श्री गिनैंह पूजा संग्रह
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ॐ
श्री
जिनेन्द्र पूजा
संग्रह
: प्रकाशक :
श्री मद्रास दिगम्बर जैन स्वाध्याय मंडल ट्रस्ट
१५, चंपप्पा मुदली स्ट्रीट,
चेन्नई-६००००७
[ 10 ]
अनुक्रमणिका
1st DAY POOJA
विनयपाठ … 1
देव-शास्त्र-गुरु पूजा … 4
दशलक्षणपूजा … 9
उत्तम क्षमाधर्म अर्घ … 10
अर्घ्यावली … 11
समुच्चय अर्घ … 14
शांतिपाठ … 15
पंच परमेष्ठी आरती … 16
2nd DAY POOJA
आराधना पाठ … 17
श्री महावीर-जिनपूजा … 19
दशलक्षणपूजा … 22
उत्तम मार्दवधर्म अर्घ … 23
अर्घ्यावली … 24
समुच्चय अर्घ … 27
शांतिपाठ … 29
श्री महावीरांजलि आरती … 30
3rd DAY POOJA
विनयपाठ … 31
श्री शांतिनाथ जिनपूजा … 34
दशलक्षणपूजा … 35
उत्तम आर्जवधर्म अर्घ … 36
अर्घ्यावली … 38
समुच्चय अर्घ … 41
शांतिपाठ … 42
श्री शांतिजिनकी आरती … 43
4th DAY POOJA
आराधना पाठ … 44
श्री चंद्रप्रभ-जिनपूजा … 46
दशलक्षणपूजा … 48
उत्तम सत्यधर्म अर्घ … 49
अर्घ्यावली … 50
समुच्चय अर्घ … 53
शांतिपाठ … 54
श्री चंद्रप्रभु जिन आरती … 55
5th DAY POOJA
विनयपाठ … 56
श्री नेमिनाथ-जिनपूजा … 59
दशलक्षणपूजा … 60
उत्तम शौचधर्म अर्घ … 61
अर्घ्यावली … 63
समुच्चय अर्घ … 66
शांतिपाठ … 67
आरती … 68
6th DAY POOJA
आराधना पाठ … 69
श्री संभव-जिनपूजा … 71
दशलक्षणपूजा … 73
उत्तम संयमधर्म अर्घ … 74
अर्घ्यावली … 75
समुच्चय अर्घ … 78
शांतिपाठ … 79
श्री संभवकी आरती … 81
7th DAY POOJA
विनयपाठ … 82
श्री कुंदकुंदाचार्यदेवपूजा … 85
दशलक्षणपूजा … 86
[ 11 ]
उत्तम तपधर्म अर्घ … 87
अर्घ्यावली … 89
समुच्चय अर्घ … 92
शांतिपाठ … 93
श्री कुंदकुंदाचार्यदेवकी आरती … 94
8th DAY POOJA
आराधना पाठ … 95
स्वर्णभूति-तीर्थ स्वर्णपुरी पूजा … 97
दशलक्षणपूजा … 99
उत्तम त्यागधर्म अर्घ … 100
अर्घ्यावली … 102
समुच्चय अर्घ … 104
शांतिपाठ … 106
ॐ जय जिनदेवा … 107
9th DAY POOJA
विनयपाठ … 108
श्री घातकीवेद-शांतिजिनपूजा … 111
दशलक्षणपूजा … 113
उत्तम आकिंचनधर्म अर्घ … 114
अर्घ्यावली … 115
समुच्चय अर्घ … 118
शांतिपाठ … 120
श्री सूर्यकीर्तिजिन आरती … 121
10th DAY POOJA
आराधना पाठ … 122
रत्नत्रयपूजा … 124
श्री चौबीस-जिनपूजा … 125
दशलक्षणपूजा … 127
उत्तम ब्रह्मचर्यधर्म अर्घ … 128
अर्घ्यावली … 129
समुच्चय अर्घ … 132
शांतिपाठ … 134
श्री चौबीस तीर्थंकरोंकी आरती … 135
11th DAY POOJA
विनयपाठ … 136
क्षमावाणी पूजा … 139
अर्घ्यावली … 143
समुच्चय अर्घ … 146
शांतिपाठ … 148
पंच परमेष्ठीकी आरती … 149
Jinmandir Annual Day
(Dhvajaroahan) Pooja
देव-शास्त्र-गुरुपूजा … 153
श्री महावीर-जिनपूजा … 157
Samyaktya Jayanti Pooja
रत्नत्रयपूजा … 168
श्री चौबीस-जिनपूजा … 170
Gurudevshri Janm-Jayanti
Pooja
श्री घातकीवेद-शांतिजिनपूजा … 181
श्री संभव-जिनपूजा … 184
Bahenshri Janm-Jayanti
Pooja
भावी मुख्य गणधर पूजा … 195
स्वर्णभूति-तीर्थ स्वर्णपुरी पूजा … 199
Bhagvan Mahavir
Nirvan Pooja
वीतरागदि पूजा … 210
श्री महावीर-जिनपूजा … 215
श्री महावीरांजलि आरती … 222
[ 12 ]
ॐ
पूजनकी विधि
- स्वच्छ खाली थालीमें पूर्ण स्वस्तिक (साथियों) करना।
- पश्चात् नीचे ‘श्री’ शब्द लिखना चाहिए।
श्री
1st Day Pooja
1
1st DAY POOJA
विनयपाठ
(दोहा)
इहि विधि ठाड़ो होयकै, प्रथम पढ़े जो पाठ।
धन्य जिनेश्वर देव तुम, मोहे करहु जु ठाठ॥1॥
अनंत चतुष्टयके धनी, तुम ही हो सितराज।
मुक्ति वधूके कंथ तुम, तीन भुवनके राज॥2॥
तिहुँ जगकी पीड़ा हरण, भवदधिसेषनहार।
ज्ञायक हो तुम विश्वके, त्रिसुखके करतार॥3॥
हरता अघअंधियारेके, करता धर्म प्रकाश।
शीतलापर दातार हो, धरता निजगुणराश॥4॥
चर्मामृत ज्यों जलपियो, ज्ञान भानु तुम रूप।
तुमरे चरण सरोजको, नावत तिहुँ जगभूप॥5॥
मैं बंदों जिनदेवको, कर अति निर्मल भाव।
कर्मबंधके छेदने, और न कछु उपाव॥6॥
भविकवनको भवकृपते, तुम ही काढनहार।
दीनदयाल अनाथपति, आतम गुण भंडार॥7॥
चितनंद निर्मल कियो, धोय कर्ममल मैल।
सरल करी या जगतमें भविकवनको शिव गैल॥8॥
तुम पद पंकज पूजते, विन विघ्न रोग दर जाय।
शत्रु मित्रताको धरै, विपद निरुपद्रव थाय॥9॥
चक्र खगधर इन्द्र पद, मिलै आपते आप।
अनुक्रम कर शिवपद लहैं, नेम सकल हनि पाप॥10॥
पूजाकी प्रारम्भिक विधि
ॐ जय जय, नमोस्तु, नमोस्तु नमोस्तु।
णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं,
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।
ॐ ह्रीं अनादिनिधनोभ्यो नमः
(उपर्युक्त पाठ पढ़कर पुष्प पानी चढ़ावें) चंद्रनिर्मित चावल थालीमें किये
हुए स्वस्तिकके ऊपर चढ़ावें।)
मंगल
चत्तारि मंगलं—अरिहंता मंगलं, सिद्धा मंगलं, साहू मंगलं, केवलिपण्णत्तो
धम्मो मंगलं।
चत्तारि लोगुत्तमा—अरिहंता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा,
केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमो।
चत्तारि सरणं पवज्जामि—अरिहंते सरणं पवज्जामि, सिद्धे सरणं पवज्जामि,
साहू सरणं पवज्जामि, केवलिपण्णत्तं धम्मं सरणं पवज्जामि।
ॐ ह्रीं नमोऽर्हते स्वाहा। (पुष्पांजलि चढ़ावें)
उज्जलकंचनतनुलदुतसुखदेऽसुरमुकुटपूज्यपादाब्जेः;
भवकंजगलगलत्सुकृतं जिनवरं जिननाभजं पजे।
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्रीशांतिनाथजिनेन्द्राय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्रीचंद्रप्रभुजिनेन्द्राय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्रीसीमंधरस्वामिभ्यो अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशतितीर्थंकरेभ्यः अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्री कुंदकुंदाचार्यदेवाय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्रीसर्वकालिजिनप्रतिमाभ्यो अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्री भावविजयसकलमलेभ्यः अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
तुम बिन मैं व्याकुल भयो, जैसे वन बिन मीन।
जन्म जरा मरण हरो, करो मोहि सचीन॥१॥
पतित बहुत पावन किये, गिनती कौन करेय।
अंजनारे तारे भये, जय जय जय जिनदेव॥२॥
बकी नाव भवधिमें तिरे, तुम प्रभु पार करेव।
खेवटिया तुम हो प्रभु, जय जय जय जिनदेव॥३॥
राग सहित जगमें रुल्यो, मिले सरागी देव।
वीतराग भेट्यो अब, मेटो राग कुदेव॥४॥
कित तिर्यंच, कित नारकी, कित तिर्यंच अज्ञान।
आत धन्य मानुष भयो, पायो जिनवर थान॥५॥
तुमको पूज सुरापति, अष्टपति नरपति देव।
धन्य भाग्य मेरो भयो, करन लग्यो तुम सेव॥६॥
अवरगके तुम शरण हो, निराधार आधार।
मैं दुत भवरूपीमें, खेओ लगाओ पार॥७॥
इन्द्रादिक गणपति भके, कर विनती भगवान्।
अपनो विरद निहारके, कीजे आप समान॥८॥
तुमरी नेक सुदृष्टिमें, जग उन्नत है पार।
हा हा डूब्यो जात हो, नेक निहार निहार॥९॥
जो मैं कहूं औरसों, तो न मिटे दुखसार।
मेरी तो तैसों बनी, तजै करो पुकार॥१०॥
बेदो पांचो परमेष्ठि, सुगुरु वेदत जात।
विघन हरन मंगल करन, पूज परम प्रकाश॥११॥
चौबीसों जिनपद नमो, नमो शारदा माय।
शिवमग साधु नमि, रच्यो पाठ सुखदाय॥१२॥
देव-शास्त्र-गुरु पूजा
(हरिगीत)
सन्मार्गदर्शी, बोधदाता, कृपा अति वर्षिता,
आश्रय अने करुणा करी, अब रंक उद्धारता;
विभवज्ञानी आनन्दमूर्ति, दिव्य गुणोपे दीपता,
जिनराजजी तुम चरणमां, दीन भावथी हो वंदना।
इम सकल सुखकर, दुरित भयहर, विमल लक्षण गुणोवरे,
प्रभु अजर, अमर, नोददहित, नित्यज्यो सीलसोभे,
निज निजगतमां, बेरागजित, धैर्यवर्जित मेंटरो,
रे भक्तजन हूँ शरणसेवक, सीमंधरप्रभु जय करो।
श्री कुंदकुंदप्रभु जय करो।
श्री सद्गुरुप्रभु जय करो।
(दोहा)
पुर्दु पद अरहंतना, पुर्दु गुरुवर सार;
पुर्दु देवी सरस्वती, नित प्रति अब प्रकार।
ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यो। अत्र अवतरत अवतरत संवौषट् इह आह्वानम्।
ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यो। अत्र तिष्ठत तिष्ठत ठः ठः स्थापनम्।
ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यो। अत्र मम सन्निहितो भवत भवत वषट् सन्निधिकरणम्।
(दोहा)
पूजा प्रकार योग्य छे, इण भाव गुणधाम;
तोशुं भावभक्ति करी, अनपमण अवदाम।
अविनाशी अहित हे, अंह अखंड अमान;
अजर अमर उपशम तुं, भर्मभंजन भगवान्।
(हरिगीत)
विभूष हूँ निवृत्त हूँ, हूँ सिद्ध हूँ ने ब्रह्म हूँ;
हूँ जन्मने जर्जु नहीं, सुखथी भरेलो शिव हूँ;
ते आत्म व्यक्तो, ज्ञानदर्शनमय, अनन्तवी र्येरे;
वस जलकष्टे कर्मवी अवियुक्त आचारो।
ॐ ह्रीं श्रीसीमंधरजिनेश्वराय भरतक्षेत्रानुगतेभ्यः देवशास्त्रगुरुभ्यश्च
जन्मजरामरणविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
शीतल गुण जेमां रह्यो, शीतल जिन सुख संग;
चंदन घसी उनमादशुं, पूजीये मनरंग।
वनमायुत बीतरागनां, परमशीतलप्रभु,
जीवध जे भवरोगनां, कायने अतिदुख।
(तोटक)
शुभ शीतलतामय छांय रही, मनवांछित ज्यां फलफूर्ति कही;
विनभक्ति ग्रहो तत्कल अहो, भजोने भगवंत भवंत हरो।
(हरिगीत)
पुण्य-पाप योगथी रोकशेने, निज आत्मने आत्मा वदी;
दर्शन अने ज्ञान तेही, परद्रव्य इच्छा परिहरी।
ॐ ह्रीं श्रीसीमंधरजिनेश्वरायभरतक्षेत्रानुगतेभ्यः देवशास्त्रगुरुभ्यश्च
संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
अक्षत पद लेवा भणी, अक्षतपूजा सार;
अखंडात जिन पूजीये, तो नहींजे ववकार।
(चंपक)
आलंबन साधन जे तणे, परपरिणतिने भागे रे;
अक्षय दर्शन ज्ञान वैराग, आनंदरूप प्रभु जागे रे।
(हरिगीत)
हूँ अंक क्षुद्र सदा अखी, ज्ञानदर्शनमय खेरे;
कई अन्य ते माटे जरी, परमप्रभु मात्र नहीं अरे।
ॐ ह्रीं श्रीसीमंधरजिनेश्वरायभरतक्षेत्रानुगतेभ्यः देवशास्त्रगुरुभ्यश्च
अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
विनवत हितसन्ता करी, पूजे भाव अमाप;
पुष्पधनी पूजा करी, काम हरो तत्काळ।
अनंत सीलख, नाम दुख, त्यो नहीं न भिन्नता!
अनंत दुःख नाम सोख्य, प्रेम त्या विचित्तता!
