श्री जिन त्रिरत्न मंडल विधान | Shri Jin Triratna Mandal Vidhan

मंगलाचरण

(दोहा)

मंगलमय जिनदेव हैं, जिनश्रुत मंगलकार ।
मंगलमय निर्ग्रन्थ गुरु, जिनशासन आधार ॥
(बसंततिलका)
श्रीमज्जिनेंद्र अरहंत प्रभु नमस्ते ।
वस्तुस्वरुप दिग्बोधिनि मां नमस्ते ।
वैराग्य वंत जिन संत गुरु नमस्ते ।
त्रिरत्न रत्नत्रय दायक हो नमस्ते ।

(दोहा)

वीतराग सर्वज्ञ हैं, सर्व हितंकर मान ।
ज्ञान दर्श सुख वीर्य युत्, नंत चतुष्टय जान ॥
दिव्यध्वनि दातार है, भविजन को सुखकार ।
श्री अरहंत जिनेश को, वंदन बारंबार ॥
जिनश्रुत द्वादश अंगमय, मुक्तिमार्ग दर्शाय ।
अनेकांतमय वस्तु को, स्याद्वाद समझाय ॥
नय प्रमाण निक्षेप से, अर्थ वस्तु विस्तार ।
नमन करें जिनवचन जो, भवदधि शोषणहार ॥
भू पर चलते सिद्ध सम, ज्ञान ध्यान मय संत ।
देह दिगंबर अरन में, अंतर आनंद वंत ॥
परिग्रह तज निज संपदा, भोग रहे मुनिराय ।
तीन गुप्ति धरनार को, वन्दें मनवचकाय ॥

(सोरठा)

मंगल रचें विधान, देवशास्त्रगुरु पूजने ।
करते हैं गुणगान, मन में उत्सव धारकर ।
इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत।

श्रीमद् जिनेंद्र देव पूजन

स्थापना

(दोहा)

वीतराग विज्ञानमय, श्रीमद् देव जिनेश ।
गुण समूह धरनार हो, दोष नही लवलेश ॥

(वीर छंद)

जिसकी प्रज्ञा में आलोकित लोक अलोक सभी तिहुंकाल ।
जिन चरणों में नित नत रहते विश्व विजेता उन्नत भाल ।
जिसको राग नहीं अनुकूलों प्रतिकूलों में द्वेष नहीं ।
आओ हे जिन ! अत्रो तिष्ठो मेरे अन्तर-देश-मही ।

ॐ ह्रीं श्रीमद्जिनेंद्रदेव ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् इत्याह्वाननम् ।
ॐ ह्रीं श्रीमद्जिनेंद्रदेव ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः इति स्थापनम् ।
ॐ ह्रीं श्रीमद्जिनेंद्रदेव ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् इति सन्निधिकरणम् परि पुष्पांजलि क्षिपेत ।

हूँ चेतन पर जड़ तन को निज मान भटकता भववन में ।
हर जन्म मिले नूतन तन में मैं मग्न रहा अपनेपन में ।
मैं मरण मान निज आतम का व्याकुल वियोग में पछताया ।
हो आत्मबोध से जन्म-मरण क्षय जल ले चरणों में आया ।

ॐ ह्रीं श्रीमद्जिनेंद्रदेव जन्म-जरा-मृत्यु-रोगविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

आत्म रुचि बिन पर परभावों में रुष्ट हुआ मैं कुपित हुआ ।
निज-पर में कर्तृत्व मान आकुल व्याकुल हो तपित हुआ ।
मलयज से प्रभु तुम शीतल हो शीतलता मुझको मिल जावे ।
चन्दन चरणों में अर्पण है भवताप-भयंकर मिट जावे ।

ॐ ह्रीं श्रीमद्जिनेंद्रदेव संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।

स्वाधीन स्वयंभू स्व-पर सभी संपूर्ण जगत की सब सत्ता ।
अरे ! मान का स्थान कहाँ सुंदरतम यह विश्व व्यवस्था ।
निज सत्ता में लीन हुए हो अक्षय अविनाशी पद पाया ।
अक्षय पद का अभिलाषी मैं अक्षत अतएव चरण लाया ।
ॐ ह्रीं श्रीम‌जिनेंद्रदेव अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।

निष्काम ब्रम्ह में मग्न हुए हो काम कहाँ क्या कुटिल काम का ।
चिद्पुष्पों से अरे महकता तेरा आंगन मोक्षधाम का ।
मैं मायावी मार कंटकों की छलना से छला हुआ ।
सुमनों से अर्चित चरण तुम्हारे पाकर हे प्रभु भला हुआ ।
ॐ ह्रीं श्रीम‌जिनेंद्रदेव कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

आनंद अमी से तृप्त हुए हो भाव क्षुधा क्षय कर जिनवर ।
मैंने तृष्णा से व्याकुल होकर खाए व्यंजन भर-भर कर ।
यह लोक अनंती होकर भी इच्छा खंदक ना भर पाए ।
इससे अच्छा है हे प्रभुवर इच्छा का अंत अरे आए ।
ॐ ह्रीं श्रीमजिनेंद्रदेव क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अज्ञान अमा की घोर तमिस्त्रा प्रज्ञा का अंत न कर पाई ।
चिन्मय रश्मि यों रही अखंडित कर्मकटक ना हर पाई ।
अतएव इसी लघु अर्चि से अर्चन करता हूँ मैं स्वामी ।
हे ज्ञानभानु मम अंतरतम को जगमग कर दो अभिरामी ।
ॐ ह्रीं श्रीम‌जिनेंद्रदेव मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

