श्री कुन्थुनाथ स्तुति | Shri Kunthunath Stuti

मात्र पूरें ही नहीं निर्मूल वांछाएँ करें।

कुछ नहीं देते तदपि, सुखधाम दर्शाते हमें ॥ टेक ॥

सुखरूप निज को भूल करके, भ्रान्तिवश सुख मानते।
धनि कुन्थु जिन तुम बिन कहें, मम सुख स्वरूप दिखावते ॥१॥

आत्मा स्वयं परमात्मा, तव दिव्यध्वनि का सार है।
आराधना निज की करे, हो जाये भव से पार है॥२॥

प्रभु दर्श करके तुच्छता, निज रूप में नहिं भासती।
दृष्टि अंतर में टिकी, प्रभुता स्वयं प्रतिभासती ॥३॥

छूटें सभी पर-भाव प्रभुवर, भावना ये ही प्रबल।
विभु प्रगट होवे मुनिदशा, शुद्धात्म संवेदन सबल ॥४॥

निज में ही होवे पूर्ण थिरता, पास बैठूं आपके ।
निष्काम सविनय भाव-वंदन, शीश चरणन नायके ॥५॥

Artist: बा.ब्र. रवीन्द्र जी आत्मन्