श्री जिनेन्द्र पूजा संग्रह | Shri Jinendra Puja Sangrah

श्री गिनैंह पूजा संग्रह

— यह ग्रंथ का अंश है; पूर्ण ग्रंथ नीचे संलग्न PDF में उपलब्ध है —

श्री
जिनेन्द्र पूजा
संग्रह

: प्रकाशक :
श्री मद्रास दिगम्बर जैन स्वाध्याय मंडल ट्रस्ट
१५, चंपप्पा मुदली स्ट्रीट,
चेन्नई-६००००७

[ 10 ]

अनुक्रमणिका

1st DAY POOJA
विनयपाठ … 1
देव-शास्त्र-गुरु पूजा … 4
दशलक्षणपूजा … 9
उत्तम क्षमाधर्म अर्घ … 10
अर्घ्यावली … 11
समुच्चय अर्घ … 14
शांतिपाठ … 15
पंच परमेष्ठी आरती … 16
2nd DAY POOJA
आराधना पाठ … 17
श्री महावीर-जिनपूजा … 19
दशलक्षणपूजा … 22
उत्तम मार्दवधर्म अर्घ … 23
अर्घ्यावली … 24
समुच्चय अर्घ … 27
शांतिपाठ … 29
श्री महावीरांजलि आरती … 30
3rd DAY POOJA
विनयपाठ … 31
श्री शांतिनाथ जिनपूजा … 34
दशलक्षणपूजा … 35
उत्तम आर्जवधर्म अर्घ … 36
अर्घ्यावली … 38
समुच्चय अर्घ … 41
शांतिपाठ … 42
श्री शांतिजिनकी आरती … 43
4th DAY POOJA
आराधना पाठ … 44
श्री चंद्रप्रभ-जिनपूजा … 46
दशलक्षणपूजा … 48
उत्तम सत्यधर्म अर्घ … 49
अर्घ्यावली … 50
समुच्चय अर्घ … 53
शांतिपाठ … 54
श्री चंद्रप्रभु जिन आरती … 55
5th DAY POOJA
विनयपाठ … 56
श्री नेमिनाथ-जिनपूजा … 59
दशलक्षणपूजा … 60
उत्तम शौचधर्म अर्घ … 61
अर्घ्यावली … 63
समुच्चय अर्घ … 66
शांतिपाठ … 67
आरती … 68
6th DAY POOJA
आराधना पाठ … 69
श्री संभव-जिनपूजा … 71
दशलक्षणपूजा … 73
उत्तम संयमधर्म अर्घ … 74
अर्घ्यावली … 75
समुच्चय अर्घ … 78
शांतिपाठ … 79
श्री संभवकी आरती … 81
7th DAY POOJA
विनयपाठ … 82
श्री कुंदकुंदाचार्यदेवपूजा … 85
दशलक्षणपूजा … 86
[ 11 ]
उत्तम तपधर्म अर्घ … 87
अर्घ्यावली … 89
समुच्चय अर्घ … 92
शांतिपाठ … 93
श्री कुंदकुंदाचार्यदेवकी आरती … 94
8th DAY POOJA
आराधना पाठ … 95
स्वर्णभूति-तीर्थ स्वर्णपुरी पूजा … 97
दशलक्षणपूजा … 99
उत्तम त्यागधर्म अर्घ … 100
अर्घ्यावली … 102
समुच्चय अर्घ … 104
शांतिपाठ … 106
ॐ जय जिनदेवा … 107
9th DAY POOJA
विनयपाठ … 108
श्री घातकीवेद-शांतिजिनपूजा … 111
दशलक्षणपूजा … 113
उत्तम आकिंचनधर्म अर्घ … 114
अर्घ्यावली … 115
समुच्चय अर्घ … 118
शांतिपाठ … 120
श्री सूर्यकीर्तिजिन आरती … 121
10th DAY POOJA
आराधना पाठ … 122
रत्नत्रयपूजा … 124
श्री चौबीस-जिनपूजा … 125
दशलक्षणपूजा … 127
उत्तम ब्रह्मचर्यधर्म अर्घ … 128
अर्घ्यावली … 129
समुच्चय अर्घ … 132
शांतिपाठ … 134
श्री चौबीस तीर्थंकरोंकी आरती … 135
11th DAY POOJA
विनयपाठ … 136
क्षमावाणी पूजा … 139
अर्घ्यावली … 143
समुच्चय अर्घ … 146
शांतिपाठ … 148
पंच परमेष्ठीकी आरती … 149
Jinmandir Annual Day
(Dhvajaroahan) Pooja
देव-शास्त्र-गुरुपूजा … 153
श्री महावीर-जिनपूजा … 157
Samyaktya Jayanti Pooja
रत्नत्रयपूजा … 168
श्री चौबीस-जिनपूजा … 170
Gurudevshri Janm-Jayanti
Pooja
श्री घातकीवेद-शांतिजिनपूजा … 181
श्री संभव-जिनपूजा … 184
Bahenshri Janm-Jayanti
Pooja
भावी मुख्य गणधर पूजा … 195
स्वर्णभूति-तीर्थ स्वर्णपुरी पूजा … 199
Bhagvan Mahavir
Nirvan Pooja
वीतरागदि पूजा … 210
श्री महावीर-जिनपूजा … 215
श्री महावीरांजलि आरती … 222

[ 12 ]

पूजनकी विधि

  1. स्वच्छ खाली थालीमें पूर्ण स्वस्तिक (साथियों) करना।
  2. पश्चात् नीचे ‘श्री’ शब्द लिखना चाहिए।

श्री

1st Day Pooja
1

1st DAY POOJA

विनयपाठ

(दोहा)
इहि विधि ठाड़ो होयकै, प्रथम पढ़े जो पाठ।
धन्य जिनेश्वर देव तुम, मोहे करहु जु ठाठ॥1॥
अनंत चतुष्टयके धनी, तुम ही हो सितराज।
मुक्ति वधूके कंथ तुम, तीन भुवनके राज॥2॥
तिहुँ जगकी पीड़ा हरण, भवदधिसेषनहार।
ज्ञापक हो तुम विश्वके, त्रिसुखके करतार॥3॥
हरता अघअंधियारेके, करता धर्म प्रकाश।
शीतलापर दातार हो, धरता निजगुणराश॥4॥
चर्मामृत ज्यों जलपियो, ज्ञान भानु तुम रूप।
तुमरे चरण सरोजको, नावत तिहुँ जगभूप॥5॥
मैं बंदों जिनदेवको, कर अति निर्मल भाव।
कर्मबंधके छेदने, और न कछु उपाव॥6॥
भविकवनको भवकृपते, तुम ही काढनहार।
दीनदयाल अनाथपति, आतम गुण भंडार॥7॥
चितनंद निर्मल कियो, धोय कर्ममल मैल।
सरल करी या जगतमें भविकवनको शिव गैल॥8॥
तुम पद पंकज पूजते, विन विघ्न रोग दर जाय।
शत्रु मित्रताको धरै, विपद निरुपद्रव थाय॥9॥
चक्र खगधर इन्द्र पद, मिलै आपते आप।
अनुक्रम कर शिवपद लहैं, नेम सकल हनि पाप॥10॥

पूजाकी प्रारम्भिक विधि

ॐ जय जय, नमोस्तु, नमोस्तु नमोस्तु।
णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं,
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।
ॐ ह्रीं अनादिनिधनोभ्यो नमः
(उपर्युक्त पाठ पढ़कर पुष्प पानी चढ़ावें) चंद्रनिर्मित चावल थालीमें किये
हुए स्वस्तिकके ऊपर चढ़ावें।)