प्रभु धवल ध्यान की शुभ्र अनल से चिद्विकृत सब ध्वस्त हुए ।
चैतन्य सदन की निर्मल मारुत सौरभ से तुम मस्त हुए ।
भाव विशुद्धि की अभिलाषा तेरे दर पर ले आई ।
लेकर दशांग यह धूप मनोहर भक्ति भावना महकाई ।
ॐ ह्रीं श्रीम‌जिनेंद्रदेव अष्टकर्मविनाशनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।

द्रव्य गुणों से सब भगवन तुम परिणति में गुणधाम हुए ।
आत्म साधना का अनुपम फल द्रव्य यथा परिणाम हुए ।
पर-द्रव्य-भाव से अरे सुखों के यत्न सभी निष्फल पाए ।
तुम पूर्ण निराकुल हो जिनवर अतएव चरण में फल लाए ।
ॐ ह्रीं श्रीमद्जिने॑द्रदेव मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।

आत्मबोध हो आत्मरुचि हो अक्षय सत्ता निज पहिचानें ।
निष्काम ब्रम्ह का आलंबन हो आनंद अमी निज रस पाने ।
ज्ञानभानु से जगमग अंतर धवल ध्यान से शिवफल पाएं ।
यों तेरे पथ पर करें गमन हम पद अनर्घ्य को पा जाएं ।
ॐ ह्रीं श्रीमद्जिनेन्द्रदेव अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अर्ध्यावली

(नाराच छंद)

इष्ट या अनिष्ट कोई द्रव्य ना भाव ना ।
हेर-फेर हानि-लाभ वस्तु का स्वभाव ना ।
राग द्वेष क्लेश नाश आप भगवंत हो ।
वीतराग श्री जिनेश आप अरहंत हो ।
ॐ ह्रीं श्री वीतराग जिन अरहंत देवाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

दीप्त त्रैलोक्य-काल आप ज्ञानभान ते ।
द्रव्य गुण परिणाम आप सब जानते ।
आप में थिर सदा आत्म ज्ञानवंत हो ।
देव सरवज्ञ जिन आप अरहंत हो ।
ॐ ह्रीं श्री सर्वज्ञ जिन अरहंत देवाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जीव मात्र लोक के आप हितकार हो ।
मुक्ति हेत देशना-दिव्य दातार हो ।
राग बिन आप ही नाथ कृपावंत हो ।
हे हितोपदेश प्रभु आप अरहंत हो ।
ॐ ह्रीं श्री हितोपदेश जिन अरहंत देवाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

कर्म-घाति विनाश भावमुक्त हो प्रभो ।
भाव-पर त्याग समभाव युक्त हो विभो ।
ज्ञान दरशन अनंत सुख वीर्यवंत हो ।
वैभवी चतुष्क धर आप अरहंत हो ।
ॐ ह्रीं श्री अनंत चतुष्टययुक्त अरहंत देवाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
छत्रतीन रत्न-आसन चंवर दुंदुभी ।
पुष्पवर्षा अशोक दिव्य ध्वनि और भी ।
भामंडल सहित प्रातिहार्य वंत हो ।
पुण्य फल बाह्य ये आप अरहंत को ।
ॐ ह्रीं श्री अष्टप्रातिहार्ययुक्त अरहंत देवाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जन्म के ज्ञान के दश-दश हैं कहें ।
चतुर्दश देवकृत कुल चौंतीस है ।
शुभ अतिशय धर तीर्थ के कंत हो ।
पुण्य फल बाह्य ये आप अरहंत को ।
ॐ ह्रीं श्री चौंतीस अतिशय युक्त अरहंत देवाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
क्षुत् तृषा भय जरा शोक मोह क्रोध मान ।
लोभ छल स्वेद खेद मद रति आदि जान ।
अष्ट-दश दोष हीन महा गुणवंत हो ।
एक मात्र लोक में आप अरहंत हो ।
ॐ ह्रीं श्री अष्टादशदोषरहित अरहंत देवाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दान लाभ भोग उपभोग वीर्य आप्त को ।
समकित ज्ञान दर्श चरण को प्राप्त हो ।
लब्धियां नव कही केवली संत को ।
शुद्ध परिणाम युत् आप अरहंत हो ।
ॐ ह्रीं श्री नवकेवललब्धिसंयुक्त अरहंत देवाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

तीन काल मध्य लोक केवली जिन कहे ।
एक क्षण को नहीं लोक जिन बिन रहे ।
जैन शासन सदा काल जयवंत हो ।
लोक नायक अहो आप अरहंत हो ।
ॐ ह्रीं श्री सदाकालजयवंत अरहंत देवाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(दोहा)

त्रिभुवन तिलक जिनेश की, महिमा अगम अपार ।
निज स्वरुप में मग्न हो, किया भवार्णव पार ॥
सकल जगत को जानते, रहते हैं अविकार ।
दिव्य ध्वनि उपदेश से करते हैं उपकार ॥
श्री जिन रुप विचारिके, निज आतम को ध्याय ।
अर्घ्य उन्हें अर्पण करें, जो शिवपुर पहुंचाय ॥
ॐ ह्रीं श्री अरहंत देवाय नमः महाअर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

(दोहा)

मुक्तिमार्ग प्रणेता हो, भेद कर्मगिरि खेत ।
विश्वतत्व सकल ज्ञाता, वंदें तुम गुण हेत ।

(चौपाई)

