श्री देवगढ़ अतिशय क्षेत्र पूजन | Shri Devgarh Atishay Kshetra Pujan

श्री देवगढ़ अतिशय क्षेत्र पूजन

(स्थापना)
(तर्ज - चलो सम्मेद शिखर चालो)
देवगढ़ जिन मंदिर आओ, देवगढ़ प्रभु दर्शन पाओ ।
अपनी प्रभुता देख लो, बाहर न भरमाओ ।।
ऐसा ही प्रभु मैं भी हूँ, यह जिनवर दर्शाय ।
भवों-भवों के संचित पातक, क्षण भर में विनशाय ।।
महापुण्य के ही प्रताप से, प्रभु दर्शन मिलते ।
जिनदर्शन से आतम दर्शन, भविजन पा लेते ।।
शान्त मुद्रा पल भर ध्याओ, दो घड़ी निज प्रभु को ध्याओ ।
अपनी प्रभुता देख लो, बाहर न भरमाओ ।।
धन्य देवगढ़ अतिशय देखो, कण-कण में भगवान ।
जहाँ नजर डालो, प्रभु ही प्रभु, भगवन्तों की खान ।।
धन्य-धन्य वे जैनी, जिनने मंदिर बनवाये ।
अन्तरमुखी भाववाही, जिनप्रतिमा पधराये ।।
आत्मन निज प्रभू को ध्याओ, दो घड़ी शांति यहां पाओ
अपनी प्रभुता देख लो, बाहर न भरमाओ ।।
(दोहा)
कृत्रिम अकृत्रिम बिम्ब जिन, वन्दूँ बारम्बार ।
अन्तर्मुख छवि सौम्य लख, हर्षित हृदय अपार ॥
ॐ ह्रीं श्री देवगढ़ स्थित सर्वजिनबिम्ब समूह ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री देवगढ़ स्थित सर्वजिनबिम्ब समूह ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ।
ॐ ह्रीं श्री देवगढ़ स्थित सर्वजिनबिम्ब समूह ! अत्र मम संन्निहितो भव भव वषट् ।
पुष्पांजलिं क्षिपेत्

(मानव छंद)
निर्मल जल चरण चढ़ाऊँ, जन्मादिक व्यथा मिटाऊँ ।
प्रभु वीतराग दर्शन कर आत्मदर्शन पा जाऊँ ॥
ये शाश्वत भव्य जिनालय, है शांति बरसती इसमें ।
महाभाग्य देवगढ़ आया, खोजूँ अपनी अस्ति मैं ।।
ॐ ह्रीं श्री देवगढ़ स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
चंदन प्रभु-चरण चढ़ाऊँ, भव ताप रहित हो जाऊँ।
वस्तु स्वरूप चिंतन कर, सुखसागर निज लहराऊँ ।।
ये शाश्वत भव्य जिनालय, है शांति बरसती इसमें ।॥ महाभाग्य. ॥
ॐ ह्रीं श्री देवगढ़ स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
अक्षत प्रभु-चरण चढ़ाऊँ, शाश्वत अक्षय सुख पाऊँ ।
चौरासी लाख बिलों में, अब और न फिर दुख पाऊँ ॥
ये शाश्वत भव्य जिनालय, है शांति बरसती इसमें ।॥ महाभाग्य. ॥
ॐ ह्रीं श्री देवगढ़ स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।
प्रभु सुरभित सुमन चढ़ाऊँ, यह काम व्यथा विनशाऊँ।
तज अशुचि देह की क्रीड़ा, अब और न पीड़ा पाऊँ ॥
ये शाश्वत भव्य जिनालय, है शांति बरसती इसमें ।। महाभाग्य. ॥
ॐ ह्रीं श्री देवगढ़ स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा
नेवज प्रभु चरण चढ़ाऊँ, चिर क्षुधा व्याधि जय पाऊँ ।
चिर तृप्ति प्रदायी व्यंजन, से शाश्वत सुख प्रगटाऊँ ॥
ये शाश्वत भव्य जिनालय, है शांति बरसती इसमें ।॥ महाभाग्य. ॥
ॐ ह्रीं श्री देवगढ़ स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दीपावलि का उजियारा, नहिं मोह तिमिर विनसावे ।
यह भेद ज्ञान का दीपक, प्रभु मुक्ति पंथ दिखलावे ।।
ये शाश्वत भव्य जिनालय, है शांति बरसती इसमें ॥ महाभाग्य. ॥
ॐ ह्रीं श्री देवगढ़ स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

