श्री कुंथुनाथ जिनेश प्रभु तुम ज्ञान मूर्ति महान् हो ।
अरहन्त हो भगवंत हो गुणवंत हो भगवान् हो ।।
तुम वीतरागी तीर्थंकर हितकर सर्वज्ञ हो ।
जानते युगपत सकल जग इसलिए विश्वज्ञ हो ।।
नाथ मैं आया शरण में राग द्वेष विनाश हो ।
दो मुझे आशीष उर में पूर्ण ज्ञान प्रकाश हो ।।
ॐ ह्रीं श्री कुंथुनाथ जिनेन्द्र अत्र अवतर अवतर संवौषट् ॐ ह्रीं श्री कुंथुनाथ जिनेंद्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ ॐ ह्रीं श्री कुंथुनाथ जिनेंद्र अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट
नव तत्व के श्रद्धान का जल स्वच्छ अन्तर में भरूं ।
समवाय पाँचों प्राप्त कर मिथ्यात्व के मल को हरूं ।।
श्री कुन्थुनाथ अनाथ रक्षक पद कमल मस्तक धरूं ।
आनंद कन्द जिनेन्द्र के पद पूज सब कल्मष हरूँ ।।१।।
ॐ ह्रीं श्री कुं थनाथ जिनेंद्राय जन्मजरामत्यु विनाशनाय जल नि ।
हे सार जग में आतमा निज तत्व चंदन आदरूँ ।
प्रभुशांत मुद्रा निरखकर मिथ्यात्व के मल को हरूँ ।।श्री कुन्थु।।२ ।।
ॐ ह्रीं श्री कुं थुनाथ जिनेन्द्राय संसारताप विनाशनाय चंदन नि ।
मैं जान तत्त्व अजीव को अक्षत स्वचेतन पद धरूँ ।
अक्षय अरूपी ज्ञान से मिथ्यात्त्व के मल को हरूँ ।।श्री कुन्थु।।३ ।।
राग द्वेष शुभ अशुभ भाव से होते पुण्य पाप के बंध ।
साम्य भाव पीयाषामृत पीने वाला ही है निर्बन्ध । ।
ॐ ह्रीं श्री कुंथुनाथ जिनेन्द्राय अक्षयपद प्राप्ताय अक्षत नि
इस आश्रव को जान दुखमय पाप पुण्याश्रव हरूँ ।
प्रभु कामवाण विनाशहित मिथ्यात्त्व के मलको हरूँ ।।श्री कुन्थु।।४ ।।
ॐ ह्रीं श्री कुं थुनाथ जिनेन्द्राय कामवाण विध्वंसनाय पुष्प नि
मैं बन्ध तत्त्व स्वरूप समझूँ आत्मचरू ले परिहरूँ ।
प्रभु क्षुधारोग विनष्टहित मिथ्यात्त्व के मल को हरूँ ।।श्री कुन्थु।।५ ।।
ॐ ह्रीं श्री कुं थुनाथ जिनेन्द्राय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्य नि ।
अब तत्त्व संवर जानकर निज ज्ञान का दीपक धरूँ ।
कुज्ञान कुमति विनाशकर मिथ्यात्त्व के मल को हरूँ ।।श्री कुन्थु।।६ ।।
ॐ ह्रीं श्री कुं थुनाथ जिनेंद्राय मोहान्धकार विनाशनाय दीप नि ।
मे निर्जरा का तत्त्व समझूँ ध्यान धूप हृदय धरूँ ।
सब बद्धकर्म अभावहित मिथ्यात्त्व के मल को हरूँ ।।श्री कुन्थु।।७ ।।
ॐ ह्रीं श्री कुं थुनाथ जिनेंद्राय अष्टकर्म विध्वंसनाय धूप नि ।
मैं मोक्ष तत्व महान् निश्चय रूप अन्तर में धरूँ ।
सम्यक् स्वरूप प्रकाशफल सम्यक्त्व को दृढतर करूँ ।।श्री कुन्थु।।८ ।।
ॐ ह्रीं श्री कुंथुनाथ जिनेंद्राय महा मोक्षफल प्राप्ताय फल नि ।
मैं ज्ञान दर्शन चरितमय निज अर्थ रत्नत्रय धरूँ ।
सम्यक् प्रकार अनर्घपद पा शाश्वत सुख को करूँ ।।श्री कुन्थु।।९ ।।
ॐ ह्रीं श्री कुंथुनाथ जिनेन्द्राय अनर्घपद प्राप्ताय अर्घ्यं नि ।
श्री पंचकल्याणक
श्रावण कृष्णा दशमी के दिन तज सर्वार्थसिद्धि आये ।
कुन्थुनाथ आगमन जानकर श्रीमती माँ हर्षाये ।।
गर्भ पूर्व छह मास जन्म तक शुभरत्नों की धार गिरी ।
नगर हस्तिनापुर शोभा लख लज्जित होती इन्द्रपुरी ।।१।।
ॐ ह्रीं श्री श्रावण कृष्णदश्याम् गर्भमंगल प्राप्ताय श्री कुंथुनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं नि ।
सूर्यसेन राजा के गृह में कुन्थुनाथ ने जन्म लिया ।
शुभ बैशाख शुक्ल एकम का तुमने दिवस पवित्र किया ।।
तेज पुं ज शुद्धातम तत्व जब निज अनुभव में होता मस्त ।
नय प्रमाण निक्षेप आदि का भी समूह हो जाता अस्त ।।
सर्व प्रथम इन्द्राणी ने दर्शन कर जीवन धन्य किया ।
पांडुकशिला विराजित कर सुरपति ने प्रभु अभिषेक किया ।।२।।
ॐ ह्रीं श्री बैशाख शुक्ला प्रतिपदायां जन्ममंगल प्राप्ताय श्री कुंथुनाथ जिनेंद्राय अर्घ्यं नि
