श्री कानजी स्वामी के प्रवचनों की विशेषता | Shri Kanaji Svami Ke Pravachanon Ki Visheshata

श्री कानजी स्वामी के प्रवचनों की विशेषता

-प्रो. वीरसागर जैन

आध्यात्मिक सत्पुरुष श्री कानजी स्वामी को कौन नहीं जानता ? उनके व्यक्तित्व का एक अत्यंत प्रमुख पक्ष था- उनका प्रवचनकार । कानजी स्वामी एक उच्च कोटि के प्रवचनकार थे । उनके प्रवचन अत्यंत आकर्षक होते थे । उनके प्रवचनों का श्रोताओं पर जादू जैसा प्रभाव पड़ता था । जो भी व्यक्ति एक बार उनका प्रवचन सुनता था, वह उनका दीवाना बन जाता था । उनके प्रवचनों से दुनिया भर के लाखों लोग पूरी तरह बदल गये, अपने कुलधर्म तक को त्यागकर उनके साथ हो गये, जो कि आसान नहीं होता ।

विचारणीय है कि आखिर उनके प्रवचनों में ऐसी क्या विशेषता थी, वे कैसे इतने सफल, सार्थक या उत्कृष्ट वक्ता बने; क्योंकि वक्ता बनना आसान नहीं होता- ‘वक्ता दशसहस्रेषु’, लोग इस कला के लिए भारी शिक्षण-प्रशिक्षण लेते हैं, बारम्बार अभ्यास करते हैं, जरा-जरा-सी बातों पर बड़ा ध्यान देते हैं, बहुत तरह की तैयारियां करते हैं, और फिर भी वे बड़े वक्ता नहीं पाते हैं । जबकि कानजी स्वामी ने न तो कभी इसका कोई शिक्षण-प्रशिक्षण लिया था और न ही वे उसकी कोई तैयारी या अभ्यास करते थे, उनकी तो औपचारिक शिक्षा भी बहुत कम थी, वे केवल छठी कक्षा तक पढ़े थे ।

दरअसल, कानजी स्वामी वक्ता बनने के लिए वक्ता नहीं बने थे, प्रवचन करने के लिए प्रवचन नहीं करते थे, वक्ता बनना या कहलाना उनका उद्देश्य नहीं था । उन्होंने तो बड़े परिश्रम से घोर साधना करके जो अद्भुत ज्ञान स्वयं प्राप्त किया था, उसे ही अत्यंत करुणा भाव से लोगों को समझाने का प्रयास किया था, वह भी एकदम निष्काम/निःस्वार्थ भाव से, निरपेक्ष भाव से । उन्हें अपने व्याख्यान के बदले में कुछ नहीं चाहिए था, धनादि तो दूर, कोई सम्मान-पुरस्कारादि भी नहीं ।

एक बार एक व्यक्ति ने मिर्जा ग़ालिब से कहा- “आप बहुत अच्छी शायरी बनाते हैं, मुझे भी सिखा दीजिए न ?” ग़ालिब का उत्तर ध्यान देने योग्य है- “इश्क़ को दिल में जगह दे ग़ालिब, इल्म से शायरी नहीं आती ।”

कानजी स्वामी और अन्य वक्ताओं में यही अंतर है । अन्य वक्ता इल्म तो बहुत सीखते हैं, पर इश्क को दिल में जगह नहीं दे पाते । कानजी स्वामी ने इल्म नहीं सीखा, पर दिल के कोने-कोने में इश्क भर दिया ।

इसी तरह की एक बहुत गहरी बात आचार्य गुणभद्रस्वामी ने भी अपने ‘आत्मानुशासन’ में कही है-

जनाः घनाश्च वाचालाः सुलभास्स्युर्वृथोत्थिताः ।
दुर्लभाः ह्यन्तरार्द्रा स्युः जगदभ्युदयजिहीर्षवः ॥

अर्थ- ऐसे जन और ऐसे घन (बादल) तो बहुत मिलते हैं जो वृथा ही उठते बोलते हैं, किन्तु ऐसे जन और ऐसे घन बहुत दुर्लभ हैं जो जगतकल्याण की कामना से अन्तर में भीगे हुए हों ।

कानजी स्वामी के प्रवचनों की सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि वे जगतकल्याण की पवित्र भावना से ही होते थे । उनकी अद्भुत सफलता का रहस्य भी यही है कि वे जगतकल्याण की कामना से अन्तर तक भीगे हुए थे | वे वृथा गरजने वाले बादलों में से नहीं थे, अपितु सम्पूर्ण लोक के सन्ताप को दूर कर परम शीतल कर देने की हार्दिक अभिलाषा से भीगे हुए बादल के समान थे | ( यही कारण है कि उनके प्रवचनों में बारम्बार करुणा के ऐसे कथन मिलते हैं कि- बधा जीवो परमात्मा थाओ, बापू ! सुन तो सही, इत्यादि | )

इसप्रकार कानजी स्वामी के प्रवचनों की सबसे बड़ी विशेषता तो यही थी कि वे जगतकल्याण की विशुद्ध भावना से ही होते थे और वह भी अत्यंत निःस्वार्थ भाव से |

कहने की आवश्यकता नहीं है कि यही वह मूल तत्त्व है जिससे कोई भी वक्ता एक सफल सार्थक वक्ता बनता है और जिसके बिना कोई भी व्यक्ति कथमपि सफल सार्थक वक्ता नहीं बन सकता | कोई भी वक्ता जब लोककल्याण की ऐसी निःस्वार्थ भावना से भरता है तो उसमें सहज ही वक्तृत्व कला के सर्व गुण विकसित हो जाते हैं, उसे उनका अलग से शिक्षण-प्रशिक्षण नहीं लेना पड़ता |

इस प्रकार यहाँ मैंने श्री कानजी स्वामी के प्रवचनों की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण केन्द्रीय विशेषता की ओर आपका ध्यान आकर्षित किया है, किन्तु इसका अर्थ ऐसा नहीं है कि उनके प्रवचनों की विशेषताओं को बिन्दुवार पद्धति से नहीं प्रस्तुत नहीं किया जा सकता, अपितु अवश्य ही प्रस्तुत किया जा सकता है और उसमें दृष्टान्त शैली, तार्किक शैली, व्याख्या शैली, ग्रन्थ को श्रोता के भी सामने रखकर प्रवचन सुनाना आदि अनेक बिन्दु उद्धरणपुरस्सर प्रस्तुत किये जा सकते हैं, परन्तु एक तो मैंने अभी उनको अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं समझा है और दूसरा- अभी मुझे उतना समय नहीं है, बाद में समय मिलने पर मैं उसे भी लिखने का प्रयास करूंगा |