दश अंगी धूप चढ़ाऊँ, दश धर्म सहज प्रगटाऊँ ।
चैतन्य भाव की सौरभ, जहाँ रहूँ वहीं महकाऊँ ॥
ये शाश्वत भव्य जिनालय, है शांति बरसती इसमें ।
महाभाग्य देवगढ़ आया, खोजूँ अपनी अस्ति मैं ।।
ॐ ह्रीं श्री देवगढ़ स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
कल्पद्रुम फल ले आऊँ, नाचूँ गाऊँ हर्षाऊँ ।
ऐसे प्रभु कहाँ मिलेंगे, जी भर निरखूँ ध्रुव ध्याऊँ ।।
ये शाश्वत भव्य जिनालय, है शांति बरसती इसमें ।। महाभाग्य. ।।
ॐ ह्रीं श्री देवगढ़ स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
भक्ति-भावों से भरकर, वसुविधि शुभ अरघ सजाया ।
यह जीवन धन्य बनाऊँ, दुर्लभ प्रभु शरणा पाया ।।
अब तक बहु भेष धरे हैं, छवि भा गई आज दिगम्बर ।
चिंतामणि प्रगट्यो हिय में, अब रहा न कोई आडम्बर ॥
जिन तारण तरणहि सेऊँ, परवाह करे क्या जब्बर ?
जो शांति न तुमसे पावे, वो भटके मोही समुंदर ।।
संस्कृति के परम धरोहर, जिन शासन के रखवारे ।
जिनबिम्ब सभी अभिनन्दूँ, जागे सौभाग्य हमारे ।।
ये शाश्वत भव्य जिनालय, है शांति बरसती इसमें ॥ महाभाग्य. ॥
ॐ ह्रीं श्री देवगढ़ स्थित समस्त सर्वजिनेन्द्रेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
(दोहा)
जिन प्रतिमा जिन सारिखी, कही जिनागम मांहि।
चंद्रवदन अवलोकते, आनंद रस बरसाहिं ।।
(रोला)
धन्य-धन्य देवों के गढ़ तो देखो आओ ।
जहाँ दृष्टि जाती है प्रभु दर्शन ही पाओ ।॥
धन्य-धन्य प्रभु जिनदर्शन की कैसी गरिमा ।
ऋषि-मुनि गणधर भी गाते हैं, जिन प्रभु महिमा ।।

अधोलोक जिन भवन शाश्वत पूजूँ स्वामी ।
सात करोड़ बहत्तर लाख, भजूँ जिन नामी ।।
मध्य लोक के चार शतक अठ्ठावन वन्दूं ।
अर्घ्य चढ़ाऊँ शिक्षा पाऊँ प्रभु अभिनन्दूं ।।
उर्ध्व लोक जिनमंदिर, के दर्शन कर आऊँ।
लख चौरासी सहस, सन्तानवे तेईस ध्याऊँ ।।
प्रभु की अन्तर्मुख मुद्रा, अब मन में भाती ।
शान्त चित्त हो निर्विकल्प, हो जाऊँ कहती ।।
तीन लोक के कृत्रिम, अकृत्रिम जिनगृह वन्दूँ ।
जिन प्रतिमायें महामनोहर, नित अभिनन्दूँ ।।
अहो ! सैकड़ों समवशरण, से जो प्रभावना ।
वैसी होती अचल बिम्ब से वो प्रभावना ।।
सात तत्त्व का मूक, संदेशा जो देती है ।
जीवराज जिनराज लखो मानो कहती है ।।
मेंढक ने प्रभु पूजन का जब भाव जगाया ।
पूजन के पहले ही, उसने शुभ फल पाया ।।
‘जौ’ के जितनी जिन प्रतिमा, जो जन रखता है।
उसको पुण्य अपार जिनागम, भी कहता है ।।
प्रतिमा प्रक्षालन प्रतिदिन, जो जन करते हैं।
समवशरण साक्षात उन्हें, दर्शन मिलते हैं ।।
सौ कामों को छोड़, देव के दर्शन करना ।
छोड़ हजारों काम दिव्य ध्वनि चित में धरना ।।
दिव्य देवगढ़ पावन भू, दर्शन शुभ पाये ।
धन्य-धन्य वो धर्मी, जिनने प्रभु पधराये ।।
भाव सहित वंदन करता हूँ है जिनस्वामी ।
मैं भी तुम जैसा हो जाऊँ अर्न्तयामी ।।
ॐ ह्रीं श्री देवगढ़ स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
चौबीसों तीर्थेश के, दर्शन अति मनहार ।
भाव सहित पूजन करूँ, पाऊँ सौख्य अपार ।।
(परिपुष्पांजलिं क्षिपामि)


Artist: पं. राजेन्द्र कुमार जैन
स्रोत: जिनेन्द्र पूजन

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