उर्जयंत गिरनार शिखर निर्वाण क्षेत्र को करूँ नमन ।
नेमिनाथ स्वामी ने पाया, सिद्ध शिला का सिंहासन ।।
शंबु प्रद्युम्न कुमार आदि अनिरुद्ध मुनीश्वर को वदन ।
कोटि बहात्तर सातशतक मुनियों ने पाया मुक्ति सदन ।।
महा भाग्य से शुभ अवसर पा करता हूँ प्रभु पद पूजन ।
नेमिनाथ की महा कृपा से पाऊँ मैं सम्यक् दर्शन ।।
ॐ ह्रीं श्री गिरनार तीर्थक्षेत्र अत्र अवतर अवतर संवौषट् ॐ ह्रीं श्री गिरनार तीर्थक्षेत्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ ॐ ह्रीं श्री गिरनार तीर्थक्षेत्र अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट ।
मैं शुद्ध पावन नीर लाऊँ भव्य समकित उर धरूँ ।
मैं शुभ अशुभ परभाव हर कर स्वयं को उज्ज्वल करूँ ।।
मैं उर्जयन्त महान् गिरि गिरनार की पूजा करूँ ।
मैं नेमि प्रभु के चरण पंकज युगल निज मस्तक धरूँ ।।१।।
ॐ ह्रीं श्री गिरनार तीर्थक्षेत्रेभ्यो जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जल नि
मैं सरस चंदन शुद्ध भावों का सहज अन्तर धरूँ ।
मैं शुभ अशुभ भवताप हर कर स्वयं को शीतल करूँ ।।मैं।।२ ।।
जीव तत्व का आलंबन संवर निर्जरा मोक्ष हित रूप ।
है आलंबन अजीव तत्व का आस्त्रव बध अहित दुख रूप ।।
ॐ ह्रीं श्री गिरनार तीर्थक्षेत्रेभ्यो संसारताप विनाशनाय चंदन नि
मैं धवल अक्षत भावमय ले आत्म का अनुभव करूँ ।
मैं शुभ अशुभ भव राग हर कर स्वयं अक्षयपद वरूँ ।।मैं।।३ ।।
ॐ ह्रीं श्री गिरनार तीर्थक्षेत्रेभ्यो अक्षयपद प्राप्ताय अक्षत नि ।
मैं चिदानंद अनूप पावन सुमन मन भावन धरूँ ।
मैं लाख चौरासी गुणोत्तर शील की महिमा वरूँ । ।मैं ।।४।।
ॐ ह्रीं श्री गिरनार तीर्थक्षेत्रेभ्यो कामवाणविध्वंसनाय पुष्प नि ।
मैं सरल सहजानंद मय नैवेद्य शुचिमय उर धरूँ ।
मैं अमल अतुल अखंड चिन्मय सहज अनुभव रस वरूँ । ।मैं ।।५।।
ॐ ह्रीं श्री गिरनार तीर्थक्षेत्रेभ्यो क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्य नि ।
मैं भेद ज्ञान प्रदीप से मिथ्यात्व के तम को हरूँ ।
मैं पूर्ण ज्ञान प्रकाश केवलज्ञान ज्योति प्रभा वरूँ ।।मैं।।६ ।।
ॐ ह्रीं श्री गिरनार तीर्थक्षेत्रेभ्यो मोहान्धकार विनाशनाय दीप नि ।
मैं भावना भवनाशिनी की धूप निज अन्तर धरूँ ।
वसु कर्मरज से मुक्त होकर निरंजन पद आदरूँ । ।मैं ।।७।।
ॐ ह्रीं श्री गिरनार तीर्थक्षेत्रेभ्यो दुष्टाष्टकर्म विध्वंसनाय धूप नि ।
मैं शुद्ध भावों के अमृतफल प्राप्त कर शिव सुख भरूँ ।
मैं अतीन्द्रिय आनन्द कद अनंत गुणमय पद वरूँ । ।मैं ।।८।।
ॐ ह्रीं श्री गिरनार तीर्थक्षेत्रेभ्यो मोक्षफल प्राप्तये फल नि ।
मैं पारिणामिक भाव का ले अर्घ निज आश्रय करूँ ।
मैं शुद्ध सादि अनंत शाश्वत परमसिद्ध स्वपद वरूँ ।।मैं।।९ ।।
ॐ ह्रीं श्री गिरनार तीर्थक्षेत्रेभ्यो अनर्घपद प्राप्तये पूर्णार्घ्य नि ।
जयमाला
उर्जयंत गिरनार, को निशि दिन करूँ प्रणाम ।
निज स्वभाव की शक्ति से लूँ सिद्धों का धाम ।।१।।
हित का कारण त्वरित ग्रहण कर त्वरित अहित कारण का त्याग ।