उधार न्याय नेमने निहाल रे निहाल तुं,
निवृत्ति श्रीप्रेममेव यारी ते प्रवृत्ति बाळ तुं।
(हरिगीत)
जीती इन्द्रियो लालभवे अधिक वाणे आत्मने;
निश्चय लिये स्थित साधुओ माते तितेंद्रिय तेने।
ॐ ह्रीं श्रीसीमंधरजिनेश्वराय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
विविध मुक्ति फलकानुसुं, लेई चित्त उदार;
अघाहारी पद पाववा, चित्तुं वांरवार।
(रासक)
रसे, रसे अने गंधे, सदा छे भिन्न आ आत्मा,
जाये मोह भावना, नहीं छे भाव कई कर्मा;
सरुं हूँ तत्व समजीने, हूँ चेतन गणा सबमां,
शिवदारी स्वरूप माहे, निहाळुं आव मीतमां।
ॐ ह्रीं श्रीसीमंधरजिनेश्वराय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
जगदीप दीप शुभ, करतां भावो तेह;
ज्ञानशक्तिमां जे रह्युं, प्रगट तहिं निज तेह।
जळहळ ज्योतिषरूप तुं, केवल कृपानिधान;
प्रेम पुनीत तुज प्रवे, भजभंजन भगवान्।
मोह स्वयंभूरूप समुद्र तरी करी,
स्थिति त्यां जाई दीपमोह गुणवान जो;
अंतस्तमस्य त्यां पूर्वस्वरूप वीतराग वई,
प्रगट्युं निज केवलज्ञान निधान जो;
अपूर्व अवसर जेवो क्यारे आवशे।
(हरिगीत)
मति, श्रुति, अवधि, मनः केवल तेह पद अनेक व खरे;
आ ज्ञानपद परमार्थ छे, जे पापी जीव मुक्ति लहे।
ॐ ह्रीं श्रीसीमंधरजिनेश्वराय मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
इणि परे पुष्पपूजा करी, जिन आगळ शुभभाव,
टाळी विनाश परिणति, दूर करो परभाव।
निरंतर निर्लेप छो, निर्मळ ज्ञान निधान,
निर्मोहक नारायण, भवभंजन भगवान्।
चार कर्म घनघाती ते व्यवच्छेद जो,
भवना बीज तणो आत्यंतिक नाश जो;
सर्वभाव जाता द्रष्टा सह शुद्धता,
कृतकृत्य प्रभु वीर्य अनंत प्रकाश जो;
अपूर्व अवसर जेवो क्यारे आवशे।
(हरिगीत)
जे सर्वसंसिमुक्ति व्यापे आत्मने आत्मा वदे,
नहिं कर्म के नोकर्म केवल चेतनो अकलने।
ॐ ह्रीं श्रीसीमंधरजिनेश्वराय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
फलपूजा करतां वखा, सकळ करो अवतार;
फळ मारुं प्रभु आगळे, तार, तार मुझ तार।
दश लक्षण धर्म पूजा
आदी अप्पउं तुं; अक्खइंति अणुमान;
मोक्खहुं हे मारगि, वयणंजण भणान।
जेक परमागम्मनी मइ न सयाता,
पुण्ण कलंक रहित अढोल स्वरूप जो;
सुद्ध निरंजन चेतनमूरति अनोपम,
अणुअणु अमूर्त सहज पररूप जो;
अपूर्व अवसर जेवो कवावे आवओ।
(हरिगीत)
जेवो तणो जाणी समता, स्वभाव वाणी आलम्बो,
जे पंचमही स्थित थाये, कर्मछोह करे अहो।
ॐ ह्रीं श्रीसीमंधरजिनेश्वराय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहे)
जळ, चंदन, अक्षत, फूल, दीप, धूप, फल नैवेद्य,
पूज अष्ट समूहथी, भक्तिथी जिनदेव।
(हरिगीत)
जीव चेतनारूप, शस्य-रस-सो-नो-अक्तिमहीन छे,
निर्दिष्ट नहि संस्थान जीतनु, ग्रहण त्रिलोकी नहीं।
प्रकाश हूँ, कुनार्थ हूँ, कल्याण हूँ ने शांत हूँ,
इन्द्रियोनी पार हूँ, अप्पय स्वरूप ज्ञान हूं।
ॐ ह्रीं श्रीसीमंधरजिनेश्वराय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
(अडिल्ल छंद)
उत्तम छिमा मारदव आरजव भाव हैं,
सत्य शौच संयम तप त्याग उपाव हैं;
आकिंचन ब्रह्मचरय धरम दश सार हैं,
यह गति दुरगति करि मुक्ति करतार हैं।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादश लक्षणधर्माय ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् इति आह्वानम्।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादश लक्षणधर्माय ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः इति स्थापनम्।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादश लक्षणधर्माय ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् इति
सन्निधिकरणम्।
(सोरठा)
देवाधिदेवकी धार, सुस्थित सम शीतल सुरभि;
भक्तानुताप निवार दशलक्षण पूजू सदा।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादश लक्षणधर्माय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
चन्दन केशर गार, होय सुवास दशों दिशा। भक्तानुताप०
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादश लक्षणधर्माय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।
अक्षत अखण्डित सार, संतुष्ट चन्दनमान शुभ। भक्तानुताप०
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादश लक्षणधर्माय अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
फूल अनेक प्रकार, महके जम्बूलोक लो। भक्तानुताप०
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादश लक्षणधर्माय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
नैवेद्य विविध निहार, उत्तम षटरससंयुत। भक्तानुताप०
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादश लक्षणधर्माय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
बाति कपूर सुधार, दीपकजोति सुहावनी। भक्तानुताप०
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादश लक्षणधर्माय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
अगर धूप विस्तार, फैले सर्व सुगन्धता। भक्तानुताप०
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादश लक्षणधर्माय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
फलकी जाति अपार, प्रान प्रान मनमोहने। भक्तानुताप०
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादश लक्षणधर्माय फलं निर्वपामीति स्वाहा।
आठों दरव संवार, ‘ज्ञानत’ अधिक उत्साहसों।
भक्तानुताप निवार दशलक्षण पूजू सदा।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादश लक्षणधर्माय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
उत्तम क्षमापर्ण अर्घ
(सोरठा)
पंडिह पूर अनेक, बांध भाव बहुविधि करै;
धरिये खिमा विवेक, कोप न कीजे पीतमा।
(चौपाई मिश्रित गीता छंद)
उत्तम खिमा गहे रे भाई, इह भव जश परभव सुखदाई,
गाली सुनि मन खेद न आनो, गुणको औगुन कहे अयानो।
कहि है अयानो वस्तु छीने, बांध भाव बहुविधि करै,
कहैं निसंकें तन विदारै, रे जो न तहीं मरैं;
तैं कसम पूत किये खोटे, कहे क्यों नहीं जीपेरा,
अक्खिअणअप्पणि तुझाण वाणी, साम्यकत्वे सीपेरा।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमापर्णाय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
(दोहा)
दशलक्षण वंदी सदा, मनवांछित फलदाय,
करौं आरती भारती, हम पर होहु सहाय। १
उत्तम खिमा जहँ मन रोई, अंतर वारह अनु न कोई;
उत्तम मारव विनय प्रगटै, नानाभेद ज्ञान सब भासै। २
उत्तम आर्जव कपट मिटावै, दुरगति त्यागि सुगति उपजावै;
उत्तम सत्यवचन मृदु बोले, सो आनी संसार न डोले। ३
उत्तम शौच लोभ परिहारी, संतोषी गुणरत्न भंडारी;
उत्तम संयम पाले ज्ञाता, समल सफल करे ले साता। ४
उत्तम तप निरग्रंथ पाले, सो नर करमक्षयको टालै;
उत्तम त्याग करे जो कोई, भोगभूमि-सुरिष-सुख होई। ५
उत्तम आकिंचन धारे, परसमसिद्धवा विस्तारे,
उत्तम ब्रह्मचर्य मन लावे, नरसुरगति मुक्तिफल पावे। ६
(दोहा)
करे करमकी निरजरा, भवपींजरा विनाश;
अवर अप्पसत्त्वको लहे, ‘ज्ञानत’ सुखकी राशि।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमा आदि, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग
आकिंचन, ब्रह्मचर्य दशलक्षणधर्माय महार्घं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री महावीर भगवानका अर्घ
पावन जल चंदन, अक्षत पुष्प रु, चरु वर दीपन, धूप धरौं;
वर अर्घ उतारो, तुम पद धारो, नंदन तारो, पूज करौं।
चरम तीर्थंकर जगत् तिलक, हे अम्बरकर, वीर जिनं,
सर्व कर्म क्षयंकर, सब दुखहर, जगजन शंकर, धर्म धनं।
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री शांतिनाथ भगवानका अर्घ
आठ विधि सौ अर्घ करिये आठ कर्म जु छीनवे,
मैं करहुँ भविजन भात प्रभुकी ‘जसकरण’ जे वीनवे,
श्री शांतिनाथ जिन पूजौ भगवती मन लायकं;
शान्त करियौ कर्म सरो मोक्षलक्ष्मी पायकं।
ॐ ह्रीं श्रीशांतिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री चंद्रप्रभु भगवानका अर्घ
बहुविधि अर्घ बनाय मनाऊं श्री जिनवरि आर्घ,
अष्टकर्मके नाश करनको श्री जिनचरण वंदायो;
चंचल चितको रोकी, चतुर्गति चक्र भ्रमण निवारो,
चारु चरण आचरण चतुर नर चंद्रप्रभु चित्त धारो।
ॐ ह्रीं श्रीचंद्रप्रभुजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री नेमिनाथ भगवानका अर्घ
सत्तित सुख मलयगिरि चंदन, अतिनि कुसुम जु भरि भरि,
सणदीप दमाग धूप फल जम, अर्घ ‘राम’ करि सुखकारी;
श्री नेमि जिनेश्वरके पद वंदूं, रयणमणि सी ततछिन धारी,
पसुवंसिनी सूं मुक्तिह करुणा धरि, जग वंदूं प्रभु गिरनारी।
ॐ ह्रीं श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री सीमंधर भगवानका अर्घ
जल गंग आदिक लेय रुखे, अर्घ कर ते आवने,
जब चल वटाय बीजम, मोक्षफलको पावने।
तीर्थपति जिनराजवी, मम पावन पूज करो;
श्री सीमंधरनाथनी सो, भाससे भक्ति तरो।
ॐ ह्रीं श्री सीमंधरस्वामिजिनेन्द्राय चरणकमलपूजनार्थं अनर्घ्यपदप्राप्तये
अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री कुंदकुंदाचार्यदेवका अर्घ
जल गंध अक्षत पुष्प चरुवर, दीप धूप जु लावना,
फल ललित आठो द्रव्य-निर्मित, अर्घ कीजे पावना;
कुंदकुंदादिक ऋद्धिराज, मुनिजनकी पूजा करूँ;
ता करें पातिक हर सारें, सकल आनंद विस्तरूँ।
ॐ ह्रीं श्रीकुंदकुंदादि मुनिगण चरणकमलपूजनार्थं अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घं निर्व०
श्री भावी तीर्थंकरका अर्घ
जल गंध सुअक्षत पुष्प, शुभ नैवेद्य वरं,
नई दीप धूप फल अर्घ, विस्तर पूज करं;
अहो ! बालेश्वरी जिंद भावी मनहारी,
जंबु-भरते शिव-मंगलकारी।
(–चेन्नई वंत जंबंत, शिव-मंगलकारी।)
ॐ ह्रीं भावीकोटी-विदेहक्षेत्रस्थ भावी जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घं निर्वपामीति
श्री सुवर्णपुरी तीर्थंकरका अर्घ
भरि स्वधात्तु वसु द्रव्य जु करि,
प्रभु सुवर्णो तिनो नाम, कहूं मैं भाव धरि,
अणुवृत्ति तीर्थवान सुवर्णपुरी सोहे,
यह कल्पवृक्ष वरदान मंगल मुक्ति मोहे।
ॐ ह्रीं श्री सुवर्णपुरी-अयोध्यातीर्थे जिनमंदिरे विराजमान श्री
सीमंधरस्वामी, पद्मप्रभ, शांतिनाथ, श्रेयांसनाथ आदि जिनेन्द्रः समवसरणे विराजमान
श्री सीमंधरस्वामी, तप्तधातु-विमानगभ श्री कुन्दकुन्दाचार्यदेवः, मानसगभे
चतुर्विंश जिनेशान श्री सीमंधरस्वामीः परमानंदिरे विराजमान भगवान् श्री
महावीरस्वामी, श्री समवसरण आदि जिनप्रतिमापि, श्री कुन्दकुन्दाचार्य-चरणचिह्नः,
'सुंदरेशश्री’के वचनमूत ‘तथा ‘बालचंद्रेश’ वचनमूत’ इति उपाध्यायां विभूषित
पंचमेरु-नन्दीश्वरादिस्थले विराजमान भगवान् श्री आदिनाथ, शाश्वतखंड विदेही
भावी तीर्थंकर, जम्बू-भरतस्य भावी श्री महाबलु जिनेन्द्रः, पंचमेरु तथा नन्दीश्व-
रादिपर्वत-जिनालये विराजमान सर्व शाश्वत जिनेन्द्रः जम्बूद्वीप-बाहुबली
निर्माणाधीन आयोजने विराजमान सर्व कृत्रिम-अकृत्रिम-शाश्वत जिनेन्द्रः
स्वध्यायाध्ययने प्रतिष्ठित श्री समवसरण-इत्यादि सर्व वीतरागदेव्यः पूजनार्थं
महार्घं निर्वपामीति स्वाहा।
देवेन्द्रकीर्ति भावि विदेही गणधरका अर्घ
(राग-रत्नागिरि हि)
पावन जिनका नामग्रहण, मंगल सुखके दाता है,
धन्य धन्य अमार प्रभु, त्रिभुवन जीतन गाता है;
शांति सुखकरणी शीतल, शंकर सद्गु-खहारी है,
देवेन्द्रकीर्ति गणधर-भगवान्, चरण-पूजा सुखकारी है।
ॐ ह्रीं विदेही-भावि श्री देवेन्द्रकीर्तिगणधरदेवाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घं नि०
श्री बाहुबली भगवानका अर्थ
वर्षाधिके तप वश्या वश की, परस अति दुष्ट पावे,
तिहि दुष्ट दूर करवो भविन, अर्थ विनाश चखावे।
पाम पूज्य वीराधिवीर जिन, बाहुबली बलधारी,
तिनके चरणकमलको नित प्रति, धोक त्रिकाल हमारी।
ॐ ह्रीं वर्तमान अवसर्पिणीसमये प्रथम मुक्तिगमनयोग्य कामतिनकेये
वीतरागि श्री बाहुबली भगवान् परिनिर्वाणाय जन्मजरामृत्युविनाशाय अर्घं निर्वपामीति।
श्री सिद्ध भगवनका अर्थ
जल फल वसु बिंदु अरघ अमंदा, जतत अणंदा के केदा;
मेटो भवकंदा सब दुखदंदा, ‘वीरनंदा’ तुम वन्दा।
त्रिभुवनके स्वामी त्रिभुवननामी, अंतरजामी, अभिरामी,
त्रिभुवनविश्रामी, निर्भयनामी पापी, सिद्ध जयनामी शिवनामी।
ॐ ह्रीं अनाहतचक्रसमय सर्वकर्मविर्निर्मुक्तकाय श्रीसिद्धचक्रायपरिनिर्वाणाय
अन्तर्ध्वंसपद्मालयै अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
सम्यग्अर्घ्य
(गीत छंद)
मैं देव श्री अर्हत पूजूँ, सिद्ध पूजूँ भाव सो,
आचार्य श्री उपाध्याय पूजूँ, साधु पूजूँ भाव सो।
अर्हत-भाषित जैन पूजूँ, द्वादशांग रचे मनी,
पूजूँ दिगंबर गुरुनको, शिव हेत सब आज्ञा ठनी।
सर्वसमर्पित धर्म दयानिधि दयवम पूजूँ सदा,
जाँहि भावना भावना भावना सो जिन शिव नहीं कदा;
त्रैलोक्यके कृत्रिम अकृत्रिम चैत्य चैत्यालय जजूँ,
पत्त नेरु मंदिधर जिनालय खर पूर पूजित भजूँ।
कैलास श्री सम्मेद श्री गिरनार गिरि पूजूँ सदा,
चंपापुरी पावापुरी पुनि और तीर्थव सदा;
चौबीस श्री जिनराज पूजूँ बीस क्षेत्र विदेह के,
नामावली इक सहस्र जजूँ जय प्रति शिवविदेह के।
(दोहा)
जल गंधाक्षत पुष्प चरु, दीप धूप फल लाय;
सर्व पूज्य पद पूजहूँ, बहु विधि भक्ति वदाय।
ॐ ह्रीं पाषाणो, भाववेत्ता, विकासरूपा, विकासनियांवी करवो कराववो-
भावना भावकी, श्री अर्हत्सिद्धा, सिद्धांनी, आचार्यनी, उपाध्यायनी, सर्वसाधुनी-
पंचपरमेष्ठियों नमः। प्रथमचतुर्णा-करणानुयोग-चरणानुयोग-द्रव्यानुयोगेभ्यो नमः।
दर्शनानुयोगेभ्यो चोईसा कारणोभ्यो नमः। उनचासविहि दशवइयालेभ्यो नमः।
सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्रेभ्यो नमः। जल विषे, धन विषे, आकाश
विषे, गुफा विषे, पहाड विषे, नगर-गावी विषे, अर्बलोक-मध्यलोक-
पाताललोक विषे विराजमान कृत्रिम अकृत्रिम जिन-चैत्यालय जिन-बिंबेभ्यो
नमः। विदेहक्षेत्रे विद्यमान वीस तीर्थंकरोभ्यो नमः। पंच भरत, पांच ऐरावत-दस
क्षेत्र संबंधी बीस चौबीसीना सातसो वीस जिनेभ्यो नमः। नंदीश्वरद्वीपसंबंधी बावन
जिनचैत्यालयेभ्यो नमः। सम्मेदशिखर, कैलाश, चंपापुर, पावापुर, गिरनार आदि
सिद्धक्षेत्रेभ्यो नमः। जैनसिद्धी, मूढसिद्धी, रणमुद्री, शंकुल्य, वागरा, सुवर्णपुरी आदि
तीर्थक्षेत्रेभ्यो नमः। श्री शरण-श्रद्धायित्री सात परमऋषिभ्यो नमः। इति
उपर्युक्तेभ्यः सर्वेभ्यो अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
शांतिपाठ
शांतिजिनेश्वर साचो साहेब, शांतिकरण अनुक्रममें हो जिनजी;
तुं मेरा मनमें तुं मेरा दिलमें, ध्यान धरूँ पल क्षनमें साहेबजी।
तुं. मेरा० १
भवमां भ्रमंता मैं दरिशन पायो, आशा पूरो एक पलमें हो जिनजी
तुं. मेरा० २
निश्चल जोवन वर पर सोहे, निकस्यो जुं चंद बातमें जिनजी
तुं. मेरा० ३
मेरो मन तुम साचे तीनों, मीन वसे जु जलमें साहेबजी;
तुं. मेरा० ४
जिन रंग कहे प्रभु शांतिनेश्वर, सेवोवी देव सकलमें हो जिनजी.
