चोबीसों जिन के पाँचों कल्याणक शुभ मंगलदायी ।
गर्भ जन्म तप ज्ञान मोक्ष कल्याणक पूजूँ सुखदायी ।।
ऋषभ अजित संभव अभिनंदन सुमतिपद्म सुपार्श्व भगवंत ।
चंद्र सुविधि शीतलश्रेयांश जिन वासुपूज्यप्रभु विमल अनंत ।।
धर्म शांति कुन्थुअरहजिन मल्लि मुनिसुव्रत नाम गुणवंत ।
नेमि पार्श्व प्रभु महावीर के पाँचों मंगल जय जयवन्त ।।
ॐ ह्रीं श्री जिनेन्द्रपंचकल्याणक समूह अत्र अवतर अवतर संवौषट् । ॐ ह्रीं श्री जिनेन्द्रपंचकल्याणक समूह अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ ।ॐ ह्रीं श्री जिनेन्द्रपंचकल्याणक समूह अत्रमम सन्निहितो भव भव वषट् ।
शुभ्र नीर की तीन धार दे जन्म जरा मृतु हरण करूँ ।
सम्यक् दर्शन की विभूति पा मोक्ष मार्ग को ग्रहण करूँ ।।
जिन तीर्थंकर के बतलाये रत्नत्रय को वरण करूँ ।
गर्भ जन्म तप ज्ञान मोक्ष पाँचों कल्याणक नमन करूँ ।।१।।
ॐ ह्रीं श्री जिनेन्द्र पंचकल्याणकेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जल नि ।
चौरासी के चक्कर से बचना है तो निज ध्यान करो ।
नव तत्त्वों की श्रद्धापूर्वक स्वपर भेद विज्ञान करो । ।
मलयागिरि चंदन अर्पित कर भव का आतप हरण करूँ ।
सम्यक् ज्ञान प्राप्त कर मैं भी मोक्ष मार्ग को गृहण करूँ ।।जिन।।२ ।।
ॐ ह्रीं श्री जिनेन्द्रपंचकल्याणकेभ्यो संसारतापविनाशनाय चन्दन नि
अक्षत से अक्षय पद पाऊँभव सागर दुख हरण करूँ ।
सम्यक् चारित्र के प्रभाव से मोक्ष मार्ग को गृहण करूँ ।।जिन।।३ ।।
ॐ ह्रीं श्री जिनेन्द्र पंचकल्याणकेभ्यो अक्षयपद प्राप्ताय अक्षत नि ।
सुन्दर पुष्प सुगन्धित लाकर काम शत्रु मद हरण करूँ ।
सम्यक् तप की महाशक्ति से मोक्षमार्ग को गृहण करूँ ।।जिन।।४ ।।
ॐ ह्रीं श्री जिनेन्द्र पंचकल्याणकेभ्यो कामबाणविध्वंशनाय पुष्प नि ।
शुभ नैवेद्य भेंटकर स्वामी क्षुधा व्याधि को हरण करूँ ।
शुद्ध ध्यान निज के प्रताप से मोक्ष मार्ग को गृहण करूँ ।।जिन।।५ ।।
ॐ ही श्री जिनेन्द्र पंचकल्याणकेभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य नि ।
तमका नाशक दीप जलाकर मोह तिमिर को हरण करूँ ।
निज अंतर आलोकित करके मोक्ष मार्ग को ग्रहण करूँ ।।जिन।।६ ।।
ॐ ह्रीं श्री जिनेन्द्र पंचकल्याणकेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीप नि ।
ध्यान अग्नि में धूप डालकर अष्ट कर्म को गृहण करूँ ।।
शक्ल ध्यान की प्राप्ति हेतु मैं मोक्षमार्ग को गृहण करूँ ।।जिन।।७ ।।
ॐ ह्रीं श्री जिनेन्द्र पंचकल्याणकेभ्यो अष्टकर्मविर्ध्वसनाय धूप नि ।
शुद्ध भाव फल लेकर स्वामी पाप पुण्य को हरण करूँ ।
परम मोक्षपद पाने को मैं मोक्ष मार्ग को ग्रहण करूँ ।।जिन।।८ ।।
ॐ ह्रीं श्री जिनेन्द्र पंचकल्याणकेभ्यो मोक्षफलप्राप्ताय फल नि ।