आत्म तत्व से जो विरुद्ध है उसका कारण से धार विराग ।।
प्रथम टोक पर नेमिनाथ प्रभु के जिन मन्दिर बने विशाल ।
स्वर्ण शिखर ध्वज दंड आदि से है शोभायमान तिहुँकाल ।।२।।
राजुल गुफा बनी अति सुन्दर संयम का पथ बतलाती ।
वीतराग निर्ग्रंथ भावनामयी मोक्ष पथ दर्शाती ।।३।।
चरण चिन्ह ऋषियों के पावन देते वीतराग संदेश ।
नेमिनाथ ने भव्य जनों को दिया विरागमयी उपदेश ।।४।।
द्वितीय टोकपर श्री मुनियों के चरण कमल है दिव्यललाम ।
भाव पूर्वक अर्घ्य चढाकर मैं लू प्रभु निज में विश्राम ।।५।।
तृतीय टोक पर ऋषि मुनियों केचरणाम्बुज अतिशोभित है ।
दर्शनार्थी दर्शन करके इन पर होते मोहित हैं ।।६।।
चौथी टोक महान् कठिन है इस पर चरण चिन्ह सुखकार ।
निज स्वभाव की पावन महिमा सुरनर मुनि गातेजयकार ।।७।।
श्री कृष्ण रुकमणी पुत्र श्री कामदेव प्रद्युम्नकुमार ।
ले विराग संयम धर मुक्त हुए पहुँचे भव सागरपार ।।८।।
शम्बुकुमार तथा अनिरुद्धकुमार आदि मुनि मुक्त हुए ।
निज स्वभाव की अमर साधना कर शिवपद संयुक्त हुए ।।९।।
पंचम टोक नेमि प्रभु की परम तपस्या भूमि महान् ।
निज स्वभाव साधन के द्वारा पाया सिद्ध स्वपद निर्वाण ।।१०।।
इन्द्रादिक देवों ने हर्षित किया यहाँ पंचम कल्याण ।
कोटि कोटि मुनियोंने तप कर पाया सिद्ध स्वपद ।।११।।
एक शिला पर प्रभु की अनुपम मूर्ति यहाँ उत्कीर्ण प्रधान ।
चरण चिन्ह श्री नेमिनाथ प्रभु के हैं जग में श्रेष्ठ महान् ।।१२।।
इसी टोक से चउ अघातिया कर्मों का करके अवसान ।
एक समय में सिद्ध शिला पर नाथ विराजे महा महान् ।।१३।।
नेमिनाथ के दर्शन होते चढकर दस सहस्त्र सोपान ।
हो जाती है पूर्ण यात्रा होता उर में हर्ष महान् ।।१४।।
फिर जाते हैं सहस्त्राम वन जहाँ हुआ था तप कल्याण ।
नेमिनाथ के चरणाम्बुज में अर्घ्य चढाते यात्री आन ।।१५।।
जिन दीक्षा लेकर प्रभु जी ने यहाँ घोर तप किया महान् ।
चार घातिया कर्म नष्ट कर पाया प्रभु ने केवलज्ञान ।।१६।।
राजुल ने भी यहीं दीक्षा लेकर किया आत्म कल्याण ।
और अनेकों यादव वंशी आदि हुए मुनि महा महान् ।।१७।।
मैं भी प्रभु के पद चिन्हों पर चलकर महामोक्ष पाऊँ ।
भेद ज्ञान की ज्योति जलाकर सम्यकदर्शन प्रगटाऊँ ।।१८।।
सम्यकज्ञान चरित्र शक्ति का पूर्ण विकास करूँ स्वामी ।
निश्चय रत्नत्रय से मैं सर्वज्ञ बनूँ अन्तर्यामी ।।१९।।
चार घातिया कर्म नष्ट कर पद अरहंत सहज पाऊँ ।
फिर अघातिया कर्म नाशकर स्वयं सिद्ध प्रभु बन जाऊँ ।।२०।।
पद अनर्घ्य पाने को स्वामी व्याकुल है यह अन्तर्मन ।
जल फलादि वसु द्रव्य अर्घ्य चरणों में करता हूँ अर्पण ।।२१।।
नेमिनाथ स्वामी तुम पद पंकज की करता हूँ पूजन ।
वीतराग तीर्थंकर तुमको कोटि कोटि मेरा वन्दन ।।२२।।
ॐ ह्रीं श्री गिरनार तीर्थक्षेत्रेभ्यो पूर्णार्घ्यं नि स्वाहा ।
नेमिनाथ निर्वाण भू बन्दूँ बारम्बार ।
उर्जयंत गिरनार से हो जाऊँ भवपार । ।
इत्याशीर्वाद
जाप्यमन्त्र-ॐ ह्रीं श्री गिरनार तीर्थक्षेत्रेभ्यो नम ।
Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), पृष्ठ २९४ से २९७