन इन्द्रिय परिणाम ।
जयति जय जयमालिका, वंदन आठों याम ॥
परिणति के अरि नाशकर, बिना असि शमशीर ।
विश्व अहिंसा दूत हैं, प्रभुवर श्री महावीर ॥

(छंद - तांटक)
वीतराग सर्वज्ञ हितंकर, तीर्थंकर श्री जिन महावीर ।
शासन नायक आनंद दायक, गुण गंभीर प्रभु श्री वीर ।
कुमति विनाशक सन्मति दाता, त्राता-भवसागर-बहुपीर ।
भक्ति तुम्हारी वर्धमान हो, मुक्तिपथ तक हे अतिवीर ।

स्याद्वादमयी वाणी तेरी, अनेकांत उद्घोषक है ।
द्वादशांग अनुयोग चार सब, वीतराग के पोषक है ।
षटद्रव्य सभी गुण परिणति युत् , धर्म अनंतों सहित कहे ।
व्यय उत्पाद ध्रौव्य सत् लक्षण, नही किसी से रहित रहे ।

तत्त्व प्रयोजनभूत सात रे, ज्ञेय हेय आदेय कहे ।
निज में रहता ज्ञान सदा सब, अर्थ तत्त्व प्रमेय रहे ।
वस्तु स्वतन्त्र सभी जग में, परिणति निजकाल स्वयं होती ।
अरे ! बुद्धि जो हेरफेर की, सम्यक् भाव धरम खोती ।

अहो अहिंसा वीर तुम्हारी, अद्भुत और निराली है ।
परिणामों से राग-विकारों, को जो हरने वाली है ।
सत्य स्वरूप वस्तु तत्त्वों का, वाणी जड़ है पुद्गल है ।
और परिग्रह पर की ममता, परभाव निजातम से छल है ।

वीर वचन में सभी बराबर, लघु-गुरु कोई आत्म नही ।
जो पुरुषार्थ करे बन सकता, जन्में ना परमात्म कहीं ।
रत्नत्रय पथ एक मोक्ष का, मार्ग सभी को सब ही काल ।
जिन सिद्धांत अटल अविनाशी, सब ज्ञानी इकमत तिहुंकाल ।

जिनधुनि मंगल दिव्य प्रदाता, शासन नायक वीर प्रभो ।
पावापुर से निजपुर पाए, शासन नायक वीर प्रभो ।
मनमंदिर में नित्य बसो तुम, शासन नायक वीर प्रभो ।
जिनशासन जयवंत रहे नित, शासन नायक वीर प्रभो ।

(धत्तानंद)
तीर्थंकर प्रभुवर हितकर दुखहर, भवतर शिवकर सुहित विभो ।
तुमको नित ध्यावें तुम गुण गावें, शिवसुख पावें शीघ्र प्रभो ।
ॐ ह्रीं शासननायक श्रीमहावीर जिनेंद्राय-अनर्घ्य पद प्राप्ताय जयमाला पूर्णार्घ्यं निर्वपामिती स्वाहा ।

(दोहा)
वर्धमान हो रत्नत्रय, वर्धमान परिणाम ।
वर्धमान पथ पर चलें, मिले शिवालय धाम ।
पुष्पांजलि क्षिपेत्।


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF):

स्रोत: Jain Granth E Library (Telegram), t.me/jainegranth/60149।

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