मंगल

चत्तारि मंगलं—अरिहंता मंगलं, सिद्धा मंगलं, साहू मंगलं, केवलिपण्णत्तो
धम्मो मंगलं।
चत्तारि लोगुत्तमा—अरिहंता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा,
केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमो।
चत्तारि सरणं पवज्जामि—अरिहंते सरणं पवज्जामि, सिद्धे सरणं पवज्जामि,
साहू सरणं पवज्जामि, केवलिपण्णत्तं धम्मं सरणं पवज्जामि।
ॐ ह्रीं नमोऽर्हते स्वाहा। (पुष्पांजलि चढ़ावें)
उज्जलकंचनतनुलदुतसुखदेऽसुरमुकुटपूज्यपादाब्जेः;
भवकंजगलगलत्सुकृतं जिनवरं जिननाभजं पजे।
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्रीशांतिनाथजिनेन्द्राय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्रीचंद्रप्रभुजिनेन्द्राय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्रीसीमंधरस्वामिभ्यो अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशतितीर्थंकरेभ्यः अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्री कुंदकुंदाचार्यदेवाय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्रीसर्वकालिजिनप्रतिमाभ्यो अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्री भावविजयसकलमलेभ्यः अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।

तुम बिन मैं व्याकुल भयो, जैसे वन बिन मीन।
जन्म जरा मरण हरो, करो मोहि सचीन॥१॥
पतित बहुत पावन किये, गिनती कौन करेय।
अंजनारे तारे भये, जय जय जय जिनदेव॥२॥
बकी नाव भवधिमें तिरे, तुम प्रभु पार करेव।
खेवटिया तुम हो प्रभु, जय जय जय जिनदेव॥३॥
राग सहित जगमें रम्यो, मिले सरगी देव।
वीतराग भेट्यो अब, मेटो राग कुदेव॥४॥
कित तिर्यंच, कित नारकी, कित तिर्यंच अज्ञान।
आत धन्य मानुष भयो, पायो जिनवर थान॥५॥
तुमको पूज सुरापति, अष्टपति नरपति देव।
धन्य भाग्य मेरो भयो, करन लग्यो तुम सेव॥६॥
अवरगके तुम शरण हो, निराधार आधार।
मैं दुत भवरूपीमें, खेओ लगाओ पार॥७॥
इन्द्रादिक गणपति भके, कर विनती भगवान।
अपनो विरद निहारके, कीजे आप समान॥८॥
तुमरी नेक सुदृष्टिमें, जग उन्नत है पार।
हा हा डूब्यो जात हो, नेक निहार निहार॥९॥
जो मैं कहूं औरसों, तो न मिटे दुखसार।
मेरी तो तैसों बनी, तजै करो पुकार॥१०॥
बेदो पांचो परमेष्ठि, सुगुरु वेदत जात।
विघन हरन मंगल करन, पूज परम प्रकाश॥११॥
चौबीसों जिनपद नमो, नमो शारदा माय।
शिवमग साधु नमि, रम्यो पाठ सुखदाय॥१२॥

देव-शास्त्र-गुरु पूजा

(हरिगीत)
सन्मार्गदर्शी, बोधदाता, कृपा अति वर्षिता,
आश्रय अने करुणा करी, अब रंक उद्धारता;
विभवज्ञानी आनन्दमूर्ति, दिव्य गुणोपे दीपता,
जिनराजजी तुम चरणमां, दीन भावथी हो वंदना।
इम सकल सुखकर, दुरित भयहर, विमल लक्षण गुणोवरे,
प्रभु अजर, अमर, नोददहित, नित्यज्यो सीलसोभे,
निज निजगतमां, बेरागजित, धैर्यवर्जित मेंटरो,
रे भक्तजन हूं शरणसेवक, सीमंधरप्रभु जय करो।
श्री कुंदकुंदप्रभु जय करो।
श्री सद्गुरुप्रभु जय करो।
(दोहा)
पुर्दु पद अरहंतना, पुर्दु गुरुवर सार;
पुर्दु देवी सरस्वती, नित प्रति अब प्रकार।
ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यो। अत्र अवतरत अवतरत संवौषट् इह आह्वानम्।
ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यो। अत्र तिष्ठत तिष्ठत ठः ठः स्थापनम्।
ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यो। अत्र मम सन्निहितो भवत भवत वषट् सन्निधिकरणम्।
(दोहा)
पूजा प्रकार योग्य छे, इण भाव गुणधाम;
तोशुं भावभक्ति करी, अनपमण अवदाम।
अविनाशी अहित हे, अंह अखंड अमान;
अजर अमर उपशम तुं, भर्मभंजन भगवान।
(हरिगीत)
विभूष हूं निवृत्त हूं, हूं सिद्ध हूं ने ब्रह्म हूं;
हूं जन्मने जर्जु नहीं, सुखथी भरेलो शिव हूं;

ते आत्म व्यक्तो, ज्ञानदर्शनमय, अनन्तवी र्येरे;
वस जलकष्टे कर्मवी अवियुक्त आचारो।
ॐ ह्रीं श्रीसीमंधरजिनेश्वराय भरतक्षेत्रानुगतेभ्यः देवशास्त्रगुरुभ्यश्च
जन्मजरामरणविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
शीतल गुण जेमां रह्यो, शीतल जिन सुख संग;
चंदन घसी उनमादशुं, पूजीये मनरंग।
वनमायुत बीतरागनां, परमशीतलप्रभु,
जीवध जे भवरोगनां, कायने अतिदुख।
(तोटक)
शुभ शीतलतामय छांय रही, मनवांछित ज्यां फलफूर्ति कही;
विनभक्ति ग्रहो तत्कल अहो, भजोने भगवंत भवंत हरो।
(हरिगीत)
पुण्य-पाप योगथी रोकशेने, निज आत्मने आत्मा वदी;
दर्शन अने ज्ञान तेही, परद्रव्य इच्छा परिहरी।
ॐ ह्रीं श्रीसीमंधरजिनेश्वरायभरतक्षेत्रानुगतेभ्यः देवशास्त्रगुरुभ्यश्च
संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
अक्षत पद लेवा भणी, अक्षतपूजा सार;
अखंडात जिन पूजीये, तो नहींजे ववकार।
(चंपक)
आलंबन साधन जे तणे, परपरिणतिने भागे रे;
अक्षय दर्शन ज्ञान वैराग, आनंदरूप प्रभु जागे रे।
(हरिगीत)
हूं अंक क्षुद्र सदा अखी, ज्ञानदर्शनमय खेरे;
कई अन्य ते माटे जरी, परमप्रभु मात्र नहीं अरे।
ॐ ह्रीं श्रीसीमंधरजिनेश्वरायभरतक्षेत्रानुगतेभ्यः देवशास्त्रगुरुभ्यश्च
अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।

(दोहा)
विनवत हितसन्ता करी, पूजे भाव अमाप;
पुष्पधनी पूजा करी, काम हरो तत्काळ।
अनंत सीलख, नाम दुख, त्यो नहीं न भिन्नता!
अनंत दुःख नाम सोख्य, प्रेम त्या विचित्तता!
उधार न्याय नेमने निहाल रे निहाल तुं,
निवृत्ति श्रीप्रेममेव यारी ते प्रवृत्ति बाळ तुं।
(हरिगीत)
जीती इन्द्रियो लालभवे अधिक वाणे आत्मने;
निश्चय लिये स्थित साधुओ माते तितेंद्रिय तेने।
ॐ ह्रीं श्रीसीमंधरजिनेश्वराय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
विविध मुक्ति फलकानुसुं, लेई चित्त उदार;
अघाहारी पद पाववा, चित्तुं वांरवार।
(रासक)
रसे, रसे अने गंधे, सदा छे भिन्न आ आत्मा,
जाये मोह भावना, नहीं छे भाव कई कर्मा;
सरुं हुं तत्व समजीने, हुं चेतन गणा सबमां,
शिवदारी स्वरूप माहे, निहाळुं आव मीतमां।
ॐ ह्रीं श्रीसीमंधरजिनेश्वराय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
जगदीप दीप शुभ, करतां भावो तेह;
ज्ञानशक्तिमां जे रह्युं, प्रगट तहिं निज तेह।
जळहळ ज्योतिषरूप तुं, केवल कृपानिधान;
प्रेम पुनीत तुज प्रवे, भजभंजन भगवान।

