श्री गोम्मटेश्वर तीर्थ पूजन | Shri Gommateshwar Teerth Pujan

श्री गोम्मटेश्वर तीर्थ - पूजन
(पद्धरि)
हे बाहुबली हे आत्मबली, हे मोहजयी जिनवर महान ।
हे वज्र तपस्वी महाऋषि, निजब्रह्मलीन आनंद धाम ॥
लिपटे भुजंग तन अंग अंग, लिपटी बेलें ज्यों तन मचान ।
फिर भी थिर रहे महामुनिवर, कितना गाऊँ मैं गुरु यशगान ॥
(दोहा)
घोर परीषहजयी प्रभू, पोदनपुर के ईश ।
गोम्मटेश हृदय बसो, जयवंतो जगदीश ।।
ॐ ह्रीं श्री बाहुबली जिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री श्री बाहुबली जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् ।
ॐ ह्रीं श्री बाहुबली जिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।
(छन्द-अवतार)
दर्शन अति महामनोज्ञ, प्रतिमा मनहारी ।
अन्तर्मुख दृष्टि होय, दर्शत सुखकारी ।।
जयवन्ते तीर्थ महान, गोम्मटगिरि पावन ।
जय बाहुबलि भगवान, जल चरणन अर्पण ॥
ॐ ह्रीं श्री बाहुबलि जिनेन्द्राय जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति…
संताप रहित निज भाव, महिमा प्रगटायी ।
भवताप नशावन हेतु, जिन शरणा भायी ।।
जयवन्ते तीर्थ महान, गोम्मटगिरि पावन ।
जय बाहुबलि भगवान, तपसी जग वंदन ॥
ॐ ह्रीं श्री बाहुबलि जिनेन्द्राय संसारताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति…
अक्षत अखंड चिद्रूप, पद प्रभु दर्शाया ।
पाऊँ अक्षत पद नाथ, दर्शत हर्षाया ।।
जयवन्ते तीर्थ महान, गोम्मटगिरि पावन ।
जय बाहुबलि भगवान, तपसी प्रभु वंदन ॥
ॐ ह्रीं श्री बाहुबलि जिनेन्द्राय अक्षयपद प्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति…

चैतन्य ब्रह्म शिवरूप, ध्याऊँ अविकारी ।
दुर्दात काम की पीर, मेटो भवहारी ।।
जयवन्ते तीर्थ महान, गोम्मटगिरि पावन ।
जय बाहुबलि भगवान, तपसी प्रभु वंदन ।।
ॐ ह्रीं श्री बाहुबलि जिनेन्द्राय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति …
प्रभु क्षुधा व्याधि को जीत, इन्द्रिय जय पायी ।
वर्षों तप किया महान, अचरज अति भारी ।।
जयवन्ते तीर्थ महान, गोम्मटगिरि पावन ।
जय बाहुबलि भगवान, तपसी प्रभु वंदन ।।
ॐ ह्रीं श्री बाहुबलि जिनेन्द्राय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति…
ले ज्ञान दीप तप तेल, शोधा ध्रुव सारा ।
संसार समझ निःसार, तृणवत ही त्यागा ।।
जयवन्ते तीर्थ महान, गोम्मटगिरि पावन ।
जय बाहुबलि भगवान, तपसी प्रभु वंदन ।।
ॐ ह्रीं श्री बाहुबलि जिनेन्द्राय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति…
प्रभु आर्त रौद्र दुर्ध्यान, तज निज ध्यान धरूँ ।
उत्तम क्षमादि दशधर्म लक्षण प्रगट करूँ ।।
जयवन्ते तीर्थ महान, गोम्मटगिरि पावन ।
जय बाहुबलि भगवान, तपसी प्रभु वंदन ।।
ॐ ह्रीं श्री बाहुबलि जिनेन्द्राय सकल कर्म विनाशनाय धूपं निर्वपामीति…
प्रभु पुण्य पाप फल मांहि, दुख ही दुख पाया ।
भव-तरू का मूल मिथ्यात्व, क्षय हो जिनराया ।।
जयवन्ते तीर्थमहान, गोम्मटगिरि पावन ।
जय बाहुबलि भगवान, तपसी प्रभु वंदन ।।
ॐ ह्रीं श्री बाहुबलि जिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति…

भरतेश प्रथम चक्रेश, चरणन शिरनावे ।
हे प्रथम रतिपति नाथ, प्रथम मुक्ति पाये ॥
प्रतिमा अति महा मनोज्ञ, लख मन हर्षावे ।
इकटक निरखे भवि जीव, सुध बुध खो जावे ॥
जयवन्ते तीर्थ महान, गोम्मटगिरि पावन ।
जय बाहुबलि भगवान, अर्घ्य करूँ अर्पण ॥
ॐ ह्रीं श्री बाहुबलि जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति …
जयमाला
(दोहा)
आत्म ध्यान में मगन हो, पाया केवलज्ञान ।
भक्ति भाव पूरित हृदय, करूँ सहज गुणगान ।।
(पद्धरि)
हे महा तपस्वी बाहुबलि, हे आत्मबली महिमा महान ।
जयवंत रहे प्रभु जिनशासन, तुम सम जीतें रागादि थान ।।
प्रभु कामदेव पद पाकर भी, विषयों में तृप्ति नहीं पायी ।
संसार असार सहज लखकर, वैराग्य भावना उमड़ाई ।।
जब भरत चक्रवर्ती ने प्रभु, षट् खंड विजयश्री पायी थी ।
लेकिन बाहुबलि के सम्मुख, वह विजय स्वयं शर्मायी थी ।।
तीनों युद्धों में आप हुये विजयी, इतिहास बताता है ।
तत्काल दिगम्बर दीक्षा ली, गाता जग गौरव गाथा है ।।
पोदनपुर के सम्राट तुम्हें, महिमा न कभी जड़ की आयी ।
सब राज-पाट तृण-सम छोड़ा, पाने शिवपुर की ठकुरायी ।।
चैतन्य महासागर में प्रभु, नित आप मग्न ही रहते थे ।
जयवंत रहे जयवंत रहे, मुनि यती भव्य गुण गाते थे ।।
हे वज्र तपस्वी बाहुबलि, तुमने तप को अपनाया था ।
बेलें लिपटी प्रभुवर तन पर, पर ध्यान न विचलित हो पाया ।।
सर्पों की बांबी बनी प्रभु, तन पर भुजंग तब लिपट गये ।
मानो प्रभु के अभिनंदन में, वो अपने में ही सिमट गये ।।

तीनों ऋतुयें बीती फिर भी, प्रभु ध्यान न पलभर भंग किया।
आहार विहार विकल्प नहीं, आनंद रसामृत पान किया ।।
चक्री ने नमन किया आकर, कैवल्य ज्ञान तब प्रकट हुआ ।
अल्पज्ञ दशा का हुआ अंत, आनंद-आनंद भरपूर हुआ ।।
प्रभु शान्त सौम्य मुद्रा तेरी, गिरिविंध्याचल पर शोभ रही ।
सारे जग की सुन्दरता को, यह अपने में ही गोप रही ।।
अति सुंदर विश्व विभूति थे, प्रतिमा भी मनहर लगती है।
जो एक बार दर्शन करता, छबि चित से नहीं उतरती है ।।
पक्षी उपसर्ग नहीं करते, छाया भी कभी न पड़ती है ।
तन-मन सब सुध खो जाती है, इतनी प्यारी छबि लगती है ।।
वह धन्य हुये श्री नेमीचंद, जिन मुद्रा दर्शन करवाया ।
वे धन्य-धन्य चामुंडराय, प्रभु गोम्मटेश को पधराया ।।
प्रभु शरण आपकी आया हूँ, भव-सागर से कब तिर जाऊँ ।
हे महातपस्वी बाहुबली, तुम जैसा ही शिवपद पाऊँ ॥
ॐ ह्रीं श्री बाहुबलि जिनेश्वराय जयमाला पूर्णार्थ्यं निर्वपामीति …
(दोहा)
बाहुबली दर्शन हुये, महाभाग्य से आज ।
आतम दर्शन प्राप्त कर, पाऊँ शीघ्र स्वराज ।।
।। पुष्पांजलिं क्षिपामि ।।


Artist: पं. राजेन्द्र कुमार जैन
स्रोत: जिनेन्द्र पूजन

प्रूफरीडिंग बाकी है