शुभ बैशाख शुक्ल एकम को उरछाया वैराग्य अपार ।
यह संसार अनित्य जानकर जिनदीक्षा का किया विचार ।।
तिलक वृक्ष के नीचे दीक्षा लेकर धार लिया निजध्यान ।
कुन्थुनाथ प्रभु का तप कल्याणक इन्द्रों ने किया महान् ।।३।।
ॐ ह्रीं श्री बैशाख शुक्ला प्रतिपदायां तपोमंगलप्राप्ताय श्रीकुंथुनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं नि ।
मोह नाशकर चेत्र शुक्ल तृतीया को पाया केवलज्ञान ।
समवशरण की रचना करके हुआ इन्द्र को हर्ष महान् ।।
खिरी दिव्यध्वनि जगजीवों को आपने किया ज्ञानप्रदान ।
कुन्थुनाथ ने मोक्ष मार्ग दर्शाकर किया विश्व कल्याण ।।४।।
ॐ ह्रीं श्री चैत्र शुक्लातृतीया ज्ञानमंगल प्राप्ताय श्री कुंथनाथ जिनेंद्राय अर्घ्यं नि ।
श्री सम्मेदशिखर पर आकर प्रतिमा योग किया धारण ।
अन्तिम शुक्लध्यान को धर कर स्वामीहुए तरण तारण ।।
प्रभु बैशाख शुक्ल एकम को शेष कर्म का कर अवसान ।
कूट ज्ञानधर से है पाया कुंथुनाथ प्रभु ने निर्वाण ।।५।।
ॐ ह्रीं श्री बैशाख शुक्ल प्रतिपदायां मोक्षमंगलप्राप्ताय श्री कुंथुनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं नि
जयमाला
कुंथुनाथ करुणा के सागर करुणादानी कृपा निधान ।
कुमति निकन्दन कल्मष भंजन कर्मोच्छेदी कृती महान् ।।१।।
षष्टम् चक्री दीना नाथ दया के सागर दया निधान ।
भरत क्षेत्र के षटखण्डों पर राज्य किया बहुतकाल बीता ।।२।।
आत्म द्रव्य तो है त्रिकाल अविकारी गुण अनंत का पिंड ।
स्वयं सिद्ध है वस्तु शाश्वत प्रभुता से सम्पन्न अखंड ।।
सप्तदशम् तीर्थंकर जिन तेरहवें कामदेव गुणवान ।
पूर्वजाति स्मरण हुआ इक दिन, वैराग्य हुआ तत्काल ।।३।।
राज्यपाट तज गए सहेतुक वन में जिन दीक्षा धारी ।
पंच मुष्टि कचलोच किया प्रभु हुए महाव्रत के धारी ।।४।।
सोलह वर्ष रहे छद्मस्थ कि राग द्वेष को दूर किया ।
क्षपक श्रेणी चढ कर्मघातिया चारों को चकचूर किया ।।५।।
भाव शुभाशुभ नाश हेतु प्रभु निज स्वभाव में लीन हुए ।
पाप पुण्य आश्रव विनाशकर स्वयंसिद्ध स्वाधीन हुए ।।६।।
गणधर थे पैंतीस आपके मुख्य स्वयंभू गणधर थे ।
मुख्य आर्यिका श्रीभाविता, श्रोता सुर नर मुनिवर थे ।।७।।
वीतराग सर्वज्ञदेव अरहंत हुए केवल ज्ञानी ।
सादि अनन्त सिद्ध पद पाया कर अघातिया की हानी ।।८।।
नाथ आपके पद पंकज में मनवच काया सहित प्रणाम ।
भक्तिभाव से यही विनय है सुनो जिनेश्वर हे गुणधाम ।।९।।
सम्यक् दर्शन को धारण कर श्रावक के व्रत ग्रहण करूँ ।
पंच पाप को एक देश तज चार कषायें मन्द करूँ ।।१०।।
पंच विषय से रागभाव तज पंच प्रमाद अभाव करूँ ।
ग्यारह प्रतिमाएँ पालन कर पंच महाव्रत भाव धरूँ ।।११।।
मनवचकाय त्रियोग संवारूँ तीन गुप्तियों को पालूँ ।
बाह्यान्तर निर्ग्रन्थ दिगम्बर मुनिषन द्वादश व्रत पालूँ ।।१२।।
पंचाचार समिति पाँचों हो तेरह विधि चारित्र धरूँ ।
दश धर्मों का निरतिचार पालन कर स्वयं स्वरूप वरूँ ।।१३।।
छठे सातवें गुणस्थान में झूलूँ श्रेणी क्षपक चढूँ ।
चार घातिया को विनष्टकर मोक्षभवन की ओर बढूँ ।।१४।।
इस प्रकार निज पद को पाऊँ यही भावना है स्वामी ।
पूर्ण करो मेरी अभिलाषा कुन्थुनाथ त्रिभुवननामी ।।१५।।
सम्यक् दृष्टि जीव के होते भोग निर्जरा के कारण ।
मिथ्या दृष्टि जीव के होते भोग बंध ही के कारण ।।
ॐ ह्रीं श्री कुन्थुनाथ जिनेन्द्राय पूर्णार्घ्यं नि स्वाहा ।
चरणों में अजचिन्ह सुशोभित कुन्थुनाथ प्रतिमा अभिराम ।
जो जन मन वचतन से पूजे जन पाते हैं शिवधाम । ।
इत्याशीर्वाद
जाप्यमंत्र - ॐ ह्रीं श्री कुन्थुनाथ जिनेन्द्राय नम
Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), पृष्ठ २३८ से २४२