मोह स्वयंभूरूप समुद्र तरी करी,
स्थिति त्यां जाई दीपमोह गुणवान जो;
अंतस्तमस्य त्यां पूर्वस्वरूप वीतराग वई,
प्रगट्युं निज केवलज्ञान निधान जो;
अपूर्व अवसर जेवो क्यारे आवशे।
(हरिगीत)
मति, श्रुति, अवधि, मनः केवल तेह पद अनेक व खरे;
आ ज्ञानपद परमार्थ छे, जे पापी जीव मुक्ति लहे।
ॐ ह्रीं श्रीसीमंधरजिनेश्वराय मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
इणि परे पुष्पपूजा करी, जिन आगळ शुभभाव,
टाळी विनाश परिणति, दूर करो परभाव।
निरंतर निर्लेप छो, निर्मळ ज्ञान निधान,
निर्मोहक नारायण, भवभंजन भगवान।
चार कर्म घनघाती ते व्यवच्छेद जो,
भवना बीज तणो आत्यंतिक नाश जो;
सर्वभाव जाता द्रष्टा सह शुद्धता,
कृतकृत्य प्रभु वीर्य अनंत प्रकाश जो;
अपूर्व अवसर जेवो क्यारे आवशे।
(हरिगीत)
जे सर्वसंसिमुक्ति व्यापे आत्मने आत्मा वदे,
नहिं कर्म के नोकर्म केवल चेतनो अकलने।
ॐ ह्रीं श्रीसीमंधरजिनेश्वराय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
फलपूजा करतां वखा, सकळ करो अवतार;
फळ मारुं प्रभु आगळे, तार, तार मुझ तार।

दश लक्षण धर्म पूजा

आदी अप्पउं तुं; अक्खइंति अणुमान;
मोक्खहुं हे मारगि, वयणंजण भणान।
जेक परमागम्मनी मइ न सयाता,
पुण्ण कलंक रहित अढोल स्वरूप जो;
सुद्ध निरंजन चेतनमूरति अनोपम,
अणुअणु अमूर्त सहज पररूप जो;
अपूर्व अवसर जेवो कवावे आवओ।
(हरिगीत)

जेवो तणो जाणी समता, स्वभाव वाणी आलम्बो,
जे पंचमही स्थित थाये, कर्मछोह करे अहो।
ॐ ह्रीं श्रीसीमंधरजिनेश्वराय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहे)

जळ, चंदन, अक्षत, फूल, दीप, धूप, फल नैवेद्य,
पूज अष्ट समूहथी, भक्तिथी जिनदेव।
(हरिगीत)

जीव चेतनारूप, शस्य-रस-सो-नो-अक्तिमहीन छे,
निर्दिष्ट नहि संस्थान जीतनु, ग्रहण त्रिलोकी नहीं।
प्रकाश हूं, कुनार्थ हूं, कल्याण हूं ने शांत हूं,
इन्द्रियोनी पार हूं, अप्पय स्वरूप ज्ञान हूं।
ॐ ह्रीं श्रीसीमंधरजिनेश्वराय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।

(अडिल्ल छंद)
उत्तम खिमा आरजव भाव हैं,
सत्त सौच संयम तप त्याग उपाव हैं;
आकिंचन ब्रह्मचरय धरम दश सार हैं,
यह गति दुरगति करि मुक्ति करतार हैं।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादश लक्षणधर्माय ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् इति आह्वानम्।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादश लक्षणधर्माय ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः इति स्थापनम्।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादश लक्षणधर्माय ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् इति
सन्निधिकरणम्।

(सोरठा)
देवाधिदेवकी धार, सुस्थित सम शीतल सुरभि;
भक्तानुताप निवार दशलक्षण पूजू सदा।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादश लक्षणधर्माय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
चन्दन केशर गार, होय सुवास दशों दिशा। भक्तानुताप०
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादश लक्षणधर्माय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।
अक्षत अखण्डित सार, संतुष्ट चन्दनमान शुभ। भक्तानुताप०
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादश लक्षणधर्माय अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
फूल अनेक प्रकार, महके जम्बूलोक लो। भक्तानुताप०
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादश लक्षणधर्माय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
नैवेद्य विविध निहार, उत्तम षटरससंयुत। भक्तानुताप०
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादश लक्षणधर्माय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
बाति कपूर सुधार, दीपकजोति सुहावनी। भक्तानुताप०
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादश लक्षणधर्माय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
अगर धूप विस्तार, फैले सर्व सुगन्धता। भक्तानुताप०
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादश लक्षणधर्माय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
फलकी जाति अपार, प्रान प्रान मनमोहने। भक्तानुताप०
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादश लक्षणधर्माय फलं निर्वपामीति स्वाहा।

आठों दरव संवार, ‘ज्ञानत’ अधिक उत्साहसों।
भक्तानुताप निवार दशलक्षण पूजू सदा।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादश लक्षणधर्माय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।

उत्तम क्षमापर्ण अर्घ

(सोरठा)
पंडिह पूर अनेक, बांध भाव बहुविधि करै;
धरिये खिमा विवेक, कोप न कीजे पीतमा।
(चौपाई मिश्रित गीता छंद)
उत्तम खिमा गहे रे भाई, इह भव जश परभव सुखदाई,
गाली सुनि मन खेद न आनो, गुणको औगुन कहे अयानो।
कहि है अयानो वस्तु छीने, बांध भाव बहुविधि करै,
कहैं निसंकें तन विदारै, रे जो न तहीं मरैं;
तैं कसम पूत किये खोटे, कहे क्यों नहीं जीपेरा,
अक्खिअणअप्पणि तुझाण वाणी, साम्यकत्वे सीपेरा।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमापर्णाय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

(दोहा)
दशलक्षण वंदी सदा, मनवांछित फलदाय,
करौं आरती भारती, हम पर होहु सहाय। १
उत्तम खिमा जहँ मन रोई, अंतर वारह अनु न कोई;
उत्तम मारव विनय प्रगटै, नानाभेद ज्ञान सब भासै। २
उत्तम आर्जव कपट मिटावै, दुगति त्यागि सुगति उपजावै;
उत्तम सत्यवचन मृदु बोले, सो आनी संसार न डोले। ३
उत्तम सौच लोभ परिहारी, संतोषी गुणरत्न भंडारी;
उत्तम संयम पाले ज्ञाता, समल सफल करे ले साता। ४

उत्तम तप निरग्रंथ पाले, सो नर करमक्षयको टालै;
उत्तम त्याग करे जो कोई, भोगभूमि-सुरिष-सुख होई। ५
उत्तम आकिंचन धारे, परसमसिद्धवा विस्तारे,
उत्तम ब्रह्मचर्य मन लावे, नरसुरगति मुक्तिफल पावे। ६
(दोहा)
करे करमकी निरजरा, भवपींजरा विनाश;
अवर अप्पसत्त्वको लहे, ‘ज्ञानत’ सुखकी राशि।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमा आदि, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग
आकिंचन, ब्रह्मचर्य दशलक्षणधर्माय महार्घं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री महावीर भगवानका अर्घ

