श्री जिनवाणी (सरस्वती) पूजन (कवि राजमल पवैया) | Shri Jinvani Saraswati Pujan (Rajmal Pavaiya)

श्री जिनवाणी पूजन

श्री जिनवाणी पूजन - 2

जय जय श्री जिनवाणी जय जग कल्याणी जय जय जय ।
तीर्थंकर की दिव्यध्वनि जय, गुरु गणधर गुम्फित जय जय ।।
स्याद्वाद पीयूषमयी जय लोकालोक प्रकाशमयी ।
द्वादशांग श्रुत ज्ञानमयी जय वीतराग विज्ञानमयी ।।

श्री जिनवाणी के प्रताप से मैं अनादि मिथ्यात्व हरूँ ।
श्री जिनवाणी मस्तक धारूँ बारम्बार प्रणाम करूँ ।।

ॐ ह्रीं श्री जिनमुखोद्भवसरस्वतिवाग्वादिनि ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री जिनमुखोद्भवसरस्वतिवाग्वादिनि ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री जिनमुखोद्भवसरस्वतिवाग्वादिनि ! अत्र मम् सन्निहितो भव भव वषट् ।

मिथ्यात्व कलुषता के कारण पाया न बिन्दु समताजल का ।
अपने ज्ञायकस्वभाव का भी अब तक प्रतिभास नहीं झलका ।।

मैं श्री जिनवाणी चरणों में मिथ्यातम हरने आया हूँ ।
श्री महावीर की दिव्यध्वनि हृदयंगम करने आया हूँ ।।

ॐ ह्रीं श्री जिन मुखोद्भव सरस्वतीदैव्य जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।

श्रद्धा विपरीत रहो मेरी निज पर का ज्ञान नहीं भाया ।
चन्दन सम शीतलता मय हूँ इतना भी ध्यान नहीं आया ।।मैं श्री।।

ॐ ह्रीं श्री जिन मुखोद्भव संसारताप विनासनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।

यह आधि व्याधि पर की उपाधि भव भ्रमण बढ़ाती आई है ।
अक्षय अखण्ड निज की समाधि अब तक नकभी भी पाई है ।।मैं श्री।।

ॐ ह्रीं श्री जिन मुखोद्भव सरस्वतीदैव्य अक्षय पद प्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।

एकत्व बुद्धि करके पर में कर्त्तापन का अभिमान किया ।
मैं निज का कर्ता भोक्ता हूँ ऐसा न कभी भी भान किया ।।मैं श्री।।

ॐ ह्रीं श्री जिनमुखोद्भवसरस्वतीदैव्य कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।

यह माया अनन्तानुबन्धी प्रति समय जाल उलझाती है ।
चारों कषाय की यह तृष्णा उलझन न कभी सुलझती है ।।मैं श्री।।

ॐ ह्रीं श्री जिन मुखोद्भव सरस्वतीदैव्य क्षुधारोग विनासनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

तत्वों के सम्यक् निर्णय बिन श्रद्धा की ज्योति न जल पाई ।
अज्ञान अंधेरा हटा नहीं सन्मार्ग न देता दिखलाई ।।मैं श्री।।

ॐ ह्रीं श्री जिन मुखोद्भव सरस्वतीदैव्य मोहान्धकार विनासनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।

होकर अनन्त गुण का स्वामी, पर का ही दास रहा अबतक ।
निज गुणकी सुरभि नहीं भाई भवदधि में कष्ट सहा अबतक ।।मैं श्री।।

ॐ ह्रीं श्री जिन मुखोद्भव सरस्वतीदैव्य अष्टकर्म विध्वंसनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।

मैं तीन लोक का नाथ पुण्य धूल के पीछे पागल हूँ ।
चिन्तामणी रत्न छोड़कर मैं रागों में आकुल-व्याकुल हूँ ।।मैं श्री।।

ॐ ह्रीं श्री जिन मुखोद्भव सरस्वतीदैव्य महा मोक्ष फल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।

अब तक जितना पुण्य शेष हर्षित हो अर्पण करता हूँ ।
अनुपम अनर्घ पद पा जाऊँ मैं यही भावना भरता हूँ ।।मैं श्री।।

ॐ ह्रीं श्री जिन मुखोद्भव सरस्वतीदैव्य अनर्घपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