जय जिन वीतराग विख्याता, जय जिन सकल ज्ञेय के ज्ञाता ।
जय जिन नंत चतुष्टय धारी, जय जिन दिव्यध्वनि विस्तारी ।
जय जिन जीव समान बताए, जय जिन मोक्ष उपाय बताए ।
जय जिन कर्म सभी दल आए, जय जिन मोक्ष पंथ चल आए ।
जय जिन सप्ततत्व सरधाना, जिय तन को तब भिन्न पिछाना ।
देव शास्त्र गुरु दृढ़तर माना, निज आतम अनुभव रसपाना ।
भाव शुभाशुभ क्षय कर दीना, शुद्धभाव निज चित में लीना ।
निज आतम साधन से स्वामी, हे जिन आप हुए गुणधामी ।

जय जिन सर्व कषाय विनाशी, ज्ञानानंद रहो अविनाशी ।
जय सब दोष अठारह अंता, जय नव केवल लब्धि लहंता ।
गणधरादि मुनि चरण जजें हैं, सुरपति नरपति नित्य भजें हैं ।
जिनशासन तिहुंजग जयवंता, तीर्थ प्रवर्तक श्री अरहंता ।
जय जिन तीन भुवन के स्वामी, जय जिन अंतर्मुख अभिरामी ।
जय जिन शांत छवि तुम प्यारी, भविजन को मन मोदन कारी ।
तुम गुण द्रव्य परिणति जाने, वह निज आतम को पहिचाने ।
मोह महारिपु लय हो जावे, सम्यक रत्नत्रय पथ पावे ।
ॐ ह्रीं श्रीमद्जिनेंद्रदेव अनर्घ्यपदप्राप्तये जयमाला पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

(दोहा)

सुरासुर नरेंद्र वंदित, घाति कर्ममल हीन ।
धर्म तीर्थ करतार जिन, प्रणमन नित्य नवीन ।
इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत।

श्री जिनवाणी माता पूजन

स्थापना

(दोहा)

श्री जिनवर की देशना, वाङ्मय श्रुत सिद्धांत ।
आगम नाम अनेक है, अर्थ तत्व वृत्तांत ।

(हरिगीत)

मोहोपचय क्षय कारिणि, वाणी जिनेश्वर वादिनी ।
सर्वज्ञ की अनुसारिणि, पथधारिणि सुख साधनी ॥
अज्ञान तम हरिणि अबाधित, अर्थ-तत्व प्रकाशिनी ।
हे ! स्यात् पद धरणि विराजो, आन हृदय सुवासिनी ॥
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखो‌द्भवसरस्वतिवाग्वादिनि ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् इत्याह्वाननम् ।
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखो‌द्भवसरस्वतिवाग्वादिनि ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः इति स्थापनम् ।
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखो‌द्भवसरस्वतिवाग्वादिनि ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम् परिपुष्पाञ्जलि क्षिपेत।

(वीर छंद)

तन में तन्मय रहकर चिन्मय, चिरकाल चहुंगति भरमाया ।
रे ! अमर जान हर जन्म अरे मैं, मरण काल में पछताया ।
श्रुत सरिता का पावन जल, मिथ्या मल मर्दन कर देता ।
चैतन्य निलय को स्वच्छ बना, भ्रमजाल चिरंतन हर लेता ।
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखो‌द्भवसरस्वतीदेव्यै जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

इच्छा पर में परिवर्तन की, मन आकुल व्याकुल कर देती ।
तुम सहज व्यवस्था बता लोक की, व्यथा-व्यर्थ-की हर लेती ।
नित चन्दन से वंदन वांग्मय, सत्वर सब दूर दुरिततप हो ।
रे ! चंद्रश्रुति सम आतप हर, हे शारद शांत भवातप हो ।
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्यै संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।

उत्पाद भंग के संग सदा ध्रुव, सत्ता का उद्घोषण है ।
पर-द्रव्य-भाव अथिर सयोंगी, नहीं आप का पोषण है ।
क्षणिक भाव से भेदज्ञान कर, अक्षय का अवलंबन हो ।
हे आप्त वचन अक्षत अर्पण, अब भावमरण परसंग न हो ।
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखो‌द्भवसरस्वतीदेव्यै-अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।

पीयूष समझ विषमय विषयों को विपदा विकट निकट पाई ।
श्री जिनवचन सुधामृत पाकर बेचेत चेतना हरषाई ।
श्रुत आंगन के मधुपुष्पों की सौरभ सम्यक आमंत्रण ।
कपट काम की कटु कुवास का हो निर्वासन रे तत्क्षण ।
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखो‌द्भवसरस्वतीदेव्यै कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

कण भर पर-भक्षण शक्य नहीं, इच्छा पर जग को कण कहती ।
अनभिज्ञ स्वयं निज वैभव से, पर-लिप्सा हर क्षण-क्षण रहती ।
षटरस व्यंजन से अर्चित जिन प्रवचन आनंद वर देता ।
निज आत्म-अनुभव अमृतरस क्षुत्पीड़ा अंतस हर लेता ।
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखो‌द्भवसरस्वतीदेव्यै क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

कैवल्य कलम से आलेखित रे शोधग्रंथ शुद्धातम के ।
हे मुक्तिपंथ के दीपथंभ चिर वांछ अंत मिथ्यातम के ।
संस्तवन हेतु यह रत्नदीप कर में धर मंगलगान करें ।
संशय विभ्रम व्यामोह नाश हे जिनश्रुत केवलज्ञान वरें ।
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्यै मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

वर्तन में नर्तन करते रे परभाव कर्म से प्रीत करे ।
मेरे चिद् आंगन को कलुषित करते ये रिपु के मीत अरे ।
विधि-विध्वंसन विधि वांग्मय से पा पावन परिणति हो जावे ।
अतएव अगर का अवलंबन ले अर्हत्-वाणी अर्चावें ।
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्यै अष्टकर्मविध्वंसनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।

