श्री कुन्दकुन्दाचार्य पूजन (कवि राजमल पवैया) | Shri Kundkundacharya Pujan (Kavi Rajmal Pavaiya)

श्री कुन्दकुन्दाचार्य पूजन

कुन्दकुन्द आचार्य देव के चरण कमल में करूँ नमन ।
कुन्दकुन्द आचार्य देव की वाणी के उर धरूँ सुमन ।।
कुन्दकुन्द आचार्य देव की भाव सहित करके पूजन ।
निज स्वभाव के साधन द्वारा मोक्ष प्राप्ति का करूँ यतन ।।
“परिणामो बंधो परिणामो मोक्खो”(1) करूँ आत्म दर्शन ।
सिद्ध स्वपद की प्राप्ति हेतु मैं निज स्वरूप में करूँ रमन ।।

ॐ ह्रीं श्री कुन्दकुन्दाचार्य देव चरणाग्रेषु पुष्पांजलि क्षिपामि ।

समयसार वैभव के जल से उर में उज्ज्वलता लाऊँ ।
“दंसण मूलो धम्मो”(2) सम्यक्दर्शन निज में प्रगटाऊँ ।।
कुन्दकुन्द आचार्य देव के चरण पूज निज को ध्याऊँ ।
सब सिद्धों को वन्दन कर ध्रुव अचल सु अनुपम गति पाऊँ ।।

ॐ ह्रीं श्री कुन्दकुन्दाचार्य देवाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलम्० ।

समयसार वैभव चन्दन से निज सुगन्ध को विकसाऊँ ।
“वत्थु सहावो धम्मो”(3) सम्यक्ज्ञान सूर्य को प्रगटाऊँ ।।कुन्द०।।

ॐ ह्रीं श्री कुन्दकुन्दाचार्यदेवाय संसारतापविनाशनाय चन्दनम्० ।

समयसार वैभव के उत्तम अक्षत गुण निज में लाऊँ ।
“चारित्तं खलु धम्मो”(4) सम्यक्चारित रथपर चढ़ जाऊँ ।।कुन्द०।।

ॐ ह्रीं श्री कुन्दकुन्दाचार्यदेवाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतम् नि० स्वाहा ।

समयसार वैभव के पावन पुष्पों में मैं रम जाऊँ ।
“दाणं पूजा मुक्खयसावयधम्मो”(5) शील स्वगुण पाऊँ ।।कुन्द०।।

ॐ ह्रीं श्री कुन्दकुन्दाचार्यदेवाय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं नि० स्वाहा ।

समयसार वैभव के मनभावन नैवेद्य हृदय लाऊँ ।
“जो जाणदि अरिहंतं”(6) निज ज्ञायकस्वभाव आश्रय पाऊँ ।।कुन्द०।।

ॐ ह्रीं श्री कुन्दकुन्दाचार्यदेवाय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि० स्वाहा ।

समयसार वैभव के ज्योतिर्मय दीपक उर में लाऊँ ।
“दंसण भट्ट भट्टा”(7) मिथ्या मोह तिमिर हर सुख पाऊँ ।।कुन्द०।।

ॐ ह्रीं श्री कुन्दकुन्दाचार्यदेवाय मोहान्धकारविनाशनाय दीपम् ।

समयसार वैभव की शुचिमय ध्यान धूप उर में लाऊँ ।
“ववहारोऽभूयत्थो”(8) निश्चय आश्रित हो शिव पद पाऊँ ।।कुन्द०।।

ॐ ह्रीं श्री कुन्दकुन्दाचार्यदेवाय अष्टकर्मविध्वंसनाय धूपम् नि० स्वाहा ।

समयसार वैभव के भव्य अपूर्व मनोरम फल पाऊँ ।
“णियमं मोक्ख उवायो”(9) द्वारा महा मोक्ष पद प्रगटाऊँ ।।कुन्द०।।

