श्री दशलक्षणधर्म पूजन - 2
उत्तम क्षमा आत्मा का गुण उत्तम मार्दव विनय स्वरूप ।
उत्तम आर्जव माया नाशक उत्तम शौच लोभहर भूप ।।
उत्तम सत्य स्वभाव ज्ञानमय उत्तम संयम संवर रूप ।
उत्तम तप निर्जरा कर्म की उत्तम त्याग स्वरूप अनूप ।।
उत्तम आकिंचन विरागमय उत्तम ब्रह्मचर्य चिद्रूप ।
धन्य धन्य दशधर्म परम पद दाता सुखमय मोक्ष स्वरूप ।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य शौच, संयम, तप त्याग, आकिंचन, ब्रह्मचर्य दशलक्षणधर्म ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य शौच, संयम, तप त्याग, आकिंचन, ब्रह्मचर्य दशलक्षणधर्म ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य शौच, संयम, तप त्याग, आकिंचन, ब्रह्मचर्य दशलक्षणधर्म ! अत्र मम् सन्निहितो भव भव वषट् ।
जल स्वभाव शीतल निर्मल पी कर भी प्यास न बुझ पाई ।
जन्म मरण का चक्र मिटाने आज धर्म की सुधि आई ।।
उत्तम क्षमा मार्दव आर्जव शौच सत्य संयम तप त्याग ।
आकिंचन ब्रह्मचर्य धर्म के दशलक्षण से हो अनुराग ।।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशधर्मांगाय जन्म-जरा-मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
दाह निकंदन चन्दन पाकर भी तो दाह न मिट पाई ।
राग आग की ज्वाला बुझाने आज धर्म की सुधि आई ।।उत्तम।।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशधर्मांगाय संसारताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।
शुभ्र अखण्डित तन्दुल पाकर भी निज रूचि न सुहा पाई ।
अजर अमर अक्षय पद पाने आज धर्म की सुधि आई ।।उत्तम।।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशधर्मांगाय अक्षयपद प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।
अगणित पुष्प सुवासित पाकर काम व्याधि न मिट पाई ।
अब कन्दर्प दर्प हरने को आज धर्म की सुधि आई ।।उत्तम।।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशधर्मांगाय कामबाण विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
जड़ की रुचि के कारण अब तक निज की तृप्ति न हो पाई ।
सहज तृप्त चेतन पद पाने आज धर्म की सुधि आई ।।उत्तम।।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशधर्मांगाय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
मिथ्याभ्रम की चकाचौंध में दृष्टि शुद्ध न हो पाई ।
मोह तिमिर का अन्त कराने आज धर्म की सुधि आई ।।उत्तम।।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशधर्मांगाय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
आर्त रौद्र ध्यानों में रहकर धर्म ध्यान छवि ना भाई ।
अष्टकर्म विध्वंस कराने आज धर्म की सुधि आई ।।उत्तम।।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशधर्मांगाय अष्टकर्म विध्वंसनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
राग हेय परिणति फल पाकर निज परिणति ना मिल पाई ।
फल निर्वाण प्राप्त करने को आज धर्म की सुधि आई ।।उत्तम।।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशधर्मांगाय महा मोक्षफल प्राप्ताय फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
चौरासी के क्रूर चक्र में उलझा शान्ति न मिल पाई ।
निज अमरत्व प्राप्त करने को आज धर्म की सुधि आई ।।उत्तम।।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशधर्मांगाय अनर्घ्य पद प्राप्ताय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
अंगपूजा
उत्तम क्षमा धर्म है सुख का सागर तीन लोक में सार ।
जन्म मरण दुख का अभाव कर शीघ्र नाश करता संसार ।।
क्रोध कषाय विनाशक दुर्गति नाशक मुनियों द्वारा पूज्य ।
व्रत संयम को सफल बनाता सुगति प्रदाता है अति पूज्य ।।
जहाँ क्षमा है वहीं धर्म है स्वपर दया का मूल महान ।
जय जय उत्तम क्षमा धर्म की जो है जग में श्रेष्ठ प्रधान ।।
ॐ ह्रीं उत्तम क्षमा धर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