पावन जल चंदन, अक्षत पुष्प ह, वरू वर दीपन, धूप धरौं;
वर अर्घ उतारो, तुम पद चारो, वंदन तारो, पूज करौं।
चमम तीर्थंकर जगत तिलक, हे अम्बरकर, वीर जिनं,
सर्व कर्म क्षयंकर, सब दुखहर, जगजन शंकर, धर्म धनं।
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री शांतिनाथ भगवानका अर्घ

आठ विधि सौ अर्घ करिये आठ कर्म जु छीनवे,
मैं करहुँ भविजन भात प्रभुकी ‘जसकरण’ जे वीनवे,
श्री शांतिनाथ जिन पूजौ भगवती मन लायकं;
शान्त करियौ कर्म सरो मोक्षलक्ष्मी पायकं।
ॐ ह्रीं श्रीशांतिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री चंद्रप्रभु भगवानका अर्घ

बहुविधि अर्घ बनाय मनाऊं श्री जिनवरि आर्घ,
अष्टकर्मके नाश करनको श्री जिनचरण वंदायो;

चंचल तिनकी चोटी, चतुर्गति चक्र भ्रम निवारो,
चारु चरण आचरण चतुर नर चंद्रप्रभु चित्त धारो।
ॐ ह्रीं श्रीचंद्रप्रभुजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री नेमिनाथ भगवानका अर्घ

सत्तित सुख मलयगिरि चंदन, अतिनि कुसुम जु भरि भरि,
सणदीप दमाग धूप फल जम, अर्घ ‘राम’ करि सुखकारी;
श्री नेमि जिनेश्वरके पद वंदूं, रयणमणि सी ततछिन धारी,
पसुवंसिनी सूं मुक्तिह करुणा धरि, जग वंदूं प्रभु गिरनारी।
ॐ ह्रीं श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री सीमंधर भगवानका अर्घ

जल गंग आदिक लेय रुखे, अर्घ कर ते आवने,
जब चल वटाय बीजम, मोक्षफलको पावने।
तीर्थपति जिनराजवी, मम पावन पूज करो;
श्री सीमंधरनाथनी सो, भाससे भक्ति तरो।
ॐ ह्रीं श्री सीमंधरस्वामिजिनेन्द्राय चरणकमलपूजनार्थं अनर्घ्यपदप्राप्तये
अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री कुंदकुंदाचार्यदेवका अर्घ

जल गंध अक्षत पुष्प चरुवर, दीप धूप जु लावना,
फल ललित आठो द्रव्य-निर्मित, अर्घ कीजे पावना;
कुंदकुंदादिक ऋद्धिराज, मुनिजनकी पूजा करूँ;
ता करें पातिक हर सारें, सकल आनंद विस्तरूँ।
ॐ ह्रीं श्रीकुंदकुंदादि मुनिगण चरणकमलपूजनार्थं अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घं निर्व०

श्री भावी तीर्थंकरका अर्घ

जल गंध सुअक्षत पुष्प, शुभ नैवेद्य वरं,
नई दीप धूप फल अर्घ, विस्तर पूज करं;

अहो ! बालेश्वरी जिंद भावी मनहारी,
जंबु-भरते शिव-मंगलकारी।
(–चेन्नई वंत जंबंत, शिव-मंगलकारी।)
ॐ ह्रीं भावीकोटी-विदेहक्षेत्रस्थ भावी जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घं निर्वपामीति

श्री सुवर्णपुरी तीर्थंकरका अर्घ

भरि स्वधात्तु वसु द्रव्य जु करि,
प्रभु सुवर्णो तिनो नाम, कहूं मैं भाव धरि,
अणुवृत्ति तीर्थवान सुवर्णपुरी सोहे,
यह कल्पवृक्ष वरदान मंगल मुक्ति मोहे।
ॐ ह्रीं श्री सुवर्णपुरी-अयोध्यातीर्थे जिनमंदिरे विराजमान श्री
सीमंधरस्वामी, पद्मप्रभ, शांतिनाथ, श्रेयांसनाथ आदि जिनेन्द्रः समवसरणे विराजमान
श्री सीमंधरस्वामी, तप्तधातु-विमानगभ श्री कुन्दकुन्दाचार्यदेवः, मानसगभे
चतुर्विंश जिनेशान श्री सीमंधरस्वामीः परमानंदिरे विराजमान भगवान श्री
महावीरस्वामी, श्री समवसरण आदि जिनप्रतिमापि, श्री कुन्दकुन्दाचार्य-चरणचिह्नः,
'सुंदरेशश्री’के वचनमूत ‘तथा ‘बालचंद्रेश’ वचनमूत’ इति उपाध्यायां विभूषित
पंचमेरु-नन्दीश्वरादिस्थले विराजमान भगवान श्री आदिनाथ, शाश्वतखंड विदेही
भावी तीर्थंकर, जम्बू-भरतस्य भावी श्री महाबलु जिनेन्द्रः, पंचमेरु तथा नन्दीश्व-
रादिपर्वत-जिनालये विराजमान सर्व शाश्वत जिनेन्द्रः जम्बूद्वीप-बाहुबली
निर्माणाधीन आयोजने विराजमान सर्व कृत्रिम-अकृत्रिम-शाश्वत जिनेन्द्रः
स्वध्यायाध्ययने प्रतिष्ठित श्री समवसरण-इत्यादि सर्व वीतरागदेव्यः पूजनार्थं
महार्घं निर्वपामीति स्वाहा।

देवेन्द्रकीर्ति भावि विदेही गणधरका अर्घ

(राग-रत्नागिरि हि)
पावन जिनका नामग्रहण, मंगल सुखके दाता है,
धन्य धन्य अमार प्रभु, त्रिभुवन जीतन गाता है;
शांति सुखकरणी शीतल, शंकर सद्गु-खहारी है,
देवेन्द्रकीर्ति गणधर-भगवान, चरण-पूजा सुखकारी है।
ॐ ह्रीं विदेही-भावि श्री देवेन्द्रकीर्तिगणधरदेवाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घं नि०

श्री बाहुबली भगवानका अर्थ

वर्षाधिके तप वश्या वश की, परस अति दुष्ट पावे,
तिहि दुष्ट दूर करवो भविन, अर्थ विनाश चखावे।
पाम पूज्य वीतरागीवर जिन, बाहुबली बलधारी,
तिनके चरणकमल नित प्रति, शोक त्रिवाल हमारी।
ॐ ह्रीं वर्तमान अवसर्पिणीसमये प्रथम मुक्तिगमनयोग्य कामतिनकेये
वीतरागि श्री बाहुबली भगवान् परिनिर्वाणाय जन्मजरामृत्युविनाशाय अर्घं निर्वपामीति।

श्री सिद्ध भगवनका अर्थ

जल फल वसु बिंदु अरघ अमंदा, जतत अणंदा के केदा;
मेटो भवकंदा सब दुखदंदा, ‘वीरनंदा’ तुम वन्दा।
त्रिभुवनके स्वामी त्रिभुवननामी, अंतरामी, अविरामी,
त्रिभुवनविश्रामी, निर्भयनामी पापी, सिद्ध जयनामी शिवनामी।
ॐ ह्रीं अनाहतचक्रसमय सर्वकर्मविर्निर्मुक्तकाय श्रीसिद्धचक्रायपरिनिर्वाणाय
अन्तर्ध्वंसपद्मालयै अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।