ॐ ह्रीं श्री कुन्दकुन्दाचार्यदेवाय मोक्षफलप्राप्तये फलम् नि० स्वाहा ।

समयसार वैभव का निर्मल भाव अर्घ्य उर में लाऊँ ।
“अहमिक्को खलु सुद्धो”(10) चिंतन कर अनर्घ्यपदको पाऊँ ।।कुन्द०।।

ॐ ह्रीं श्री कुन्दकुन्दाचार्यदेवाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यम् नि० स्वाहा ।

जयमाला

मङ्गलमय भगवान् वीर प्रभु मङ्गलमय गौतम गणधर ।
मङ्गलमय श्री कुन्दकुन्द मुनि, मङ्गलमय जैन धर्म सुखकर ।।
कन्नड़ प्रान्त बड़ा दक्षिण में कोण्डकुण्ड था ग्राम अपूर्व ।
कुन्दकुन्द ने जन्म लिया था दो सहस्र वर्षों के पूर्व ।।

ग्यारह वर्ष आयु थी जब तुमने स्वामी वैराग्य लिया ।
श्रेष्ठ महाव्रत धारण करके मुनि पद का सौभाग्य लिया ।।
एक दिवस जङ्गल में बैठे घोर तपस्या में थे लीन ।
कंचन सी काया तपती थी आत्म ध्यान में थे तल्लीन ।।

उसी समय इक पूर्व जन्म का मित्र देव व्यंतर आया ।
देख तपस्यारत भू पर आ श्रद्धा से मस्तक नाया ।।
ध्यान पूर्ण होने पर मुनि ने जब अपनी आँखें खोली ।
देखा देव पास बैठा है बोले तब हित मित बोली ।।

धर्म वृद्धि हो, धर्म वृद्धि हो, धर्म वृद्धि हो, तुम हो कौन ।
हर्षित पुलकित गद्गद् होकर तोड़ा तब व्यन्तर ने मौन ।।
नमस्कार कर भक्ति भाव से पूर्व जन्म का दे परिचय ।
पिछले भव में परम मित्र थे क्षमा करें मेरी अविनय ।।

सीमंधर स्वामी के दर्शन को विदेह भू जाता हूँ ।
यही प्रार्थना चलें आप भी नम्र विनय मन लाता हूँ ।।
चिर इच्छा साकार हुई मुनिवर ने स्वर्ण समय जाना ।
बोले श्री जिनवाणी सुनकर मुझे लौट भारत आना ।।

मुनि को साथ लिया उसने आकाश मार्ग से गमन किया ।
तीर्थङ्कर सर्वज्ञ देव को जा विदेह में नमन किया ।।
सीमन्धर के समवरण को देखा मन में हर्षाये ।
जन्म-जन्म के पातक क्षय कर अनुपम ज्ञान रत्न पाये ।।

सीमन्धर प्रभु के चरणों में झुक कर किया विनय वन्दन ।
प्रभु की शांत मधुर छवि लखकर धन्य हुए भारत नन्दन ।।
प्रभु से प्रश्न हुआ लघु मुनिवर कौन कहाँ से आये हैं ।
खिरी दिव्यध्वनि कुन्दकुन्द मुनि भरत क्षेत्र से आये हैं ।।

सीमन्धर ने दिव्यध्वनि में कुन्दकुन्द का नाम लिया ।
भव-भव के अघ नष्ट हो गये मुनि ने विनय प्रणाम किया ।।
विनयी होकर कुन्दकुन्द ने जिनवाणी का पान किया ।
अष्ट दिवस रह समवशरण में द्वादशांग का ज्ञान लिया ।।

अक्षय ज्ञान उदधि मन में भर और हृदय में प्रभु का नाम ।
सीमन्धर तीर्थङ्कर प्रभु को करके बारम्बर प्रणाम ।।
फिर विदेह से चले और नभ पथ से भारत में आये ।
तीर्थङ्कर वाणी का सागर मन-मन्दिर में लहराये ।।

