पिता-हठ तजो रे बेटा ! हठ तजो, मत जाओ वनवास, बेटा हठ तजो।
कुंदकुंद- मोह तजो रे पिताजी मोह तजो, जाने दो वनवास, पिताजी.. ।
पिता-वन में कंकर, वन में कंटक, वन में बाघ विकराल… ।
कुंदकुंद- बाघ सिंह तो परम मित्र हैं, धरूँगा आतम ध्यान,
सुख वैभव भंडार भरा है, तेरे ही आधार ।
यह संसार दावानल सुलगे, सुख जलावन हार।।
पिता- लाड़ लड़ाऊँ प्रेम से तुझको, ले लो मिष्ट पकवान।
कुंदकुंद- काया मिट्टी की अरे ! क्या पोषे दुःखदाय।
पिता- ऊँचे-ऊँचे महल मनोहर, हीरा-मोती अपार ।
कुंदकुंद- महल-मसान, हीरा अरु मोती, रे ! रे! पुद्गल का ठाठ।
पिता- भयंकर वन में कैसे सहेगा, वर्षा मूसलाधार ।
कुंदकुंद- अतीन्द्रिय सुख में मग्न हो, धरूँगा ध्रुव का ध्यान।
पिता- कोमल काया है तेरी कैसे सहे आताप ।
कुंदकुंद- श्रीफल में गोला जुदा, जुदी नरेटी छाल,
शुद्धातम गोला त्यों जुदा, जुदा करम औ राग।
आज्ञा दे दो शीघ्र पिताजी, जाऊँ मैं वनवास ।।
पिता- धनि-धनि तव वैराग्य है, जाओ खुशी से आज ।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह