मध्य लोक में चार शतक अट्ठावन जिन चैत्यालय है ।
तेरह द्वीपों में अकृत्रिम पावन पूज्य जिनालय है । ।
सर्व इन्द्र, इन्द्रध्वज पूजन करते बहु बैभव के साथ ।
हर मन्दिर पर ध्वजा चढाते झुका त्रियोग पूर्वक माथ । ।
मैं भी अष्ट द्रव्य ले स्वामी भक्ति सहित करता पूजन ।
निज भावों का ध्वजा चढाऊँ मिटे पंच परावर्तन । ।
ॐ ह्रीं मध्यलोक तेरहद्वीपसम्बन्धी चारसौ अट्ठावन जिनालयस्थ शाश्वत् जिनबिम्ब समूह अत्र अवतर अवतर संवौषट् । अत्रतिष्ठ तिष्ठ ठ ठ , अत्रमम् सन्निहितो भव भव वषट् ।
रत्न जडित कंचन झारी में क्षीरोदधि का जल लाऊँ ।
जन्म मरण भव रोग नशाऊँ निज स्वभाव में रमजाऊँ ।।
तेरह द्वीप चार सौ अट्ठावन जिन चैत्यालय बन्दूँ ।
इन्द्रध्वज पूजन करके प्रभु शुद्धातम को अभिनन्दूँ ।।१।।
ॐ ह्रीं मध्यलोक तेरहद्वीपसम्बन्धी चारसौ अट्ठावन जिनालयस्थ शाश्वत जिनबिम्बेभ्यो जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जल नि स्वाहा ।
मलयागिरि का बावन चंदन रजत कटोरी में लाऊँ ।
भव बाधा आताप नाश हित निज स्वभाव में रमजाऊँ । ।तेरह ।।२।।
ॐ ह्रीं श्री मध्यलोक तेरह द्वीपसम्बन्धी चारसौअट्ठावन जिनालयस्थ शाश्वत जिनबिम्बेभ्यो संसारताप विनाशनाय चन्दनं नि स्वाहा ।
कर्म विपाकोदय निमित्त पा होते रागद्वेष विभाव ।
अज्ञानी उनमें रत होता मूल वीतरागी निज भाव । ।
उत्तम उज्ज्वल धवल अखण्डित तंदुल चरणों में लाऊँ ।
अक्षय पद की प्राप्ति हेतु मैं निज स्वभाव में रमजाऊं । ।तेरह. ।।३।।
ॐ ह्रीं श्री मध्यलोक तेरहद्वीपसम्बन्धी चारसौअट्ठावन जिनालयस्थ शाश्वत जिनबिम्बेभ्यो अक्षयपद प्राप्तये अक्षत नि स्वाहा ।
महा सुगन्धित शोभनीय बहु पीत पुष्प लेकर आऊँ ।
काम भाव पर जय पाने को जिन स्वभाव में रमजाऊँ । ।तेरह ।।४।।
ॐ ह्रीं मध्यलोक तेरहद्वीपसम्बन्धी चारसौअट्ठावन जिनालयस्थ शाश्वत जिनबिम्बेभ्यो कामबाण विध्वंसनाय पुष्प नि स्वाहा ।
विविध भाँति के भाव पूर्ण नैवेद्य रम्य लेकर आऊँ ।
क्षुधा रोग का दोष मिटाने निज स्वभाव में रमजाऊँ ।।तेरह।।५ ।।
ॐ ह्रीं मध्यलोक तेरहद्वीपसम्बन्धी चारसौअट्ठावन जिनालयस्थ शाश्वत जिनबिम्बेभ्या क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्य नि स्वाहा ।
मोह तिमिर अज्ञान नाश करने को ज्ञान दीप लाऊँ ।
मैं अनादि मिथ्वात्व नष्टकर निज स्वभाव में रमजाऊँ ।।तेरह।।६ ।।
ॐ ह्रीं मध्यलोक तेरह द्वीपसम्बन्धी चारसौअट्ठावन जिनालयस्थ शाश्वत जिनबिम्बेभ्यो मोहान्धकार विनाशनाय दीप नि स्वाहा ।
प्रकृति एक सौ अडतालीस कर्म की धूप बना लाऊँ ।
अष्टकर्म अरि क्षयकरने को निज स्वभाव में रमजाऊँ । ।तेरह ।।७।।
ॐ ह्रीं मध्यलोक तेरहद्वीपसम्बन्धी चारसौअट्ठावन जिनालयस्थ शाश्वत जिनबिम्बेभ्या अष्टकर्म दहनाय धूप नि स्वाहा ।
रागद्वेष परिणति अभाव कर निजपरिणति के फलपाऊँ ।
भव्य मोक्ष कल्याणक पाने निज स्वभाव में रमजाऊँ ।।तेरह।।८ ।।
ॐ ह्रीं मध्यलोक तेरह द्वीपसम्बन्धी चारसौअट्ठावन जिनालयस्थ शाश्वत जिनबिम्बेभ्या मोक्षफल प्राप्तये फल नि स्वाहा ।
द्रव्यकर्म नोकर्म भावकर्मों को जीत अर्घ लाऊँ ।
देह मुक्त निज पद अनर्घ हित निज स्वभाव में रम जाऊँ ।।तेरह।।९ ।।
ॐ ह्रीं मध्यलोक तेरहद्वीप सम्बन्धी चार सौ अट्ठावन जिनालयस्थ शाश्वत जिनबिम्बेभ्यो अनर्घपद प्राप्तये अर्घ्यं नि ।
पुण्य फूल के लिए बावरे हीरा जनम गंवाता ।
रत्न राख के लिए जलाता फिर भव भव पछताता ।।
जयमाला
तेरह द्वीप महान् के श्री जिन बिम्ब महान् ।
इन्द्रध्वज पूजन करूँ पाउँ सुख निर्वाण ।।१।।
मेरु सुदर्शन, विजय, अचल, मंदिर, विद्युन्माली अभिराम ।
भद्रशाल, सौमनस, पांडुक, नंदनवन शोभित सुललाम ।।२।।
ढाई द्वीप में पंचमेरु के बंदूँ अस्सी चैत्यालय ।
विजयारध के एक शतक सत्तर बन्दूँ मैं जिन आलय ।।३।।
जम्बू वृक्ष पांच मैं बन्दूँ शाल्मलि तरु के पाँच महान् ।
मानुषोत्तर चार और इष्वाकारों के चार प्रधान ।।४।।
वक्षारों के अस्सी बन्दूं गजदन्तों के बन्दूँ बीस ।
तीस कुलाचल के मैं बन्दूँ श्रद्धा भाव सहित जगदीश ।।५।।
मनुज लोक के चार शतक में दो कम चैत्यालय वन्दूँ ।
ढाई द्वीप से आगे के द्वीपों में साठ भवन वन्दूँ ।।६।।
इक शत त्रेशठ कोटिलाख चौरासी योजन नन्दीश्वर ।
अष्टम द्वीप दिशा चारों में हैं कुल बावन जिन मन्दिर ।।७।।
चारों दिशि में अंजनगिरि, दधिमुख, रतिकर, पर्वत सुन्दर ।
देव सुरेन्द्र सदा पूजन बंदन करने आते सुखकर ।।८।।
कुण्डलगिरि हैं द्वीप तेरहवाँ चार चैत्यालय वन्दूँ ।
द्वीप रुचकवर तेरहवें के चार जिनालय मैं वन्दूँ ।।९।।
मध्यलोक तेरह द्वीपों में चार शतक अट्ठावन गृह ।
एक-एक में एक शतक अरु आठ आठ प्रतिमा विग्रह ।।१०।।
अष्ट प्रतिहार्यों से शोभित रत्नमयी जिन बिम्ब प्रवर ।
अष्ट-अष्ट मंगल द्रव्यों से हैं शोभायमान मनहर ।।११।।
उनन्चास सहस्त्र चार सौ चौंसठ जिन प्रतिमा पावन ।
सभी अकृत्रिम हैं अनादि हैं परम पूज्य अति मन भावन ।।१२।।
देह अपावन जड पुदगल है तू चेतन चिद्रूपी ।
शुद्धबुद्ध अविरुद्ध निरंजन नित्य अनूप अरुपी ।।
एक शतक अरु अर्ध शतक योजन लम्बे चौड़े जिन धाम ।
पौन शतक योजन ऊँचे हैं भव्य गगनचुम्बी सुललाम ।।१३।।
उत्तम से आधे मध्यम इनसे आधे जघन्य विस्तार ।
इन्द्र चढाते ध्वजा सुपूजन इन्द्रध्वज करते सुखकार ।।१४।।
उच्च शिखर पर दश चिह्नों के ध्वज फहराते हैं हर्षित ।
अष्ट द्रव्य देवोपम चरण चढाते हैं कर मस्तक नत ।।१५।।
माला, सिंह, कमल, गज, अंकुश, गरुड, मयूर, वृषभ के चित्र ।
चकवा चकवी,हंसचिह्न शोभित बहुरंगी ध्वजापवित्र ।।१६।।
मेरु मन्दिरों पर माला का चिह्न ध्वजाओं में होता ।
विजयारध की सर्वध्वजाओं में तो वृषभ चिह्न होता ।।१७।।
जंबूशाल्मलितरु के ध्वज पर अंकुश चिह्न सरल होत ।
मानुषोत्तर इष्वाकारों के ध्वज गज शोभित होते ।।१८।।
वक्षारों के जिन मन्दिर पर गरुड चिंन्ह के ध्वज होते ।
गजदंतों के चैत्यालय पर सिंह विभूषित ध्वज होते ।।१९।।
सर्वकुलाचल के जिन गृह पर कमल चिंह के ध्वज होते ।
नंदीश्वर में चकवा चकवी चिह्न सुशोभित ध्वज होते ।।२०।।
कुण्डलवर गिरि मे मयूर के चिह्न विभूषित ध्वज होते ।
द्वीप रुचकवर गिरि मन्दिर पर हंसचिह्न के ध्वज होते ।।२१।।
महाध्वजा अरु क्षुद्र ध्वजायें पंचवर्ण की होती है ।
जिन पूजन करने वालों के सर्व पाप मल धोती है ।।२२।।
सुर सुरांगना इन्द्र शर्ची प्रभु गुण गाते हर्षाते हैं ।
नाच नाचकर अरिहंतों के यश की गाथा गाते हैं ।।२३।।
गीत नृत्य वाद्यों से झंकृत हो जाते है तीनों लोक ।
जय जयकार गुंजता नभ में पुलकित हो जाता सुरलोक ।।२४।।
इसीलिए इसको इन्द्रध्वज पूजन कहता है आगम ।
पुण्य उदय जिनका हो वे ही प्रभु पूजन करते अनुपम ।।२५।।
इन्द्र महापूजा रचता है मध्यलोक में हितकारी ।
अब मिथ्यात्व तिमिर हरने को मेरी है प्रभु तैयारी ।।२६।।
प्रभु दर्शन से निज आतम का जब दर्शन होगा स्वामी ।
इस पूजा का सम्यक् फल तबमुझको भी होगा स्वामी ।।२७।।
एक दिवस ऐसा आयेगा शुद्ध भाव ही होगा पास ।
पाप पुण्य परभाव नाश कर सिद्ध लोक में होगा बास ।।२८।।
ॐ ह्रीं मध्यलोक तेरहद्वीपसम्बन्धी चारसौअट्ठावन जिनालयस्थ शाश्वत जिनबिम्बेभ्यो पूर्णार्घ्यं नि स्वाहा ।
भाव सहित जो इन्द्रध्वज की पूजन कर हर्षाते है ।
निमिष मात्र में उनके संकट सारे ही मिट जाते हैं । ।
इत्याशीर्वाद
जाप्यमंत्र-ॐ ह्रीं श्री मध्यलोक तेरह द्वीप सम्बन्धी चार सौ अन्ठावन जिनालयस्थ शाश्वत जिन बिम्बेभ्यो नम
Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), पृष्ठ १०९ से ११३