श्री कुंडलपुर सिद्धक्षेत्र पूजन | Shri Kundalpur Siddhkshetra Pujan

श्री कुंडलपुर सिद्धक्षेत्र पूजन

(वीर)
कुंडलपुर जी सिद्धक्षेत्र में आदिनाथ प्रभु रहे विराज ।
हे त्रिलोक के नाथ स्वयंभू, भव्य जनों के हो सरताज ।।
भरत क्षेत्र के अंतिम केवलि, श्रीधर प्रभु यहाँ मुक्त हुये।
धन्य हुई यह पावन भूमि, खिरी दिव्य ध्वनि सिद्ध हुये ।।
जिन संस्कृति की अमर धरोहर, सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर तीर्थ ।
हृदय विराजो हे तीर्थेश्वर, पाऊँ परम विशुद्धि शीघ्र ॥
ॐ ह्रीं श्री कुंडलपुरसिद्धक्षेत्रे आदिनाथ जिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री कुंडलपुरसिद्धक्षेत्रे आदिनाथ जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री कुंडलपुरसिद्धक्षेत्रे आदिनाथ जिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।

(ताटंक)
कितनी सुन्दर जिन प्रतिमा है, महाभाग्य दर्शन पाये ।
पल पल रहूँ निरखता प्रभु को, रोम-रोम मम हर्षाये ।।
श्रीधर प्रभुवर श्री पद पाया, मैं भी पाने आया हूँ ।
आज प्रभो आदीश्वर दर पर, भक्ति-भाव-जल लाया हूँ ॥
ॐ ह्रीं श्री कुंडलपुर सिद्धक्षेत्रे आदिनाथ जिनेन्द्राय जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जलं
निर्वपामीति स्वाहा ।
भवाताप की अग्नि भयंकर, दुखिया हैं सब संसारी ।
तत्त्वज्ञान की शीतल वर्षा, तुम ही करते त्रिपुरारी ॥
श्रीधर प्रभुवर श्री पद पाया, मैं भी पाने आया हूँ।
आज प्रभो आदीश्वर दर पर, निर्मल चंदन लाया हूँ ॥
ॐ ह्रीं श्री कुंडलपुर सिद्धक्षेत्रे आदिनाथ जिनेन्द्राय भवाताप विनाशनाय चंदनं
निर्वपामीति स्वाहा।

क्षण-भंगुर सब रूप संपदा, अब न कभी लुभाऊँगा।
निज चैतन्य स्वरूप सम्पदा, शाश्वत नित अपनाऊँगा ।।
श्रीधर प्रभुवर श्री पद पाया, मैं भी पाने आया हूँ।
आज प्रभो आदीश्वर दर पर, अक्षत लेकर आया हूँ ।।
ॐॐ ह्रीं श्री कुंडलपुर सिद्धक्षेत्रे आदिनाथ जिनेन्द्राय अक्षयपद प्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति
स्वाहा ।
काम-केतु का ध्वंस करूँ मैं, काम रहित प्रभु हो जाऊँ।
सुकृत भी तो भोग-मूल हैं, बस शुद्धातम ही ध्याऊँ ।।
श्रीधर प्रभुवर श्री पद पाया, मैं भी पाने आया हूँ।
आज प्रभो आदीश्वर दर पर, पुष्प संजोकर लाया हूँ ॥
ॐ ह्रीं श्री कुंडलपुर सिद्धक्षेत्रे आदिनाथ जिनेन्द्राय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं
निर्वपामीति स्वाहा ।
त्याग विराग न मन में भाया, शुष्क ज्ञान में मस्त रहा ।
त्याग विराग हुआ तो उसमें, धर्म मान सन्तुष्ट रहा ।।
श्रीधर प्रभुवर श्री पद पाया, मैं भी पाने आया हूँ।
आज प्रभो आदीश्वर दर पर, नेवज लेकर लाया हूँ ।।
ॐ ह्रीं श्री कुंडलपुर सिद्धक्षेत्रे आदिनाथ जिनेन्द्राय क्षुधा रोग विनाशनाय नैवेद्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।
मोह-तिमिर के कारण जग में, चारों दिशि है अंधियारा ।
आत्मज्ञान के बिना प्रभु जी, कैसे होवे उजियारा ॥
श्रीधर प्रभुवर श्री पद पाया, मैं भी पाने आया हूँ।
आज प्रभो आदीश्वर दर पर, दीप चढ़ाने आया हूँ ।।
ॐ ह्रीं श्री कुंडलपुर सिद्धक्षेत्रे आदिनाथ जिनेन्द्राय मोहांधकार विनाशनाय दीपं
निर्वपामीति स्वाहा ।
भाव अशुभ ही नहीं अहो प्रभु, शुभ से भी बंधन होता ।
सब कर्मों को सदा निमंत्रण, भाव आस्रव ही देता ।।
श्रीधर प्रभुवर श्री पद पाया, मैं भी पाने आया हूँ।
आज प्रभो आदीश्वर दर पर, धूप दशांगी लाया हूँ ।।
ॐ ह्रीं श्री कुंडलपुर सिद्धक्षेत्रे आदिनाथ जिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति
स्वाहा ।