सम्यग्अर्घ्य

(गीत छंद)
मैं देव श्री अर्हत पूजूँ, सिद्ध पूजूँ भाव सो,
आचार्य श्री उपाध्याय पूजूँ, साधु पूजूँ भाव सो।
अर्हत-भाषित जैन पूजूँ, द्वादशांग रचे मनी,
पूजूँ दिगंबर गुरुनको, शिव हेत सब आज्ञा ठनी।
सर्वसमर्पित धर्म दयानिधि दयवम पूजूँ सदा,
जाँहि भावना भावना भावना सो जिन शिव नहीं कदा;
त्रैलोक्यके कृत्रिम अकृत्रिम चैत्य चैत्यालय जजूँ,
पत्त नेरु मंदिधर जिनालय खर पूर पूजित भजूँ।
कैलास श्री सम्मेद श्री गिरनार गिरि पूजूँ सदा,
चंपापुरी पावापुरी पुनि और तीर्थव सदा;

चौबीस श्री जिनराज पूजूँ बीस क्षेत्र विदेह के,
नामावली इक सहस्र जजूँ जय प्रति शिवविदेह के।
(दोहा)
जल गंधाक्षत पुष्प चरु, दीप धूप फल लाय;
सर्व पूज्य पद पूजहूँ, बहु विधि भक्ति वदाय।
ॐ ह्रीं पाषाणो, भाववेत्ता, विकासरूपा, विकासनियांवी करवो कराववो-
भावना भावकी, श्री अर्हत्सिद्धा, सिद्धांनी, आचार्यनी, उपाध्यायनी, सर्वसाधुनी-
पंचपरमेष्ठियों नमः। प्रथमचतुर्णा-करणानुयोग-चरणानुयोग-द्रव्यानुयोगेभ्यो नमः।
दर्शनानुयोगेभ्यो चोईसा कारणोभ्यो नमः। उनचासविहि दशवइयालेभ्यो नमः।
सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्रेभ्यो नमः। जल विषे, धन विषे, आकाश
विषे, गुफा विषे, पहाड विषे, नगर-गावी विषे, अर्बलोक-मध्यलोक-
पाताललोक विषे विराजमान कृत्रिम अकृत्रिम जिन-चैत्यालय जिन-बिंबेभ्यो
नमः। विदेहक्षेत्रे विद्यमान वीस तीर्थंकरोभ्यो नमः। पंच भरत, पांच ऐरावत-दस
क्षेत्र संबंधी बीस चौबीसीना सातसो वीस जिनेभ्यो नमः। नंदीश्वरद्वीपसंबंधी बावन
जिनचैत्यालयेभ्यो नमः। सम्मेदशिखर, कैलाश, चंपापुर, पावापुर, गिरनार आदि
सिद्धक्षेत्रेभ्यो नमः। जैनसिद्धी, मूढसिद्धी, रणमुद्री, शंकुल्य, वागरा, सुवर्णपुरी आदि
तीर्थक्षेत्रेभ्यो नमः। श्री शरण-श्रद्धायित्री सात परमऋषिभ्यो नमः। इति
उपर्युक्तभ्यः सर्वेभ्यो अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।

शांतिपाठ

शांतिजिनेश्वर साचो साहेब, शांतिकरण अनुक्रममें हो जिनजी;
तुं मेरा मनमें तुं मेरा दिलमें, ध्यान धरूँ पल क्षनमें साहेबजी।
तुं. मेरा० १
भवमां भ्रमंता मैं दरिशन पायो, आशा पूरो अंक फलमें हो जिनजी
तुं. मेरा० २
निश्चल जोवन वर पर सोहे, निकस्यो जुं चंद बातमें जिनजी
तुं. मेरा० ३

मेरो मन तुम साचे तीनों, मीन वसे जु जलमें साहेबजी;
तुं. मेरा० ४
जिन रंग कहे प्रभु शांतिनेश्वर, सेवोवी देव सकलमें हो जिनजी.
तुं. मेरा० ५

विसर्जन

ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि शालिनोक्तं न कृतं मया;
तत्सर्वं पूर्णमेवमस्तु तत्प्रसादाद्विसर्जनं॥१॥
आवाहनं नैव जानामि नैव जानामि पूजनं;
विसर्जनं न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥२॥
मंत्रहीनं क्रियाहीनं द्रव्यहीनं तथैव च;
तत्सर्वं क्षम्यतां देव रक्ष रक्ष जिनेश्वर॥३॥
मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी;
मंगलं कुंदकुंदार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्॥४॥
सर्वमंगल मांगल्यं, सर्वकल्याणकारकं;
प्रधानं सर्वधर्माणां, जैनं जयतु शासनम्॥५॥
(पूजा पूर्ण होनेके बाद नौ बार णमोकार मंत्रका जाप देना चाहिये)

पंच परमेष्ठी अर्घ

ईह विधि मंगल आरती कीजे, पंच परमेष्ठि भव सुख लीजे. टेक
पहली आरती श्रीजिनराजा, भवदधि पार उतार जिहाजा. इह० १
दूसरी आरती सिद्धकेरी, सुमरत कटै भवकेरी. इह० २
तीजी आरती सुर मुनिवर, जन्म मरण दुख दूर करिदा. इह० ३
चौथी आरती श्रीउवझाया, दरशन देखत पाप पलाया. इह० ४
पांचवी आरती साधु तिहारी, कुमति-विनाशन शिव-अधिकारी. इह० ५
छठी आरती श्रीजिनवाणी, ‘ध्यानत’ सुरग मुक्ति सुखदानी. इह० ६

प्रतिमा तिम्भर सदा चाहूँ, ध्यान आसन सोहना,
वसुकुंभमें व्रत वृथा चाहूँ, शिव ग्रहूँ मोह ना॥१॥
मैं साधुवनको संघ चाहूँ, प्रीति तिन ही सो करो,
मैं पक्के उपास चाहूँ, अर्थमें मैं परिरतो;
इस दुःख पंचमकाल मही, कुल अराक्षक मैं लहों,
अरु महाव्रत पद सही नाही नित्त तन मेंही॥२॥
आराधना उत्तम सदा चाहूँ, सुगुणी विनयरासी,
तुम ऊसभाव अनाथ ‘ध्यानत’ दया करता व्यासी;
वसुकुंभना विनाश ज्ञान प्रकाश कोकीजे,
करि सुप्रतिपन्न समाधिमरण सुभक्ति वचन दीजे॥३॥

पूजाकी प्रारंभिक विधि

जय जय जय, नमोस्तु, नमोस्तु, नमोस्तु।
णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं,
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।
ॐ ह्रीं अनादिपरमेष्ठिभ्यो नमः
(उपर्युक्त पाठ पढ़कर पुष्प या (अर्घ्य) चंदनतिलक चावल थालीमें किये
हुए स्वस्तिकके ऊपर धरणा।)

मंगल

चत्तारि मंगलं-अरहंत मंगलं, सिद्धा मंगलं, साहू मंगलं, केवलिपण्णत्तो
धम्मो मंगलं।
चत्तारि लोगुत्तमा-अरहंता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा,
केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमा।
चत्तारि सरणं पवज्जामि-अरहंत सरणं पवज्जामि, सिद्धे सरणं पवज्जामि,
साहू सरणं पवज्जामि, केवलिपण्णत्तं धम्मं सरणं पवज्जामि।
ॐ ह्रीं णमोऽर्हते स्वाहा। (पुष्पांजलि चढ़ाना)

