मंगलाचरण
(दोहा)
मंगलमय जिनदेव हैं, जिनश्रुत मंगलकार।
मंगलमय निर्ग्रन्थ गुरु, जिनशासन आधार॥
(बसंततिलका)
श्रीमज्जिनेंद्र अरहंत प्रभु नमस्ते।
वस्तुस्वरुप दिग्बोधिनि मां नमस्ते॥
वैराग्य वंत जिन संत गुरु नमस्ते।
त्रिरत्न रत्नत्रय दायक हो नमस्ते॥
(दोहा)
वीतराग सर्वज्ञ हैं, सर्व हितंकर मान।
ज्ञान दर्श सुख वीर्य युत्, नंत चतुष्टय जान॥
दिव्यध्वनि दातार है, भविजन को सुखकार।
श्री अरहंत जिनेश को, वंदन बारंबार॥
जिनश्रुत द्वादश अंगमय, मुक्तिमार्ग दर्शाय।
अनेकांतमय वस्तु को, स्याद्वाद समझाय॥
नय प्रमाण निक्षेप से, अर्थ वस्तु विस्तार।
नमन करें जिनवचन जो, भवदधि शोषणहार॥
भू पर चलते सिद्ध सम, ज्ञान ध्यान मय संत।
देह दिगंबर अरन में, अंतर आनंद वंत॥
परिग्रह तज निज संपदा, भोग रहे मुनिराय।
तीन गुप्ति धरनार को, वन्दें मनवचकाय॥
(सोरठा)
मंगल रचें विधान, देवशास्त्रगुरु पूजने।
करते हैं गुणगान, मन में उत्सव धारकर॥
इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत।
श्रीमद् जिनेंद्र देव पूजन
स्थापना
(दोहा)
वीतराग विज्ञानमय, श्रीमद् देव जिनेश।
गुण समूह धरनार हो, दोष नही लवलेश॥
(वीर छंद)
जिसकी प्रज्ञा में आलोकित लोक अलोक सभी तिहुंकाल।
जिन चरणों में नित नत रहते विश्व विजेता उन्नत भाल॥
जिसको राग नहीं अनुकूलों प्रतिकूलों में द्वेष नहीं।
आओ हे जिन ! अत्रो तिष्ठो मेरे अन्तर-देश-मही॥
ॐ ह्रीं श्रीमद्जिनेंद्रदेव ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् इत्याह्वाननम्।
ॐ ह्रीं श्रीमद्जिनेंद्रदेव ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः इति स्थापनम्।
ॐ ह्रीं श्रीमद्जिनेंद्रदेव ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् इति सन्निधिकरणम् परि पुष्पांजलि क्षिपेत।
हूँ चेतन पर जड़ तन को निज मान भटकता भववन में।
हर जन्म मिले नूतन तन में मैं मग्न रहा अपनेपन में॥
मैं मरण मान निज आतम का व्याकुल वियोग में पछताया।
हो आत्मबोध से जन्म-मरण क्षय जल ले चरणों में आया॥
ॐ ह्रीं श्रीमद्जिनेंद्रदेव जन्म-जरा-मृत्यु-रोगविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
आत्म रुचि बिन पर परभावों में रुष्ट हुआ मैं कुपित हुआ।
निज-पर में कर्तृत्व मान आकुल व्याकुल हो तपित हुआ॥
मलयज से प्रभु तुम शीतल हो शीतलता मुझको मिल जावे।
चन्दन चरणों में अर्पण है भवताप-भयंकर मिट जावे॥
ॐ ह्रीं श्रीमद्जिनेंद्रदेव संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
स्वाधीन स्वयंभू स्व-पर सभी संपूर्ण जगत् की सब सत्ता।
अरे ! मान का स्थान कहाँ सुंदरतम यह विश्व व्यवस्था॥
निज सत्ता में लीन हुए हो अक्षय अविनाशी पद पाया।
अक्षय पद का अभिलाषी मैं अक्षत अतएव चरण लाया॥
ॐ ह्रीं श्रीमजिनेंद्रदेव अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
निष्काम ब्रम्ह में मग्न हुए हो काम कहाँ क्या कुटिल काम का।
चिद्पुष्पों से अरे महकता तेरा आंगन मोक्षधाम का॥
मैं मायावी मार कंटकों की छलना से छला हुआ।
सुमनों से अर्चित चरण तुम्हारे पाकर हे प्रभु भला हुआ॥
ॐ ह्रीं श्रीमजिनेंद्रदेव कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
आनंद अमी से तृप्त हुए हो भाव क्षुधा क्षय कर जिनवर।
मैंने तृष्णा से व्याकुल होकर खाए व्यंजन भर-भर कर॥
यह लोक अनंती होकर भी इच्छा खंदक ना भर पाए।
इससे अच्छा है हे प्रभुवर इच्छा का अंत अरे आए॥
ॐ ह्रीं श्रीमजिनेंद्रदेव क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अज्ञान अमा की घोर तमिस्त्रा प्रज्ञा का अंत न कर पाई।
चिन्मय रश्मि यों रही अखंडित कर्मकटक ना हर पाई॥
अतएव इसी लघु अर्चि से अर्चन करता हूँ मैं स्वामी।
हे ज्ञानभानु मम अंतरतम को जगमग कर दो अभिरामी॥
ॐ ह्रीं श्रीमजिनेंद्रदेव मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
प्रभु धवल ध्यान की शुभ्र अनल से चिद्विकृत सब ध्वस्त हुए।
चैतन्य सदन की निर्मल मारुत सौरभ से तुम मस्त हुए॥
भाव विशुद्धि की अभिलाषा तेरे दर पर ले आई।
लेकर दशांग यह धूप मनोहर भक्ति भावना महकाई॥
ॐ ह्रीं श्रीमजिनेंद्रदेव अष्टकर्मविनाशनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