कण-कण परखा क्षण-क्षण चाहा सुख का कण क्षण-भर पर न मिला ।
बस एक निजातम ज्ञान बिना श्रम-फल मृगजल सम ही निकला ।
आया अब तेरी शरण शारदे शुद्धात्म ज्ञान का संबल दो ।
निज आत्मसाधना से रत्नत्रय सुखमय मोक्ष महाफल हो ।
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखो‌द्भवसरस्वतीदेव्यै मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।

आगम का सेवन कर परमातम हूँ मैं नक्की निश्चय हो ।
युक्ति का आलंबन करके हूँ परमातम मैं निर्णय हो ।
पर-अपर गुरु उपदेश मिले हूँ परमातम मैं अनुभव हो ।
अविरल आनंद झरे परिणति में निज वैभव का उद्भव हो ।
हे परमागम पावन पीयूष परिणति ध्रुव अचल अनुपम हो ।
हे दिव्य वचन तीर्थंकर के अर्चन हित अर्घ्य निरुपम हो ।
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखो‌द्भवसरस्वतीदेव्यै अनर्घ्यपदप्राप्तये-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

अर्ध्यावली

(छंद गीता)

समवसरण के मध्य में श्री जिन विराजे अधर में ।
ओंकार वाणी सब प्रदेशों से झरे बिन-अखर में ।
निज भाष में समझे अहो सुर नर पशु के जीव गण ।
अर्घ्य से अर्चन करें ध्वनि दिव्य का प्रत्येक क्षण ।
ॐ ह्रीं श्री जिनवरदेशना जिनश्रुतेभ्यो नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जिनदेशना को कर श्रवण, अंतरमहुरत काल में ।
गणधर रचे जिनश्रुत अहो, निजज्ञान उन्नत भाल में ।
अंग एकादश तथा, पूरब चतुर्दश भेद हैं ।
ये अंग द्वादश अर्घ्य पूजित, हर रहे भवि खेद है ।
ॐ ह्रीं श्री द्वादशांगजिनश्रुतेभ्यो नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(छंद भुजंगप्रयात)

महाभाग पुरुषों का जीवन बतावे, परिणाम फल शुभ-अशुभ के दिखावे ।
चले रत्नत्रय पथ लही मुक्ति कैसे, कथा के अनुयोग कहते हैं वैसे ।
कथन में भले हो अलंकार भाषा, किये हो प्रशंसा बहु पुण्य राशा ।
अहो वीतरागी परिणाम का ही, प्रयोजन सदा है अनुयोग माही ।
ॐ ह्रीं श्री प्रथमानुयोग जिनश्रुतेभ्यो नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
परिणाम सूक्षम करे जीव जैसे, बंधे कर्म थितियां अनुभाग वैसे ।
कथन मार्गणा के गुणस्थान के सब, त्रिलोकादि रचना गति कौन सी कब ।
केवली गम्य वचन सूक्ष्म करते, नही-तर्क आज्ञाप्रधानी सुमरते ।
अहो वीतरागी परिणाम का ही, प्रयोजन सदा है अनुयोग माही ।
ॐ ह्रीं श्री करुणानुयोग जिनश्रुतेभ्यो नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

मुनिराज श्रावक करें आचरण जो, महाव्रत अणुव्रत करें वे वरण जो ।
अरे देह आश्रित जो संयम बतावे, व्यवहार नय से धरम नाम पावे ।
नियत रत्नत्रय के जो सहचर रहे हैं, कथन इन सभी का जिनागम कहे हैं।
अहो वीतरागी परिणाम का ही, प्रयोजन सदा है अनुयोग माही ।
ॐ ह्रीं श्री चरणानुयोग जिनश्रुतेभ्यो नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
छहों द्रव्य गुण का परिणाम भी का, कथन सात तत्वों पदारथ सभी का ।
स्व-पर भेद लखकर निजातम की श्रद्धा, अहो ज्ञान रमना कथन मुक्ति पथ का ।
करे न्याय तर्कों से वस्तु की सिद्धि, प्रमाणों नयों से सदा सत् प्रसिद्धि ।
अहो वीतरागी परिणाम का ही, प्रयोजन सदा है अनुयोग माही ।
ॐ ह्रीं श्री द्रव्यानुयोग जिनश्रुतेभ्यो नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(सोरठा)

अनेकांतमय अर्थ, स्याद्वाद शैली कथन ।
कहने की सामर्थ्य, श्रुत को पूजें अर्घ्य से ।
ॐ ह्रीं श्री अनेकांतप्रकाशक स्याद्वादशैली जिनश्रुतेभ्यो नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पूर्वापर अविरोध, जिनश्रुत के सिद्धांत सब ।
अर्थ तत्व का बोध, लेकर पूजें अर्घ्य से ।
ॐ ह्रीं श्री पूर्वापर अविरोध जिनश्रुतेभ्यो नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(दोहा)

जिनवाणी नितबोधिनी, करें आत्मकल्याण ।
अर्घ्य अमोलक से जजें, मिले दुखों से त्राण ।
ॐ ह्रीं श्री नित्यबोधिनी जिनश्रुतेभ्यो नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(छंद हरिगीतिका)