वसु विधि अर्घ चढ़ाकर मैं अष्टम वसुधा को वरण करूँ ।
निज अनर्घ पद प्राप्ति हेतु मैं मोक्षमार्ग को ग्रहण करूँ ।।जिन।।९ ।।
ॐ ह्रीं श्री जिनेन्द्र पंचकल्याणकेभ्यो अनर्घपद प्राप्ताय अर्घ्य नि ।
भेदज्ञान के बिना न मिलता मिथ्या भ्रम का अंत रे ।
भेदज्ञान से सिद्ध हुए हैं जीव अनंतानंत रे ।।
श्री गर्भकल्याणकअर्घ
श्री जिन गर्भ कल्याण की महिमा अपरम्पार ।
रत्नों की बोछार हो घर घर मंगलचार ।।
गर्भ पूर्व छह मास जन्म तक नित नूतन मंगल होते ।
नव बारह योजन नगरी रच इन्द्र महा हर्षित होते ।।
गर्भ दिवस जिन माता को दिखते हैं सोलह स्वप्न महान् ।
बेल, सिंह, माला, लक्ष्मी, गज, रवि, शशि, सिंहासन, छविमान ।।
मीन युगल, दोकलश, सरोवर, सुरविमान, नागेन्द्र विमान ।
रत्न राशि, निर्धूमअग्नि सागर लहराता अतुल महान् ।।
स्वप्न फलों को सुनकर हर्षित, होता है अनुपम आनन्द ।
धन्य गर्भ कल्याण देवियाँ सेवा करती हैं सानन्द ।।१।।
ॐ ह्रीं श्री तीथकरगर्भ कल्याणकेभ्यो अर्घ्यं नि स्वाहा ।
श्री जन्म कल्याणकअर्घ
श्री जिन जन्म कल्याण की महिमा अपरम्पार ।
तीनों लोकों में हुआ प्रभु का जय जयकार ।।
जन्म समय तीनों लोकों में होता है आनन्द अपार ।
सभी जीव अन्तर्मुहूर्त को पाते अति साता सुखकार । ।
इन्द्रशची ऐरावत पर चढ धूम मचाते आते हैं ।
जिन प्रभु का अभिषेक मेरु पर्वत के शिखर रचाते हैं ।।
क्षीरोदधि से एक सहस्त्र अरु अष्ट कलश सुर भरते हैं ।
स्वर्ण कलश शुभ इन्द्रभाव में प्रभु मस्तक पर करते हैं ।।
मात पिता को सोंप इन्द्र करता है नाटक नृत्य महान् ।
परम जन्म कल्याण महोत्सव पर होता है जय जयगान ।।२।।
ॐ ह्रीं श्री तीर्थंकरजन्मकल्याणकेभ्यो अर्घ्यं नि ।
निज मे जागरुक रह पंच प्रमादों पर तुम जय पाओ ।
अप्रमत्त बन निज वैभव से सहज पूर्णता को लाओ ।।
श्री तप कल्याणकअर्घ
श्री जिन तप कल्याण की महिमा अपरम्पार ।
तप संयम की हो रही पावन जय जयकार ।।
कुछ निमित्त पा जब प्रभु के मन में आता वैराग्य अपार ।
भव्य भावना द्वादश भाते तजते राजपाट संसार ।
लोकान्तिक ब्रह्मर्षि एक भव अवतारी होते पुलकित ।
प्रभु वैराग्य सुदृढ करने को कहते धन्य धन्य हर्षित ।।
इन्द्रादिक प्रभु को शिविका पर ले जाते बाहर वन में ।
महाव्रती हो केश लोचकर लय होते निज चिंतन में ।।
इन केशों को इन्द्र प्रवाहित क्षीरोदधि में करता है ।
तप कल्याण महोत्सव तप की विमल भावना भरता है ।।३।।
ॐ ह्रीं श्री तीर्थंकर तपकल्याणकेभ्यो अर्घ्य नि स्वाहा ।
श्री ज्ञान कल्याणकअर्घ
परम ज्ञान कल्याण की महिमा अपरम्पार ।
स्वपर प्रकाशक आत्म में झलक रहा संसार ।।
क्षपक श्रेणी चढ शुक्ल ध्यान से गुणस्थान बारहवॉ पा ।