तुं. मेरा० ५
विसर्जन
ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि शालिनोक्तं न कृतं मया;
तत्सर्वं पूर्णमेवमस्तु तत्प्रसादाद्विसर्जनं॥१॥
आवाहनं नैव जानामि नैव जानामि पूजनं;
विसर्जनं न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥२॥
मंत्रहीनं क्रियाहीनं द्रव्यहीनं तथैव च;
तत्सर्वं क्षम्यतां देव रक्ष रक्ष जिनेश्वर॥३॥
मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी;
मंगलं कुंदकुंदार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्॥४॥
सर्वमंगल मांगल्यं, सर्वकल्याणकारकं;
प्रधानं सर्वधर्माणां, जैनं जयतु शासनम्॥५॥
(पूजा पूर्ण होनेके बाद नौ बार णमोकार मंत्रका जाप देना चाहिये)
पंच परमेष्ठी अर्घ
ईह विधि मंगल आरती कीजे, पंच परमेष्ठि भव सुख लीजे. टेक
पहली आरती श्रीजिनराजा, भवदधि पार उतार जिहाजा. इह० १
दूसरी आरती सिद्धकेरी, सुमरत कटै भवकेरी. इह० २
तीजी आरती सुर मुनिवर, जन्म मरण दुख दूर करिदा. इह० ३
चौथी आरती श्रीउवझाया, दरशन देखत पाप पलाया. इह० ४
पांचवी आरती साधु तिहारी, कुमति-विनाशन शिव-अधिकारी. इह० ५
छठी आरती श्रीजिनवाणी, ‘द्यानत’ सुरग मुक्ति सुखदानी. इह० ६
प्रतिमा दिगम्बर सदा चाहूँ, ध्यान आसन सोहना,
वसुकुंभमें व्रत वृथा चाहूँ, शिव ग्रहूँ मोह ना॥१॥
मैं साधुजनको संघ चाहूँ, प्रीति तिन ही सो करो,
मैं पक्के उपास चाहूँ, अर्थमें मैं परिरतो;
इस दुःख पंचमकाल मही, कुल अराक्षक मैं लहों,
अरु महाव्रत पद सही नाही नित्त तन मेंही॥२॥
आराधना उत्तम सदा चाहूँ, सुनो जिनरायजी,
तुम कृपानाथ अनाथ ‘द्यानत’ दया करना न्यायजी;
वसुकुंभना विनाश ज्ञान प्रकाश कोकीजे,
करि सुप्रतिपन्न समाधिमरण सुभक्ति वचन दीजे॥३॥
पूजाकी प्रारंभिक विधि
जय जय जय, नमोस्तु, नमोस्तु, नमोस्तु।
णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं,
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।
ॐ ह्रीं अनादिपरमेष्ठिभ्यो नमः
(उपर्युक्त पाठ पढ़कर पुष्प या (अर्घ्य) चंदनतिलक चावल थालीमें किये
हुए स्वस्तिकके ऊपर धरणा।)
मंगल
चत्तारि मंगलं-अरहंत मंगलं, सिद्धा मंगलं, साहू मंगलं, केवलिपण्णत्तो
धम्मो मंगलं।
चत्तारि लोगुत्तमा-अरहंता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा,
केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमा।
चत्तारि सरणं पवज्जामि-अरहंत सरणं पवज्जामि, सिद्धे सरणं पवज्जामि,
साहू सरणं पवज्जामि, केवलिपण्णत्तं धम्मं सरणं पवज्जामि।
ॐ ह्रीं णमोऽर्हते स्वाहा। (पुष्पांजलि चढ़ाना)
उव्वत्तणत्तदणुप्पत्तणदुप्पत्तणपुष्फत्थके;
वक्खामंगलपव्वत्तुक्के जिणवरे जिणप्पभं पदे।
ॐ ह्रीं श्रीऋषभादिजिनेन्द्राय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्रीशांतिनाथजिनेन्द्राय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्रीचंद्रप्रभजिनेन्द्राय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशतितीर्थंकरेभ्यः अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्री कुंदकुंदाचार्यदेवाय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्रीसूर्यकीर्तिनाथजिनेन्द्राय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्री भावजिनासनसंनाभ्यः अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री महावीर-जिनपूजा
(वसंततिलका)
हे देव! पूज्य वरमान यहां पधारो,
आवाहन मैं करत सिद्ध सुसिद्ध तारो,
कीनों पवित्र बीरको उपदेश सारो,
पूजो सदा तव पदपद्म वंद्यहि तारो।
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्र। अत्र अवतर अवतर संवौषट् इह आह्वानम्।
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्र। अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्।
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्र। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम्।
(त्रिभंगी छंद)
अभयदन दच्छ, आशि रम स्वच्छ, तर्पित अर्घ्य, वीर मरो,
तनु धारा धारो, तृषा निवारो, कर्म निवारो, पूज करो;
2nd Day Pooja
चरम तीर्थंकर जगत् हितंकर, हे अभयंकर, वीर जिने,
सर्व कर्म क्षयंकर, दया पुरंदर, जगजन शंकर, शर्म घने।
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं०
अष्ट कर्म निवारण; शीतल कारण; गंधसे पूजन, नित्य करों,
जय उत्तम उच्चारण, हे भवतारण, करुणाकारण, अर्ज करों। च०
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चंदनं नि०
भरि अक्षत थारी, अक्षनहारी, तुम पद धारी, सो अर्चों,
अक्षयपदधारी, भवभयहारी; अति सुखकारी, सो पिरचों। च०
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि०
मदगन्धन विवर्जन, भवभयभंजन, शिवसुखंजन, विश्वभने,
शुभ्र कमल वदनं, कमला पादं, अमला चार्णं, जगद्विते। च०
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय कामबाणविनाशनाय पुष्प नि०
सब मोदन मोहक रसना मोहन, कर्म विमोचन, सब करो,
नैवेद्य चढ़ाऊँ, पूज रचाऊँ, गुणगण गाऊँ, पूज करो। च०
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि०
मिथ्यात्व निवारा, अति उजियारा, दीपक धारा, पूज करो,
करूँ तुम पद आरती, नाशे आरति, भासे भारती, ज्ञान घरों। च०
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय मोहांधकारविनाशनाय दीपं नि०
बहु धूप अनूपमं कर्म जलन्मं, लगो शरणमं, चरणमं,
हे हरिकुन्दन, देहु मोक्षपद, पूजूं तुम पद सेवनमें। च०
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं नि०
बादाम सुश्रीफल, बहु पुंगीफल, ने अनेक फल सो अर्चों;
बहु चार भारजें, तुम पूज पाऊँ शिवसुख पाऊँ सोभचों। च०
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं नि०
2nd Day Pooja
पावन जल चंदन, अक्षत पुष्प रु, वर वर दीपन, धूप धरौ;
वर अर्घ्य जजातो, तुम पद धारो, नंदन तारो, पूज करो।
चरम तीर्थंकर, जगत् हितंकर, हे अभयंकर, वीर जिने,
सर्व कर्म क्षयंकर, दया पुरंदर, जगजन शंकर, शर्म घने।
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि०
पंचकल्याणक अर्घ्य
असित सावनस छठ लियो तिथि, गर्भ धरो प्रभु मात भवानी,
(त्रिशलादेवी)
नर हरि देव नमे जिनमाता, हम शिर नावत पावत सातों।
ॐ ह्रीं अषाढ़शुक्लषष्ठ्यां गर्भमंगलप्राप्ताय श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अर्घ्यं०
असित सु चैत वये तेरसको, हरि अभिषेक कियो प्रभुजीको;
कुसुम सु देवने बरसाये, जय जय शब्द किये हरषाये।
ॐ ह्रीं चैत्रशुक्लत्रयोदश्यां जन्ममंगलप्राप्ताय श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अर्घ्यं०
भव तन भोग अखिल विगारा, तुम मन धार तपे तपधारा;
सुर शिविका धर कानन धावे, बन धन देव अहो धन जावे।
ॐ ह्रीं मार्गशीर्षकृष्णदशम्यां तपोमंगलप्राप्ताय श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अर्घ्यं०
असित सु वैशाख ज्ञानसि पायो, सकल चराचर वस्तु लखायो,
पशु नर देव तु पूजन आवें, हम इत मूँढ़न मंगल गावें।
ॐ ह्रीं वैशाखशुक्लदशम्यां ज्ञानमंगलमंडिताय श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अर्घ्यं०
असित कार्तिक अमास्याका दिन, शिवरमणी वरके सुख पायो;
हरि हर्रादि जपे पावनपुर, जजत जिनेश नमे भवभासा।
ॐ ह्रीं कार्तिककृष्णमावस्यां मोक्षमंगलमंडिताय श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अर्घ्यं०
दशलक्षणधर्मपूजा
(अष्टक छंद)
उत्तम क्षमा मारदव आरजव भाव हैं;
सत्य शौच संयम तप त्याग उपाव हैं;
आकिंचन ब्रह्मचर्य धरम दश सार हैं;
चहुँ गति दुखते काढ़ि मुक्ति करतार हैं।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्म ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् इति आह्वाननम्।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्म ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः इति स्थापनम्।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्म ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् इति सन्निधिकरणम्।
(सोरठा)
हेमपात्रकी धार, मुनिचित्त सम शीतल सुभिर;
भवतापनिहार दशलक्षण पूजू सदा।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्मेभ्यो जलं निर्वपामीति स्वाहा।
चन्दन केशर गार, होय सुवास दशों दिशा। भवाताप०
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्मेभ्यो चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।
अमल अखण्डित सार, तंदुल चन्द्रसमान शुभ्र। भवाताप०
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्मेभ्यो अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
फूल अनेक प्रकार, महकें उपवनलोक तो। भवाताप०
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्मेभ्यो पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
नैवेद्य विविध निरख, उत्तम षटरससंयुग। भवाताप०
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्मेभ्यो नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
वाति कपूर सुधार, दीपज्योति सुहावनी। भवाताप०
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्मेभ्यो दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
अगर धूप विस्तार, फैले सर्व सुगन्धता। भवाताप०
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्मेभ्यो धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
फलकी जाति अपार, प्राप्त रतन मनमोहने। भवाताप०
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्मेभ्यो फलं निर्वपामीति स्वाहा।
2nd Day Pooja
आठों दरव संवार, ‘यादव’ अधिक उपासी।
भवाताप निहार दशलक्षण पूजू सदा।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्मेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
उत्तम मार्दवधर्म अर्घ्य
(सोरठा)
पीछे तुष्ट अनेक, वांच भार बहुविधि करै;
वरिये शिक्षा विवेक, कोप न कीजे पीतमा।
(चौपाई मिश्रित गीता छंद)
उत्तम क्षमा गहो रे भाई, इह भव जस परभव सुखदाई,
गाली सुनि मन खेद न आनो, जिनको ओगुन कहे अपानो।
कहि है अपानो वस्तु धीर, वांच भार बहुविधि करै,
धरतैं निरखें तन विदारें, वैरी जो न कहीं धरैं;
ते कलप पूरव किये खोटे, सहै क्यों नहिं जीयरा,
अतिकोऊधर्मनि जुझाय प्राणी, साम्यभावले सीयरा।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमागुणाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
(दोहा)
दशलक्षण वंदो सदा, मनवांछित फलदाय,
कहो आरती भारती, हम पर होहु सहाय। १
उत्तम क्षमा जहां मन होइ, अंतर बाह्य शत्रु न कोइ;
उत्तम मार्दव बिनय प्रकासे, ज्ञानभेद सब भाव भासे। २
उत्तम आर्जव कपट मिटावे, दुर्गति त्याग सुगति उपजावे;
उत्तम सत्यवचन सुख बोले, सो प्राणी संसार न डोले। ३
उत्तम शौच लोभ परिहारी, संतोषी गुणरतन धारी;
उत्तम संयम पाले ज्ञाता, नरभव सफल कर ले साता। ४
2nd Day Pooja
उत्तम तप निर्दोषिन पाले, सो नर कर्मशत्रु को टाले;
उत्तम त्याग जो कोई कीजै, भोगभूमि-सुरगति-सुख होई। ५
उत्तम आकिंचन व्रत धारे, परसम्पत्तिदा विसारे,
उत्तम ब्रह्मचर्य मन लावे, नरसुरगति मुक्किफल पावे। ६
(दोहा)
करे करमकी निरजरा, भवर्जाता विनशि;
अवर असपरको लहे, ‘द्यानत’ सुखकी राशि।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमा मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग
आकिंचन, ब्रह्मचर्य दशलक्षणधर्मेभ्यो महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
देव-शास्त्र-गुरुका अर्घ्य
(गीता छंद)
जल फल उज्ज्वल गंध अक्षत पुष्प वर दीपक धरूँ;
वर धूप निस्मल फल विविध बहु जन्मके पातक हरूँ;
इह भांति अर्घ्य चढ़ाय नित नित भाव करूँ शिव पंक्ति मंजु;
अरहंत श्रुत-सिद्धांत गुरु-निरग्रंथ नित पूजू स्वभु।
स्तुतिविधि अर्घ्य संजोयके अति उज्वल मन कौन;
जातों पूज्यों परम पद देव शास्त्र गुरु तीन।
ॐ ह्रीं देव-शास्त्र-गुरुभ्यः अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री शांतिनाथ भगवानका अर्घ्य
अट सोधि सो अर्घ्य करि आवे कटु कर्म जु छीनवे,
मैं करहुँ भक्तिन भगत प्रभुको ‘जसकरण’ जे वीनवे,
श्री शांतिनाथ जिनेश पूजों भावसों मन लायके;
शांत करियों कर्म सबरे मोक्षलक्ष्मी पायके।
ॐ ह्रीं श्रीशांतिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
2nd Day Pooja
श्री चंद्रप्रभु भगवानका अर्घ्य
वसुविधि अर्घ्य बनाय मनोहर श्री जिनवर जावो,
अष्टकर्मकी नाश करनको श्री जिनवचन चढावो;
चंचल चितको रोकी, चतुर्गति चक्र भ्रमण निवारो,
चहु गुण आचरण चतुर नर चंद्रसम चित्त धारो।
ॐ ह्रीं श्रीचंद्रप्रभुजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री नेमिनाथ भगवानका अर्घ्य
अनिल शुद्ध मलयागिरि चंदन, अतिलघु कुसुमादि भरि वारी,
मणिदीप दरांगि घृत फल उत्तम, अर्घ्य ‘राम’ करि सुखकारी;
श्री नेमि जिनेश्वरके पद वंदूँ, रमणति सी ततलीन तरी,
पशुपुत्रकी रच मुनिकें करुणा धारी, जय चहु प्रभु गुणधारी।
ॐ ह्रीं श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री सीमंधर भगवानका अर्घ्य
जल गंध आदि द्रव्य लेऊँ, अर्घ्य कर ले आवने,
धाय चरण वंदाय भक्तिवन, मोक्षफलको पावने;
तीर्थपति जिनराजकी, मम पावन पूज करूँ,
श्री सीमंधरस्वामी सो, भासते भक्ति लहूँ।
ॐ ह्रीं श्री सीमंधरस्वामिजिनेन्द्राय चरणकमलपूजनार्थं अनर्घ्यपदप्राप्तये
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री कुंदकुंदाचार्यदेवका अर्घ्य
जल गंध अक्षत पुष्प सत्तर, दीप धूप सु भावना,
फल ललित आठों द्रव्य-निश्चित, अर्घ्य कीने पावना;
कुंदकुंदादिक मुनिनायक, मुनिनकी पूजा करूँ;
ता करें पातक हरे सारे, सकल आनंद वितरूँ।
ॐ ह्रीं श्रीकुंदकुंदादि मुनिराज चरणकमलपूजनार्थं अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्व०
श्री भावी तीर्थंकरका अर्थ
जल गंध अक्षत पुष्प, शुभ नैवेद्य चरु,
नई दीप धूप फल अर्घ, जिनवर पूज करूँ;
अहो ! भावीखंड जिनेन्द्र भारी मनहारी,
जंबू-भरत जयवंत, शिव-मंगलकारी।
(वे बनाई वंदै जयवंत, शिव-मंगलकारी।)
ॐ ह्रीं भावीखंडप-सिद्धक्षेत्रस्थ भावि जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री सुवर्णपुरी तीर्थंका अर्थ
भरि स्वर्णथाल वसु द्रव्य अर्घ कर जोरै,
प्रभु सुमिरौं विनती नाव, कष्ट मैं भव परि,
अनुभूति तीर्थंमान सुवर्णपुरी सोहै,
यह कंचनपुर वरदान मंगल मुक्ति सोहै।
ॐ ह्रीं श्री सुवर्णपुरी-अष्टान्हिकादि जिनेन्द्राय विद्यमान श्री सीमन्धरस्वामी, ऋषभ, शांतिनाथ, नेमिनाथ आदि जिनेन्द्र; समवसरणे बिराजमान श्री सीमन्धरस्वामी, तत्वादिगुण-विद्यमान श्री कुन्दकुन्दाचार्यदेव; मानस्तंभे चतुर्दिग् विद्यमान श्री सीमन्धरस्वामी; परमागमनंदिरे विद्यमान भगवान् श्री महावीरस्वामी, श्री समयसार आदि पंचपरमागम, श्री कुन्दकुन्दाचार्य-वचनादि; ‘पद्मनंदिदेव वचनामृत’ तथा ‘हस्तिकल्प वचनामृत’ इति उभयाम्नाय विनिर्मित पंचमे-नंदीश्वरवीरादिने विद्यमान भगवान् श्री आदिनाथ, भावीखंड सिद्धक्षेत्र भावी तीर्थंकर, जम्बू-भरतस्य भावी श्री महाप्रभु जिनवर; पंचमेरो तथा नन्दीश्वर-द्वापघाटादि-जिनेन्द्रायै विद्यमान सर्व शाश्वत जिनेन्द्र; जम्बूद्वीप-बाहुबली निर्माणाधीन आयतने विराजमान सर्व कृत्रिम-अकृत्रिम-शाश्वत जिनेन्द्र; स्वाध्यायमंदिरै प्रतिष्ठित श्री समवसरण-इत्यादि सर्व वीतरागपरमदेव्यः पूजनाथं महार्घं निर्वपामीति स्वाहा।
देववंदकीर्ति भावि विदेही गणधरका अर्थ
(राग-दयानिधि हो)
पावन जिनका नामस्मरण, मंगल सुखके दाता है,
धन्य धन्य अवतार प्रभु, त्रिभुवन कीर्तन गाता है;
शांति सुखकाली शीतल, सीकर षट्दुःखहारी है,
देववंदकीर्ति गणधर-भगवान्, चरण-पूजा सुखकारी है।
ॐ ह्रीं विदेही-भावि श्री देववंदकीर्तिगणधराय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री बाहुबली भगवानका अर्थ
वसुवृष्टि वश सुध बुध सों, परवश अति दुःख पावै,
सिधि दुःख हर कलको प्रविचन, अर्घ निजाय बढ़ावै।
परम पूज्य वीराधिवीर जिन, बाहुबली बलधारी,
तिनके चरणकमलको नित प्रति, धोक त्रिकाल हमारी।
ॐ ह्रीं वर्तमान अवसर्पिणीसमये प्रथम मुक्तिस्थानप्राप्तये कर्मविजेतवे वीतरागिणे वीरवाणी श्री बाहुबली परमजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री सिद्ध भगवानका अर्थ
जल फल वसु इंद्र अर्घ अमंद, जंत अनंतदा के बंदा;
भेटो भवपदा सब दुखददा, ‘हीराचंद’ तुम वन्दा।
त्रिभुवनके स्वामी त्रिभुवननामी, अंतगामी, अभिगामी,
शिवपुरीधामी, निजविधि धामी, सिद्ध जगनामी शिरनामी।
ॐ ह्रीं अनाहतपद्मकाय सर्वकर्मनिर्मुक्तिकाय श्रीसिद्धचक्रधिपतये अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
सानुच्चय अर्घ
(गीता छंद)
मैं देव श्री अर्हत पूजू, सिद्ध पूजू भाव सों,
आचार्य श्री उवझाय पूजू, साधु पूजू भाव सों।
अर्हत-भाषित जैन पूजू, द्वादशांग रच गनी,
पूजू दिगंबर गुरुवचन, शिव हेल सब आशा हनी।
सर्वज्ञभाषित धर्म दशविधि दयामय पूजू सदा,
जीव भावना बोधसत्त्व सम्यक् या शिव नहीं कदा;
त्रैलोक्य कृत्रिम अकृत्रिम चैत्य चैत्यालय पूजू,
एन भेद नंदीश्वर जिनालय खर सुर पूजित भजू।
कैलाश श्री सम्मेद श्री गिरनार फिर पूजू सदा,
चंपापुरी पावापुरी पुनि और तीरथ सर्वदा;
चौबीस श्री जिनराज पूजू बीस क्षेत्र विदेह के,
नामावली इक सहस वसु जय होय प्रति शिवगेह के।
(दोहा)
जल गंधाक्षत शुभ चरु, दीप धूप फल लाय;
सर्व पूज्य पद पूजहूं, बहु विध भक्ति बढाय।
ॐ ह्रीं भासुरपा, भाववेदना, क्रियानिष्ठा, त्रिकालवेदना कली
करवाली-भावना भावनी, श्री अहिंद्रेणी, सिद्धेणी, आचार्येणी, उपाध्यायेणी,
सर्वसाधुनी-पंचपरमेष्ठिभ्यो नमः। प्रमाणानुयोग-करणानुयोग-चरणानुयोग-
द्रव्यानुयोगेभ्यो नमः। दर्शनविशुद्ध्यादि षोडश कारणेभ्यो नमः। उत्तमक्षमादि
दशलक्षणधर्मेभ्यो नमः। सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्रेभ्यो नमः। जल
विषे, थल विषे, आकाश विषे, गुफा विषे, पहाड़ विषे, नगर-नगरी विषे,
ऊर्ध्वलोक-मध्यलोक-पाताललोक विषे विराजमान कृत्रिम अकृत्रिम जिन-
चैत्यालय जिन-बिंबेभ्यो नमः। सिद्धक्षेत्रे विद्यमान बीस तीर्थंकरेभ्यो नमः।
पांच भरत, पांच ऐरावत-दस क्षेत्र संबंधी बीस चौबीसीना सातों बीस
जिनेभ्यो नमः। नंदीश्वरद्वीपसंबंधी बावन जिनचैत्यालयेभ्यो नमः।
सम्मेदशिखर, कैलाश, चंपापुर, पावापुर, गिरनार आदि सिद्धक्षेत्रेभ्यो नमः।
जैनबिंबो, मुद्रबिंबो, रत्नगुहो, रत्नज्वर, धारा, सुवर्णपुरी आदि तीर्थेभ्यो
नमः। श्री चारण-ऋद्धिधारी सात परमऋषिभ्यो नमः। इति उपर्युक्तेभ्यः
सर्वेभ्यो अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
शांतिपाठ
(चौपाई)
मैं तुम चरण कमल गुण गाय, बहुविधि भक्ति करूँ मन लाय;
जनम जनम प्रभु पाऊं तोहि, यह सेवरूप दीजे मोहि। १
कृपा तिहारी जैसी होय, जामन मरण मिटाय मोय;
वार वार मैं विनती करूँ, तुम सेवे भवसागर तरूं। २
नाम नेत सब दुःख मिट जाय, तुम दर्शन देखा प्रभु आय;
तुम हो प्रभु देवके देव, मैं तो करूँ चरण तब सेव। ३
मैं आयो पूजने काज, मेरो जन्म सफल भयो आज;
जो मुझ सेवककी अरदास, सो सब ही जानमैं भास। ४
यामें नहीं कुछ कमी धेर, तुमही ते सब कारण करे;
तुमरे गुणोंकी अंत न पार, तुम किन कौन लगावे पार। ५
“तार तार” बिन मन कर देव, ओहि सिद्ध सुन तारन अंव;
पूजा करके नवाऊं निज शीश, मुझ अपराध क्षय उपदीश। ६
विसर्जन
देह छतां देनी दशा, देह दंता देहतीत;
ते ज्ञानीनां चरणमां, हो वंदन अगीत।
अह परम्पद प्राप्तितुं करूँ ध्यान में,
गया नगर ने हाल मनोरथ्य जो;
तो एन निश्चय रामचंद्र मनने रहो,
प्रभु-आलापने वासुं ते व स्वरूप जो।
अपूर्व अवसर जेवो स्वरूपे आवशे?