द्रव्य गुणों से सब भगवन तुम परिणति में गुणधाम हुए।
आत्म साधना का अनुपम फल द्रव्य यथा परिणाम हुए॥
पर-द्रव्य-भाव से अरे सुखों के यत्न सभी निष्फल पाए।
तुम पूर्ण निराकुल हो जिनवर अतएव चरण में फल लाए॥
ॐ ह्रीं श्रीमद्जिने॑द्रदेव मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
आत्मबोध हो आत्मरुचि हो अक्षय सत्ता निज पहिचानें।
निष्काम ब्रम्ह का आलंबन हो आनंद अमी निज रस पाने॥
ज्ञानभानु से जगमग अंतर धवल ध्यान से शिवफल पाएं।
यों तेरे पथ पर करें गमन हम पद अनर्घ्य को पा जाएं॥
ॐ ह्रीं श्रीमद्जिनेन्द्रदेव अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अर्ध्यावली
(नाराच छंद)
इष्ट या अनिष्ट कोई द्रव्य ना भाव ना।
हेर-फेर हानि-लाभ वस्तु का स्वभाव ना॥
राग द्वेष क्लेश नाश आप भगवंत हो।
वीतराग श्री जिनेश आप अरहंत हो॥
ॐ ह्रीं श्री वीतराग जिन अरहंत देवाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दीप्त त्रैलोक्य-काल आप ज्ञानभान ते।
द्रव्य गुण परिणाम आप सब जानते॥
आप में थिर सदा आत्म ज्ञानवंत हो।
देव सरवज्ञ जिन आप अरहंत हो॥
ॐ ह्रीं श्री सर्वज्ञ जिन अरहंत देवाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जीव मात्र लोक के आप हितकार हो।
मुक्ति हेत देशना-दिव्य दातार हो॥
राग बिन आप ही नाथ कृपावंत हो।
हे हितोपदेश प्रभु आप अरहंत हो॥
ॐ ह्रीं श्री हितोपदेश जिन अरहंत देवाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
कर्म-घाति विनाश भावमुक्त हो प्रभो।
भाव-पर त्याग समभाव युक्त हो विभो॥
ज्ञान दरशन अनंत सुख वीर्यवंत हो।
वैभवी चतुष्क धर आप अरहंत हो॥
ॐ ह्रीं श्री अनंत चतुष्टययुक्त अरहंत देवाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
छत्रतीन रत्न-आसन चंवर दुंदुभी।
पुष्पवर्षा अशोक दिव्य ध्वनि और भी॥
भामंडल सहित प्रातिहार्य वंत हो।
पुण्य फल बाह्य ये आप अरहंत को॥
ॐ ह्रीं श्री अष्टप्रातिहार्ययुक्त अरहंत देवाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जन्म के ज्ञान के दश-दश हैं कहें।
चतुर्दश देवकृत कुल चौंतीस है॥
शुभ अतिशय धर तीर्थ के कंत हो।
पुण्य फल बाह्य ये आप अरहंत को॥
ॐ ह्रीं श्री चौंतीस अतिशय युक्त अरहंत देवाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
क्षुत् तृषा भय जरा शोक मोह क्रोध मान।
लोभ छल स्वेद खेद मद रति आदि जान॥
अष्ट-दश दोष हीन महा गुणवंत हो।
एक मात्र लोक में आप अरहंत हो॥
ॐ ह्रीं श्री अष्टादशदोषरहित अरहंत देवाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दान लाभ भोग उपभोग वीर्य आप्त को।
समकित ज्ञान दर्श चरण को प्राप्त हो॥
लब्धियां नव कही केवली संत को।
शुद्ध परिणाम युत् आप अरहंत हो॥
ॐ ह्रीं श्री नवकेवललब्धिसंयुक्त अरहंत देवाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
तीन काल मध्य लोक केवली जिन कहे।
एक क्षण को नहीं लोक जिन बिन रहे॥
जैन शासन सदा काल जयवंत हो।
लोक नायक अहो आप अरहंत हो॥
ॐ ह्रीं श्री सदाकालजयवंत अरहंत देवाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
त्रिभुवन तिलक जिनेश की, महिमा अगम अपार।
निज स्वरुप में मग्न हो, किया भवार्णव पार॥
सकल जगत् को जानते, रहते हैं अविकार।
दिव्य ध्वनि उपदेश से करते हैं उपकार॥
श्री जिन रुप विचारिके, निज आतम को ध्याय।
अर्घ्य उन्हें अर्पण करें, जो शिवपुर पहुंचाय॥
ॐ ह्रीं श्री अरहंत देवाय नमः महाअर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
(दोहा)
मुक्तिमार्ग प्रणेता हो, भेद कर्मगिरि खेत।
विश्वतत्व सकल ज्ञाता, वंदें तुम गुण हेत॥
(चौपाई)
जय जिन वीतराग विख्याता, जय जिन सकल ज्ञेय के ज्ञाता।
जय जिन नंत चतुष्टय धारी, जय जिन दिव्यध्वनि विस्तारी॥
जय जिन जीव समान बताए, जय जिन मोक्ष उपाय बताए।
जय जिन कर्म सभी दल आए, जय जिन मोक्ष पंथ चल आए॥
जय जिन सप्ततत्व सरधाना, जिय तन को तब भिन्न पिछाना।
देव शास्त्र गुरु दृढ़तर माना, निज आतम अनुभव रसपाना॥
भाव शुभाशुभ क्षय कर दीना, शुद्धभाव निज चित में लीना।
निज आतम साधन से स्वामी, हे जिन आप हुए गुणधामी॥
जय जिन सर्व कषाय विनाशी, ज्ञानानंद रहो अविनाशी।