जयमाला

जय जय जय ओंकार दिव्यध्वनि योगीजननित करते ध्यान ।
मोहतिमिर मिथ्यात्व विनाशक ज्ञान प्रकाशक सूर्य समान ।।
वस्तु स्वरूप प्रकाशक निज पर भेद ज्ञान की ज्योति महान ।
सप्तभंग, स्याद्वाद नयाश्रित द्वादशांग श्रुत ज्ञान प्रमाण ।।

द्वादश अंग पूर्व चौदह, परिक्रर्म सूत्र से शोभित है ।
पंच चूलिका चौ अनुयोग प्रकीर्णक चौदह भूषित है ।।
जय जय आचारांग प्रथम जय सूत्र कृतांग द्वितीय नमन ।
स्थानांग तृतीय नमन जय चौथा समवायांग नमन ।।

जय व्याख्याप्रज्ञप्ति पाँचवां षष्टम् ज्ञातृधर्मकथांग ।
उपासकाध्ययनांग सातवाँ अष्टम् अन्तःकृतदशांग ।।
अनुत्तरोत्पादक दशांग नौ प्रश्न व्याकरण अंग दशम् ।
जय विपाकसूत्रांग ग्यारहवाँ दृष्टिवाद द्वादशम् परम् ।।

दृष्टिवाद के चौदह भेद रूप है चौदह पूर्व महान ।
ग्यारह अंगपूर्व नौ तक का द्रव्यलिंगि कर सकता ज्ञान ।।
पहला है उत्पाद पूर्व दूजा अग्रायणीय जानो ।
तीजा है वीर्यानुवाद चौथा है अस्तिनास्ति मानो ।।

पंचम ज्ञानप्रवाद कि षष्टम् सत्यप्रवाद पूर्व जानो ।
सप्तम आत्मप्रवाद, आठवाँ कर्मप्रवाद पूर्व मानो ।।
नवमा व्याख्यानप्रवाद सु दशवाँ विद्यानुवाद जान ।
ग्यारहवाँ कल्याणवाद बारहवाँ प्राणानुवाद महान ।।

तेरहवाँ क्रिया विशाल चौदहवाँ लोक बिन्दु है सार ।
अंग प्रविष्ट अरु अंग बाह्य के भेद प्रभेद सदा सुखकार ।।
दृष्टिवाद का भेद पाँचवां पंच चूलिका नाम यथा ।
जलगत थलगत मायागत अरु रूपगता आकाशगता ।।

पाँच भेद परिकर्म उपांग के प्रथम चन्द्र प्रज्ञप्ति महान ।
दूजा सूर्यप्रज्ञप्ति तीसरा जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति प्रधान ।।
चौथा द्वीप-समूह प्रज्ञप्ति पंचम व्याख्या प्रज्ञप्ति जान ।
सूत्र आदि अनुयोग अनेकों है उपांग धन-धन श्रुत ज्ञान ।।

तत्वों के सम्यक् निर्णय से होता शुद्धातम का ज्ञान ।
सरस्वती माँ के आश्रय से होता है शाश्वत कल्याण ।।
इसीलिए जिनवाणी का अध्ययन चिंतवन मैं कर लूँ ।
काल लब्धि पाकर अनादि अज्ञान निविड़तम को हरलूँ ।।

नव पदार्थ छह द्रव्य काल त्रय सात तत्व को मैं जानूँ ।
तीन लोक पंचास्तिकाय छह लेश्याओं को पहचानूँ ।।
षट्कायक की दया पालकर समिति गुप्तिव्रत को पालूँ ।
द्रव्यभाव चारित्र धार कर तप संयम को अपना लूँ ।।

निज स्वभाव में लीन रहूँ मैं निज स्वरूप में मुस्काऊँ ।
क्रम-क्रम से मैं चार घातियाँ नाश करूँ निज पद पाऊँ ।।
प्राप्त चतुर्दश गुणस्थान कर पूर्ण अयोगी बन जाऊँ ।
निज सिद्धत्व प्रगट कर सिद्धशिला पर सिद्धस्वपद पाऊँ ।।

यह मानव पर्याय धन्य हो जाये माँ ऐसा बल दो ।
सम्यक्दर्शन ज्ञान चरित रत्नत्रय पावन निर्मल दो ।।
भव्य भावना जगा हृदय में जीवन मंगलमय कर दो ।
हे जिनवाणी माता मेरा अन्तर ज्योतिर्मय कर दो ।।

ॐ ह्रीं श्री जिनमुखोद्भवसरस्वतीदैव्य पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

जिनवाणी का सार है भेद-ज्ञान सुखकार ।
जो अन्तर में धारते, हो जाते भव पार ।।

इत्याशीर्वादः


Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ २७७ से २८०