श्री कलिकुण्ड पार्श्वनाथ जिन पूजा (नाथूराम) | Shri Kalikund Parshvanath Jin Puja (Nathuram)

श्री कलिकुण्ड पार्श्वनाथ जिन पूजा (नाथूराम) | Shri Kalikund Parshvanath Jin Puja (Nathuram)

(मंगल पाठ) ॐ नमः सिद्धेभ्यः
मंगल मूर्ति परम पद, पंच धरो नित ध्यान ।
हरो अमंगल विश्व का, मंगलमय भगवान् ।।१।।

मंगल जिनवर पदनमो, मंगल अर्हंत देव ।
मंगलकारी सिद्ध पद, सो वन्दो स्वयमेव ।।२।।

मंगल आचार्य मुनि, मंगल गुरु उवझाय ।
सर्व साधु मंगल करो, वन्दो मन वच काय ।।३।।

मंगल सरस्वती मात का, मंगल जिनवर धर्म ।
मंगल मय मंगल करो, हरो असाता कर्म ।।४।।

या विधि मंगल से सदा, जग में मंगल होत ।
मंगल नाथूराम यह, भव सागर दृट पोत ।।५।।

।।इति मंगलपाठ।।

श्री कलिकुण्ड पार्श्वनाथ जिन पूजा (भाषा)
अडिल्ल छंद-हूँ कार अक्षरात्मक देव जो ध्यावते ।
देव मनुष पशु कृत सो व्याधि नशावते ।।
कांसो तांबे पत्र पै शुद्ध लिखावते ।
केशर चन्दन ता पर गंध रचावते ।।
दोहा-ऐसे अनुपम यंत्र को, मन वच काय संभार ।
जे भवि पूजें प्रीति धर, हों भवदधि से पार ।।१।।

।।यंत्र स्थापना।। चाल जोगीरासा ।।

है महिमा को थान शुद्धवर यंत्र कलिकुण्ड जानो ।
डाकिनि शाकिनि अगनि चोर भय नाशत सब दुख खानो ।।
नव ग्रहों का सब दुख नाशो रवि शनि आदि पिछानो ।
तिनका मैं स्थापन करहूँ त्रिविधि योग मन लानो ।।

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं कलिकुण्ड दण्ड श्री पार्श्वनाथ धरणेन्द्र

पद्मावती सेवित अतुलबल-वीर्य-पराक्रम युक्त सर्वविघ्न-विनाशक,
अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः
स्थापनम् । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम् ।।
।।अथाष्टक।।

छंदत्रिभंगी-गंगाको नीर अति ही शीरं गंध गहीर मेल सही ।
भर कंचन झारी आनंद धारी धार करो मन प्रीति लही ।।
कलिकुण्ड सुयंत्रं पढ़ कर मंत्र ध्यावत जे भवि जन ज्ञानी ।
सब विपति विनाशैं, सुख परकाशैं, होवै मंगल सुखदानी ।।

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं कलिकुण्ड दंड श्री पार्श्वनाथाय धरणेंद्र

पद्मावती सेविताय अतुल बलवीर्य पराक्रमाय सर्व विघ्न विनाशनाय
ह्म्ल्व्र्यूं भ्म्ल्व्र्यूं म्म्ल्व्र्यूं र्म्ल्व्र्यूं घ्म्ल्व्र्यूं झ्म्ल्व्र्यूं स्म्ल्व्र्यूं ख्म्ल्व्र्यूं जन्म
जरा मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।।१।।

क्षीरोदधिनन्दन मलया चन्दन केशर और कर्पूर घसो ।
भर सुवरण कलशा मन अति हुलसा भय वा ताप का दुःख
नशो । कलिकुण्ड सु० ।।चंदन।।२ ।।

नोट-प्रत्येक द्रव्य चढ़ाते समय पूरा मंत्र पढ़िये ।
शशि सम उजियारो तंदुल प्यारो अणि इक सारो जुगलेवो ।
हो गंध मनोहर रतन थार भर पुञ्ज मुखर मद तज देवो
।।कलिकुण्ड०।। अक्षत ।।३।।

बहु फूल सुवासं मधुकर रासं करके आसं आवत हैं ।
सुरतरु के लावो पुण्य बढ़ावो काम व्यथा नश जावत हैं ।।
कलिकुण्ड० ।।पुष्प।। ४ ।।

पकवान बनाये बहु घृत लाये खांड पगाये मिष्ट करे ।
मन आनन्द धारैं मंत्र उचारैं क्षुधा रोग तत्काल टरे ।।
कलिकुण्ड० ।।नैवेद्यं।। ५ ।।

रतनन की जोतं अति उद्योतं तम क्षय होत ज्ञान बढ़ै ।
अति ही सुख पावै पाप नशावै जो मन लावै पाठ पढ़ै ।।
कलिकुण्ड० ।।दीप।। ६ ।।

चंदन कर्पूरं अगर गुचूरं लौंगादिक दश गंध मिला ।
वर धूप बनाकर अगनि मांहि धर, दुष्ट कर्म तत्काल जला ।।
कलिकुण्ड० ।।धूपं।। ७ ।।