जय सब दोष अठारह अंता, जय नव केवल लब्धि लहंता॥
गणधरादि मुनि चरण जजें हैं, सुरपति नरपति नित्य भजें हैं।
जिनशासन तिहुंजग जयवंता, तीर्थ प्रवर्तक श्री अरहंता॥
जय जिन तीन भुवन के स्वामी, जय जिन अंतर्मुख अभिरामी।
जय जिन शांत छवि तुम प्यारी, भविजन को मन मोदन कारी॥
तुम गुण द्रव्य परिणति जाने, वह निज आतम को पहिचाने।
मोह महारिपु लय हो जावे, सम्यक् रत्नत्रय पथ पावे॥
ॐ ह्रीं श्रीमद्जिनेंद्रदेव अनर्घ्यपदप्राप्तये जयमाला पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
सुरासुर नरेंद्र वंदित, घाति कर्ममल हीन।
धर्म तीर्थ करतार जिन, प्रणमन नित्य नवीन॥
इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत।
श्री जिनवाणी माता पूजन
स्थापना
(दोहा)
श्री जिनवर की देशना, वाङ्मय श्रुत सिद्धांत।
आगम नाम अनेक है, अर्थ तत्व वृत्तांत॥
(हरिगीत)
मोहोपचय क्षय कारिणि, वाणी जिनेश्वर वादिनी।
सर्वज्ञ की अनुसारिणि, पथधारिणि सुख साधनी॥
अज्ञान तम हरिणि अबाधित, अर्थ-तत्व प्रकाशिनी।
हे ! स्यात् पद धरणि विराजो, आन हृदय सुवासिनी॥
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतिवाग्वादिनि ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् इत्याह्वाननम्।
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतिवाग्वादिनि ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः इति स्थापनम्।
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतिवाग्वादिनि ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम् परिपुष्पाञ्जलि क्षिपेत।
(वीर छंद)
तन में तन्मय रहकर चिन्मय, चिरकाल चहुंगति भरमाया।
रे ! अमर जान हर जन्म अरे मैं, मरण काल में पछताया॥
श्रुत सरिता का पावन जल, मिथ्या मल मर्दन कर देता।
चैतन्य निलय को स्वच्छ बना, भ्रमजाल चिरंतन हर लेता॥
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्यै जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
इच्छा पर में परिवर्तन की, मन आकुल व्याकुल कर देती।
तुम सहज व्यवस्था बता लोक की, व्यथा-व्यर्थ-की हर लेती॥
नित चन्दन से वंदन वांग्मय, सत्वर सब दूर दुरिततप हो।
रे ! चंद्रश्रुति सम आतप हर, हे शारद शांत भवातप हो॥
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्यै संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
उत्पाद भंग के संग सदा ध्रुव, सत्ता का उद्घोषण है।
पर-द्रव्य-भाव अथिर सयोंगी, नहीं आप का पोषण है॥
क्षणिक भाव से भेदज्ञान कर, अक्षय का अवलंबन हो।
हे आप्त वचन अक्षत अर्पण, अब भावमरण परसंग न हो॥
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्यै-अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
पीयूष समझ विषमय विषयों को विपदा विकट निकट पाई।
श्री जिनवचन सुधामृत पाकर बेचेत चेतना हरषाई॥
श्रुत आंगन के मधुपुष्पों की सौरभ सम्यक् आमंत्रण।
कपट काम की कटु कुवास का हो निर्वासन रे तत्क्षण॥
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्यै कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
कण भर पर-भक्षण शक्य नहीं, इच्छा पर जग को कण कहती।
अनभिज्ञ स्वयं निज वैभव से, पर-लिप्सा हर क्षण-क्षण रहती॥
षटरस व्यंजन से अर्चित जिन प्रवचन आनंद वर देता।
निज आत्म-अनुभव अमृतरस क्षुत्पीड़ा अंतस हर लेता॥
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्यै क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
कैवल्य कलम से आलेखित रे शोधग्रंथ शुद्धातम के।
हे मुक्तिपंथ के दीपथंभ चिर वांछ अंत मिथ्यातम के॥
संस्तवन हेतु यह रत्नदीप कर में धर मंगलगान करें।
संशय विभ्रम व्यामोह नाश हे जिनश्रुत केवलज्ञान वरें॥
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्यै मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
वर्तन में नर्तन करते रे परभाव कर्म से प्रीत करे।
मेरे चिद् आंगन को कलुषित करते ये रिपु के मीत अरे॥
विधि-विध्वंसन विधि वांग्मय से पा पावन परिणति हो जावे।
अतएव अगर का अवलंबन ले अर्हत्-वाणी अर्चावें॥
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्यै अष्टकर्मविध्वंसनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