(पूजा पूर्ण होनेके बाद दो बार नमस्कार मंत्रका जाप देना चाहिये)
श्री महावीरजिन आरती
ॐ जय तुम देव, प्रभु जय सम्मति देव;
वीर महा अति वीर प्रभुजी, वर्धमान देव। ॐ १
विजया उर अवतार लिने प्रभु सुन्दर हरषै;
षट्ठ मास रत्न कुंडलपुर, उन्नति वरषै। ॐ २
भुक्त त्रयोदशि चैत्रमासकी, प्रभु आनंद करतारी;
राय सिद्धार्थ घर जन्मोत्सव, ठाट सबे भारी। ॐ ३
त्रीस वर्ष तो हे मुनजे, प्रभु बाल ब्रह्मचारी;
राज त्याग कर घर चौवनमें, मुनिदीक्षा धारी। ॐ ४
बारह वर्ष किया तप दुस्तर विधि चक्रपुर किया;
झलके लोकालोक ज्ञानमें, यश भरपूर लिया। ॐ ५
कार्तिक श्याम अमावस के दिन, जाकर मोक्ष वसे;
पूर्व दिवाली वाला तभीसे घर-घर दीप जले। ॐ ६
वीतराग सर्वज्ञ हितषी, शिवपदम अविनाशी;
हरिहर ब्रह्मा नाव तुमही हो, जबजब अविनाशी। ॐ ७
दीनदयाला जगप्रतिपाला मुनवरराज जजे;
तुमगत बिन दर छक छिनमें, पातक दूर भजे। ॐ ८
चोर भील चांडाल उबारे, भवदुःख हर तुही;
पतित पावन शिवराम उच्चारे, हे जिन शरण सुही। ॐ ९
कैलास श्री सम्मेद श्री गिरनार गिरि पूजुं सदा,
चंपापुरी पावापुरी पुनि और तीरथ सर्वदा;
चौबीस श्री जिनराज पूजूं बीस क्षेत्र विदेह के,
नामावली इक सहस वसु जय होय प्रति शिवगेह के।
जल गंधाक्षत पुष्प चरु, दीप धूप फल लाय;
सर्व पूज्य पद पूजहुं, बहु विध भक्ति बढाय।
ॐ ह्रीँ भावपूजा, भाववंदना, त्रिकालपूजा, त्रिकालवंदना करवी कराववी-भावना भाववी, श्री अरिहंतजी, सिद्धजी, आचार्यजी, उपाध्यायजी, सर्वसाधुजी-पंचपरमेष्ठिभ्यो नमः । प्रथमानुयोग-करणानुयोग-चरणानुयोग- द्रव्यानुयोगेभ्यो नमः । दर्शनविशुद्ध्यादि षोडश कारणेभ्यो नमः । उत्तमक्षमादि दशलक्षणधर्मेभ्यो नमः । सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्रेभ्यो नमः । जल विषे, थल विषे, आकाश विषे, गुफा विषे, पहाड विषे, नगर-नगरी विषे, उर्ध्वलोक-मध्यलोक-पाताललोक विषे बिराजमान कृत्रिम अकृत्रिम जिन- चैत्यालय जिन-बिंबेभ्यो नमः । विदेहक्षेत्र विद्यमान वीस तीर्थंकरेभ्यो नमः । पांच भरत, पांच औरावत-दस क्षेत्र संबंधी त्रीस चोवीसीना सातसो वीस जिनेभ्यो नमः । नंदीश्वरद्वीपसंबंधी बावन जिनचैत्यालयेभ्यो नमः । सम्मेदशिखर, कैलास, चंपापुर, पावापुर, गिरनार आदि सिद्धक्षेत्रेभ्यो नमः । जैनबिद्री, मूडबिद्री, राजगृही, शत्रुंजय, तारंगा, सुवर्णपुरी आदि तीर्थक्षेत्रेभ्यो नमः । श्री चारण-ऋद्धिधारी सात परमऋषिभ्यो नमः । इति उपर्युक्तेभ्यः सर्वेभ्यो अर्धं निर्वपामीति स्वाहा।
शांतिपाठ
शांतिजिनेश्वर साचो साहेब, शांतिकरण अनुकूलमें हो जिनजी; तुं मेरा मनमें तुं मेरा दिलमें, ध्यान धरूं पल पलमें साहेबजी; तुं. मेरा० १
भवमां भमतां मैं दरिशन पायो, आशा पूरो ओक पलमें हो जिनजी तुं. मेरा० २
निरमल ज्योत वदन पर सोहे, निकस्यो ज्युं चंद वादळ में जिनजी तुं. मेरा० ३
मेरो मन तुम साथे लीनो, मीन वसे ज्यु जळमें साहेबजी; तुं. मेरा० ४
जिन रंग कहे प्रभु शांतिजिनेश्वर, दीठोजी देव सकळमें हो जिनजी. तुं. मेरा० ५
विसर्जन
परमेश्वर परमात्मा, पावन तू परमिट्ठ;
जय जगगुरु देवाधिदेव, नयणें में दिठ्ठ । १
अचल अकल अविकार सार, करुणारस सिंधु;
जगति जन आधार ओक, निष्कारण बंधु। २
गुण अनंत प्रभु ताहरा ओ, किमही कळ्या न जाय;
भक्ति धरुं जिन ध्यानथी, चिदानंद सुख थाय। ३
(पूजा पूर्ण होनेके बाद नौ बार नमस्कार मंत्रका जाप देना चाहिये) श्री चंद्रप्रभु जिन आरती
धन्य धन्य आज घडी कैसी सुखकार है,
चंद्रप्रभु दरबार लगा सीमंधर दरबार है.
खुशियां अपार आज हर दिलपे छांई हैं,
दर्शनके हेतु सब जनता अकुलाई है, जनता अकुलाई हैं,
चारों ओर देखलो भीड बेसुमार है. चंद्रप्रभु०१
भक्तिसे नृत्य-गान कोई हैं कर रहे,
आतम सुबोध कर पापोंसे डर रहे, पापोंसे डर रहे;
पल पल पुण्यका भरे भंडार है. चंद्रप्रभु०२
जय जयके नादसे गुंजा आकाश है,
छूटेंगे पाप सब निश्चय ये आश है, निश्चय ये आश है;
देखलो ‘सौभाग्य’ खुला आज मुक्तिद्वार है. चंद्रप्रभु०३ 5th Day Pooja
विनयपाठ
(दोहा)
इहि विधि ठाड़ो होयके, प्रथम पढे जो पाठ। धन्य जिनेश्वर देव तुम, नाशे कर्म जु आठ ।।१।। अनंत चतुष्टयके धनी, तुम ही हो सिरताज। मुक्ति वधूके कंथ तुम, तीन भुवनके राज ।।२।। तिहुं जगकी पीडा हरण, भवदधिशोषणहार। ज्ञायक हो तुम विश्वके, शिवसुखके करतार ।।३।। हरता अघअंधियारके, करता धर्म प्रकाश। थिरतापद दातार हो, धरता निजगुणराश ।।४।। धर्मामृत उर जलधिसों, ज्ञान भानु तुम रूप। तुमरे चरण सरोजको, नावत तिहुं जगभूप ।।५।। में वंदौं जिनदेवको, कर अति निरमल भाव। कर्मबंधके छेदने, और न कछु उपाय ।।६।। भविजनको भवकूपतें, तुम ही काढनहार।
दीनदयाल अनाथपति, आतम गुण भंडार ।।७।। चिदानंद निर्मल कियो, धोय कर्मरज मैल। सरल करी या जगतमें भविजनको शिव गैल ।।८।। तुम पद पंकज पूजतें, विघ्न रोग टर जाय। शत्रु मित्रताको धरै, विष निरविषता थाय ।।९।। चक्री खगधर इन्द्र पद, मिलें आपतें आप। अनुक्रम कर शिवपद लहैं, नेम सकल हनि पाप ।।१०।। 5th Day Pooja
तुम विन मैं व्याकुल भयो, जैसे जल विन मीन। जन्म जरा मेरी हरो, करो मोहि स्वाधीन ।।११।। पतित बहुत पावन किये, गिनती कौन करेय। अंजनसे तारे कुधी, जय जय जय जिनदेव ।।१२।। थकी नाव भवदधि विषे, तुम प्रभु पार करेय। खेवटिया तुम हो प्रभु, जय जय जय जिनदेव ।।१३।। राग सहित जगमें रुल्यो, मिले सरागी देव। वीतराग भेटयौ अबै, मेटो राग कुटेव ।।१४।। कित निगोद, कित नारकी, कित तिर्यंच अज्ञान। आज धन्य मानुष भयो, पायो जिनवर थान ।।१५।। तुमको पूजें सुरपति, अहिपति नरपति देव। धन्य भाग्य मेरो भयो, करन लग्यो तुम सेव ।।१६।। अशरणके तुम शरण हो, निराधार आधार।
मैं डूबत भवसिंधुमें, खेओ लगाओ पार ।।१७।। इन्द्रादिक गणपति थके, कर विनती भगवान्। अपनो विरद निहारकें, कीजे आप समान ।।१८।। तुमरी नेक सुदृष्टितैं, जग उतरत है पार। हा हा डूब्यो जात हाँ, नेक निहार निकार ।।१९।। जो में कहहूं औरसों, तो न मिटै उरझार। मेरी तो तौसों बनी, तातें करौं पुकार ।।२०।। वंदो पाँचौं परमगुरु, सुरगुरु वंदत जास। विघन हरन मंगल करन, पूरन परम प्रकाश ।।२१।। चौवीसौं जिनपद नमों, नमो शारदा माय। शिवमग साधक साधु नमि, रच्यो पाठ सुखदाय ।।२२।। पूजाकी प्रारंभिक विधि
ॐ जय जय जय, नमोस्तु, नमोस्तु, नमोस्तु ।
णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं,
णमो उवज्झायाणं, णमो लोओ सव्वसाहूणं।
ॐ ह्रीँ अनादिमूलमंत्रेभ्यो नमः
(उपर्युक्त पाठ पढ़कर पुष्प यानी (अर्थात्) चंदनमिश्रित चावल थालीमें किये हुए स्वस्तिकके ऊपर चढ़ाना।)
मंगल
चत्तारि सरणं पव्वज्जामि—अरहंते सरणं पव्वज्जामि, सिद्धे सरणं पव्वज्जामि, साहू सरणं पव्वज्जामि, केवलिपण्णत्तो धम्मं सरणं पव्वज्जामि । ॐ ह्रीँ नमोऽर्हते स्वाहा। (पुष्पांजलि चढ़ाना)
उदकचन्दनतन्दुलपुष्पकैश्चरुसुदीपसुधूपफलार्धकैः;
धवलमंगलगानरवाकुले जिनग्रहे जिननाथमहं यजे।
ॐ ह्रीँ श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्रीशान्तिनाथजिनेन्द्राय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्रीचंद्रप्रभुजिनेन्द्राय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्रीसीमंधरतीर्थंकराय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्री चतुर्विंशतितीर्थंकरेभ्यः अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्री कुंदकुंदाचार्यदेवाय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्रीसूर्यकीर्तिनाथजिनेन्द्राय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्री भगवज्जिनसहस्त्रनामेभ्यः अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। 5th Day Pooja
श्री नेमिनाथ-जिनपूजा
(जोगीरासा)
श्री हरिवंश उजागर नागर नेमीश्वर जिनराई,
बालब्रह्मचारी जगतारी श्याम शरीर सुहाई;
जादववंश महानभ पूरन चंद्रकला सुखदाई,
अत्र विराज हरो दुख हमरो शिवसुख द्यो जिनराई ।
(गीता छंद)
पद्मद्रहको नीर मनोहर कंचन झारी मांहि धरों,
जनम जरा दुःख दूर करनको, श्री जिन सन्मुख धार करों; बालब्रह्मचारी जगतारी नेमिश्वर जिनराज महान्,
मैं नित ध्यान धरूं प्रभु तेरा, मोकुं दीजो अविचल थान। ॐ ह्रीँ श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि० मलयागिर करपूर मिलाया केशर रंग अनूपम जान,
भव आताप रहित जिनवरके चरनकमलको पूजे आन। बाल०
ॐ ह्रीँ श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय भवतापविनाशनाय चंदनं नि० चंद किरनसम उज्ज्वल लीजै, अक्षत स्वच्छ सरल गुणखान; अक्षयपदके नायक प्रभुको, पूजें हर्ष सहित हित मान। बाल० ॐ ह्रीँ श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि० वरन वरनके कुसुम मंगावें, कुसुमायुध अरि जीतन काज;
कुसुमायुध विजयी जिनवरके, चरनकमलको पूजें आज। बाल०
ॐ ह्रीँ श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं नि० मनमोहन पकवान बनावो, हरष सहित प्रभुके गुण गाय;
क्षुधा रोगके नाश करनको, श्री जिन चरनन देत चढाय । बालब्रह्मचारी जगतारी नेमीश्वर जिनराज महान्,
मैं नित ध्यान धरूं प्रभु तेरा, मोकूं दीजो अविचल थान। ॐ ह्रीँ श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि० मणिमय दीप अमोलक लेके, रतन रकेबीमें धर लाय;
मोह महातम नासक प्रभुके, चरणाम्बुजमें देत चढाय। बाल० ॐ ह्रीँ श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय मोहांधकारविनाशनाय दीपं नि० कृष्णागर करपूर मिलाकर, धूप सुगंध मनोहर आन;
कर्मकलंक निवारक प्रभुके, चरमकमल ते पूजौं आन। बाल० ॐ ह्रीँ श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं नि० श्रीफल लोंग सुपारी पिस्ता, ओला केला आदि महान्;
मुक्ति श्रीफलदायक प्रभुके, चरणाम्बुज पूजै गुणखान। बाल० ॐ ह्रीँ श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं नि० जल फल द्रव्य मिलाय गाय गुन, रतनथार भरिये सुखदान, अष्टकर्मके नासक प्रभुको, पूजौं निज गुणदायक जान। बाल० ॐ ह्रीँ श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं नि० दशलक्षणधर्मपूजा
(अडिल्ल छंद)
उत्तम छिमा मारदव आरजव भाव हैं,
सत्य शौच संयम तप त्याग उपाव हैं;
आकिंचन ब्रह्मचरज धरम दश सार हैं,
चहुं गति दुखतें काढि मुक्ति करतार हैं।
(सोरठा)
हेमाचलकी धार, मुनिचित सम शीतल सुरभि;
भवआताप निवार दसलच्छन पूजुं सदा।
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय जलं निर्वपामीति स्वाहा। चन्दन केशर गार, होय सुवास दशों दिशा। भवआताप०
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। अमल अखण्डित सार, तंदुल चन्द्रसमान शुभ। भवआताप०
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा। फूल अनेक प्रकार, महकें ऊरघलोक लों। भवआताप०
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। नेवज विविध निहार, उत्तम षटरससंगजुग। भवआताप०
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। बाति कपूर सुधार, दीपकजोति सुहावनी। भवआताप०
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय दीपं निर्वपामीति स्वाहा। अगर धूप विस्तार, फैले सर्व सुगन्धता । भवआताप०
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय धूपं निर्वपामीति स्वाहा। फलकी जाति अपार, घ्रान नयन मनमोहने। भवआताप०
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय फलं निर्वपामीति स्वाहा। आठों दरब संवार, ‘द्यानत’ अधिक उछाहसों ।
भवआताप निवार दसलच्छन पूजुं सदा।
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। उत्तम शौचधर्म अर्घ
धरि हिरदै संतोष, करहु तपस्या देहसौं,
शौच सदा निरदोष, धरम बडौ संसारमें ।
उत्तम शौच सर्व जग जाना, लोभ पापको बाप बखाना;
आशा-पास महा दुखदानी, सुख पावै सन्तोषी प्रानी।
प्रानी सदा शुचि शील जप तप, ज्ञानध्यानप्रभावतें, नित गंगजमुन समुद्र न्हाये, अशुचि दोष सुभावतें; उपर अमल मल भर्यो भीतर, कौन विध घट शुचि कहै; बहु देह मैली सुगुन थैली, शौचगुन साधु लहै। ॐ ह्रीँ उत्तमशौचधर्मांगाय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। जयमाला
(दोहा)
दशलच्छन वंदौ सदा, मनवांछित फलदाय,
कहों आरती भारती, हम पर होहु सहाय। १
उत्तम छिमा जहां मन होई, अंतर बाहर शत्रु न कोई; उत्तम मार्दव विनय प्रकासै, नानाभेद ज्ञान सब भासै । २ उत्तम आर्जव कपट मिटावै, दुरगति त्याग सुगति उपजावै; उत्तम सत्यवचन मुख बोलै, सो प्रानी संसार न डोलै। ३ उत्तम शौच लोभ परिहारी, संतोषी गुनरतन भंडारी; उत्तम संयम पालै ज्ञाता, नरभव सफल करै लै साता । ४ उत्तम तप निरवांछित पालै, सो नर करमशत्रुको टालै; उत्तम त्याग करै जो कोई, भोगभूमि-सुरशिव-सुख होई । ५ उत्तम आकिंचनव्रत धारे, परमसमाधिदशा विसतारे, उत्तम ब्रह्मचर्य मन लावै, नरसुरसहित मुक्तिफल पावै। ६ (दोहा)
करे करमकी निरजरा, भवपींजरा विनाशि;
अजर अमरपदकों लहे, ‘द्यानत’ सुखकी राशि ।
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमा मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग आकिंचन्य, ब्रह्मचर्य दशलक्षणधर्माय महार्घ निर्वपामीति स्वाहा। 5th Day Pooja
देव-शास्त्र-गुरुका अर्घ
जल परम उज्ज्वल गंध अक्षत पुष्प चरु दीपक धरूं, वर धूप निरमल फल विविध बहु जनमके पातक हरूं; इह भांति अर्घ चढाय नित भवि करत शिव पंकति मचूं, अरहंत श्रुत-सिद्धांत गुरु-निरग्रंथ नित पूजा रचू । वसुविधि अर्घ संजोयके अति उछाह मन कीन;
जासों पूजों परम पद देव शास्त्र गुरु तीन।
ॐ ह्रीँ देव-शास्त्र-गुरुभ्यः अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। श्री महावीर भगवानका अर्घ
पावन जल चंदन, अक्षत पुष्प रु, चरु वर दीपन, धूप धरों; वर अर्घ उतारो, तुम पद धारो, नंदन तारो, पूज करो। चरम तीर्थंकर जगत् हितंकर, हे अभयंकर, वीर जिनं, सब कर्म क्षयंकर, दया धुरंधर, जगजन शंकर, शर्म घनं। ॐ ह्रीँ श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। श्री शांतिनाथ भगवानका अर्घ
आठ विधि सौ अर्घ करिये आठ कर्म जु छीनवे,
मैं करहुं भविजन भगत प्रभुकी ‘जसकरण’ अ वीनवै, श्री शान्तिनाथ जिनेश पूजौं भावसौं मन लायकैं; शान्त करियौ कर्म सबरे मोक्षलक्ष्मी पायकें. ॐ ह्रीँ श्रीशान्तिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। श्री चंद्रप्रभु भगवानका अर्घ
वसुविधि अर्घ बनाय मनोहर श्री जिनमंदिर जावो, अष्टकर्मके नाश करनको श्री जिनचरन चढावो;
चंचल चितको रोकी, चतुर्गति चक्र भ्रमण निरवारो, चारु चरण आचरण चतुर नर चंद्रप्रभ चित धारो. ॐ ह्रीँ श्रीचंद्रप्रभुजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। 5th Day Pooja
श्री सीमंधर भगवानका अर्घ
जल गंध आदिक द्रव्य लेके, अर्घ कर ले आवने,
धाय चरन चढाय भविजन, मोक्षफलको पावने.