उव्वत्तणत्तदणुप्पत्तणदुप्पत्तणपुष्फत्थके;
वक्खामंगलपव्वत्तुक्के जिणवरे जिणप्पभं पदे।
ॐ ह्रीं श्रीऋषभादिजिनेन्द्राय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्रीशांतिनाथजिनेन्द्राय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्रीचंद्रप्रभजिनेन्द्राय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशतितीर्थंकरेभ्यः अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्री कुंदकुंदाचार्यदेवाय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्रीसूर्यकीर्तिनाथजिनेन्द्राय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्री भावजिनासनसंनाभ्यः अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री महावीर-जिनपूजा

(वसंततिलका)
हे देव! पूज्य वरमान यहां पधारो,
आवाहन मैं करत सिद्ध सुसिद्ध तारो,
कीनों पवित्र बीरको उपदेश सारो,
पूजो सदा तव पदपद्म वंद्यहि तारो।
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्र। अत्र अवतर अवतर संवौषट् इह आह्वानम्।
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्र। अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्।
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्र। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम्।
(त्रिभंगी छंद)
अभयदन दच्छ, आशि रम स्वच्छ, तर्पित अर्घ्य, वीर मरो,
तनु धारा यारो, तृषा निवारो, कर्म निवारो, पूज करो;

2nd Day Pooja

चरम तीर्थंकर जगत हितंकर, हे अभयंकर, वीर जिने,
सर्व कर्म क्षयंकर, दया पुरंदर, जगजन शंकर, शर्म घने।
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं०
अष्ट कर्म निवारण; शीतल कारण; गंधसे पूजन, नित्य करों,
जय उत्तम उच्चारण, हे भवतारण, करुणाकारण, अर्ज करों। च०
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चंदनं नि०
भरि अक्षत थाली, अकलमवारी, तुम पद धारी, सो अर्चों,
अक्षयपदधारी, भवभयहारी; अति सुखकारी, सो पिचों। च०
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि०
मदगन्धन विवर्जन, भवभयभंजन, शिवसुखंजन, विश्वभने,
शुभ्र कमल वदनं, कमला पादं, अमला चार्णं, जगद्विते। च०
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय कामबाणविनाशनाय पुष्प नि०
सब मोदन मोहक रसना मोहन, कर्म विमोहन, सब करो,
नैवेद्य चढ़ाऊँ, पूज रचाऊँ, गुणगण गाऊँ, पूज करो। च०
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि०
मिथ्यात्व निवारा, अति उजियारा, दीपक धारा, पूज करो,
करूँ तुम पद आरती, नाशे आरति, भासे भारती, ज्ञान घरों। च०
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय मोहांधकारविनाशनाय दीपं नि०
बहु धूप अनूपमं कर्म जलन्मं, लगो शरणमं, चरणमं,
हे हरिकुन्दन, देहु मोक्षपद, पूजूं तुम पद सेवनमें। च०
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं नि०
वादाम सुश्रीफल, बहु पुंगीफल, ने अनेक फल सो अर्चों;
बहु चार भारजें, तुम पूज पाऊँ शिवसुख पाऊँ सोभचों। च०
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं नि०

2nd Day Pooja

पावन जल चंदन, अक्षत पुष्प रु, वर वर दीपन, धूप धरौ;
वर अर्घ्य जजातो, तुम पद थातो, नंदन तातो, पूज करो।
चरम तीर्थंकर, जगत हितंकर, हे अभयंकर, वीर जिने,
सर्व कर्म क्षयंकर, दया पुरंदर, जगजन शंकर, शर्म घने।
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि०

पंचकल्याणक अर्घ्य

असित सावनस छठ लियो तिथि, गर्भ धरो प्रभु मात भवानी,
(त्रिशलादेवी)
नर हरि देव नमे जिनमाता, हम शिर नावत पावत सातों।
ॐ ह्रीं अषाढ़शुक्लषष्ठ्यां गर्भमंगलप्राप्ताय श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अर्घ्यं०
असित सु चैत वये तेरसको, हरि अभिषेक कियो प्रभुवीको;
कुसुम सु देवने बरसाये, जय जय शब्द किये हरषावे।
ॐ ह्रीं चैत्रशुक्लत्रयोदश्यां जन्ममंगलप्राप्ताय श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अर्घ्यं०
भव तन भोग अखिल विगारा, तुम मन धार तपे तपधारा;
सुर शिविका धर कानन धावे, बन धन देव अहो धन जावे।
ॐ ह्रीं मार्गशीर्षकृष्णदशम्यां तपोमंगलप्राप्ताय श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अर्घ्यं०
असित सु वैशाख ज्ञानसि पायो, सकल चराचर वस्तु लखायो,
पशु नर देव तु पूजन आवें, हम इत मूँढ़न मंगल गावें।
ॐ ह्रीं वैशाखशुक्लदशम्यां ज्ञानमंगलमंडिताय श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अर्घ्यं०
असित कार्तिक अमास्याका दिन, शिवरमणी वरके सुख पायो;
हरि हर्रादि जपे पावनपुर, जजत जिनेश नमे भवभासा।
ॐ ह्रीं कार्तिककृष्णमावस्यां मोक्षमंगलमंडिताय श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अर्घ्यं०

दशलक्षणधर्मपूजा

(अष्टक छंद)
उत्तम क्षमा मारदव आरजव भाव हैं;
सत्य शौच संयम तप त्याग उपाव हैं;
आकिंचन ब्रह्मचर्य धरम दश सार हैं;
चहुँ गति दुखते काढ़ि मुक्ति करतार हैं।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्म ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् इति आह्वाननम्।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्म ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः इति स्थापनम्।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्म ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् इति सन्निधिकरणम्।

(सोरठा)
हेमपात्रकी धार, मुनिचित्त सम शीतल सुभिर;
भवतापनिहार दशलक्षण पूजू सदा।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्मेभ्यो जलं निर्वपामीति स्वाहा।
चन्दन केशर गार, होय सुवास दशों दिशा। भवाताप०
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्मेभ्यो चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।
अमल अखण्डित सार, तंदुल चन्द्रसमान शुभ्र। भवाताप०
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्मेभ्यो अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
फूल अनेक प्रकार, महकें उपवनलोक तो। भवाताप०
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्मेभ्यो पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
नैवेद्य विविध निरख, उत्तम षटरससंयुग। भवाताप०
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्मेभ्यो नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
वाति कपूर सुधार, दीपज्योति सुहावनी। भवाताप०
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्मेभ्यो दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
अगर धूप विस्तार, फैले सर्व सुगन्धता। भवाताप०
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्मेभ्यो धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
फलकी जाति अपार, प्राप्त रतन मनमोहने। भवाताप०
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्मेभ्यो फलं निर्वपामीति स्वाहा।

2nd Day Pooja

आठों दरव संवार, ‘यादव’ अधिक उपासी।
भवाताप निहार दशलक्षण पूजू सदा।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्मेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

उत्तम मार्दवधर्म अर्घ्य

(सोरठा)
पीछे तुष्ट अनेक, वांच भार बहुविधि करै;
वरिये शिक्षा विवेक, कोप न कीजे पीतमा।
(चौपाई मिश्रित गीता छंद)
उत्तम क्षमा गहो रे भाई, इह भव जस परभव सुखदाई,
गाली सुनि मन खेद न आनो, जिनको ओगुन कहे अपानो।
कहि है अपानो वस्तु धीर, वांच भार बहुविधि करै,
धरतैं निरखें तन विदारें, वैरी जो न कहीं धरैं;
ते कलप पूरव किये खोटे, सहै क्यों नहिं जीयरा,
अतिकोऊधर्मनि जुझाय प्राणी, साम्यभावले सीयरा।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमागुणाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