खर्जूर मंगावो श्रीफल लावो दाख अनार बदाम खरे ।
पुंगीफल प्यारे मन सुखकारे अन्तराय विधि दूर करे ।।
कलिकुण्ड० ।।फलं।। ८ ।।

जल गंध सुधारा तंदुल प्यारा पुष्प चरु ले दीप भली ।
दश धूप सुरङ्गी फल ले अभङ्गी करो अर्घ उर हर्ष रली ।।
कलिकुण्ड० ।।अर्घं।। ।।९।।

जयमाला ।
सर्वज्ञ परम गुण सागर हैं, तिन पद के हरि सब चाकर हैं ।
सब विघ्न विनाशक सुखकर हैं ।। कलिकुन्डसुयंत्र नमूं वर है
नित ध्यान करैं जो जन मन ला, वर पूज रचैं कर यंत्र
भला । सब विघ्न० ।।२।।

तिनके घर ऋद्धि अनेक भरैं । मन वांछित कारज सर्व सरैं
सब विघ्न० ।।३।।

सुर वंदित हैं तिनके चरण, उर धर्म बढ़े अघ को हरण ।।
सब विघ्न० ।।४।।

भय चोर अगनि जल सांप मही, सब व्याधि नशै छिन में
जु सही ।।सब विघ्न०।।५ ।
सब बन्ध खुलैं छिन मांहि लखो, अरि मित्र होय गुरु सांच
अखो ।।सब विघ्न०।।६ ।।

अतिसार संग्रहणी रोग नसैं, वंझा नारी लह पुत्र हसैं ।।
सब विघ्न० ।।७।।

सब दूर अमंगल होय जान, सुख संपत दिन दिन बढ़त
मान ।।सब विघ्न०।।८ ।।

इस यंत्र की जे पूजा करत,सुर नर सुख लह हो मुकति कंत ।।
सब विघ्न० ।।९।।

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं कलिकुण्डदंड श्रीपार्श्वनाथाय धरणेंद्र

पद्मावति-सेविताय अतुल-बलवीर्य-पराक्रमाय सर्व-विघ्न-विनाशकाय महार्घं निर्व० ।।
जाप्य मंत्र ।

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं श्रीपार्श्वनाथाय धरणेंद्रपद्मावती

सेविताय ममेप्सित कार्यं कुरु कुरु स्वाहा ।।

जयमाला

नागेंद्र प्रभु के चरण नमते मुकुट प्रभा महा बढ़ी ।
बढ़ो पुण्य अपार सब दुख कार अघ प्रकृति घटी ।।
ध्याये श्री कलिकुण्ड दण्ड प्रचण्ड पारसनाथ जी ।
तिनकी सुनो जयमाल भविजन कहूँ नवाके माथ जी ।।१।।

त्रोटक छन्द

विधि घाति हनो वर ज्ञान लहो, सब ही पदार्थ को भेद कहो ।
नित यंत्र नमूं कलिकुण्ड सार, सब विघ्न विनाशन सुक्खकार २
कुमती वसु मान विनाशत हैं, मुकती का मारग भाषत हैं ।
नित यंत्र० ।।३।।

दुर्गति मारग का नाश करै, एकांत मिथ्यात विवाद हरै ।
नित यंत्र० ।।४।।

निराकुल निर्मल शील धरै, निर्मल मुक्त लक्ष्मी को वरै ।
नित यंत्र० ।।५।।

नहीं क्रोध मान छल लोभ पाप, अष्टादश दोष विमुक्त आप ।
नित यंत्र० ।।६।।

हैं अजर अमर गुण के भंडार, सब विघ्न विनाशक परम
सार ।।नित यंत्र०।।७ ।।

नागेंद्र नरेंद्र सुरेंद्र आय, नमि है आनन्दित चित्त लाय ।
नित यंत्र० ।।८।।

दिनेंद्र मुनेंद्र निशेन्द्र आय, पूजत नित मनमें हर्ष धार ।।
नित यंत्र० ।।९।।

(घत्ता छन्द)
सब पाप निवारण, संकट टारण, कलिकुण्ड पारस परचंड ।
जग में यश पावैं, संपति आवैं, लहै मुकत जो सुख है अखण्ड ।
प्रति दिन जो बन्दैं, मन आनन्दैं हो बलवन्त पाप सब दूर ।।
सवविघ्न विनाश लहैं सुख संपति दुष्टकर्म होवैं चकचूर ।।अर्घ।।

श्री पारस स्वामी अन्तर्यामी, ध्यान लगायो वन मांही ।
चर कमठ जु आयो क्रोध बढ़ायो परिषह कीनी अधिकाई ।।
जिन मेरु समाना अचल महाना लख नागेंद्र ने पूज कियो ।
सुर फण मंडप कीनो सुरबल हीनो है प्रभु को निज शीस नयो
।।महार्घं।।

सोरठा

पूजन ये सुखकार, जे भवि करि है प्रीतिधर ।
विधि बलवंत अपार, हन कर शिव सुखको लहै ।।
।।इत्याशीर्वाद।। पुष्पांजलि क्षिपेत् ।।


Artist: नाथूराम
स्रोत: पूजन-पाठ-प्रदीप (सातवां संस्करण, देहली), पृष्ठ २६३ से २६८