तीर्थपति जिनराजजीकी, परम पावन पूज करो;
श्री सीमंधरनाथकी सौ, भावसे भक्ति लहो।
ॐ ह्रीँ श्री सीमंधरनाथजिनेन्द्रदेवाय चरणकमलपूजनार्थे अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री कुंदकुंदाचार्यदेवका अर्घ
जल गंध अक्षत पुष्प चरुवर, दीप धूप सु लावना,
फल ललित आठों द्रव्य-मिश्रित, अर्घ कीजे पावना;
कुंदकुंदआदिक ऋद्धिधारक, मुनिनकी पूजा करूँ;
ता करें पातिक हरें सारें, सकल आनंद विस्तरूं ।
ॐ ह्रीँ श्रीकुंदकुंदआदि मुनिराज चरणकमलपूजनार्थे अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्व० श्री भावी तीर्थंकरका अर्घ
जल गंध सुअक्षत पुष्प, शुभ नैवेद्य धरूं,
लई दीप धूप फळ अर्ध, जिनवर पूज करूँ;
अहो ! धातकीखंड जिणंद भावी मनहारी,
जंबू-भरते जयवंत, शिव - मंगळकारी ।
(-चेन्नाई वर्ते जयवंत, शिव - मंगळकारी ।)
ॐ ह्रीँ धातकीद्वीप-विदेहक्षेत्रस्थ भावि जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति श्री सुवर्णपुरी तीर्थका अर्घ
भरि स्वर्णथाल वसु द्रव्य अचूं कर जोरि,
प्रभु सुनियो विनती नाथ, कहूं मैं भाव धरि,
अनुभूति तीर्थमहान् सुवर्णपुरी सोहे,
यह कहानगुरु वरदान मंगल मुक्ति मिले ।
ॐ ह्रीं श्री सुवर्णपुरी-अध्यात्मतीर्थे जिनमन्दिरे बिराजमान श्री
सीमन्धरस्वामी, पद्मप्रभ, शान्तिनाथ, नेमिनाथ आदि जिनेन्द्र; समवसरणे बिराजमान श्री सीमन्धरस्वामी, तत्पादमूल-विराजमान श्री कुन्दकुन्दाचार्यदेव; मानस्तम्भे चतुर्दिक्षु बिराजमान श्री सीमन्धरस्वामी; परमागममन्दिरे बिराजमान भगवान् श्री महावीरस्वामी, श्री समयसार आदि पंचपरमागम, श्री कुन्दकुन्दाचार्य-चरणचिह्न; ‘गुरुदेवश्रीके वचनामृत’ तथा ‘बहिनश्रीके वचनामृत’ इति उभयाभ्यां विभूषित पंचमेरु-नन्दीश्वरजिनालये बिराजमान भगवान् श्री आदिनाथ, धातकीखण्ड विदेही भावी तीर्थंकर, जम्बु-भरतस्य भावी श्री महापद्म जिनवर; पंचमेरौ तथा नन्दीश्वर- द्वापंचाशत्-जिनालये बिराजमान सर्व शाश्वत जिनेन्द्र; जम्बूद्वीप-बाहुबली निर्माणाधीन आयतने विराजमान सर्व कृत्रिम-अकृत्रिम-शाश्वत जिनेन्द्रः, स्वाध्यायमन्दिरे प्रतिष्ठित श्री समयसार-इत्यादि सर्व वीतरागपूज्यपदेभ्यः पूजनार्थे महार्घ निर्वपामीति स्वाहा।
देवेन्द्रकीर्ति भावि विदेही गणधरका अर्घ
पावन जिनका नामस्मरण, मंगल सुखके दाता है,
धन्य धन्य अवतार प्रभु, त्रिभुवन कीर्तन गाता है;
शांति सुधाकरकी शीतल, शीकर भवदुःखहारी है,
ॐ ह्रीं विदेही-भावि श्री देवेन्द्रकीर्तिगणधरदेवाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं नि० श्री बाहुबली भगवानका अर्घ
वसुविधिके वस वसुधा सब की, परवश अति दुःख पावे,
तिहि दुःख दूर करनको भविजन, अर्घ जिनाग्र चढावे ।
परम पूज्य वीराधिवीर जिन, बाहुबली बलधारी,
तिनके चरणकमलको नित प्रति, धोक त्रिकाल हमारी।
ॐ ह्रीँ वर्तमान अवसर्पिणीसमये प्रथम मुक्तिस्थानप्राप्ताय कर्मरिविजये वीराधिवीर वीराग्रणी श्री बाहुबली परमजिनदेवाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति० श्री सिद्ध भगवानका अर्घ
जल फल वसु वृंदा अरघ अमंदा, जजत अनंदा के कंदा;
मेटो भवफंदा सब दुखदंदा, ‘हीराचंदा’ तुम बन्दा।
त्रिभुवनके स्वामी त्रिभुवननामी, अंतरजामी, अभिरामी,
शिवपुरविश्रामी, निजनिधि पामी, सिद्ध जजामी शिरनामी।
ॐ ह्रीँ अनाहतपराक्रमाय सर्वकर्मविनिर्मुक्ताय श्रीसिद्धचक्राधिपतये अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा।
समुच्चय अर्घ
(गीता छंद)
मैं देव श्री अरहत पूजूं, सिद्ध पूजूं चाव सों,
आचार्य श्री उवझाय पूजूं, साधु पूजूं भाव सों।
अरहत-भाषित वैन पूजूं, द्वादशांग रचे गनी,
पूजूं दिगंबर गुरुचरन, शिव हेत सब आशा हनी।
सर्वज्ञभाषित धर्म दशविधि दयामय पूजूं सदा,
जजि भावना षोडश रतनत्रय जा विना शिव नहीं कदा;
त्रैलोक्यके कृत्रिम अकृत्रिम चैत्य चैत्यालय जजूं,
पन मेरु नंदीश्वर जिनालय खचर सुर पूजित भजूं ।
कैलास श्री सम्मेद श्री गिरनार गिरि पूजुं सदा,
चंपापुरी पावापुरी पुनि और तीरथ सर्वदा;
चौबीस श्री जिनराज पूजूं बीस क्षेत्र विदेह के,
नामावली इक सहस वसु जय होय प्रति शिवगेह के।
(दोहा)
जल गंधाक्षत पुष्प चरु, दीप धूप फल लाय;
सर्व पूज्य पद पूजहुं, बहु विध भक्ति बढाय।
शांतिपाठ
(चौपाई)
मैं तुम चरण कमल गुण गाय, बहुविधि भक्ति करूँ मन लाय; जनम जनम प्रभु पाउं तोहि, यह सेवाफल दीजे मोहि। १
कृपा तिहारी जैसी होय, जामन मरन मिटावो मोय;
वार वार मैं विनती करूँ, तुम सेये भवसागर तरूं । २
नाम लेत सब दुःख मिट जाय, तुम दर्शन देख्या प्रभु आय; तुम हो प्रभु देवनके देव, मैं तो करूँ चरण तव सेव । ३ मैं आयो पूजनके काज, मेरो जन्म सफल भयो आज;
जो मुझ सेवककी अरदास, सो सब रही ज्ञानमें भास। ४
यातें नहि कुछ कहनी परे, तुमही तें सब कारज सरे;
तुमरे गुणोंको स्वामी अंत न पार, तुम बिन कौन लगावे पार। ५ “तार तार” विल मत कर देव, अहि विरद सुन तारन अव;
पूजा करके नवाउं निज शीश, मुज अपराध क्षमहु जगदीश । ६ 5th Day Pooja
विसर्जन
देह छतां जेनी दशा, वर्ते देहातीत;
ते ज्ञानीनां चरणमां, हो वंदन अगणित.
ओह परमपद प्राप्तिनुं कर्यु ध्यान में, गजा वगर ने हाल मनोरथरूप जो;
तो पण निश्चय राजचंद्र मनने रह्यो,
प्रभु-आज्ञाओ थाशुं ते ज स्वरूप जो;
अपूर्व अवसर ओवो क्यारे आवशे?
(पूजा पूर्ण होनेके बाद नौ बार नमस्कार मंत्रका जाप देना चाहिये) आरती
लाख लाख दीवडानी आरती उतारजो,
लाख लाख तोरण बंधाय;
आंगणिये अवसर आनंदना…(टेक)
लाख लाख द्रव्योनी पूजा रचावजो;
लाख लाख हाथे कराय. आंगणिये…लाख ० १
खोबे खोबे रंग उडे गुलालना,
लाखो वधामणां जिनवरना आवतां;
लाखेणी भक्ति कराय. आंगणिये…लाख० २
गावो गावो गीत गाजो गवरावजो,
ताने ताने नाच नाची नचावजो;
लाखेणा ल्हावा लेवाय. आंगणिये…लाख ० ३ लाख लाख गुरुजीना गुण गवरावजो;
लाख लाख (जीवोना) उद्धार करनार. आंगणिये…लाख ० ४ जयकार जगतमां फेलाय आंगणिये…लाख लाख ०
आराधना पाठ
(हरिगीत)
मैं देव नित अरहंत चाहूं, सिद्धका सुमिरन करौं; मैं सूर गुरु मुनि तीनि पद मैं, साधुपद हृदये धरौं; मैं धर्म करुणामयी चाहूं, जहां हिंसा रंच ना; मैं शास्त्रज्ञान विराग चाहूं, जासु में परपंच ना ॥१॥ चौबीस श्री जिनदेव चाहूं, और देव न मन बसैं; जिन बीस क्षेत्र विदेह चाहूं, बंदिते पातिक नशै; गिरनार शिखर संमेद चाहूं, चम्पापुरी पावापुरी; कैलास श्री जिनधाम चाहूं, भजत भांजें भ्रमजुरी ॥२॥ नवतत्त्वका सरधान चाहूं, और तत्त्व न मन धरौं; षटद्रव्य गुण परजाय चाहूं, ठीकतासों भय हरौं; पूजा परम जिनराज चाहूं, और देव न हूँ सदा; तिहुंकालकी मैं जाप चाहूं, पाप नहि लागै कदा ॥३॥ सम्यक्त्व दरशन ज्ञान चारित्र सदा चाहूं, भावसों; दशलक्षणी मैं धर्म चाहूं, महा हर्ष उछावसों; सोलह जु कारण दुःखनिवारण सदा चाहूं, प्रीतिसों; मैं चित्त अठाई पर्व चाहूं महा मंगल रीतिसों ॥४॥ मैं वेद चारों सदा चाहूं, आदि अंत निवाहसों, पाओ धरमके चार चाहूं, अधिक चित्त उछाहसों; मैं दान चारों सदा चाहूं, भुवन वशि लाहो लहूं, आराधना मैं चारि चाहूं, अन्तमें ये ही गहूं ॥५॥ भावना बारह सदा भाऊं, भाव निरमल होत हैं, मैं व्रत जु बारह सदा चाहूं, त्याग भाव उद्योत हैं; प्रतिमा दिगम्बर सदा चाहूं, ध्यान आसन सोहना,
वसुकर्मतें मैं छुटा चाहूं, शिव लहूं जहुं मोह ना ॥६॥ मैं साधुजनको संघ चाहूं, प्रीति तिन ही सों करौ,
मैं पर्वके उपवास चाहूं, अरम्भै मैं परिहरों;
इस दुःख पंचमकाल माहीं, कुल शरावक मैं लहौं,
अरु महाव्रत धरि सकौं नाहीं निबल तन मैंने गहो ॥७।। आराधना उत्तम सदा चाहूं, सुनो जिनरायजी,
तुम कृपानाथ अनाथ ‘द्यानत’ दया करना न्यायजी;
वसुकर्मनाश विकाश ज्ञान प्रकाश मोको कीजीओ,
करि सुगतिगमन समाधिमरन सुभक्ति चरनन दीजिओ ॥८॥
पूजाकी प्रारंभिक विधि
ॐ जय जय जय, नमोस्तु, नमोस्तु, नमोस्तु।
णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं,
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं ।
ॐ ह्रीँ अनादिमूलमंत्रेभ्यो नमः
(उपर्युक्त पाठ पढ़कर पुष्प यानी (अर्थात्) चंदनमिश्रित चावल थालीमें किये हुए स्वस्तिकके ऊपर चढ़ाना।)
मंगल
चत्तारि सरणं पव्वज्जामि—अरहंते सरणं पव्वज्जामि, सिद्धे सरणं पव्वज्जामि, साहू सरणं पव्वज्जामि, केवलिपण्णत्तो धम्मं सरणं पव्वज्जामि । ॐ ह्रीँ नमोऽर्हते स्वाहा। (पुष्पांजलि चढ़ाना)
उदकचन्दनतन्दुलपुष्पकैश्चरुसुदीपसुधूपफलार्धकैः;
धवलमंगलगानरवाकुले जिनग्रहे जिननाथमहं यजे।
ॐ ह्रीँ श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्रीशान्तिनाथजिनेन्द्राय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्रीचंद्रप्रभुजिनेन्द्राय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्रीसीमंधरतीर्थंकराय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्री चतुर्विंशतितीर्थंकरेभ्यः अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्री कुंदकुंदाचार्यदेवाय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्रीसूर्यकीर्तिनाथजिनेन्द्राय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्री भगवज्जिनसहस्रनामेभ्यः अर्धं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री सीमंधर-जिनपूजा
(दोहा)
श्री सीमंधर आदि दे, विहरमान जिनराय;
पूजों पदजुग पद्म सम, सुर-शिवपद सुखदाय।
ॐ ह्रीँ श्रीसीमंधरजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवोषट् इति आह्वाननम् । ॐ ह्रीँ श्रीसीमंधरजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्, ॐ ह्रीँ श्रीसीमंधरजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम् । (गीता छंद)
परम प्रासुक नीर निर्मल, क्षीरदधि सम लीजिये;
हेम झारी मांहि भरके, धार सुंदर दीजिये।
तीर्थपति जिनराजजीकी, परम पावन पूज करो;
श्री सीमंधरनाथकी सौ, भावसे भक्ति लहो।
ॐ ह्रीँ श्री सीमंधरजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। चंदन सुपावन दुःख मिटावन, अति सुगंध मिलाईओ;
डाल कर कर्पूर केशर, नीरसों घिस ल्याईओ… तीर्थपति० ॐ ह्रीँ श्री सीमंधरजिनेन्द्राय संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। 6th Day Pooja
विमल तंदुल ले अखंडित, ज्योति निशिपति सम धरे;
कनक थारी मांहि धरके, पूज कर पायन परे;
तीर्थपति जिनराजजीकी, परम पावन पूज करो;
श्री सीमंधरनाथकी सौ, भावसे भक्ति लहो।
ॐ ह्रीं श्री सीमंधरजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा। सुरवृक्ष के सम फूल लेकर, गंधधर मधुकर फिरे;
मदनबाण विनाशनेको, प्रभु-चरण पूजा करे… तीर्थपति० ॐ ह्रीँ श्री सीमंधरजिनेन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। छहों रसकर जुक्त नेवज, कनक थारीमें भरो;
भावसे प्रभु चरन पूजो, क्षुधादिक मनकी हरो ।… तीर्थपति० ॐ ह्रीँ श्री सीमंधरजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। रतनदीप कपूर बाती, ज्योत जगमग होत है,
मोहतिमिर विनाशवेको, भानु सम उद्योत है… तीर्थपति० ॐ ह्रीँ श्री सीमंधरजिनेन्द्राय मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा। कूट मलयागिरी चंदन, अगर आदि मिलाईओ,
ले दशांगी धूप सुंदर, अगन मांहिं जराईओ… तीर्थपति० ॐ ह्रीँ श्री सीमंधरजिनेन्द्राय अषकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा। ल्याय केला श्रीफल दाडिम, और फल बहुते घने,
नेत्र रसना लगे सुंदर, फल अनूप चढावने… तीर्थपति० ॐ ह्रीँ श्री सीमंधरजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा। जल गंध आदिक द्रव्य लेके, अर्घ कर ले आवने,
धाय चरन चढाय भविजन, मोक्षफलको पावने… तीर्थपति०
ॐ ह्रीँ श्री सीमंधरनाथजिनेन्द्रदेवाय चरणकमलपूजनार्थे अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा।
दशलक्षणधर्मपूजा
(अडिल्ल छंद)
उत्तम छिमा मारदव आरजव भाव हैं,
सत्य शौच संयम तप त्याग उपाव हैं;
आकिंचन ब्रह्मचरज धरम दश सार हैं,
चहुं गति दुखतें काढि मुक्ति करतार हैं।
(सोरठा)
हेमाचलकी धार, मुनिचित सम शीतल सुरभि;
भवआताप निवार दसलच्छन पूजुं सदा।
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय जलं निर्वपामीति स्वाहा। चन्दन केशर गार, होय सुवास दशों दिशा। भवआताप०
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। अमल अखण्डित सार, तंदुल चन्द्रसमान शुभ। भवआताप०
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा। फूल अनेक प्रकार, महकें ऊरघलोक लों। भवआताप०
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। नेवज विविध निहार, उत्तम षटरससंगजुग। भवआताप०
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। बाति कपूर सुधार, दीपकजोति सुहावनी। भवआताप०
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय दीपं निर्वपामीति स्वाहा। अगर धूप विस्तार, फैले सर्व सुगन्धता । भवआताप०
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय धूपं निर्वपामीति स्वाहा। फलकी जाति अपार, घ्रान नयन मनमोहने ।
भवआताप निवार दसलच्छन पूजुं सदा।
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय फलं निर्वपामीति स्वाहा। आठों दरब संवार, ‘द्यानत’ अधिक उछाहसों। भवआताप० ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा।
उत्तम संयमधर्म अर्घ
काय छहों प्रतिपाल, पंचेन्द्रिय मन वश करो; संयम-रतन संभाल, विषयचोर बहु फिरत हैं।
उत्तम संयम गहु मन मेरे, भव भवके भाजै अघ तेरे; सुरग नरक पशुगति में नाहीं, आलस हरन करन सुख ठाहीं। ठाहीं पृथ्वी जल आग मारुत, रूख क्षस करुना धरो, सपरसन रसना घ्रान नैना, कान मन सब वश करो;
जिस बिना नहि जिनराज सीझे, तू रुल्यो जगकीचमें, इक धरी मत विसरो नित, आयु जममुख बीचमें।
ॐ ह्रीँ उत्तमसंयमधर्मांगाय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
(दोहा)
दशलच्छन वंदौ सदा, मनवांछित फलदाय,
कहों आरती भारती, हम पर होहु सहाय । १
उत्तम छिमा जहां मन होई, अंतर बाहर शत्रु न कोई; उत्तम मार्दव विनय प्रकासै, नानाभेद ज्ञान सब भासै । २ उत्तम आर्जव कपट मिटावै, दुरगति त्याग सुगति उपजावै; उत्तम सत्यवचन मुख बोलै, सो प्रानी संसार न डोलै। ३ उत्तम शौच लोभ परिहारी, संतोषी गुनरतन भंडारी; उत्तम संयम पालै ज्ञाता, नरभव सफल करै लै साता । ४
उत्तम तप निरवांछित पालै, सो नर करमशत्रुको टालै; उत्तम त्याग करै जो कोई, भोगभूमि-सुरशिव-सुख होई । ५ उत्तम आकिंचनव्रत धारे, परमसमाधिदशा विसतारे, उत्तम ब्रह्मचर्य मन लावै, नरसुरसहित मुक्तिफल पावै। ६ (दोहा)
करे करमकी निरजरा, भवपींजरा विनाशि;
अजर अमरपदकों लहे, ‘द्यानत’ सुखकी राशि।
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमा मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग आकिंचन्य, ब्रह्मचर्य दशलक्षणधर्माय महार्घ निर्वपामीति स्वाहा।
देव-शास्त्र-गुरुका अर्घ
जल परम उज्ज्वल गंध अक्षत पुष्प चरु दीपक धरूं, वर धूप निरमल फल विविध बहु जनमके पातक हरूं; इह भांति अर्घ चढाय नित भवि करत शिव पंकति मचूं, अरहंत श्रुत-सिद्धांत गुरु-निरग्रंथ नित पूजा रचू । वसुविधि अर्घ संजोयके अति उछाह मन कीन;
जासों पूजों परम पद देव शास्त्र गुरु तीन।
ॐ ह्रीं देव-शास्त्र-गुरुभ्यः अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री महावीर भगवानका अर्घ
पावन जल चंदन, अक्षत पुष्प रु, चरु वर दीपन, धूप धरों; वर अर्घ उतारो, तुम पद धारो, नंदन तारो, पूज करो। चरम तीर्थंकर जगत् हितंकर, हे अभयंकर, वीर जिनं, सब कर्म क्षयंकर, दया धुरंधर, जगजन शंकर, शर्म घनं। ॐ ह्रीँ श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री शांतिनाथ भगवानका अर्घ
आठ विधि सौ अर्घ करिये आठ कर्म जु छीनवे,
मैं करहुं भविजन भगत प्रभुकी ‘जसकरण’ अ वीनवै, 6th Day Pooja
श्री शान्तिनाथ जिनेश पूजौं भावसौं मन लायकैं;
शान्त करियौ कर्म सबरे मोक्षलक्ष्मी पायकें.