कण-कण परखा क्षण-क्षण चाहा सुख का कण क्षण-भर पर न मिला।
बस एक निजातम ज्ञान बिना श्रम-फल मृगजल सम ही निकला॥
आया अब तेरी शरण शारदे शुद्धात्म ज्ञान का संबल दो।
निज आत्मसाधना से रत्नत्रय सुखमय मोक्ष महाफल हो॥
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्यै मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
आगम का सेवन कर परमातम हूँ मैं नक्की निश्चय हो।
युक्ति का आलंबन करके हूँ परमातम मैं निर्णय हो॥
पर-अपर गुरु उपदेश मिले हूँ परमातम मैं अनुभव हो।
अविरल आनंद झरे परिणति में निज वैभव का उद्भव हो॥
हे परमागम पावन पीयूष परिणति ध्रुव अचल अनुपम हो।
हे दिव्य वचन तीर्थंकर के अर्चन हित अर्घ्य निरुपम हो॥
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्यै अनर्घ्यपदप्राप्तये-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा
अर्ध्यावली
(छंद गीता)
समवसरण के मध्य में श्री जिन विराजे अधर में।
ओंकार वाणी सब प्रदेशों से झरे बिन-अखर में॥
निज भाष में समझे अहो सुर नर पशु के जीव गण।
अर्घ्य से अर्चन करें ध्वनि दिव्य का प्रत्येक क्षण॥
ॐ ह्रीं श्री जिनवरदेशना जिनश्रुतेभ्यो नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जिनदेशना को कर श्रवण, अंतरमहुरत काल में।
गणधर रचे जिनश्रुत अहो, निजज्ञान उन्नत भाल में॥
अंग एकादश तथा, पूरब चतुर्दश भेद हैं।
ये अंग द्वादश अर्घ्य पूजित, हर रहे भवि खेद है॥
ॐ ह्रीं श्री द्वादशांगजिनश्रुतेभ्यो नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(छंद भुजंगप्रयात)
महाभाग पुरुषों का जीवन बतावे, परिणाम फल शुभ-अशुभ के दिखावे।
चले रत्नत्रय पथ लही मुक्ति कैसे, कथा के अनुयोग कहते हैं वैसे॥
कथन में भले हो अलंकार भाषा, किये हो प्रशंसा बहु पुण्य राशा।
अहो वीतरागी परिणाम का ही, प्रयोजन सदा है अनुयोग माही॥
ॐ ह्रीं श्री प्रथमानुयोग जिनश्रुतेभ्यो नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
परिणाम सूक्षम करे जीव जैसे, बंधे कर्म थितियां अनुभाग वैसे।
कथन मार्गणा के गुणस्थान के सब, त्रिलोकादि रचना गति कौन सी कब॥
केवली गम्य वचन सूक्ष्म करते, नही-तर्क आज्ञाप्रधानी सुमरते।
अहो वीतरागी परिणाम का ही, प्रयोजन सदा है अनुयोग माही॥
ॐ ह्रीं श्री करुणानुयोग जिनश्रुतेभ्यो नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
मुनिराज श्रावक करें आचरण जो, महाव्रत अणुव्रत करें वे वरण जो।
अरे देह आश्रित जो संयम बतावे, व्यवहार नय से धरम नाम पावे॥
नियत रत्नत्रय के जो सहचर रहे हैं, कथन इन सभी का जिनागम कहे हैं।
अहो वीतरागी परिणाम का ही, प्रयोजन सदा है अनुयोग माही॥
ॐ ह्रीं श्री चरणानुयोग जिनश्रुतेभ्यो नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
छहों द्रव्य गुण का परिणाम भी का, कथन सात तत्वों पदारथ सभी का।
स्व-पर भेद लखकर निजातम की श्रद्धा, अहो ज्ञान रमना कथन मुक्ति पथ का॥
करे न्याय तर्कों से वस्तु की सिद्धि, प्रमाणों नयों से सदा सत् प्रसिद्धि।
अहो वीतरागी परिणाम का ही, प्रयोजन सदा है अनुयोग माही॥
ॐ ह्रीं श्री द्रव्यानुयोग जिनश्रुतेभ्यो नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(सोरठा)
अनेकांतमय अर्थ, स्याद्वाद शैली कथन।
कहने की सामर्थ्य, श्रुत को पूजें अर्घ्य से॥
ॐ ह्रीं श्री अनेकांतप्रकाशक स्याद्वादशैली जिनश्रुतेभ्यो नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पूर्वापर अविरोध, जिनश्रुत के सिद्धांत सब।
अर्थ तत्व का बोध, लेकर पूजें अर्घ्य से॥
ॐ ह्रीं श्री पूर्वापर अविरोध जिनश्रुतेभ्यो नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
जिनवाणी नितबोधिनी, करें आत्मकल्याण।
अर्घ्य अमोलक से जजें, मिले दुखों से त्राण॥
ॐ ह्रीं श्री नित्यबोधिनी जिनश्रुतेभ्यो नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(छंद हरिगीतिका)
श्री वीर वाणी से प्रवाहित श्रुत बहा बस ज्ञान में।
आचार्य श्री धरसेन स्वामी थे विचरते ध्यान में॥
इस काल के रे अंत तक कैसे रहेगा वांग्मय।
तब पुष्पदंत रु भूतबली को योग्य जाने शिष्य द्वय॥