(दोहा)
दशलक्षण वंदो सदा, मनवांछित फलदाय,
कहो आरती भारती, हम पर होहु सहाय। १
उत्तम क्षमा जहां मन होइ, अंतर बाह्य शत्रु न कोइ;
उत्तम मार्दव बिनय प्रकासे, ज्ञानभेद सब भाव भासे। २
उत्तम आर्जव कपट मिटावे, दुर्गति त्याग सुगति उपजावे;
उत्तम सत्यवचन सुख बोले, सो प्राणी संसार न डोले। ३
उत्तम शौच लोभ परिहारी, संतोषी गुणरतन धारी;
उत्तम संयम पाले ज्ञाता, नरभव सफल कर ले साता। ४

2nd Day Pooja

उत्तम तप निर्दोषिन पाले, सो नर कर्मशत्रु को टाले;
उत्तम त्याग जो कोई कीजै, भोगभूमि-सुरगति-सुख होई। ५
उत्तम आकिंचन व्रत धारे, परसम्पत्तिदा विसारे,
उत्तम ब्रह्मचर्य मन लावे, नरसुरगति मुक्किफल पावे। ६
(दोहा)
करे करमकी निरजरा, भवर्जाता विनशि;
अवर असपरको लहे, ‘द्यानत’ सुखकी रशि।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमा मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग
आकिंचन, ब्रह्मचर्य दशलक्षणधर्मेभ्यो महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

देव-शास्त्र-गुरुका अर्घ्य

(गीता छंद)
जल फल उज्ज्वल गंध अक्षत पुष्प वर दीपक धरूँ;
वर धूप निस्मल फल विविध बहु जन्मके पातक हरूँ;
इह भांति अर्घ्य चढ़ाय नित नित भाव करूँ शिव पंक्ति मंजु;
अरहंत श्रुत-सिद्धांत गुरु-निरग्रंथ नित पूजू स्वभु।
स्तुतिविधि अर्घ्य संजोयके अति उज्वल मन कौन;
जातों पूज्यों परम पद देव शास्त्र गुरु तीन।
ॐ ह्रीं देव-शास्त्र-गुरुभ्यः अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री शांतिनाथ भगवानका अर्घ्य

अट सोधि सो अर्घ्य करि आवे कटु कर्म जु छीनवे,
मैं करहुँ भक्तिन भगत प्रभुको ‘जसकरण’ जे वीनवे,
श्री शांतिनाथ जिनेश पूजों भावसों मन लायके;
शांत करियों कर्म सबरे मोक्षलक्ष्मी पायके।
ॐ ह्रीं श्रीशांतिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

2nd Day Pooja

श्री चंद्रप्रभु भगवानका अर्घ्य

वसुविधि अर्घ्य बनाय मनोहर श्री जिनवर जावो,
अष्टकर्मकी नाश करनको श्री जिनवचन चढावो;
चंचल चित्तकी चेती, चतुर्गति चक्र भ्रम निवारो,
चहु गुण आचरण चतुर नर चंद्रसम चित्त धारो।
ॐ ह्रीं श्रीचंद्रप्रभुजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री नेमिनाथ भगवानका अर्घ्य

अनिल शुद्ध मलयागिरि चंदन, अतिलघु कुसुमादि भरि वारी,
मणिदीप दरांगि घृत फल उत्तम, अर्घ्य ‘राम’ करि सुखकारी;
श्री नेमि जिनेश्वरके पद वंदूँ, रमणति सी ततलीन तरी,
पशुपुत्रकी रच मुनिकें करुणा धारी, जय चहु प्रभु गुणधारी।
ॐ ह्रीं श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री सीमंधर भगवानका अर्घ्य

जल गंध आदि द्रव्य लेऊँ, अर्घ्य कर ले आवने,
धाय चरण वंदाय भक्तिवन, मोक्षफलको पावने;
तीर्थपति जिनराजकी, मम पावन पूज करूँ,
श्री सीमंधरस्वामी सो, भासते भक्ति लहूँ।
ॐ ह्रीं श्री सीमंधरस्वामिजिनेन्द्राय चरणकमलपूजनार्थं अनर्घ्यपदप्राप्तये
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री कुंदकुंदाचार्यदेवका अर्घ्य

जल गंध अक्षत पुष्प सत्तर, दीप धूप सु भावना,
फल ललित आठों द्रव्य-निश्चित, अर्घ्य कीने पावना;
कुंदकुंदादिक मुनिनायक, मुनिनकी पूजा करूँ;
ता करें पातक हरे सारे, सकल आनंद वितरूँ।
ॐ ह्रीं श्रीकुंदकुंदादि मुनिराज चरणकमलपूजनार्थं अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्व०

श्री भावी तीर्थंकरका अर्थ

जल गंध अक्षत पुष्प, शुभ नैवेद्य चरु,
नई दीप धूप फल अर्घ, जिनवर पूज करूं;
अहो ! भावीखंड जिनेन्द्र भारी मनहारी,
जंबू-भरत जयवंत, शिव-मंगलकारी।
(वे बनाई वंदै जयवंत, शिव-मंगलकारी।)
ॐ ह्रीं भावीखंडप-सिद्धक्षेत्रस्थ भावि जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री सुवर्णपुरी तीर्थंका अर्थ

भरि स्वर्णपाल वसु द्रव्य अर्घ कर जोरै,
प्रभु सुमिरौं विनती नाव, कष्ट मैं भव परि,
अनुभूति तीर्थंमान सुवर्णपुरी सोहै,
यह कंचनपुर वरदान मंगल मुक्ति सोहै।
ॐ ह्रीं श्री सुवर्णपुरी-अष्टान्हिकादि जिनेन्द्राय विद्यमान श्री सीमन्धरस्वामी, ऋषभ, शांतिनाथ, नेमिनाथ आदि जिनेन्द्र; समवसरणै विद्यमान श्री सीमन्धरस्वामी, तत्वादिगुण-विद्यमान श्री कुन्दकुन्दाचार्यदेव; मानस्तंभे चतुर्दिग् विद्यमान श्री सीमन्धरस्वामी; परमागमनंदिरे विद्यमान भगवान श्री महावीरस्वामी, श्री समसार आदि पंचपरमागम, श्री कुन्दकुन्दाचार्य-वचनादि; ‘पद्मनंदिदेव वचनामृत’ तथा ‘हस्तिकल्प वचनामृत’ इति उभयाम्नाय विनिर्मित पंचमे-नंदीश्वरवीरादिने विद्यमान भगवान श्री आदिनाथ, भावीखंड सिद्धक्षेत्र भावी तीर्थंकर, जम्बू-भरतस्य भावी श्री महाप्रभु जिनवर; पंचमेरो तथा नन्दीश्वर-द्वापघाटादि-जिनेन्द्रायै विद्यमान सर्व शाश्वत जिनेन्द्र; जम्बूद्वीप-बाहुबली निर्माणाधीन आयतनै विद्यमान सर्व कृत्रिम-अकृत्रिम-शाश्वत जिनेन्द्र; स्वाध्यायमंदिरै प्रतिष्ठित श्री समवसरण-इत्यादि सर्व वीतरागपरमदेव्यः पूजनाथं महार्घं निर्वपामीति स्वाहा।

देववंदकीर्ति भावि विदेही गणधरका अर्थ

(राग-दयानिधि हो)
पावन जिनकथा नामस्मरण, मंगल सुखके दाता है,
धन्य धन्य अवतार प्रभु, त्रिभुवन कीर्तिन गाता है;
शांति सुखकाली शीतल, सीकर षट्दुःखहारी है,
देववंदकीर्ति गणधर-भगवान, चरण-पूजा सुखकारी है।
ॐ ह्रीं विदेही-भावि श्री देववंदकीर्तिगणधराय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री बाहुबली भगवानका अर्थ