फल पाने की मनोकामना, जग में भ्रमण कराती है।
नारायण प्रतिनारायण पदवी, इसी भाव से आती है ॥
श्रीधर प्रभुवर श्री पद पाया, मैं भी पाने आया हूँ।
आज प्रभो आदीश्वर दर पर, फल चरणों में लाया हूँ ॥
ॐ ह्रीं श्री कुंडलपुर सिद्धक्षेत्रे आदिनाथ जिनेन्द्राय मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति
स्वाहा ।
आदिनाथ प्रभु प्रथम तीर्थंकर, ब्रह्मा विष्णु तुम्ही महेश ।
मुक्तिमार्ग के आद्य विधाता, दिव्यध्वनि दाता परमेश ॥
श्रीधर प्रभुवर श्री पद पाया, मैं भी पाने आया हूँ।
आज प्रभो आदीश्वर दर पर, अर्घ्य चढ़ाने आया हूँ ॥
ॐ ह्रीं श्री कुंडलपुर सिद्धक्षेत्रे आदिनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति
स्वाहा ।
जयमाला
(दोहा)
शुद्धातम में मगन हो, हुये सिद्ध भगवान ।
श्रीधर प्रभुवर पथ चलूँ, पाऊँ पद अम्लान ॥
(चौपाई)
जय जय श्री-श्रीधर जिन स्वामी, मुक्त हुये हे त्रिभुवन नामी ।
अंतिम केवलि आप हमारे, कुंडलपुर से मुक्ति पधारे ॥
पंचमगति तुमने प्रगटायी, भव संतति से मुक्ति पायी ।
आगम गावे गान तुम्हारा, भव्यजनों को तारण हारा ॥
जय जय श्री आदीश्वर स्वामी, हे प्रभु तुम हो अंतर्यामी ।
तीन भुवन में नाम तुम्हारा, ब्रह्मा, विष्णु, कहे जग सारा ॥
पद्मासन प्रतिमा मनहारी, सारे जग में ख्याति तुम्हारी ।
औरंगजेब यहाँ जब आया, अतिशय देख विरोध नशाया ॥
राजा छत्रसाल भी आये, प्रभु दर्शन कर समता पाये ।
तत्त्व ज्ञान की सीख जगायी, शांति यहाँ उनने भी पाई ॥
शरण आपकी तारणहारी, अंतर्मुखी सौम्य छवि प्यारी ।

यह संसार महावन भारी, महामोह भारी बीमारी ।
शिव मारग नहीं कहीं सुझावे, विषय वासना जियत जलावे ।
शुद्धातम तुम ही दर्शाते, भेद ज्ञान की कला सिखाते ।।
अरे हजारों समवशरण से, लाभ नहीं जो भी मिल पाता ।
एक अचल जिनमुद्रा लखकर, लाभ जगत जन है पा जाता ।।
कैसी सुन्दर जिन प्रतिमा है, कैसा सुंदर प्रभु का रूप ।
रहूँ निरखता पल-पल तुमको, साधूँ सुन्दर आत्म स्वरूप ।।
अर्हन्त प्रभु साक्षात विराजे, मन आनंदित हो जाता ।
लगता प्रभु हमसे कहते हैं, तेरा जग से क्या नाता ।।
हम भी आतम ध्यान लगावें, परमातम पद में खो जावें ।
जग में और नहीं भरमावें, तुम जैसा ही शिवपद पावें ।।
प्रभू आपकी सदा शरण हो, भाव समाधि सहित मरण हो ।
कुंडलपुर वाले जिनवर की, सदा शरण हो भव विजयी की ।।
ॐ ह्रीं श्री कुंडलपुर सिद्धक्षेत्रे आदिनाथ जिनेन्द्राय जयमाला पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति
स्वाहा ।

(दोहा)
मंगलमय मंगलकरन, सिद्ध स्वभाव महान ।
रत्नत्रय पद प्रगट कर, पाऊँ शिव अम्लान ।।
(पुष्पांजलिं क्षिपामि)


Artist: पं. राजेन्द्र कुमार जैन
स्रोत: जिनेन्द्र पूजन