ज्येष्ठ सुदि शुभ पंचमी षटखंड-आगम अवतरे।
धवल आदि महान् टीका प्रथम श्रुत भावों भरे॥
ॐ ह्रीं श्री जिनप्रथमश्रुतस्कंधेभ्यो नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री कुंदकुंद महान् थे आचार्य इस कलिकाल में।
देखा उन्होंने इस जगत् में जीव हैं भ्रमजाल में॥
लाए सीमंधर देशना पीयूष परमागम दिये।
रे भाग्य अरु पुरुषार्थ जिनका है प्रबल भर-भर पिएं॥
प्रवचन समय पंचास्ति आदिक और भी पाहुड गढ़े।
रे सूरी श्रमणों कृत सभी जिन सूत्र हम निजहित पढ़ें॥
ॐ ह्रीं श्री जिनद्वितीयश्रुतस्कंधेभ्यो नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
ओंकारमय जिनधुनि, गणधर गूंथे अंग।
ग्रंथ रचे निर्ग्रन्थ ने, करें मोह को भंग॥
वीतराग विज्ञानमय, है चारों अनुयोग।
समझें तत्व पदार्थ को, करके थिर उपयोग॥
सर्व जगत् सुखकारिणी, जिनवाणी हितकार।
अष्ट द्रव्य मय अर्घ्य ले, वन्दें बारंबार॥
ॐ ह्रीं श्री जिनश्रुतेभ्यो नमः महाअर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
(दोहा)
वीतराग सर्वज्ञ के, श्री जिन वचन महान्।
विनय भाव चित धार कर, पावें निर्मल ज्ञान॥
(छंद लक्ष्मीधरा)
वीतराग देव की दिव्यध्वनि सार है।
ज्ञान कैवल्य के दर्श अनुसार है॥
इष्ट और सत्य है दिव्य वाणी सही।
जीव मात्र हित हेत जैन वाणी कही॥
काल अंतर महुरत रचना करे।
देव गणधर अहो अंग द्वादश अरे॥
अंग-अंग ज्ञान के संग सुख भेंट ही।
जीव मात्र हित हेत जैन वाणी कही॥
सूरी मुनि ज्ञानी निर्ग्रन्थ ग्रंथकार है।
विश्व तत्व को विलोकि आत्मतत्व सार है॥
शब्द-शब्द सार है पद-पद में वही।
जीव मात्र हित हेत जैन वाणी कही॥
कथा, सिद्धांत के, चरण के, द्रव्य के।
तीर्थ की भेंट है हाथ में भव्य के॥
पोषते अनुयोग वीतराग भाव ही।
जीव मात्र हित हेत जैन वाणी कही॥
विश्व में वस्तुएं हैं अनेकांत मय।
स्याद्वाद से कहे प्रमाण निक्षेप नय॥
तर्क न्याय युक्ति से साध्य सिद्धि सही।
जीव मात्र हित हेत जैन वाणी कही॥
सात तत्व द्रव्य छः सब कहे पदार्थ नव।
जान निज अर्थ हेत अर्थ को मेट भव॥
वस्तु व्याख्यान ये और विश्व में नहीं।
जीव मात्र हित हेत जैन वाणी कही॥
जीव चिरकाल भव-भव-भ्रमण भोगता।
भोगता क्लेश था द्वेष राग रोग था॥
भांति-भांति भ्रांति में शांति थी कब लही।
जीव मात्र हित हेत जैन वाणी कही॥
सर्व संशय विभ्रम मोह मेटने
वाद का अंत कर समाधान भेंटने।
है समर्थ वीतराग ध्वनि बस एक ही॥
जीव मात्र हित हेत जैन वाणी कही।
राज-भोग-चोर-नार चार कुकथा निवार।
जैन श्रुत करो विचार रत्नत्रय मार्ग धार॥
आत्मबोध एक सार सर्व आगम महीं।
जीव मात्र हित हेत जैन वाणी कही॥
मार्ग दुख-मोक्ष का मार्ग सम्यक्त्व है।
मार्ग भव-भेद का भेद ज्ञान तत्व है॥
मार्ग में चरण धर वरण शिव की मही।
जीव मात्र हित हेत जैन वाणी कही॥
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्यै अनर्घ्यपदप्राप्तये जयमालापूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
जीव मात्र हितकारिणी, श्री जिनवाणी मात्।
पढ़ें सुनें चित् में धरें, तीर्थ वचन विख्यात॥
नितप्रति पूजन अर्चना, नितप्रति करें प्रणाम।
अष्ट द्रव्य से पूजकर, श्रद्धें आठो याम॥
इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत।
श्री दिगंबर मुनिराज पूजन
(अडिल्ल)
संत दिगंबर अहो सिद्ध धरनीश हैं।
रहित परिग्रह आत्म गुणों के ईश हैं॥
ध्यान तथा स्वाध्याय निरत निर्ग्रन्थ हैं।
सहित समाधि साधु चले शिवपंथ हैं॥
(दोहा)
आओ आओ मम हृदय, तिष्ठो श्री मुनिराज।
निकट रहो मेरे सदा, शिवसुख साधन काज॥
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रन्थ दिगंबर मुनिराज ! अत्र अवतर अवतर संवौषट इत्याह्वाननम्।
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रन्थ दिगंबर मुनिराज! अत्र विष तिष्ठ ठः ठः इति स्थापनम्।
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रन्थ दिगंबर मुनिराज ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् इति सन्त्रिधिकरणम्। परिपुष्पाञ्जलिं क्षिपेत।
(अवतार)
तन चेतन भिन्न पिछान, मिथ्यामल विघटे।
हो आत्म तत्व श्रद्धन, समकित तब प्रगटे॥
निजरुप मगन मुनिराज, करते शिव साधन।
रे! जन्म-मरण क्षय काज, जल से आराधन॥
