श्री देव-शास्त्र-गुरु पूजन (पं. राजेन्द्र कुमार जैन) | Shri Dev-Shastra-Guru Pujan (Pt. Rajendra Kumar Jain)

स्थापना

(वीर)
वीतराग सर्वज्ञ जिनेश्वर पावन चरणों में वंदन ।
शुद्धातम के साधक साधू संत ऋषीश्वर अभिनंदन ।।
नित्य बोधनी मां जिनवाणी, जग में नित जयवन्त रहो ।
मन मंदिर में सदा विराजो, देव शास्त्र गुरुवर जय हो ॥
(दोहा)
रोम - रोम से झलकती, शांति अपरम्पार ।
परिणति में प्रगटे प्रभो, वन्दूँ बारम्बार ।।
ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्रगुरू समूह ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्रगुरू समूह ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् ।
ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्रगुरू समूह ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।
पुष्पांजलिं क्षिपेत्
(मानव छंद)
चैतन्य विलासी जिनवर, चैतन्य भाव दर्शाते ।
चैतन्य विहारी मुनिवर, चैतन्य गीत नित गाते ।।
समता रस पान कराती, मां स्व पर विवेक जगाती ।
श्री देव शास्त्र गुरू वन्दूँ - अभिनन्दूँ महिमा आती ॥
ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्रगुरुभ्यो जन्म-जरा मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
संसार ताप में जल-जल, अगणित अनंत दुख पाये ।
विषयों में शांति मिली ना, अब शरण तुम्हारी आये ।।
प्रभु दिव्य ध्वनि सुन तेरी, परिणति में समता आती ।
श्री देव शास्त्र गुरू वन्दूँ-अभिनन्दूँ महिमा आती ।।
ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्रगुरूभ्यो संसारताप विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा ।

आनंदमय हो मंगलमय प्रभु आराधना हमारी ।
पर्याय मूढ़ बन भटका, अब पायी शरण तुम्हारी ॥
अक्षय प्रभुता दर्शायी, पद पाउँ ध्रुव अविनाशी ।
श्री देव शास्त्र गुरू वन्दूँ, अभिनन्दूँ महिमा आती ॥
ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्रगुरुभ्यो अक्षयपद प्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।
चैतन्य सुरभि से सुरभित, अतिशय शुद्धात्म दिखाया।
मैं भूल स्वयं का वैभव, विषयांधवना भरमाया ॥
निष्काम तत्व निज निरखूँ, छूटें कब विषय विजाती ।
श्री देव शास्त्र गुरू वंदूँ, अभिनन्दूँ महिमा आती ॥
ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्रगुरुभ्यो कामबाण विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
चैतन्य रसामृत पीते, मुनिराज विचरते वन में ।
चलते फिरते सिद्धों सम, चैतन्य निरखते तन में ॥
सब विषय वासना झूठी, तृप्ति स्वभाव से आती ।
श्री देव शास्त्र गुरू वंदूँ, अभिनन्दूँ महिमा आती ॥
ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्रगुरुभ्यो क्षुधा रोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जिनदर्शन से निज दर्शन, कर मोहमहांध निवारूँ ।
स्व पर विवेक प्रगटाऊँ, शुद्धातम में रम जाऊँ ।
अपनी निधि अपने में ही, पानी में मीन प्यासी ।
श्री देव शास्त्र गुरू वंदूँ, अभिनन्दूँ महिमा आती ।।
ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्रगुरुभ्यो मोहांधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
मधुवन में होली खेलें, मुनिराज मगन निज मन में।
ध्रुवधाम ध्येय अग्नि से, जल जाते कर्म सहज में ॥
चैतन्य-सुरभि प्रभु तेरी, दश धर्मी सौरभ लाती ।
श्री देव शास्त्र गुरू वंदूँ, अभिनन्दूँ महिमा आती ।।
ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्रगुरुभ्यो अष्टकर्म विनाशनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।