चार घातिया कर्म नाशकर गुणस्थान तेरहवॉ पा ।।
केवलज्ञान प्रकट होते ही होती परमौदारिक देह ।
अष्टादश दोषों में विरहित छयालीस गुण मंडित नेह ।।
समवशरण की रचना होती होते अतिशय देवोपम ।
शत इन्द्रों के द्वारा वंदित प्रभु की छवि अति सुन्दरतम ।।
दिव्य ध्वनि खिरती है सब जीवों का होता है कल्याण ।
परम ज्ञान कल्याण महोत्सव पर जिन प्रभु का ही यश गान ।।४।।
ॐ ह्रीं श्री तीर्थंकर ज्ञानकल्याणकेभ्यो अर्घ्य नि स्वाहा ।
जो निवृत्ति की परम भक्ति में रहते हैं तल्लीन सदा ।
सिद्ध वधू के दिव्य मुकुट पर होते हैं आमीन सदा ।।
श्री मोक्ष कल्याणकअर्घ
परम मोक्षकल्याण की महिमा अपरम्पार ।
अष्टकर्म को नाश कर नाथ हुए भवपार ।।
गुणस्थान चौदहवॉ पाकर योगों का निरोध करते ।
अन्तिम शुक्ल ध्यान के द्वारा कर्म अघातिया भी हरते ।।
अ,इ,उ,ऋ,लृ उच्चारण में लगता है जितना काल ।
तीन लोक के शीश विराजित ही जाते हैं प्रभु तत्काल ।।
तन कपूर वत उड जाता है नख अरु केश शेष रहते ।
मायामयी शरीर देव रच अन्तिम क्रिया अग्नि दहते ।।
मंगल गीत नृत्य वाद्यों की ध्वनि से होता हर्ष अपार ।
भव्य मोक्ष कल्याण मनाते सब जीवों को मंगलकार ।।५।।
ॐ ह्रीं श्री तीर्थंकर मोक्षकल्याणकेभ्यो अर्घ्यं नि स्वाहा ।
जयमाला
जिनवर पंच कल्याणक की महिमा अगम अपार ।
गर्भ जन्म तप ज्ञान सह महामोक्ष शिवकार ।।१।।
वृषभादिक चोबीस जिनेश्वर के मंगल कल्याण महान् ।
गर्भ जन्म तप ज्ञान मोक्ष पाँचों कल्याणक महिमावान ।।२।।
श्री पंचकल्याणक पूजन करके निज वैभव पाऊँ ।
सोलहकारण भव्य भावना मैं भी हे जिनवर भाऊँ ।।३।।
जिनध्वनि सुनकर मेरे मन में रहा नहीं प्रभु भय का लेश ।
पूर्ण शुद्ध ज्ञायक स्वरुप मय एक मात्र है उज्ज्वल वेश ।।४।।
संयोगी भावों के कारण भटक रहा भव सागर में ।
जिन प्रभु का उपदेश सुना पर झिला नहीं निज गागर में ।।५।।
अवसर आज अपूर्व मिल गया प्रभु चरणों की पूजन का ।
सम्यकदर्शन आज मिला है फल पाया नर जीवन का ।।६।।
संयम तप बैराग्य न जागा तो फिर तत्त्व मनन कैसा ।
निज आतम का भानु न जागा तो फिर निज चिन्तन कैसा ।।
हे प्रभु मुझे मार्ग दर्शन दो अब मैं आगे बढ़ जाऊँ ।
अणुव्रत धार महाव्रत धारूँ गुणस्थान भी चढ़ जाऊँ ।।७।।
परम पंचकल्याण विभूषित जिन प्रभु की महिमा गाऊँ ।
घाति अघाति कर्म सब क्षयकर शाश्वत सिद्ध स्वपद पाऊँ ।।८।।
ॐ ह्रीं श्री तीर्थंकर गर्भ जन्म तप ज्ञान मोक्ष पंचकल्याणकेभ्यो पूर्णार्घ्यं नि ।
तीर्थंकर जिन देव के पूज्य पंच कल्याण ।
भाव सहित जो पूजते पाते शांति महान् । ।
इत्याशीर्वाद
जाप्यमन्त्र ॐ ह्रीं श्री जिन पंचकल्याणकेभ्यो नम ।
Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), पृष्ठ ५२ से ५७