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रथदिगंबरमुनिराजेभ्यो जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
काषायिक भाव विकार, क्लेश तपन भारी।
तुम करो दोष निरवार, समता रस धारी॥
निज ध्यान धरे मुनिराज, शिवरमणी वरने।
चन्दन से वन्दन आज, भव आतप हरने॥
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रथदिगंबरमुनिराजेभ्यो संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
तुम रुप अकम्प अनूप, मानो सिद्ध प्रभो।
अवनि चलते शिवभूप, अंतरमग्न विभो॥
क्षण-क्षण में श्री मुनिराज, आतम रुप लखें।
अक्षय निधि पाने आज, अक्षत चरण रखें॥
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रथदिगंबरमुनिराजेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
चैतन्य चमन चितवंत, सुरभित चित्त अहो।
कंदर्प अंत कर संत, अन्तर व्यापक हो॥
हे ब्रम्हलीन मुनिराज, ऋजुपथ गमन करें।
हो पतित पंचशर राज, पद में सुमन धरें॥
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रथदिगंबरमुनिराजेभ्यो कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
भववास आस का दास, आशाकूप अतल।
तुमको निजरस सुखवास, क्षुत्पीड़ा निर्बल॥
हो परम तृप्त मुनिराज, अनुभव अमिरस से।
व्यंजन से अर्चन आज, साम्य सुधा बरसे॥
ॐ ह्रीं श्री निर्मंथदिगंबरमुनिराजेभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
निज संवेदन प्रचुर प्रकाश, भ्रमतम शेष नहीं।
है ज्ञानभानु अविनाश, संशय लेश नहीं॥
सम्यक् ज्ञानी मुनिराज, मोह तिमिर हरने।
दीपक ले पूजन काज, आया तुम शरने॥
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रथदिगंबरमुनिराजेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
निजरुप करो विश्रांत, प्रतपन चेतन का।
हो निसतरंग चित् शांत, धधकन करमन का॥
तप बल से हे मुनिराज, अंतर शोधन हो।
चित् सुरभित परिणति काज, धूप समर्पण हो॥
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रथदिगंबरमुनिराजेभ्यो अष्टकर्म विध्वंसनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
निज श्रद्धा ज्ञान विराम, अनुपम फल होगा।
साधक का सहज सुधाम, मुक्ति थल होगा॥
बल वह अब दो मुनिराज, तुमसा बन जाऊँ।
फल दिवतरु लाया आज, तुम जस गुण गाऊं॥
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रथदिगंबरमुनिराजेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
(हरिगीत)
मोहमल भवतापकारी, क्षणमरण भावित करें।
निष्काम ऋजुता आतमा की, लख भविक अमृत वरें॥
चेतन प्रकाशित ज्ञप्ति में, सब कर्म संचित ध्वस्त हो।
मुनिनाथ शिवफल हेतु निज में, लीन हो तुम मस्त हो॥
(दोहा)
वीतराग निर्ग्रन्थ हैं, समदर्शी मुनिराज।
अर्चन उत्तम अर्घ्य से, पद अनर्घ्य के काज॥
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रथदिगंबरमुनिराजेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अर्ध्यावली
(छंद त्रोटक)
श्री जिन धुनि सुनि अंतर में गुनि, अंग रचे चुनि धन्य मुनि।
गणधर गुरुवर गुण नायक हैं, श्रुत द्वादश अंग प्रदायक है॥
सब ऋद्धि सिद्धि प्रसिद्धि धरें, जिन ज्ञान चार अवगाह करें।
तीर्थंकर तन तज मोक्ष गहे, तब केवलज्ञान महान् लहे॥
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रन्थमुनिराज गणधरदेवाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(छंद-लक्ष्मीधरा) (नंदीश्वर द्वीप जयमाला)
परिणाम शुद्धि रत्नत्रय आधिक्य से।
संघ नायक हो भव्य के उर बसे॥
गुरु आचार्य के गुण छत्तीस है।
नर-सुर नमत नित चरण धर शीश है॥
ज्ञान-दान दीक्षा जान भवि दक्षता।
परिणाम शोधते प्रायश्चित्तता॥
सूरि नित ज्ञान में ध्यान में रत रहे।
आत्मथिर सूरि शुद्धभाव ते शिव लहे॥
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रन्थमुनिराज आचार्य परमेष्ठिने नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
द्रव्यश्रुत भावश्रुत ज्ञान आधिक्य से।
संघ में शोभते धर्म उपदेश से॥
गुरु उवझाय के गुण पच्चीस है।
अंग-पूर्व-ज्ञान को नमत नत शीश है॥
ज्ञान उद्योत से अज्ञ को बोधते।
मोहभाव को विनाश भव्य आत्म शोधते॥
उवझाय ज्ञान में ध्यान में रत रहे।