दृष्टि में ध्रुव परमातम, अनुभव में प्रभु परमातम ।
हर श्वांस बसे परमातम, फिर क्यों न बनूं परमातम ।।
सब झूठे रिश्ते नाते, जिन शासन ही है साथी ।
श्री देव शास्त्र गुरू वंदूँ, अभिनन्दूँ महिमा आती ॥
ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्रगुरुभ्यो मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
जिन मुद्रा नित्य निहारूँ, जिन सम निजरूप संवारूँ।
निर्ग्रथ पंथ पर चलकर, अर्हन्त दशा अवधारूँ ।।
भक्ति भावों का अनुपम, यह अर्घ्य सजाकर लायां ।
पाऊँ अनर्घ पद स्वामी, दातार आप-सा पाया ।।
निःसार जगत् जड़ वैभव, लख महिमा अंतर जागी ।
श्री देव शास्त्र गुरू वंदूँ, अभिनन्दूँ महिमा आती ॥
ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्रगुरूभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

जयमाला

(दोहा)
देवशास्त्र गुरू रतन शुभ, तीन रतन करतार ।
गाऊँ गुणमाला प्रभो, पाऊँ पद अविकार ।।
(चौपाई)
जय जय श्री अरिहन्त जिनेश्वर, महामहिम मुनिनाथ मुनीश्वर ।
वीतराग सर्वज्ञ हितंकर, मुक्ति मार्ग दर्शायो प्रभुवर ।।
शत शत इन्द्र करें तुम सेवा, तुम हो प्रभु देवन के देवा ।
सुरपति सहस्र नाम गुण गावे, तुम गुण सुमरत पार न पावे ।।
अन्तर्मुख छवि धन्य तुम्हारी, अन्तस्तत्त्व प्रकाशनहारी ।
दर्शन ज्ञान वीर्य बलधारी, सुख अनन्त सेवें त्रिपुरारी ॥
समवशरण की शोभा न्यारी, निराधार राजे अविकारी ।
रोम-रोम पुलकित हो जावे, जब जिनवर दर्शन भवि पावे ।।
धर्म तीर्थ के तुमही प्रणेता, मुक्ति मार्ग के तुमही नेता।

कर्म रुप पर्वत के भेत्ता, महा सौख्य दातार महंता ।।
स्वाश्रित मुक्ति मार्ग बताया, समझ-समझ भविजन शिव पाया।
तुम बिन कौन मर्म दर्शावे, आत्म भान ही शम सुख लावे ।।
कहां निगोद नारक दुख पाया, कित तिर्यंच गती तड़पाया।
आज धन्य मानुष तन पायो, महा भाग्य प्रभु शरणा आयो ।
यही भावना है हे स्वामी, तुम सम हो दृष्टि जग नामी ।
ऐसी भक्ति हृदय जगाऊँ, फिर न लौट मां गर्भ में आऊँ ॥
जिनवाणी माता उपकारी, स्व पर विवेक जगावनहारी ।।
मिथ्या भ्रांति नशावनहारी, दिव्य तत्त्व दर्शावनहारी ।
धन्य-धन्य निर्ग्रथ मुनीश्वर, लेश नहीं जिनके आडम्बर ॥
दर्शन ही वैराग्य जगावे, चक्री वैभव भी न भावे ।
शुद्ध उपयोगी संत हमारे, मुक्ति वधू के कंत महा रे ।।
दर्शन महा भाग्य जो पावे, आतम आराधक हो जावे ।
सौम्यमूर्ति किसको न भावे, पशु भी बैर विरोध भुलावे ॥
चलते-फिरते तीर्थ हमारे, भव्य जननि के तारण हारे ।
तुम जैसी समता कब पाऊँ, शत्रु-मित्र सम भाव जगाऊँ ॥
ज्ञानाभ्यास करूँ हर्षाऊँ, कब निर्ग्रन्थ दशा अपनाऊँ।
धन्य घड़ी कब ऐसी आवे, चिर समाधि में मन रम जावे ।।
देव शास्त्र गुरू सदा नमन है, जिनशासन ही सहज शरण है ।।
ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्रगुरूभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
भक्ति भाव से वंद्यकर, हर्षित हृदय अपार ।
प्रभु सम प्रभुता अनुभवूँ, शीघ्र होऊँ भवपार ॥
।। परिपुष्पांजलिं क्षिपामि ।।


Artist: पं. राजेन्द्र कुमार जैन
स्रोत: जिनेन्द्र पूजन (संकलन: पं. राजेन्द्र कुमार जैन)

प्रूफरीडिंग बाकी है