श्री वीर वाणी से प्रवाहित श्रुत बहा बस ज्ञान में ।
आचार्य श्री धरसेन स्वामी थे विचरते ध्यान में ।
इस काल के रे अंत तक कैसे रहेगा वांग्मय ।
तब पुष्पदंत रु भूतबली को योग्य जाने शिष्य द्वय ।
ज्येष्ठ सुदि शुभ पंचमी षटखंड-आगम अवतरे ।
धवल आदि महान टीका प्रथम श्रुत भावों भरे ।
ॐ ह्रीं श्री जिनप्रथमश्रुतस्कंधेभ्यो नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री कुंदकुंद महान थे आचार्य इस कलिकाल में ।
देखा उन्होंने इस जगत में जीव हैं भ्रमजाल में ।
लाए सीमंधर देशना पीयूष परमागम दिये ।
रे भाग्य अरु पुरुषार्थ जिनका है प्रबल भर-भर पिएं ।
प्रवचन समय पंचास्ति आदिक और भी पाहुड गढ़े ।
रे सूरी श्रमणों कृत सभी जिन सूत्र हम निजहित पढ़ें ।
ॐ ह्रीं श्री जिन‌द्वितीयश्रुतस्कंधेभ्यो नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(दोहा)

ओंकारमय जिनधुनि, गणधर गूंथे अंग ।
ग्रंथ रचे निर्ग्रन्थ ने, करें मोह को भंग ।
वीतराग विज्ञानमय, है चारों अनुयोग ।
समझें तत्व पदार्थ को, करके थिर उपयोग ।
सर्व जगत सुखकारिणी, जिनवाणी हितकार ।
अष्ट द्रव्य मय अर्घ्य ले, वन्दें बारंबार ।
ॐ ह्रीं श्री जिनश्रुतेभ्यो नमः महाअर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

(दोहा)

वीतराग सर्वज्ञ के, श्री जिन वचन महान ।
विनय भाव चित धार कर, पावें निर्मल ज्ञान ।

(छंद लक्ष्मीधरा)

वीतराग देव की दिव्यध्वनि सार है ।
ज्ञान कैवल्य के दर्श अनुसार है ।
इष्ट और सत्य है दिव्य वाणी सही ।
जीव मात्र हित हेत जैन वाणी कही ।

काल अंतर महुरत रचना करे ।
देव गणधर अहो अंग द्वादश अरे ।
अंग-अंग ज्ञान के संग सुख भेंट ही ।
जीव मात्र हित हेत जैन वाणी कही ।

सूरी मुनि ज्ञानी निर्ग्रन्थ ग्रंथकार है ।
विश्व तत्व को विलोकि आत्मतत्व सार है ।
शब्द-शब्द सार है पद-पद में वही ।
जीव मात्र हित हेत जैन वाणी कही ।

कथा, सिद्धांत के, चरण के, द्रव्य के ।
तीर्थ की भेंट है हाथ में भव्य के ।
पोषते अनुयोग वीतराग भाव ही ।
जीव मात्र हित हेत जैन वाणी कही ।

विश्व में वस्तुएं हैं अनेकांत मय ।
स्याद्वाद से कहे प्रमाण निक्षेप नय ।
तर्क न्याय युक्ति से साध्य सिद्धि सही ।
जीव मात्र हित हेत जैन वाणी कही ।

सात तत्व द्रव्य छः सब कहे पदार्थ नव ।
जान निज अर्थ हेत अर्थ को मेट भव ।
वस्तु व्याख्यान ये और विश्व में नहीं ।
जीव मात्र हित हेत जैन वाणी कही ।

जीव चिरकाल भव-भव-भ्रमण भोगता ।
भोगता क्लेश था द्वेष राग रोग था ।
भांति-भांति भ्रांति में शांति थी कब लही ।
जीव मात्र हित हेत जैन वाणी कही ।

सर्व संशय विभ्रम मोह मेटने
वाद का अंत कर समाधान भेंटने ।
है समर्थ वीतराग ध्वनि बस एक ही ।
जीव मात्र हित हेत जैन वाणी कही ।

राज-भोग-चोर-नार चार कुकथा निवार ।
जैन श्रुत करो विचार रत्नत्रय मार्ग धार ।
आत्मबोध एक सार सर्व आगम महीं ।
जीव मात्र हित हेत जैन वाणी कही ।

मार्ग दुख-मोक्ष का मार्ग सम्यक्त्व है ।
मार्ग भव-भेद का भेद ज्ञान तत्व है ।
मार्ग में चरण धर वरण शिव की मही ।
जीव मात्र हित हेत जैन वाणी कही ।

ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्यै अनर्घ्यपदप्राप्तये जयमालापूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

(दोहा)

जीव मात्र हितकारिणी, श्री जिनवाणी मात् ।
पढ़ें सुनें चित् में धरें, तीर्थ वचन विख्यात ।
नितप्रति पूजन अर्चना, नितप्रति करें प्रणाम ।
अष्ट द्रव्य से पूजकर, श्रद्धें आठो याम ।

इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत।

श्री दिगंबर मुनिराज पूजन

(अडिल्ल)

संत दिगंबर अहो सिद्ध धरनीश हैं ।
रहित परिग्रह आत्म गुणों के ईश हैं ।
ध्यान तथा स्वाध्याय निरत निर्ग्रन्थ हैं ।
सहित समाधि साधु चले शिवपंथ हैं ।

(दोहा)