ॐ ह्रीँ श्रीशान्तिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। श्री चंद्रप्रभु भगवानका अर्घ
वसुविधि अर्घ बनाय मनोहर श्री जिनमंदिर जावो,
अष्टकर्मके नाश करनको श्री जिनचरन चढावो;
चंचल चितको रोकी, चतुर्गति चक्र भ्रमण निरवारो,
चारु चरण आचरण चतुर नर चंद्रप्रभ चित धारो.
ॐ ह्रीँ श्रीचंद्रप्रभुजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। श्री नेमिनाथ भगवानका अर्घ
सलिल सुच्छ मलयागिर चंदन, अछित कुसुम चरु भरि थारी,
मणिदीप दसांग धूप फल उत्तम, अर्घ ‘राम’ करि सुखकारी;
श्री नेमि जिनेश्वरके पद वंदूं, रजमति सी ततछिन छारी,
पसुवनिकी रव सुनिकें करुणा धरि, जाय चढे प्रभु गिरनारी.
ॐ ह्रीँ श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। श्री कुंदकुंदाचार्यदेवका अर्घ
जल गंध अक्षत पुष्प चरुवर, दीप धूप सु लावना,
फल ललित आठों द्रव्य-मिश्रित, अर्घ कीजे पावना;
कुंदकुंदआदिक ऋद्धिधारक, मुनिनकी पूजा करूँ;
ता करें पातिक हरें सारें, सकल आनंद विस्तरूं ।
ॐ ह्रीँ श्रीकुंदकुंदआदि मुनिराज चरणकमलपूजनार्थे अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ निर्व० श्री भावी तीर्थंकरका अर्घ
जल गंध सुअक्षत पुष्प, शुभ नैवेद्य धरूं,
लई दीप धूप फळ अर्घ, जिनवर पूज करूँ;
अहो ! धातकीखंड जिणंद भावी मनहारी,
जंबू-भरते जयवंत, शिव - मंगळकारी ।
(-चेन्नाई वर्ते जयवंत, शिव - मंगळकारी ।)
ॐ ह्रीँ धातकीद्वीप-विदेहक्षेत्रस्थ भावि जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति श्री सुवर्णपुरी तीर्थका अर्घ
भरि स्वर्णथाल वसु द्रव्य अचूं कर जोरि,
प्रभु सुनियो विनती नाथ, कहूं मैं भाव धरि,
अनुभूति तीर्थमहान् सुवर्णपुरी सोहे,
यह कहानगुरु वरदान मंगल मुक्ति मिले ।
ॐ ह्रीँ श्री सुवर्णपुरी-अध्यात्मतीर्थे जिनमन्दिरे बिराजमान श्री सीमन्धरस्वामी, पद्मप्रभ, शान्तिनाथ, नेमिनाथ आदि जिनेन्द्र; समवसरणे बिराजमान श्री सीमन्धरस्वामी, तत्पादमूल-विराजमान श्री कुन्दकुन्दाचार्यदेव; मानस्तम्भे चतुर्दिक्षु बिराजमान श्री सीमन्धरस्वामी; परमागममन्दिरे बिराजमान भगवान् श्री महावीरस्वामी, श्री समयसार आदि पंचपरमागम, श्री कुन्दकुन्दाचार्य-चरणचिह्न; ‘गुरुदेवश्रीके वचनामृत’ तथा ‘बहिनश्रीके वचनामृत’ इति उभयाभ्यां विभूषित पंचमेरु- नन्दीश्वरजिनालये बिराजमान भगवान् श्री आदिनाथ, धातकीखण्ड विदेही भावी तीर्थंकर, जम्बु-भरतस्य भावी श्री महापद्म जिनवर; पंचमेरौ तथा नन्दीश्वर- द्वापंचाशत्-जिनालये बिराजमान सर्व शाश्वत जिनेन्द्र; जम्बूद्वीप-बाहुबली निर्माणाधीन आयतने विराजमान सर्व कृत्रिम-अकृत्रिम-शाश्वत जिनेन्द्रः, स्वाध्यायमन्दिरे प्रतिष्ठित श्री समयसार-इत्यादि सर्व वीतरागपूज्यपदेभ्यः पूजनार्थे महार्घ निर्वपामीति स्वाहा। देवेन्द्रकीर्ति भावि विदेही गणधरका अर्घ
(राग-दयानिधि हो)
पावन जिनका नामस्मरण, मंगल सुखके दाता है,
धन्य धन्य अवतार प्रभु, त्रिभुवन कीर्तन गाता है;
शांति सुधाकरकी शीतल, शीकर भवदुःखहारी है,
ॐ ह्रीं विदेही-भावि श्री देवेन्द्रकीर्तिगणधरदेवाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति 6th Day Pooja
श्री बाहुबली भगवानका अर्घ
वसुविधिके वस वसुधा सब की, परवश अति दुःख पावे,
तिहि दुःख दूर करनको भविजन, अर्घ जिनाग्र चढावे।
परम पूज्य वीराधिवीर जिन, बाहुबली बलधारी,
तिनके चरणकमलको नित प्रति, धोक त्रिकाल हमारी।
ॐ ह्रीँ वर्तमान अवसर्पिणीसमये प्रथम मुक्तिस्थानप्राप्ताय कर्मरिविजये वीराधिवीर वीराग्रणी श्री बाहुबली परमजिनदेवाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति. श्री सिद्ध भगवानका अर्घ
जल फल वसु वृंदा अरघ अमंदा, जजत अनंदा के कंदा;
मेटो भवफंदा सब दुखदंदा, ‘हीराचंदा’ तुम बन्दा।
त्रिभुवनके स्वामी त्रिभुवननामी, अंतरजामी, अभिरामी,
शिवपुरविश्रामी, निजनिधि पामी, सिद्ध जजामी शिरनामी।
ॐ ह्रीँ अनाहतपराक्रमाय सर्वकर्मविनिर्मुक्ताय श्रीसिद्धचक्राधिपतये अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा ।
समुच्चय अर्घ
(गीता छंद)
मैं देव श्री अरहत पूजूं, सिद्ध पूजूं चाव सों,
आचार्य श्री उवझाय पूजूं, साधु पूजूं भाव सों।
अर्हत-भाषित वैन पूजूं, द्वादशांग रचे गनी,
पूजूं दिगंबर गुरुचरन, शिव हेत सब आशा हनी।
सर्वज्ञभाषित धर्म दशविधि दयामय पूजूं सदा,
जजि भावना षोडश रतनत्रय जा विना शिव नहीं कदा;
त्रैलोक्यके कृत्रिम अकृत्रिम चैत्य चैत्यालय जजूं,
पन मेरु नंदीश्वर जिनालय खचर सुर पूजित भजूं।
कैलास श्री सम्मेद श्री गिरनार गिरि पूजुं सदा,
चंपापुरी पावापुरी पुनि और तीरथ सर्वदा;
चौबीस श्री जिनराज पूजूं बीस क्षेत्र विदेह के,
नामावली इक सहस वसु जय होय प्रति शिवगेह के।
जल गंधाक्षत पुष्प चरु, दीप धूप फल लाय;
सर्व पूज्य पद पूजहुं, बहु विध भक्ति बढाय।
ॐ ह्रीँ भावपूजा, भाववंदना, त्रिकालपूजा, त्रिकालवंदना करवी कराववी-भावना भाववी, श्री अरिहंतजी, सिद्धजी, आचार्यजी, उपाध्यायजी, सर्वसाधुजी-पंचपरमेष्ठिभ्यो नमः । प्रथमानुयोग-करणानुयोग-चरणानुयोग- द्रव्यानुयोगेभ्यो नमः । दर्शनविशुद्ध्यादि षोडश कारणेभ्यो नमः । उत्तमक्षमादि दशलक्षणधर्मेभ्यो नमः । सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्रेभ्यो नमः । जल विषे, थल विषे, आकाश विषे, गुफा विषे, पहाड विषे, नगर-नगरी विषे, ऊर्ध्वलोक-मध्यलोक-पाताललोक विषे बिराजमान कृत्रिम अकृत्रिम जिन- चैत्यालय जिन-बिंबेभ्यो नमः । विदेहक्षेत्र विद्यमान वीस तीर्थंकरेभ्यो नमः । पांच भरत, पांच औरावत-दस क्षेत्र संबंधी त्रीस चोवीसीना सातसो वीस जिनेभ्यो नमः । नंदीश्वरद्वीपसंबंधी बावन जिनचैत्यालयेभ्यो नमः । सम्मेदशिखर, कैलास, चंपापुर, पावापुर, गिरनार आदि सिद्धक्षेत्रेभ्यो नमः । जैनबिद्री, मूडबिद्री, राजगृही, शत्रुंजय, तारंगा, सुवर्णपुरी आदि तीर्थक्षेत्रेभ्यो नमः । श्री चारण-ऋद्धिधारी सात परमऋषिभ्यो नमः । इति उपर्युक्तेभ्यः सर्वेभ्यो अर्धं निर्वपामीति स्वाहा।
शांतिपाठ
(शान्तिपाठ बोलते वक्त दोंनों हाथोंसे पुष्पवृष्टि करना) (चोपाई १६ मात्रा)
शांतिनाथ मुख शशि उनहारी, शीलगुणव्रतसंयमधारी;
लखन ओक सौ आठ विराजै, निरखत नयन कमलदल लाजै ।
पंचम चक्रवर्ति पदधारी, सोलम तीर्थंकर सुखकारी; इन्द्र नरेन्द्र पूज्य जिननायक, नमों शांतिहित शांति विद्यायक। दिव्य विटप पहुपनकी वरषा, दुन्दुभी आसन वाणी सरसा; छत्र चमर भामंडल भारी, ये तुव प्रातिहार्य मनहारी। शांति जिनेश शांति सुखदाइ, जगतपूज्य पूजौं शिर नाइ; परम शांति दीजैं हम सबको, पढें तिन्हें पुनि चार संघको । (वसंततिलका)
पूजें जिन्हें मुकुट हार किरीट लाके,
इन्द्रादि देव अरु पूज्य पदाब्ज जाके;
सो शांतिनाथ वरवंश जगत्प्रदीप,
मेरे लिये करहिं शांति सदा अनूप।
(दोहा)
घातिकर्म जिन नाश करि, पायो केवलराज;
शांति करो सब जगतमें, वृषभादिक जिनराज । विसर्जन
श्री सीमंधर जगधणी, आ भरते आवो;
करुणावंत करुणा करी, अमने वंदावो। १
सकल भक्त तुमे घणी, जो होवे अम नाथ;
भवो भव हूँ हूँ ताहरो नहीं मेलुं हवे साथ। २ सकल संग छंडी करी, चारित्र लईशुं;
पाय तुमारा सेवीने, शिवरमणी वरशुं । ३
ओ अळजो मुजने घणो, पूरो सीमंधर देव;
इहां थकी हूँ विनवुं, अवधारो मुज सेव। ४ (पूजा पूर्ण होनेके बाद नौ बार नमस्कार मंत्रका जाप देना चाहिये)
श्री सीमंधरजिनकी आरती
(राग-अबोलडा शाने लीधा छे)
आरती उतारूं हूँ तो सीमंधरनाथनी;
वारी वारी मुखडुं निहाळ… हो देव जय जिनराया. १ उपशम रसभरी मुद्रा निहाळी;
तुज पर जाउं बलिहारी…हो देव जय जिनराया. २ रत्नमणिना दीपक प्रगटावी;
आरती उतारुं नाथ तारी… हो देव जय जिनराया. ३ शुक्ल ध्याननी श्रेणीओ चढिया;
केवळज्ञान उपजाया…हो देव जय जिनराया. ४ जगमग जगमग ज्योति प्रकाशी;
झळके छे ब्रह्मांडमांही… हो देव जय जिनराया. ५ ईन्द्रो नरेन्द्रो आरती उतारे;
भक्तिनी धून मचावे… हो देव जय जिनराया. ६ दिव्यध्वनिनो नाद ज छूट्यो;
झील्यो छे कहान गुरुदेवे… हो देव जय जिनराया. ७ जय जय आरती नाथ तुमारी;
भक्तोने आनंदकारी… हो देव जय जिनराया. ८ 7th Day Pooja
विनयपाठ
(दोहा)
इहि विधि ठाड़ो होयके, प्रथम पढै जो पाठ। धन्य जिनेश्वर देव तुम, नाशे कर्म जु आठ ॥१॥ अनंत चतुष्टयके धनी, तुम ही हो सिरताज । मुक्ति वधूके कंथ तुम, तीन भुवनके राज ॥२॥ तिहुं जगकी पीडा हरण, भवदधिशोषणहार । ज्ञायक हो तुम विश्वके, शिवसुखके करतार ।। ३।। हरता अघअंधियारके, करता धर्म प्रकाश । थिरतापद दातार हो, धरता निजगुणराश ॥४॥ धर्मामृत उर जलधिसों, ज्ञान भानु तुम रूप। तुमरे चरण सरोजको, नावत तिहुं जगभूप ॥५॥ में वंदों जिनदेवको, कर अति निरमल भाव। कर्मबंधके छेदने, और न कछु उपाय ।।६।। भविजनको भवकूपतें, तुम ही काढनहार।
दीनदयाल अनाथपति, आतम गुण भंडार ॥७॥ चिदानंद निर्मल कियो, धोय कर्मरज मैल। सरल करी या जगतमें भविजनको शिव गैल ॥८॥ तुम पद पंकज पूजतें, विघ्न रोग टर जाय। शत्रु मित्रताको धरै, विष निरविषता थाय ।।९।। चक्री खगधर इन्द्र पद, मिलें आपतें आप। अनुक्रम कर शिवपद लहैं, नेम सकल हनि पाप ॥१०॥ तुम विन मैं व्याकुल भयो, जैसे जल विन मीन। जन्म जरा मेरी हरो, करो मोहि स्वाधीन ।।११।। पतित बहुत पावन किये, गिनती कौन करेय । अंजनसे तारे कुधी, जय जय जय जिनदेव ।।१ २। थकी नाव भवदधि विषे, तुम प्रभु पार करेय । खेवटिया तुम हो प्रभु, जय जय जय जिनदेव ।।१ ३।। राग सहित जगमें रुल्यो, मिले सरागी देव। वीतराग भेटयौ अबै, मेटो राग कुटेव ।।१४।। कित निगोद, कित नारकी, कित तिर्यंच अज्ञान। आज धन्य मानुष भयो, पायो जिनवर थान ।।१५।। तुमको पूजें सुरपति, अहिपति नरपति देव । धन्य भाग्य मेरो भयो, करन लग्यो तुम सेव ।।१६।। अशरणके तुम शरण हो, निराधार आधार ।
मैं डूबत भवसिंधुमें, खेओ लगाओ पार ।।१७।। इन्द्रादिक गणपति थके, कर विनती भगवान् । अपनो विरद निहारकें, कीजे आप समान ।।१८।। तुमरी नेक सुदृष्टितैं, जग उतरत है पार। हा हा डूब्यो जात हाँ, नेक निहार निकार ।।१ ९।। जो में कहहूं औरसों, तो न मिटै उरझार। मेरी तो तौसों बनी, तातें करौं पुकार ।।२०।। वंदो पाँचौं परमगुरु, सुरगुरु वंदत जास। विघन हरन मंगल करन, पूरन परम प्रकाश ।।२१।। चौवीसौं जिनपद नमों, नमो शारदा माय। शिवमग साधक साधु नमि, रच्यो पाठ सुखदाय ।।२२।। पूजाकी प्रारंभिक विधि
ॐ जय जय जय, नमोस्तु, नमोस्तु, नमोस्तु ।
णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं,
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।
ॐ ह्रीँ अनादिमूलमंत्रेभ्यो नमः
(उपर्युक्त पाठ पढ़कर पुष्प यानी (अर्थात्) चंदनमिश्रित चावल थालीमें किये हुए स्वस्तिकके ऊपर चढ़ाना।)
मंगल
चत्तारि सरणं पव्वज्जामि—अरहंते सरणं पव्वज्जामि, सिद्धे सरणं पव्वज्जामि, साहू सरणं पव्वज्जामि, केवलिपण्णत्तो धम्मं सरणं पव्वज्जामि । ॐ ह्रीँ नमोऽर्हते स्वाहा। (पुष्पांजलि चढ़ाना)
उदकचन्दनतन्दुलपुष्पकैश्चरुसुदीपसुधूपफलार्धकैः;
धवलमंगलगानरवाकुले जिनग्रहे जिननाथमहं यजे।
ॐ ह्रीँ श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्रीशान्तिनाथजिनेन्द्राय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्रीचंद्रप्रभुजिनेन्द्राय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्रीसीमंधरतीर्थंकराय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्री चतुर्विंशतितीर्थंकरेभ्यः अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्री कुंदकुंदाचार्यदेवाय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्रीसूर्यकीर्तिनाथजिनेन्द्राय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्री भगवज्जिनसहस्त्रनामेभ्यः अर्धं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री कुंदकुंदाचार्यदेवपूजा
(छप्पय)
श्री कुंदकुंद आचार्यवर, करूँ तास पद थापना;
मैं पूजुं मन वच काय करि, जो सुख चाहूं आपना।
ॐ ह्रीँ श्रीकुंदकुंदाचार्यादि मुनिराज ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् इति आह्वाननम् । अत्र तिष्ठत तिष्ठत ठः ठः स्थापनम्—अत्र मम सन्निहितो भवत भवत वषट् सन्निधिकरणम् ।
(गीता छंद)
शुभ-तीर्थ-उद्भव-जल अनूपम मिष्ट शीतल लायकें,
भव-तृषा-कंद-निकंद-कारण शुद्ध-घट भरवायकैं;
कुंदकुंद आदिक ऋद्धिधारक मुनिन की पूजा करूँ,
ता करें पातिक हरें सारे सकल आनंद विस्तरूं ।