वसुवृष्टि वश सुध बुध सों, परवश अति दुःख पावै,
सिधि दुःख हर कलको प्रविचन, अर्घ निजाय बढ़ावै।
पदम पूज्य वीतरागि निज, बाहुबली वतधारी,
सिन्धु चरणकमलको नित प्रति, शोक विकाल हमारी।
ॐ ह्रीं वर्तमान अवसर्पिणीसमये प्रथम मुक्तिस्थानप्राप्तये कर्मविजेतवे वीतरागिणे वीरवाणी श्री बाहुबली परमजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री सिद्ध भगवानका अर्थ

जल फल वसु इंद्र अर्घ अमंद, जंत अनंतदा के बंदा;
भेटो भवपदा सब दुखददा, ‘हीराचंद’ तुम वन्दा।
त्रिभुवनके स्वामी त्रिभुवननामी, अंतगामी, अभिगामी,
शिवपुरीधामी, निजविधि धामी, सिद्ध जगनामी शिरनामी।
ॐ ह्रीं अनाहतपद्मकाय सर्वकर्मनिर्मुक्तिकाय श्रीसिद्धचक्रधिपतये अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

सानुच्चय अर्घ

(गीता छंद)
मैं देव श्री अर्हत पूजू, सिद्ध पूजू भाव सों,
आचार्य श्री उझाय पूजू, साधु पूजू भाव सों।
अर्हत-भाषित जैन पूजू, द्वादशांग रच गनी,
पूजू दिगंबर गुरुवचन, शिव हेल सब आशा हनी।

सर्वज्ञभाषित धर्म दशविधि दयामय पूजू सदा,
जीव भावना बोधसत्त्व सम्यक् या शिव नहीं कदा;
त्रैलोक्य कृत्रिम अकृत्रिम चैत्य चैत्यालय पूजू,
एन भेद नंदीश्वर जिनालय खर सुर पूजित भजू।
कैलाश श्री सम्मेद श्री गिरनार फिर पूजू सदा,
चंपापुरी पावापुरी पुनि और तीरथ सर्वदा;
चौबीस श्री जिनराज पूजू बीस क्षेत्र विदेह के,
नामावली इक सहस वसु जय होय प्रति शिवगेह के।
(दोहा)
जल गंधाक्षत शुभ चरु, दीप धूप फल लाभ;
सर्व पूज्य पद पूजहूं, बहु त्रय भक्ति वलाभ।
ॐ ह्रीं भासुरपा, भाववेदना, क्रियानिष्ठा, त्रिकालवेदना कली
करवाली-भावना भावनी, श्री अहिंद्रेणी, सिद्धेणी, आचार्येणी, उपाध्यायेणी,
सर्वसाधुनी-पंचपरमेष्ठिभ्यो नमः। प्रमाणानुयोग-करणानुयोग-चरणानुयोग-
द्रव्यानुयोगेभ्यो नमः। दर्शनविशुद्ध्यादि षोडश कारणेभ्यो नमः। उत्तमक्षमादि
दशलक्षणधर्मेभ्यो नमः। सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्रेभ्यो नमः। जल
विषे, थल विषे, आकाश विषे, गुफा विषे, पहाड़ विषे, नगर-नगरी विषे,
ऊर्ध्वलोक-मध्यलोक-पाताललोक विषे विराजमान कृत्रिम अकृत्रिम जिन-
चैत्यालय जिन-बिंबेभ्यो नमः। सिद्धक्षेत्रे विद्यमान बीस तीर्थंकेभ्यो नमः।
पांच भरत, पांच ऐरावत-दस क्षेत्र संबंधी बीस चौबीसीना सातों बीस
जिनेभ्यो नमः। नंदीश्वरद्वापसंबंधी बावन जिनचैत्यालयेभ्यो नमः।
सम्मेदशिखर, कैलाश, चंपापुर, पावापुर, गिरनार आदि सिद्धक्षेत्रेभ्यो नमः।
जैनबिंबो, मुद्रबिंबो, रत्नगुहो, रत्नज्वर, धारा, सुवर्णपुरी आदि तीर्थेभ्यो
नमः। श्री चारण-ऋद्धिधारी सात परमऋषिभ्यो नमः। इति उपर्युक्तेभ्यः
सर्वेभ्यो अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।

शांतिपाठ

(चौपाई)
मैं तुम चरण कमल गुण गाय, बहुविधि भक्ति करूं मन लाय;
जनम जनम प्रभु पाऊं तोहि, यह सेवरूप दीजे मोहि। १
कृपा तिहारी जैसी होय, जामन मरण मिटाय मोय;
वार वार मैं विनती करूं, तुम सेवे भवसागर तरूं। २
नाम नेत सब दुःख मिट जाय, तुम दर्शन देखा प्रभु आय;
तुम हो प्रभु देवके देव, मैं तो करूं चरण तब सेव। ३
मैं आयो पूजने काज, मेरो जन्म सफल भयो आज;
जो मुझ सेवककी अरदास, सो सब ही जानमैं भास। ४
यामें नहीं कुछ कमी धेर, तुमही ते सब कारण करे;
तुमरे गुणोंकी अंत न पार, तुम किन कौन लगावे पार। ५
“तार तार” बिन मन कर देव, ओहि सिद्ध सुन तारन अंव;
पूजा करके नवाऊं निज शीश, मुझ अपराध क्षय उपदीश। ६

विसर्जन

देह छतां देनी दशा, देह दंता देहतीत;
ते ज्ञानीनां चरणमां, हो वंदन अगीत।
अह परम्पद प्राप्तितुं करूं ध्यान में,
गया नगर ने हाल मनोरथ्य जो;
तो एन निश्चय रामचंद्र मनने रहो,
प्रभु-आलापने वासुं ते व स्वरूप जो।
अपूर्व अवसर जेवो स्वरूपे आवशे?
(पूजा पूर्ण होनेके बाद दो बार नमस्कार मंत्रका जाप देना चाहिये)

श्री महावीरजिन आरती

ॐ जय तुम देव, प्रभु जय सम्मति देव;
वीर महा अति वीर प्रभुजी, वर्धमान देव। ॐ १
विजया उर अवतार लिने प्रभु सुन्दर हरषै;
षट्ठ मास रत्न कुंडलपुर, उन्नति वरषै। ॐ २
भुक्त त्रयोदशि चैत्रमासकी, प्रभु आनंद करतारी;
राय सिद्धार्थ घर जन्मोत्सव, ठाट सबे भारी। ॐ ३
त्रीस वर्ष तो हे मुनजे, प्रभु बाल ब्रह्मचारी;
राज त्याग कर घर चौवनमें, मुनिदीक्षा धारी। ॐ ४
बारह वर्ष किया तप दुस्तर विधि चक्रपुर किया;
झलके लोकोलोक ज्ञानमें, यश भरपूर लिया। ॐ ५
कार्तिक श्याम अमावस के दिन, जाकर मोक्ष वसे;
पूर्व दिवाली वाला तभीसे घर-घर दीप जले। ॐ ६
वीतराग सर्वज्ञ हितषी, शिवपदम अविनाशी;
हरिहर ब्रह्मा नाव तुमही हो, जबजब अविनाशी। ॐ ७
दीनदयाला जगप्रतिपाला मुनवरराज जजे;
तुमगत बिन दर छक छिनमें, पातक दूर भजे। ॐ ८
चोर भील चांडाल उचारे, भवदुःख हर तुही;
पतित पावन शिवराम उचारे, हे जिन शरण सुही। ॐ ९

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 2985.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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