जो सुनकर आये जिनवाणी फिर उसको लिपि रूप दिया ।
जगत् जीव कल्याण करें निज ऐसा शास्त्र स्वरूप दिया ।।
राग मात्र को हेय बताया उपादेय निज शुद्धातम ।
भाव शुभाशुभ का अभाव कर होता चेतन परमातम ।।

समयसार में निश्चय-नय का पावन मय सन्देश भरा ।
श्री पञ्चास्तिकाय को रचकर द्रव्य तत्त्व उपदेश भरा ।।
प्रवचनसार बनाया तुमने भेदज्ञान को बतलाया ।
मूलाचार लिखा मुनि जन हित साधु मार्ग को दर्शाया ।।

नियमसार की रचना अनुपम रयणसार गूँथा चितलाय ।
लघु सामायिक पाठ बनाया लिखा सिद्ध प्राभृत सुखदाय ।।
श्री अष्टपाहुड़ षट्प्राभृत द्वादशानुप्रेक्षा के बोल ।
चौरासी पाहुड़ लिक्खे जो ज्ञात नहीं हमको अनमोल ।।

ताड़पत्र पर लिखे ग्रन्थ सब सफल हुई चिर अभिलाषा ।
जन-जन की वाणी कल्याणी धन्य हुई प्राकृत भाषा ।।
जीवों के प्रति करुणा जागी मोक्षमार्ग उपदेश दिया ।
और तपस्याभूमि बनाकर गिरि कुन्दाद्रि पवित्र किया ।।

अमृतचन्द्राचार्य देव की टीका आत्मख्याति विख्यात ।
पद्मप्रभमलधारि देव टीका नियमसार प्रख्यात ।।
श्री जयसेनाचार्य रचित तात्पर्यवृत्ति टीका पावन ।
श्री कानजी स्वामी के भी अनुपम समयसार प्रवचन ।।

पद्मनन्दि गुरु वक्रग्रीव मुनि ऐलाचार्य आपके नाम ।
गृद्धपृच्छ आचार्य यतीश्वर कुन्दकुन्द हे गुण के धाम ।।
हे आचार्य आपके गुण वर्णन करने की मुझमें शक्ति नहीं ।
पथ पर चलें आपके ऐसी भी तो अभी विरक्ति नहीं ।।

भक्ति विनय के सुमन तुम्हारे चरणों में अर्पित हैं देव ।
भव्य भावना यही एक दिन मैं सर्वज्ञ बनूँ स्वयमेव ।।
“जीवादि सद्दहणं सम्मत्तं”(11) पाऊँ प्रभु करूँ प्रणाम ।
इन चरणों को पूजन का फल पाऊँ सिद्ध पुरी का धाम ।।

ॐ ह्रीं श्री कुन्दकुन्दाचार्यदेवाय अनर्घ्यपदप्राप्तये महार्घ्यं नि० स्वाहा ।

(दोहा)
कुन्दकुन्द मुनि के वचन, भाव सहित उरधार ।
निज आतम जो ध्यावते, पाते ज्ञान अपार ।।

(इत्याशीर्वादः)

टिप्पणी
(1) परिणामों से बन्ध और परिणामों से मोक्ष होता है।
(2) धर्म का मूल सम्यक्दर्शन है।
(3) वस्तु स्वभाव ही धर्म है।
(4) चारित्र ही धर्म है।
(5) श्रावक धर्म में दान और पूजा मुख्य है।
(6) जो अरहन्त को जानता है।
(7) जो पुरुष दर्शन से भ्रष्ट है, वे भ्रष्ट हैं।
(8) व्यवहार नय अभूतार्थ है।
(9) (रत्नत्रय रूप) नियम मोक्ष का उपाय है।
(10) मैं निश्चय से एक हूँ, शुद्ध हूँ।
(11) जीवादि पदार्थों का श्रद्धान सम्यग्दर्शन है।


Artist: कवि राजमल पवैया
स्रोत: बृहज्जिनवाणी संग्रह (विशेष पूजन खण्ड), पृष्ठ १५९ से १६३
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ २६९ से २७३