आओ आओ मम हृदय, तिष्ठो श्री मुनिराज ।
निकट रहो मेरे सदा, शिवसुख साधन काज ।
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रन्थ दिगंबर मुनिराज ! अत्र अवतर अवतर संवौषट इत्याह्वाननम् ।
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रन्थ दिगंबर मुनिराज! अत्र विष तिष्ठ ठः ठः इति स्थापनम् ।
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रन्थ दिगंबर मुनिराज ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् इति सन्त्रिधिकरणम् । परिपुष्पाञ्जलिं क्षिपेत।
(अवतार)
तन चेतन भिन्न पिछान, मिथ्यामल विघटे ।
हो आत्म तत्व श्रद्धन, समकित तब प्रगटे ।
निजरुप मगन मुनिराज, करते शिव साधन ।
रे! जन्म-मरण क्षय काज, जल से आराधन ।
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रथदिगंबरमुनिराजेभ्यो जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
काषायिक भाव विकार, क्लेश तपन भारी ।
तुम करो दोष निरवार, समता रस धारी ।
निज ध्यान धरे मुनिराज, शिवरमणी वरने ।
चन्दन से वन्दन आज, भव आतप हरने ।
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रथदिगंबरमुनिराजेभ्यो संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
तुम रुप अकम्प अनूप, मानो सिद्ध प्रभो ।
अवनि चलते शिवभूप, अंतरमग्न विभो ।
क्षण-क्षण में श्री मुनिराज, आतम रुप लखें ।
अक्षय निधि पाने आज, अक्षत चरण रखें ।
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रथदिगंबरमुनिराजेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।

चैतन्य चमन चितवंत, सुरभित चित्त अहो ।
कंदर्प अंत कर संत, अन्तर व्यापक हो ।
हे ब्रम्हलीन मुनिराज, ऋजुपथ गमन करें ।
हो पतित पंचशर राज, पद में सुमन धरें ।
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रथदिगंबरमुनिराजेभ्यो कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

भववास आस का दास, आशाकूप अतल ।
तुमको निजरस सुखवास, क्षुत्पीड़ा निर्बल ।
हो परम तृप्त मुनिराज, अनुभव अमिरस से ।
व्यंजन से अर्चन आज, साम्य सुधा बरसे ।
ॐ ह्रीं श्री निर्मंथदिगंबरमुनिराजेभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

निज संवेदन प्रचुर प्रकाश, भ्रमतम शेष नहीं ।
है ज्ञानभानु अविनाश, संशय लेश नहीं ।
सम्यक ज्ञानी मुनिराज, मोह तिमिर हरने ।
दीपक ले पूजन काज, आया तुम शरने ।
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रथदिगंबरमुनिराजेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

निजरुप करो विश्रांत, प्रतपन चेतन का ।
हो निसतरंग चित् शांत, धधकन करमन का ।
तप बल से हे मुनिराज, अंतर शोधन हो ।
चित् सुरभित परिणति काज, धूप समर्पण हो ।
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रथदिगंबरमुनिराजेभ्यो अष्टकर्म विध्वंसनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।

निज श्रद्धा ज्ञान विराम, अनुपम फल होगा ।
साधक का सहज सुधाम, मुक्ति थल होगा ।
बल वह अब दो मुनिराज, तुमसा बन जाऊं ।
फल दिवतरु लाया आज, तुम जस गुण गाऊं ।
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रथदिगंबरमुनिराजेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।

(हरिगीत)

मोहमल भवतापकारी, क्षणमरण भावित करें ।
निष्काम ऋजुता आतमा की, लख भविक अमृत वरें ।
चेतन प्रकाशित ज्ञप्ति में, सब कर्म संचित ध्वस्त हो ।
मुनिनाथ शिवफल हेतु निज में, लीन हो तुम मस्त हो ।

(दोहा)

वीतराग निर्ग्रन्थ हैं, समदर्शी मुनिराज ।
अर्चन उत्तम अर्घ्य से, पद अनर्घ्य के काज ।
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रथदिगंबरमुनिराजेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अर्ध्यावली

(छंद त्रोटक)

श्री जिन धुनि सुनि अंतर में गुनि, अंग रचे चुनि धन्य मुनि ।
गणधर गुरुवर गुण नायक हैं, श्रुत द्वादश अंग प्रदायक है ।
सब ऋद्धि सिद्धि प्रसिद्धि धरें, जिन ज्ञान चार अवगाह करें ।
तीर्थंकर तन तज मोक्ष गहे, तब केवलज्ञान महान लहे ।
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रन्थमुनिराज गणधरदेवाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(छंद-लक्ष्मीधरा) (नंदीश्वर द्वीप जयमाला)
परिणाम शुद्धि रत्नत्रय आधिक्य से ।
संघ नायक हो भव्य के उर बसे ।
गुरु आचार्य के गुण छत्तीस है ।
नर-सुर नमत नित चरण धर शीश है ।
ज्ञान-दान दीक्षा जान भवि दक्षता ।
परिणाम शोधते प्रायश्चित्तता |
सूरि नित ज्ञान में ध्यान में रत रहे ।
आत्मथिर सूरि शुद्धभाव ते शिव लहे ।
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रन्थमुनिराज आचार्य परमेष्ठिने नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

द्रव्यश्रुत भावश्रुत ज्ञान आधिक्य से ।
संघ में शोभते धर्म उपदेश से ।
गुरु उवझाय के गुण पच्चीस है ।
अंग-पूर्व-ज्ञान को नमत नत शीश है ।
ज्ञान उद्योत से अज्ञ को बोधते ।
मोहभाव को विनाश भव्य आत्म शोधते ।
उवझाय ज्ञान में ध्यान में रत रहे ।
आत्मथिर होय शुद्धभाव ते शिव लहे ।
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रन्थमुनिराज उपाध्याय परमेष्ठिने नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
ज्ञान-वैराग्य शांत-भाव आधिक्य से ।
गृहवास छोड़ तोड़ मोह कानन बसे ।
साधु मुनिराज के गुण आठबीस है ।
नग्न तन शुद्ध मन नमन नत शीश है ।
पल-पल परम भाव को आराधते ।
क्षण-क्षण क्षीण संसार सार-साधते ।
सर्वसाधु ज्ञान में ध्यान में रत रहे ।
आत्मथिर साधु शुद्ध भाव ते शिव लहे ।
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रन्थमुनिराज साधु परमेष्ठिने नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(हरिगीत)