ॐ ह्रीँ श्रीकुंदकुंदआदि मुनिराज चरणकमलपूजनार्थे जलं० श्रीखंड कदलीनंद केशर, मंद मंद घिसायकैं;
तसु गंध प्रसरित दिग-दिगंतर, भर कटोरी लायकें। कुंदकुंद० ॐ ह्रीँ श्रीकुंदकुंदआदि मुनिराज चरणकमलपूजनार्थे चंदनं० अति धवल अक्षत खंड वर्जित, मिष्ट राजन भोगके;
कलधौत-थारा भरत सुंदर, चुनित शुभ उपयोगके। कुंदकुंद० ॐ ह्रीँ श्रीकुंदकुंदआदि मुनिराज चरणकमलपूजनार्थे अक्षतान्० बहु-वर्ण सुवरण-सुमन आछे, अमल कमल गुलाबके;
केतकी चंपा चारु मरुआ, चुने निजकर चावके । कुंदकुंद० ॐ ह्रीँ श्रीकुंदकुंदआदि मुनिराज चरणकमलपूजनार्थे पुष्पं० पकवान नानाभांति चातुर, रचित शुद्ध नये नये;
सदमिष्ट लाडू आदि भर बहु, पुरटके थारा लये। कुंदकुंद० 7th Day Pooja
ॐ ह्रीँ श्रीकुंदकुंदआदि मुनिराज चरणकमलपूजनार्थे नैवेद्यं० कलधौत-दीपक जडित नाना, भरित गोधृत-सारसों,
अतिज्वलित जगमगज्योति जाकी, तिमिरनाशनहारसों ।
कुंदकुंद आदिक ऋद्धिधारक, मुनिनकी पूजा करूँ;
ता करें पातिक हरें सारें, सकल आनंद विस्तरूं ।
ॐ ह्रीँ श्रीकुंदकुंदआदि मुनिराज चरणकमलपूजनार्थे दीपं० दीकुचक्र गंधित होत जाकर, धूप दश-अंगी कही;
सो लाय मनवचकाय शुद्ध, लगाय कर खेऊं अहीं। कुंदकुंद० ॐ ह्रीँ श्रीकुंदकुंदआदि मुनिराज चरणकमलपूजनार्थे धूपं० वर दाख खारक अमित प्यारे, मिष्ट चुष्ट चुनायकैं;
द्रावडी दाडिम चारु पुंगी, थाल भर भर लायकें। कुंदकुंद० ॐ ह्रीँ श्रीकुंदकुंदआदि मुनिराज चरणकमलपूजनार्थे फलं० जल गंध अक्षत पुष्प चरु वर, दीप धूप सु लावना,
फल ललित आठों द्रव्य-मिश्रित, अर्घ कीजे पावना; कुंदकुंद० ॐ ह्रीँ श्रीकुंदकुंदआदि मुनिराज चरणकमलपूजनार्थे अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्व० दशलक्षणधर्मपूजा
(अडिल्ल छंद)
उत्तम छिमा मारदव आरजव भाव हैं,
सत्य शौच संयम तप त्याग उपाव हैं;
आकिंचन ब्रह्मचरज धरम दश सार हैं,
चहुं गति दुखतें काढि मुक्ति करतार हैं।
(सोरठा)
हेमाचलकी धार, मुनिचित सम शीतल सुरभि;
भवआताप निवार दसलच्छन पूजुं सदा।
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय जलं निर्वपामीति स्वाहा। चन्दन केशर गार, होय सुवास दशों दिशा। भवआताप०
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। अमल अखण्डित सार, तंदुल चन्द्रसमान शुभ। भवआताप०
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा। फूल अनेक प्रकार, महकें ऊरघलोक लों। भवआताप०
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। नेवज विविध निहार, उत्तम षटरससंगजुग। भवआताप०
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। बाति कपूर सुधार, दीपकजोति सुहावनी। भवआताप०
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय दीपं निर्वपामीति स्वाहा। अगर धूप विस्तार, फैले सर्व सुगन्धता । भवआताप०
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय धूपं निर्वपामीति स्वाहा। फलकी जाति अपार, घ्रान नयन मनमोहने। भवआताप०
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय फलं निर्वपामीति स्वाहा। आठों दरब संवार, ‘द्यानत’ अधिक उछाहसों ।
भवआताप निवार दसलच्छन पूजुं सदा।
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। उत्तम तपधर्म अर्घ
तप चाहें सुरराय, करमशिखरको वज्र है,
द्वादशविधि सुखदाय, क्यों न करै निज सकति सम।
उत्तम तप सबमाहिं बखाना, करमशिखरको वज्र समाना,
वस्यो अनादि निगोद मझारा, भू-विकलत्रय पशुतन धारा। 7th Day Pooja
धारा मनुष तन महादुर्लभ, सुकुल आयु निरोगता, श्रीजैनवानी तत्त्वज्ञानी, भई विषयपयोगता । अति महादुर्लभ त्याग विषय, कषाय जो तप आदरै, नरभव अनूपम कनक घरपर, मणिमयी कलसा धरें।
ॐ ह्रीँ उत्तमतपधर्मांगाय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। जयमाला
(दोहा)
दशलच्छन वंदौ सदा, मनवांछित फलदाय,
कहों आरती भारती, हम पर होहु सहाय । १
उत्तम छिमा जहां मन होई, अंतर बाहर शत्रु न कोई; उत्तम मार्दव विनय प्रकासै, नानाभेद ज्ञान सब भासै । २ उत्तम आर्जव कपट मिटावै, दुरगति त्याग सुगति उपजावै; उत्तम सत्यवचन मुख बोलै, सो प्रानी संसार न डोलै। ३ उत्तम शौच लोभ परिहारी, संतोषी गुनरतन भंडारी; उत्तम संयम पालै ज्ञाता, नरभव सफल करै लै साता । ४ उत्तम तप निरवांछित पालै, सो नर करमशत्रुको टालै; उत्तम त्याग करै जो कोई, भोगभूमि-सुरशिव-सुख होई । ५ उत्तम आकिंचनव्रत धारे, परमसमाधिदशा विसतारे, उत्तम ब्रह्मचर्य मन लावै, नरसुरसहित मुक्तिफल पावै। ६ (दोहा)
करे करमकी निरजरा, भवपींजरा विनाशि;
अजर अमरपदकों लहे, ‘द्यानत’ सुखकी राशि।
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमा मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग आकिंचन्य, ब्रह्मचर्य दशलक्षणधर्माय महार्घं निर्वपामीति स्वाहा। 7th Day Pooja
देव-शास्त्र-गुरुका अर्घ
जल परम उज्ज्वल गंध अक्षत पुष्प चरु दीपक धरूं, वर धूप निरमल फल विविध बहु जनमके पातक हरूं; इह भांति अर्घ चढाय नित भवि करत शिव पंकति मचूं, अरहंत श्रुत-सिद्धांत गुरु-निरग्रंथ नित पूजा रचू । वसुविधि अर्घ संजोयके अति उछाह मन कीन;
जासों पूजों परम पद देव शास्त्र गुरु तीन।
ॐ ह्रीँ देव-शास्त्र-गुरुभ्यः अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। श्री महावीर भगवानका अर्घ
पावन जल चंदन, अक्षत पुष्प रु, चरु वर दीपन, धूप धरों; वर अर्घ उतारो, तुम पद धारो, नंदन तारो, पूज करो। चरम तीर्थंकर जगत् हितंकर, हे अभयंकर, वीर जिनं, सब कर्म क्षयंकर, दया धुरंधर, जगजन शंकर, शर्म घनं। ॐ ह्रीँ श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। श्री शांतिनाथ भगवानका अर्घ
आठ विधि सौ अर्घ करिये आठ कर्म जु छीनवे,
मैं करहुं भविजन भगत प्रभुकी ‘जसकरण’ अ वीनवै, श्री शान्तिनाथ जिनेश पूजौं भावसौं मन लायकैं; शान्त करियौ कर्म सबरे मोक्षलक्ष्मी पायकें. ॐ ह्रीँ श्रीशान्तिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। श्री चंद्रप्रभु भगवानका अर्घ
वसुविधि अर्घ बनाय मनोहर श्री जिनमंदिर जावो, अष्टकर्मके नाश करनको श्री जिनचरन चढावो;
चंचल चितको रोकी, चतुर्गति चक्र भ्रमण निरवारो, चारु चरण आचरण चतुर नर चंद्रप्रभ चित धारो. ॐ ह्रीँ श्रीचंद्रप्रभुजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। 7th Day Pooja
श्री नेमिनाथ भगवानका अर्घ
सलिल सुच्छ मलयागिर चंदन, अछित कुसुम चरु भरि थारी,
मणिदीप दसांग धूप फल उत्तम, अर्घ ‘राम’ करि सुखकारी;
श्री नेमि जिनेश्वरके पद वंदूं, रजमति सी ततछिन छारी,
पसुवनिकी रव सुनिकें करुणा धरि, जाय चढे प्रभु गिरनारी.
ॐ ह्रीँ श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। श्री सीमंधर भगवानका अर्घ
जल गंध आदिक द्रव्य लेके, अर्घ कर ले आवने,
धाय चरन चढाय भविजन, मोक्षफलको पावने.
तीर्थपति जिनराजजीकी, परम पावन पूज करो;
श्री सीमंधरनाथकी सौ, भावसे भक्ति लहो।
ॐ ह्रीँ श्री सीमंधरनाथजिनेन्द्रदेवाय चरणकमलपूजनार्थे अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री भावी तीर्थंकरका अर्घ
जल गंध सुअक्षत पुष्प, शुभ नैवेद्य धरुं,
लई दीप धूप फळ अर्घ, जिनवर पूज करूँ;
अहो ! धातकीखंड जिणंद भावी मनहारी,
जंबू-भरते जयवंत, शिव - मंगळकारी ।
(-चेन्नाई वर्ते जयवंत, शिव - मंगळकारी ।)
ॐ ह्रीँ धातकीद्वीप-विदेहक्षेत्रस्थ भावि जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति श्री सुवर्णपुरी तीर्थका अर्घ
भरि स्वर्णथाल वसु द्रव्य अचूं कर जोरि,
प्रभु सुनियो विनती नाथ, कहूं मैं भाव धरि,
अनुभूति तीर्थमहान् सुवर्णपुरी सोहे,
यह कहानगुरु वरदान मंगल मुक्ति मिले ।
ॐ ह्रीं श्री सुवर्णपुरी-अध्यात्मतीर्थे जिनमन्दिरे बिराजमान श्री
सीमन्धरस्वामी, पद्मप्रभ, शान्तिनाथ, नेमिनाथ आदि जिनेन्द्र; समवसरणे बिराजमान श्री सीमन्धरस्वामी, तत्पादमूल-विराजमान श्री कुन्दकुन्दाचार्यदेव; मानस्तम्भे चतुर्दिक्षु बिराजमान श्री सीमन्धरस्वामी; परमागममन्दिरे बिराजमान भगवान् श्री महावीरस्वामी, श्री समयसार आदि पंचपरमागम, श्री कुन्दकुन्दाचार्य-चरणचिह्न; ‘गुरुदेवश्रीके वचनामृत’ तथा ‘बहिनश्रीके वचनामृत’ इति उभयाभ्यां विभूषित पंचमेरु-नन्दीश्वरजिनालये बिराजमान भगवान् श्री आदिनाथ, धातकीखण्ड विदेही भावी तीर्थंकर, जम्बु-भरतस्य भावी श्री महापद्म जिनवर; पंचमेरौ तथा नन्दीश्वर- द्वापंचाशत्-जिनालये बिराजमान सर्व शाश्वत जिनेन्द्र; जम्बूद्वीप-बाहुबली निर्माणाधीन आयतने विराजमान सर्व कृत्रिम-अकृत्रिम-शाश्वत जिनेन्द्रः, स्वाध्यायमन्दिरे प्रतिष्ठित श्री समयसार-इत्यादि सर्व वीतरागपूज्यपदेभ्यः पूजनार्थे महार्घ निर्वपामीति स्वाहा।
देवेन्द्रकीर्ति भावि विदेही गणधरका अर्घ
पावन जिनका नामस्मरण, मंगल सुखके दाता है,
धन्य धन्य अवतार प्रभु, त्रिभुवन कीर्तन गाता है;
शांति सुधाकरकी शीतल, शीकर भवदुःखहारी है,
ॐ ह्रीं विदेही-भावि श्री देवेन्द्रकीर्तिगणधरदेवाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं नि० श्री बाहुबली भगवानका अर्घ
वसुविधिके वस वसुधा सब की, परवश अति दुःख पावे,
तिहि दुःख दूर करनको भविजन, अर्घ जिनाग्र चढावे ।
परम पूज्य वीराधिवीर जिन, बाहुबली बलधारी,
तिनके चरणकमलको नित प्रति, धोक त्रिकाल हमारी।
ॐ ह्रीँ वर्तमान अवसर्पिणीसमये प्रथम मुक्तिस्थानप्राप्ताय कर्मरिविजये वीराधिवीर वीराग्रणी श्री बाहुबली परमजिनदेवाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति० श्री सिद्ध भगवानका अर्घ
जल फल वसु वृंदा अरघ अमंदा, जजत अनंदा के कंदा;
मेटो भवफंदा सब दुखदंदा, ‘हीराचंदा’ तुम बन्दा।
त्रिभुवनके स्वामी त्रिभुवननामी, अंतरजामी, अभिरामी, शिवपुरविश्रामी, निजनिधि पामी, सिद्ध जजामी शिरनामी। ॐ ह्रीँ अनाहतपराक्रमाय सर्वकर्मविनिर्मुक्ताय श्रीसिद्धचक्राधिपतये अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा।
समुच्चय अर्घ
(गीता छंद)
मैं देव श्री अर्हत पूजूं, सिद्ध पूजूं चाव सों,
आचार्य श्री उवझाय पूजूं, साधु पूजूं भाव सों।
अर्हत-भाषित वैन पूजूं, द्वादशांग रचे गनी,
पूजूं दिगंबर गुरुचरन, शिव हेत सब आशा हनी।
सर्वज्ञभाषित धर्म दशविधि दयामय पूजूं सदा,
जजि भावना षोडश रतनत्रय जा विना शिव नहीं कदा;
त्रैलोक्यके कृत्रिम अकृत्रिम चैत्य चैत्यालय जजूं,
पन मेरु नंदीश्वर जिनालय खचर सुर पूजित भजूं ।
कैलास श्री सम्मेद श्री गिरनार गिरि पूजुं सदा,
चंपापुरी पावापुरी पुनि और तीरथ सर्वदा;
चौबीस श्री जिनराज पूजूं बीस क्षेत्र विदेह के,
नामावली इक सहस वसु जय होय प्रति शिवगेह के।
(दोहा)
जल गंधाक्षत पुष्प चरु, दीप धूप फल लाय;
सर्व पूज्य पद पूजहुं, बहु विध भक्ति बढाय।
ॐ ह्रीँ भावपूजा, भाववंदना, त्रिकालपूजा, त्रिकालवंदना करवी कराववी-भावना भाववी, श्री अरिहंतजी, सिद्धजी, आचार्यजी, उपाध्यायजी, सर्वसाधुजी-पंचपरमेष्ठिभ्यो नमः । प्रथमानुयोग-करणानुयोग-चरणानुयोग- द्रव्यानुयोगेभ्यो नमः । दर्शनविशुद्ध्यादि षोडश कारणेभ्यो नमः । उत्तमक्षमादि 7th Day Pooja
शांतिपाठ
शांतिजिनेश्वर साचो साहेब, शांतिकरण अनुकूलमें हो जिनजी; तुं मेरा मनमें तुं मेरा दिलमें, ध्यान धरूं पल पलमें साहेबजी; तुं. मेरा० १
भवमां भमतां मैं दरिशन पायो, आशा पूरो ओक पलमें हो जिनजी तुं. मेरा० २
निरमल ज्योत वदन पर सोहे, निकस्यो ज्युं चंद वादळ में जिनजी तुं. मेरा० ३
मेरो मन तुम साथे लीनो, मीन वसे ज्यु जळमें साहेबजी; तुं. मेरा० ४
जिन रंग कहे प्रभु शांतिजिनेश्वर, दीठोजी देव सकळमें हो जिनजी. तुं. मेरा० ५
विसर्जन
ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि शास्त्रोक्तं न कृतं मया;
तत्सर्वं
पूर्णमेवास्तु त्वत्प्रसादाज्जिानेश्वर ।।१।।
आह्वानं नैव जानामि नैव जानामि पूजनं;
श्री कुंदकुंदाचार्यदेवकी आरती
हूँ तो आरती उतारूं प्रभु कुंदनी रे;
प्रभु कुंदनी रे आचार्यदेवनी रे. हूँ तो. विदेह क्षेत्र जई भरतमां पधारीया रे;
सीमंधर देवना संदेशा रूडा लावीया रे. हूँ तो. चौद पूर्वना रहस्ये शास्त्र गूंथीया रे; श्रुतज्ञाननी तें नहेरो वहेवडावीयुं रे. हूँ तो. अचल ज्योति अखंड अनूपम अछे रे;
आत्म ख्याति खजाना अणमूल्य छे रे. हूँ तो. निज स्वरूपमांहे कुंदमुनि झूलता रे;
धन्य धन्य वनवासी ओ मुनिवरा रे. हूँ तो. तुज शासनना नूर भरत भूमिओ रे;