आत्मथिर होय शुद्धभाव ते शिव लहे॥
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रन्थमुनिराज उपाध्याय परमेष्ठिने नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
ज्ञान-वैराग्य शांत-भाव आधिक्य से।
गृहवास छोड़ तोड़ मोह कानन बसे॥
साधु मुनिराज के गुण आठबीस है।
नग्न तन शुद्ध मन नमन नत शीश है॥
पल-पल परम भाव को आराधते।
क्षण-क्षण क्षीण संसार सार-साधते॥
सर्वसाधु ज्ञान में ध्यान में रत रहे।
आत्मथिर साधु शुद्ध भाव ते शिव लहे॥
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रन्थमुनिराज साधु परमेष्ठिने नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(हरिगीत)
चैतन्य में थिरता नियत, उपचार द्वादश तप करे।
मुनिराज नित निज आत्मबल से आश-अहि को वश करे॥
करते कषाएं क्षीण अन्तर, बाह्य ऋद्धि हो स्वतः।
मम रत्नत्रय की ऋद्धि हो, अर्चन ऋषिश्वर है अतः॥
ॐ ह्रीं श्री ऋद्धिधर निर्ग्रन्थ मुनिराजाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
निज आत्म सन्मुख जानते हैं, आतमा को शुद्ध केवल।
अंग द्वादश सर्वश्रुत है ज्ञान में जिनके विमल॥
श्रुत केवली परमार्थ से, उपचार से भी जिन कहे।
उन अर्घ्य पूजित गुरुवरों की शरण में हम नित रहें॥
ॐ ह्रीं श्री द्वादशांगपाठी श्रुतकेवली निर्ग्रन्थ मुनिराजाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री सिद्ध प्रभु को नमन कर जिनश्रमण बन कानन बसे।
मुख मौन केवल आत्म-साधन लक्ष्य ले निज रस लसे॥
रे ! तीर्थ के नायक बनेंगे पंच कल्याणक विभूषित।
उन परम गुरु उपदेश से होगा अरे सब जगत् हित॥
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रन्थ तीर्थंकर मुनिराजाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(वीर छंद)
तीन कषाय विनाश मुनिश्वर प्रचुर शांत परिणाम हुए।
अशुभ भाव नहीं लेश शेष संज्वलन उदय शुभ नाम हुए॥
तीव्र उदय वश मूलगुणों की सीमा में सब वृत्ति रही।
रहे विकल्प दशा में किंचित् उनमें पर आसक्ति नहीं॥
ॐ ह्रीं श्री अखंडशुद्धपरिणतिसयुंक्त निर्ग्रन्थ मुनिराजाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
उदय रहा बाहर में केवल, संचेतन में चेतन हो।
ज्ञान-ज्ञेय-ज्ञाता विकल्प नहीं, निश्चल ध्रुव में मग्न अहो॥
निर्द्वद्व निराकुल निर्विकल्प हो, परमसमाधि ध्यान धरें।
रत मुनिवर शुद्धोपयोग में, आनंद अमृत पान करें॥
ॐ ह्रीं श्री स्वानुभवनिरतशुद्धोपयोगी निर्ग्रन्थ मुनिराजाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(छंद-लक्ष्मीधरा)
प्रमत्त से अयोगजिन सर्व आगम कहे,
रत्नत्रय भाव युत् आत्म आनंद लहे।
तीन काल राजते ढाई द्वीप में गुणी,
तीन कम नौ करोड़ भावलिंगी मुनि।
नार-नर-सुर-सुरेंद्र-चक्री चरणदास हैं,
राग-द्वेष-हीन मुनि आप गुणवास हैं।
आप गुण चाहते चरण चित् चर्चते,
अष्ट द्रव्य अर्घ्य ले आपको अर्चते।
ॐ ह्रीं श्री ढाईद्वीपस्थ तीनकमनौकरोडड़ निर्ग्रन्थ मुनिराजाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
परगृह तज निजगृह बसे, वीतराग मुनिराज।
परिग्रह चौबीस भेद तज, तजे सकल जग काज॥
आत्मध्यान आगमपठन, सब जीवन का सार।
और सकल जो वृत्तियां, है इनकी आधार॥
वैरागी निर्ग्रन्थ गुरु, मंगलमय हितकार।
चरण कमल नित पूजतें, उत्तम अर्घ्य संभार॥
ॐ ह्रीं श्री सर्वनिर्ग्रन्थ दिगंबर मुनिराजाय नमः महाअर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
(दोहा)
नगन दिगंबर वेश है, परमशांत परिणाम।
आतम साधन में निरत, मुनिवर गुण के धाम॥
(छंद मानव)
मुनिवर परमेष्ठि पावन, तुम रुप अहो मनभावन।
मुनिवर जिनवर के नन्दन, चरणों में शत-शत वंदन॥
मुनिवर हैं श्रेष्ठ अनुपम, निश्छल मन-तन जिन रुपम।
मुनिवर महिमा हम जानें, मुनिवर स्वरुप पहिचानें॥
पहिले कर भेद विज्ञाना, पर को पर, निज निज जाना।
निज ज्ञान भाव ज्ञायक में, थिर कर अनुभव रस पाना॥
रत्नत्रय उर में धरकर, वैराग्य भावना भाई।
द्वादश अनुप्रेक्षा पावन, चिंतन कर दीक्षा पाई॥
हो नग्न दिगंबर वन में, निर्भय हो मुनि विचरते।
तब बाघ सिंह वनचर भी, चरणों में मस्तक धरते॥
तपते तप शैल शिखर पर, सरिता तट शिशिर कहर पर।
पावस में पादप नीचे, वर्षा जल मस्तक सींचे॥