चैतन्य में थिरता नियत, उपचार द्वादश तप करे ।
मुनिराज नित निज आत्मबल से आश-अहि को वश करे ।
करते कषाएं क्षीण अन्तर, बाह्य ऋद्धि हो स्वतः ।
मम रत्नत्रय की ऋद्धि हो, अर्चन ऋषिश्वर है अतः ।
ॐ ह्रीं श्री ऋद्धिधर निर्ग्रन्थ मुनिराजाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
निज आत्म सन्मुख जानते हैं, आतमा को शुद्ध केवल ।
अंग द्वादश सर्वश्रुत है ज्ञान में जिनके विमल ।
श्रुत केवली परमार्थ से, उपचार से भी जिन कहे ।
उन अर्घ्य पूजित गुरुवरों की शरण में हम नित रहें ।
ॐ ह्रीं श्री द्वादशांगपाठी श्रुतकेवली निर्ग्रन्थ मुनिराजाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री सिद्ध प्रभु को नमन कर जिनश्रमण बन कानन बसे ।
मुख मौन केवल आत्म-साधन लक्ष्य ले निज रस लसे ।
रे ! तीर्थ के नायक बनेंगे पंच कल्याणक विभूषित ।
उन परम गुरु उपदेश से होगा अरे सब जगत हित ।
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रन्थ तीर्थंकर मुनिराजाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(वीर छंद)

तीन कषाय विनाश मुनिश्वर प्रचुर शांत परिणाम हुए ।
अशुभ भाव नहीं लेश शेष संज्वलन उदय शुभ नाम हुए ।
तीव्र उदय वश मूलगुणों की सीमा में सब वृत्ति रही ।
रहे विकल्प दशा में किंचित् उनमें पर आसक्ति नहीं ।
ॐ ह्रीं श्री अखंडशुद्धपरिणतिसयुंक्त निर्ग्रन्थ मुनिराजाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
उदय रहा बाहर में केवल, संचेतन में चेतन हो ।
ज्ञान-ज्ञेय-ज्ञाता विकल्प नहीं, निश्चल ध्रुव में मग्न अहो ।
निर्द्वद्व निराकुल निर्विकल्प हो, परमसमाधि ध्यान धरें ।
रत मुनिवर शुद्धोपयोग में, आनंद अमृत पान करें ।
ॐ ह्रीं श्री स्वानुभवनिरतशुद्धोपयोगी निर्ग्रन्थ मुनिराजाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(छंद-लक्ष्मीधरा)

प्रमत्त से अयोगजिन सर्व आगम कहे,
रत्नत्रय भाव युत् आत्म आनंद लहे ।
तीन काल राजते ढाई द्वीप में गुणी,
तीन कम नौ करोड़ भावलिंगी मुनि ।
नार-नर-सुर-सुरेंद्र-चक्री चरणदास हैं,
राग-द्वेष-हीन मुनि आप गुणवास हैं ।
आप गुण चाहते चरण चित् चर्चते,
अष्ट द्रव्य अर्घ्य ले आपको अर्चते ।
ॐ ह्रीं श्री ढाईद्वीपस्थ तीनकमनौकरोडड़ निर्ग्रन्थ मुनिराजाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(दोहा)

परगृह तज निजगृह बसे, वीतराग मुनिराज ।
परिग्रह चौबीस भेद तज, तजे सकल जग काज।।
आत्मध्यान आगमपठन, सब जीवन का सार ।
और सकल जो वृत्तियां, है इनकी आधार। ।
वैरागी निर्ग्रन्थ गुरु, मंगलमय हितकार ।
चरण कमल नित पूजतें, उत्तम अर्घ्य संभार ।
ॐ ह्रीं श्री सर्वनिर्ग्रन्थ दिगंबर मुनिराजाय नमः महाअर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

(दोहा)

नगन दिगंबर वेश है, परमशांत परिणाम ।
आतम साधन में निरत, मुनिवर गुण के धाम ।

(छंद मानव)

मुनिवर परमेष्ठि पावन, तुम रुप अहो मनभावन ।
मुनिवर जिनवर के नन्दन, चरणों में शत-शत वंदन ।
मुनिवर हैं श्रेष्ठ अनुपम, निश्छल मन-तन जिन रुपम ।
मुनिवर महिमा हम जानें, मुनिवर स्वरुप पहिचानें ।
पहिले कर भेद विज्ञाना, पर को पर, निज निज जाना ।
निज ज्ञान भाव ज्ञायक में, थिर कर अनुभव रस पाना ।
रत्नत्रय उर में धरकर, वैराग्य भावना भाई ।
द्वादश अनुप्रेक्षा पावन, चिंतन कर दीक्षा पाई ।
हो नग्न दिगंबर वन में, निर्भय हो मुनि विचरते ।
तब बाघ सिंह वनचर भी, चरणों में मस्तक धरते ।
तपते तप शैल शिखर पर, सरिता तट शिशिर कहर पर ।
पावस में पादप नीचे, वर्षा जल मस्तक सींचे ।