दिव्य वाणीना दातार कानगुरु अछे रे. हूँ तो. 8th Day Pooja
आराधना पाठ
(हरिगीत)
मैं देव नित अरहंत चाहूं, सिद्धका सुमिरन करौं; मैं सूर गुरु मुनि तीनि पद मैं, साधुपद हृदये धरौं; मैं धर्म करुणामयी चाहूं, जहां हिंसा रंच ना; मैं शास्त्रज्ञान विराग चाहूं, जासु में परपंच ना ।।१।। चौबीस श्री जिनदेव चाहूं, और देव न मन बसैं; जिन बीस क्षेत्र विदेह चाहूं, बंदिते पातिक नशै; गिरनार शिखर संमेद चाहूं, चम्पापुरी पावापुरी; कैलास श्री जिनधाम चाहूं, भजत भांजें भ्रमजुरी ।।२।। नवतत्त्वका सरधान चाहूं, और तत्त्व न मन धरौं; षटद्रव्य गुण परजाय चाहूं, ठीकतासों भय हरौं; पूजा परम जिनराज चाहूं, और देव न हूँ सदा; तिहुंकालकी मैं जाप चाहूं, पाप नहि लागै कदा ।।३।। सम्यक्त्व दरशन ज्ञान चारित्र सदा चाहूं, भावसों; दशलक्षणी मैं धर्म चाहूं, महा हर्ष उछावसों; सोलह जु कारण दुःखनिवारण सदा चाहूं, प्रीतिसों; मैं चित्त अठाई पर्व चाहूं महा मंगल रीतिसों ।।४।। मैं वेद चारों सदा चाहूं, आदि अंत निवाहसों, पाओ धरमके चार चाहूं, अधिक चित्त उछाहसों; मैं दान चारों सदा चाहूं, भुवन वशि लाहो लहूं, आराधना मैं चारि चाहूं, अन्तमें ये ही गहूं ।।५।। भावना बारह सदा भाऊं, भाव निरमल होत हैं, मैं व्रत जु बारह सदा चाहूं, त्याग भाव उद्योत हैं; 8th Day Pooja
प्रतिमा दिगम्बर सदा चाहूं, ध्यान आसन सोहना,
वसुकर्मतें मैं छुटा चाहूं, शिव लहूं जहुं मोह ना ॥६॥ मैं साधुजनको संघ चाहूं, प्रीति तिन ही सों करौ,
मैं पर्वके उपवास चाहूं, अरम्भ में परिहरों;
इस दुःख पंचमकाल माहीं, कुल शरावक मैं लहौं,
अरु महाव्रत धरि सकौं नाहीं निबल तन मैंने गहो ॥७॥
आराधना उत्तम सदा चाहूं, सुनो जिनरायजी,
तुम कृपानाथ अनाथ ‘द्यानत’ दया करना न्यायजी;
वसुकर्मनाश विकाश ज्ञान प्रकाश मोको कीजीओ,
करि सुगतिगमन समाधिमरन सुभक्ति चरनन दीजिओ ॥८॥
पूजाकी प्रारंभिक विधि
ॐ जय जय जय, नमोस्तु, नमोस्तु, नमोस्तु ।
णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं,
णमो उवज्झायाणं, णमो लोओ सव्वसाहूणं ।
ॐ ह्रीँ अनादिमूलमंत्रेभ्यो नमः
(उपर्युक्त पाठ पढ़कर पुष्प यानी (अर्थात्) चंदनमिश्रित चावल थालीमें किये हुए स्वस्तिकके ऊपर चढ़ाना।)
मंगल
चत्तारि सरणं पव्वज्जामि—अरहंते सरणं पव्वज्जामि, सिद्धे सरणं पव्वज्जामि, साहू सरणं पव्वञ्जामि, केवलिपण्णत्तो धम्मं सरणं पव्वज्जामि । ॐ ह्रीँ नमोऽर्हते स्वाहा। (पुष्पांजलि चढ़ाना)
उदकचन्दनतन्दुलपुष्पकैश्चरुसुदीपसुधूपफलार्धकैः;
धवलमंगलगानरवाकुले जिनग्रहे जिननाथमहं यजे।
ॐ ह्रीँ श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्रीशान्तिनाथजिनेन्द्राय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्रीचंद्रप्रभुजिनेन्द्राय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्रीसीमंधरतीर्थंकराय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्री चतुर्विंशतितीर्थंकरेभ्यः अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्री कुंदकुंदाचार्यदेवाय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीं श्रीसूर्यकीर्तिनाथजिनेन्द्राय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। ॐ ह्रीँ श्री भगवज्जिनसहस्त्रनामेभ्यः अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। स्वानुभूति-तीर्थ स्वर्णपुरी पूजा
(राग-सम्यक् सुक्षायिक जान)
स्वात्मानुभूति-प्रधान सुमंगल-स्वर्णपुरी,
संतोकी साधनाभूमि, अध्यातम तीर्थ बनी,
‘तू परमातमा है’, ये गाजे गुरुवाणी,
गुरुकहानका यह वरदान, सुंदर स्वर्णपुरी ।
ॐ ह्रीं श्री सौराष्ट्रदेशस्थ स्वर्णपुरीतीर्थे सर्वजिनायतनेषु विराजमान- जिनबिंबानि ! अत्र अवतरत अवतरत संवोषट् इति आह्वाननम् । ॐ ह्रीं श्री सौराष्ट्रदेशस्थ स्वर्णपुरीतीर्थे सर्वजिनायतनेषु विराजमान- जिनबिंबानि ! अत्र तिष्ठत तिष्ठत ठः ठः इति स्थापनम् । ॐ ह्रीं श्री सौराष्ट्रदेशस्थ स्वर्णपुरीतीर्थे सर्वजिनायतनेषु विराजमान- जिनबिंबानि ! अत्र मम सन्निहितानि भवत भवत, इति सन्निधिकरणम् । उज्जवल जल शीतल लाय सुवरण कलश भरे,
सब जिनवरजीको चढ़ाय ज्ञानामृत पावे,
अनुभूति तीर्थमहान्, सुवर्णपुरी सोहे,
यह कहानगुरु वरदान, मंगल मुक्ति मिले ।
ॐ ह्रीं श्री सुवर्णपुरीतीर्थे सर्वजिनायतनेषु बिराजमान-जिनबिंबेभ्यः जलं निर्व० कश्मीर सुकेसर ल्याय चंदन सुखकारी,
श्री जिनवरजीको चढ़ाय शांतिसुधा पावे, अनुभूति तीर्थमहान् सुवर्णपुरी सोहे, यह कहानगुरु वरदान मंगल मुक्ति मिले । ॐ ह्रीं श्री सुवर्णपुरीतीर्थे सर्वजिनायतनेषु बिराजमान-जिनबिंबेभ्यः चंदनं निर्व० शुभ शालि अखंडित ल्याय, प्रभुजीके चरण धरूं, अक्षयपद प्राप्ति काज अखंडित ध्यान करूँ, अनुभूति तीर्थमहान् सुवर्णपुरी सोहे, यह कहानगुरु वरदान मंगल मुक्ति मिले । ॐ ह्रीं श्री सुवर्णपुरीतीर्थे सर्वजिनायतनेषु बिराजमान-जिनबिंबेभ्यः अक्षतान् निर्व० पंचवरणमय दिव्य फूल अनेक कहे,
श्री जिनवर पूजत पाद बहुविध पुण्य लहे, अनुभूति तीर्थमहान् सुवर्णपुरी सोहे, यह कहानगुरु वरदान मंगल मुक्ति मिले । ॐ ह्रीं श्री सुवर्णपुरीतीर्थे सर्वजिनायतनेषु बिराजमान-जिनबिंबेभ्यः पुष्पं निर्व० फेणी खाजा पकवान, मोदक-सरस बने,
जिन चरणन देत चढ़ाय, दोष क्षुधादि टले, अनुभूति तीर्थमहान् सुवर्णपुरी सोहे, यह कहानगुरु वरदान मंगल मुक्ति मिले । ॐ ह्रीं श्री सुवर्णपुरीतीर्थे सर्वजिनायतनेषु बिराजमान-जिनबिंबेभ्यः नैवेद्यम् निर्व० दीपककी ज्योति जगाय मिथ्या तिमिर नशे, तव चरनन सन्मुख जाय भव भव रोग टले,
अनुभूति तीर्थमहान् सुवर्णपुरी सोहे, यह कहानगुरु वरदान मंगल मुक्ति मिले । ॐ ह्रीं श्री सुवर्णपुरीतीर्थे सर्वजिनायतनेषु बिराजमान-जिनबिंबेभ्यो दीपम् निर्व०
वर धूप सु दस विधि ल्याय, दस दिशि गंध भरे, सब कर्म जलावत जाय, मानो नृत्य करे, अनुभूति तीर्थमहान् सुवर्णपुरी सोहे, यह कहानगुरु वरदान मंगल मुक्ति मिले । ॐ ह्रीं श्री सुवर्णपुरीतीर्थे सर्वजिनायतनेषु बिराजमान-जिनबिंबेभ्यः धूपं निर्व० ले फल उत्कृष्ट महान्, जिनवर पद पूजूं, लहुं मोक्ष परम शुभ-थान, तुम सम नहीं दूजो, अनुभूति तीर्थमहान् सुवर्णपुरी सोहे, यह कहानगुरु वरदान मंगल मुक्ति मिले । ॐ ह्रीं श्री सुवर्णपुरीतीर्थे सर्वजिनायतनेषु बिराजमान-जिनबिंबेभ्यः फलं० । भरि स्वर्णथाल वसु द्रव्य अचूं कर जोरि, प्रभु सुनियो विनती नाथ, कहूं मैं भाव धरि, अनुभूति तीर्थमहान् सुवर्णपुरी सोहे, यह कहानगुरु वरदान मंगल मुक्ति मिले । ॐ ह्रीं श्री सुवर्णपुरीतीर्थे सर्वजिनायतनेषु बिराजमान-जिनबिंबेभ्यः अर्धं निर्व० दशलक्षणधर्मपूजा
(अडिल्ल छंद)
उत्तम छिमा मारदव आरजव भाव हैं,
सत्य शौच संयम तप त्याग उपाव हैं;
आकिंचन ब्रह्मचरज धरम दश सार हैं,
(सोरठा)
हेमाचलकी धार, मुनिचित सम शीतल सुरभि;
भवआताप निवार दसलच्छन पूजुं सदा।
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय जलं निर्वपामीति स्वाहा। चन्दन केशर गार, होय सुवास दशों दिशा। भवआताप० ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। अमल अखण्डित सार, तंदुल चन्द्रसमान शुभ। भवआताप० ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा। फूल अनेक प्रकार, महकें ऊरघलोक लों। भवआताप०
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। नेवज विविध निहार, उत्तम षटरससंगजुग। भवआताप० ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। बाति कपूर सुधार, दीपकजोति सुहावनी। भवआताप०
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय दीपं निर्वपामीति स्वाहा। अगर धूप विस्तार, फैले सर्व सुगन्धता। भवआताप० ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय धूपं निर्वपामीति स्वाहा। फलकी जाति अपार, घ्रान नयन मनमोहने। भवआताप०
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय फलं निर्वपामीति स्वाहा। आठों दरब संवार, ‘द्यानत’ अधिक उछाहसों। भवआताप० ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। उत्तम त्यागधर्म अर्घ
दान चार परकार, चार संघको दीजिये,
घन विजुली उनहार, नरभव लाहो लीजिये।
उत्तम त्याग कह्यो जगसारा, औषधि शास्त्र अभय आहारा, निहचै राग-द्वेष निरवारै, ज्ञाता दोनों दान संभारै।
दोनों संभारै कूपजल सम, दरब घरमें परनिया,
निज हाथ दीजे साथ लीजे, खाय खोया बह गया।
धनि साध शास्त्र अभय दिवैया, त्याग राग विरोधकों, बिन दान श्रावक साध दोनों, लहें नाहीं बोधकों। ॐ ह्रीँ उत्तमत्यागधर्मांगाय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा जयमाला
(दोहा)
दशलच्छन वंदौ सदा, मनवांछित फलदाय,
कहों आरती भारती, हम पर होहु सहाय। १
उत्तम छिमा जहां मन होई, अंतर बाहर शत्रु न कोई; उत्तम मार्दव विनय प्रकासै, नानाभेद ज्ञान सब भासै। २ उत्तम आर्जव कपट मिटावै, दुरगति त्याग सुगति उपजावै; उत्तम सत्यवचन मुख बोलै, सो प्रानी संसार न डोलै। ३ उत्तम शौच लोभ परिहारी, संतोषी गुनरतन भंडारी; उत्तम संयम पालै ज्ञाता, नरभव सफल करै लै साता। ४ उत्तम तप निरवांछित पालै, सो नर करमशत्रुको टालै; उत्तम त्याग करै जो कोई, भोगभूमि-सुरशिव-सुख होई। ५ उत्तम आकिंचनव्रत धारे, परमसमाधिदशा विसतारे, उत्तम ब्रह्मचर्य मन लावै, नरसुरसहित मुक्तिफल पावै। ६ (दोहा)
करे करमकी निरजरा, भवपींजरा विनाशि;
अजर अमरपदकों लहे, ‘द्यानत’ सुखकी राशि।
ॐ ह्रीँ उत्तमक्षमा मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग आकिंचन्य, ब्रह्मचर्य दशलक्षणधर्माय महार्घ निर्वपामीति स्वाहा। 8th Day Pooja
देव-शास्त्र-गुरुका अर्घ
जल परम उज्ज्वल गंध अक्षत पुष्प चरु दीपक धरूं, वर धूप निरमल फल विविध बहु जनमके पातक हरूं; इह भांति अर्घ चढाय नित भवि करत शिव पंकति मचूं, अरहंत श्रुत-सिद्धांत गुरु-निरग्रंथ नित पूजा रचू। वसुविधि अर्घ संजोयके अति उछाह मन कीन;
जासों पूजों परम पद देव शास्त्र गुरु तीन।
ॐ ह्रीँ देव-शास्त्र-गुरुभ्यः अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। श्री महावीर भगवानका अर्घ
पावन जल चंदन, अक्षत पुष्प रु, चरु वर दीपन, धूप धरों; वर अर्घ उतारो, तुम पद धारो, नंदन तारो, पूज करो। चरम तीर्थंकर जगत् हितंकर, हे अभयंकर, वीर जिनं, सब कर्म क्षयंकर, दया धुरंधर, जगजन शंकर, शर्म घनं। ॐ ह्रीँ श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। श्री शांतिनाथ भगवानका अर्घ
आठ विधि सौ अर्घ करिये आठ कर्म जु छीनवे,
मैं करहुं भविजन भगत प्रभुकी ‘जसकरण’ अ वीनवै, श्री शान्तिनाथ जिनेश पूजौं भावसौं मन लायकैं; शान्त करियौ कर्म सबरे मोक्षलक्ष्मी पायकें. ॐ ह्रीँ श्रीशान्तिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। श्री चंद्रप्रभु भगवानका अर्घ
वसुविधि अर्घ बनाय मनोहर श्री जिनमंदिर जावो, अष्टकर्मके नाश करनको श्री जिनचरन चढावो;
चंचल चितको रोकी, चतुर्गति चक्र भ्रमण निरवारो, चारु चरण आचरण चतुर नर चंद्रप्रभ चित धारो. ॐ ह्रीँ श्रीचंद्रप्रभुजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। 8th Day Pooja
श्री नेमिनाथ भगवानका अर्घ
सलिल सुच्छ मलयागिर चंदन, अछित कुसुम चरु भरि थारी, मणिदीप दसांग धूप फल उत्तम, अर्घ ‘राम’ करि सुखकारी; श्री नेमि जिनेश्वरके पद वंदूं, रजमति सी ततछिन छारी, पसुवनिकी रव सुनिकें करुणा धरि, जाय चढे प्रभु गिरनारी. ॐ ह्रीँ श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा। श्री सीमंधर भगवानका अर्घ
जल गंध आदिक द्रव्य लेके, अर्घ कर ले आवने, धाय चरन चढाय भविजन, मोक्षफलको पावने.
तीर्थपति जिनराजजीकी, परम पावन पूज करो;
श्री सीमंधरनाथकी सौ, भावसे भक्ति लहो।
ॐ ह्रीं श्री सीमंधरनाथजिनेन्द्रदेवाय चरणकमलपूजनार्थे अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री कुंदकुंदाचार्यदेवका अर्घ
जल गंध अक्षत पुष्प चरुवर, दीप धूप सु लावना, फल ललित आठों द्रव्य-मिश्रित, अर्घ कीजे पावना; कुंदकुंद आदिक ऋद्धिधारक, मुनिनकी पूजा करूँ; ता करें पातिक हरें सारें, सकल आनंद विस्तरूं।
- अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें -
मूल दस्तावेज़ (PDF): 2985.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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