संयोग कहाँ है दुखकर, समता रस पीते सुखकर।
अरि-मित्र महल-तृणकुटिया, समदृष्टा मुनिवर सुखिया॥
अमृतरस झरती वाणी, है हित-मित-प्रिय कल्याणी।
तत्वों का वर्षण करती, चिर मोहमहातप हरती॥
मुनिवर अंतर में निरंतर, आनंद समामृत पीते।
परभाव अरि आतंकी, भागे सब भीते भीते॥
मोहांश अंत अब करने, मुनिराज चले भव तरने।
शिवनार हार ले कर में, पथ जोह रही अंतर में॥
है धन्य दिगंबर साधक, है धन्य आत्म आराधक।
है धन्य जिनेश्वर मुद्रा, है धन्य धन्य शिव साधक॥
मैं चलूं आपके पथ पर, मैं चलूं मुक्तिपुर रथ पर।
मुनिवर तुम सम बन जाऊँ, मुनिवर तुम सम वन जाऊँ॥
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रन्थ दिगंबर मुनिराजेभ्यो जयमाला पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
आप तिरें पर तारते, दया सिंधु मुनिराज।
सिद्ध धरा पर राजते, तारण तरण जहाज॥
मनिचरणों में नित नमें, चलें चरण के साथ।
मोक्षमहल में पग धरे, वीतराग मुनिनाथ॥
इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत।
समुच्चय महाअर्घ्य
देव शास्त्र गुरु जिनशासन के मंगलमय आधार है।
देव शास्त्र गुरु तीन लोक में सर्वोतम है सार है॥
देव शास्त्र गुरु शरण रहें नित होने भव से पार है।
देव शास्त्र गुरु हृदय रहे मम खुलता मुक्ति द्वार है॥
सम्यक् दर्शन ज्ञान चरण रत्नत्रय के करतार हैं।
सात तत्व छह द्रव्य प्रयोजन भूत ज्ञान दातार है॥
स्व-पर भेद विज्ञान प्रकाशक करें वस्तु निरधार है।
निज आतम ही केवल अपना ज्ञान मात्र सब सार है॥
देव शास्त्र गुरु श्री जिन त्रि रत्न रत्नत्रय के दाता।
देव शास्त्र गुरु श्री जिन त्रि रत्न लोकत्रय विख्याता॥
देव शास्त्र गुरु श्री जिन त्रि रत्न कालत्रय अभिनंदन।
देव शास्त्र गुरु श्री जिन त्रि रत्न योगत्रय से वंदन॥
(दोहा)
श्री जिन त्रि रत्न है, देवागम मुनिराज।
महाअर्घ्य अर्पण करें, पद अनर्घ्य के काज॥
ॐ ह्रीं श्रीमज्जिनेंद्रजिनागमनिर्ग्रथमुनिराजाय अनर्घ्य पद प्राप्ताय समुच्चय महाअर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
समुच्चय जयमाला
(छंद हरिगीत)
हे देव तुम सब राग द्वेष विकार हर अरहंत हो।
सब द्रव्य गुण पर्याय को तुम जानते भगवंत हो॥
सर्वांग से ओंकार मय प्रभु दिव्य ध्वनि दातार हो।
तिहुंलोक के हितकार हो अज्ञानतम हरतार हो॥
हूँ अज्ञ मैं जिनराज अब तक आपको जाने बिना।
मैं कौन हूँ पर कौन है यह भेद पहिचाने बिना॥
सुख प्राप्ति हेतु जो सहे तुम जानते सब संत हो।
अब आपकी आया शरण भवकष्ट सब ही अंत हो॥
हे दिव्यवाणी तीर्थ के करतार की तुम तीर्थ हो।
तुम तारती भवसिंधु से हो भव्यजन को तीर्थ हो॥
अनुयोग चारों अंग बारह पोषते वीतराग को।
वे सूत्र हो या छंद हों वे पोषते वीतराग को॥
मैं अज्ञ हूँ हे मात अब तक तत्व से अनजान हूँ।
सब नय प्रमाणों न्याय युक्ति तर्क से अनजान हूँ॥
तुम स्यात् पद अंकित अहो अविरोध सर्व सुभंत हो।
मैं हूँ शरण में आपकी भ्रम मोह संशय अंत हो॥
हे मुनिश्वर विपिनवासी वीतरागी वंद्य हो।
निर्ग्रन्थ हो निर्बंध हो निर्दोष निर्भय नंद्य हो॥
जग में विरागी जगत् से धरणी विचरते सिद्ध हो।
एकात्म प्रिय एकांत प्रिय हो तीनलोक प्रसिद्ध हो॥
संयोग दृष्टि देखता मैं कष्ट में मुनिनाथ को।
वे भोगते हैं सुख प्रचुर निज आत्म-अनुभव साथ हो॥
निज ध्यान आगम गमन में हो मगन महिमावंत हो।
मैं हूँ शरण में हे मुनि चिरमोह का अब अंत हो॥
जिनदेव आगम जिनमुनि आदर्श है सब सार है।
जिनदेव आगम जिनमुनि मेरे हृदय के हार है॥
जिनदेव आगम जिनमुनि ही मुक्तिपथ आधार है।
जिनदेव आगम जिनमुनि आराधना शत बार है॥
ॐ ह्रीं श्रीमज्जिनेंद्रजिनागमनिर्ग्रथमुनिराजाय अनर्घ्य पद प्राप्ताय समुच्चय जयमाला पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा
(दोहा)
तीन जगत् में पूज्य है, देव शास्त्र गुरु तीन।
तीन वचन मन काय से, वंदन कालों तीन॥
देवागम मुनिराज की, महिमा अपरम्पार।
लघु मुख से कैसे कहें, सर्व सुगुण विस्तार॥
अल्प शक्ति कुछ शब्द से, हुआ वचन व्यवहार।
भूल-चूक सब हो क्षमा, प्रणमें बारंबार॥
इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत।
Artist: राजेश कासलीवाल, उज्जैन
स्रोत: श्री जिन त्रिरत्न मंडल विधान
प्रूफरीडिंग बाकी है