संयोग कहाँ है दुखकर, समता रस पीते सुखकर ।
अरि-मित्र महल-तृणकुटिया, समदृष्टा मुनिवर सुखिया ।
अमृतरस झरती वाणी, है हित-मित-प्रिय कल्याणी ।
तत्वों का वर्षण करती, चिर मोहमहातप हरती ।
मुनिवर अंतर में निरंतर, आनंद समामृत पीते ।
परभाव अरि आतंकी, भागे सब भीते भीते ।
मोहांश अंत अब करने, मुनिराज चले भव तरने ।
शिवनार हार ले कर में, पथ जोह रही अंतर में ।
है धन्य दिगंबर साधक, है धन्य आत्म आराधक ।
है धन्य जिनेश्वर मुद्रा, है धन्य धन्य शिव साधक ।
मैं चलूं आपके पथ पर, मैं चलूं मुक्तिपुर रथ पर ।
मुनिवर तुम सम बन जाऊं, मुनिवर तुम सम वन जाऊं ।
ॐ ह्रीं श्री निर्ग्रन्थ दिगंबर मुनिराजेभ्यो जयमाला पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

(दोहा)

आप तिरें पर तारते, दया सिंधु मुनिराज ।
सिद्ध धरा पर राजते, तारण तरण जहाज। ।
मनिचरणों में नित नमें, चलें चरण के साथ ।
मोक्षमहल में पग धरे, वीतराग मुनिनाथ ।
इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत।

समुच्चय महाअर्घ्य

देव शास्त्र गुरु जिनशासन के मंगलमय आधार है ।
देव शास्त्र गुरु तीन लोक में सर्वोतम है सार है ।
देव शास्त्र गुरु शरण रहें नित होने भव से पार है ।
देव शास्त्र गुरु हृदय रहे मम खुलता मुक्ति द्वार है ।
सम्यक दर्शन ज्ञान चरण रत्नत्रय के करतार हैं ।
सात तत्व छह द्रव्य प्रयोजन भूत ज्ञान दातार है ।
स्व-पर भेद विज्ञान प्रकाशक करें वस्तु निरधार है ।
निज आतम ही केवल अपना ज्ञान मात्र सब सार है ।

देव शास्त्र गुरु श्री जिन त्रि रत्न रत्नत्रय के दाता ।
देव शास्त्र गुरु श्री जिन त्रि रत्न लोकत्रय विख्याता ।
देव शास्त्र गुरु श्री जिन त्रि रत्न कालत्रय अभिनंदन ।
देव शास्त्र गुरु श्री जिन त्रि रत्न योगत्रय से वंदन ।

(दोहा)

श्री जिन त्रि रत्न है, देवागम मुनिराज ।
महाअर्घ्य अर्पण करें, पद अनर्घ्य के काज ।
ॐ ह्रीं श्रीमज्जिनेंद्रजिनागमनिर्ग्रथमुनिराजाय अनर्घ्य पद प्राप्ताय समुच्चय महाअर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

समुच्चय जयमाला

(छंद हरिगीत)

हे देव तुम सब राग द्वेष विकार हर अरहंत हो ।
सब द्रव्य गुण पर्याय को तुम जानते भगवंत हो ।
सर्वांग से ओंकार मय प्रभु दिव्य ध्वनि दातार हो ।
तिहुंलोक के हितकार हो अज्ञानतम हरतार हो ।
हूँ अज्ञ मैं जिनराज अब तक आपको जाने बिना ।
मैं कौन हूँ पर कौन है यह भेद पहिचाने बिना ।
सुख प्राप्ति हेतु जो सहे तुम जानते सब संत हो ।
अब आपकी आया शरण भवकष्ट सब ही अंत हो ।
हे दिव्यवाणी तीर्थ के करतार की तुम तीर्थ हो ।
तुम तारती भवसिंधु से हो भव्यजन को तीर्थ हो ।
अनुयोग चारों अंग बारह पोषते वीतराग को ।
वे सूत्र हो या छंद हों वे पोषते वीतराग को ।
मैं अज्ञ हूँ हे मात अब तक तत्व से अनजान हूँ ।
सब नय प्रमाणों न्याय युक्ति तर्क से अनजान हूँ ।
तुम स्यात् पद अंकित अहो अविरोध सर्व सुभंत हो ।
मैं हूँ शरण में आपकी भ्रम मोह संशय अंत हो ।

हे मुनिश्वर विपिनवासी वीतरागी वंद्य हो ।
निर्ग्रन्थ हो निर्बंध हो निर्दोष निर्भय नंद्य हो ।
जग में विरागी जगत से धरणी विचरते सिद्ध हो ।
एकात्म प्रिय एकांत प्रिय हो तीनलोक प्रसिद्ध हो ।
संयोग दृष्टि देखता मैं कष्ट में मुनिनाथ को ।
वे भोगते हैं सुख प्रचुर निज आत्म-अनुभव साथ हो ।
निज ध्यान आगम गमन में हो मगन महिमावंत हो ।
मैं हूँ शरण में हे मुनि चिरमोह का अब अंत हो ।

जिनदेव आगम जिनमुनि आदर्श है सब सार है ।
जिनदेव आगम जिनमुनि मेरे हृदय के हार है ।
जिनदेव आगम जिनमुनि ही मुक्तिपथ आधार है ।
जिनदेव आगम जिनमुनि आराधना शत बार है ।

ॐ ह्रीं श्रीमज्जिनेंद्रजिनागमनिर्ग्रथमुनिराजाय अनर्घ्य पद प्राप्ताय समुच्चय जयमाला पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा

(दोहा)

तीन जगत में पूज्य है, देव शास्त्र गुरु तीन ।
तीन वचन मन काय से, वंदन कालों तीन।।
देवागम मुनिराज की, महिमा अपरम्पार ।
लघु मुख से कैसे कहें, सर्व सुगुण विस्तार।।
अल्प शक्ति कुछ शब्द से, हुआ वचन व्यवहार ।
भूल-चूक सब हो क्षमा, प्रणमें बारंबार ।
इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत।


Artist: राजेश कासलीवाल, उज्जैन
स्रोत: श्री जिन त्रिरत्न मंडल विधान