उत्तम मार्दव धर्म ज्ञानमय वसु मद रहित परम सुखकार ।
मान कषाय नष्ट करता है विनय गुणों का है भण्डार ।।
विनय बिना तत्वों का हो सकता न कभी सम्यक् श्रद्धान ।
दर्शन ज्ञान चारित्र विनय तप बिना न होता सम्यक्ज्ञान ।।
जहाँ मार्दव वहीं धर्म है वहीं मोक्ष नगरी का द्वार ।
उत्तम मार्दव धर्म हमारा विनय भाव की जय जयकार ।।
ॐ ह्रीं उत्तमार्दव धर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
उत्तम आर्जव धर्म कुटिलता से विरहित ऋजुता से पूर्ण ।
निज आतम का परम मित्र है करता माया शल्य विचूर्ण ।।
लेश मात्र भी मायाचारी कुगति प्रदायक अति दुख कार ।
सरल स्वभाव चेतन गुण धारी टंकोत्कीर्ण महा सुख कार ।।
शिवमय शाश्वत मोक्ष प्रदाता मंगलमय अनमोल परम ।
उत्तम आर्जव धर्म आत्म का अभय रूप निश्चल अनुपम ।।
ॐ ह्रीं उत्तम आर्जव धर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
उत्तम शौच धर्म सुखकारी मन वच काया करता शुद्ध ।
लोभ कषाय नाश कर देता समकित होता परम विशुद्ध ।।
ऋद्धि-सिद्धि का लोभ न किंचित इसके कारण हो पाता ।
जो सन्तोषामृत पीता है वही आत्मा को ध्याता ।।
शौच धर्म पावन मंगलमय से हो जाता है निर्वाण ।
उत्तम शौच धर्म ही जग में करता है सबका कल्याण ।।
ॐ ह्रीं उत्तम शौच धर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
उत्तम सत्य धर्म हितकारी निज स्वभाव शीतल पावन ।
वचन गुप्ति के धारी मुनिवर 'ही पाते हैं मुक्ति सदन ।।
सब धर्मों में यह प्रधान है भव तम नाशक सूर्य समान ।
सुगति प्रदायक भव सागर से पार उतरने को जलयान ।।
सत्य धर्म से अणुव्रत और महाव्रत होते हैं निर्दोष ।
जय जय उत्तम सत्य धर्म त्रिभुवन में गूँज रहा जयघोष ।।
ॐ ह्रीं उत्तम सत्यधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
उत्तम संयम तीन लोक में दुर्लभ, सहज मनुज गति में ।
दो क्षण को पाने की क्षमता, देवों में न सुरपति में ।।
पंचेन्द्रिय मन वश में करना, त्रस थावर रक्षा करना ।
अनुकम्पा आस्तिक्य प्रशम संवेगधार मुनिपद धरना ।।
धन्य धन्य संयम की महिमा तीर्थंकर तक अपनाते ।
उत्तम संयम धर्म जयति जय हम पूजन कर हर्षाते ।।
ॐ ह्रीं उत्तम संयम धर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
उत्तम तप है धर्म परम पावन स्वरूप का मनन जहाँ ।
यही सु तप है अष्ट कर्म की होती है निर्जरा यहाँ ।।
पंचेन्द्रिय का दमन सर्व इच्छाओं का निरोध करना ।
सम्यक् तप धर निज स्वभाव से भाव शुभाशुभ को हरना ।।
धन्य धन्य बाह्यन्तर द्वादश तप विध धन्य धन्य मुनिराज ।
उत्तम तप जो धारण करते हो जाते हैं श्री जिनराज ।।
ॐ ह्रीं उत्तमतपधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
उत्तम त्याग धर्म है अनुपम पर पदार्थ का निश्चय त्याग ।
अभय शास्त्र औषधि अहार है चारों दान सरल शुभ राग ।।
सरल भाव से प्रेम पूर्वक करते हैं जो चारों दान ।
एक दिवस गृह त्याग साधु हो करते हैं निज का कल्याण ।।
अहो दान की अद्भुत महिमा तीर्थंकर प्रभु लेते हैं आहार ।
उत्तम त्याग धर्म की जय जय जो है स्वर्ग मोक्ष दातार ।।
ॐ ह्रीं उत्तमत्यागधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
उत्तम आकिंचन है धर्म स्वरूप ममत्व भाव से दूर ।
चौदह अंतरंग दश बाहर के हैं जहाँ परिग्रह चूर ।।
तृष्णाओं को जीता पर द्रव्यों से राग नहीं किंचित ।
सर्व परिग्रह त्याग मुनिश्वर विचरें वन में आत्माश्रित ।।
परम ज्ञानमय परम ध्यानमय सिद्ध स्वपद का दाता है ।
उत्तम आकिंचन व्रत जग में श्रेष्ठ धर्म विख्याता है ।।
ॐ ह्रीं उत्तम आकिंचनधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
उत्तम ब्रह्मचर्य दुर्धर व्रत है सर्वोत्कृष्ट जग में ।
काम वासना नष्ट किये बिन नहीं सफलता शिवमग में ।।
विषय भोग अभिलाषा तज जो आत्मध्यान में रम जाते ।
शील स्वभाव सजा दुर्मतिहर काम शत्रु पर जय पाते ।।
परमशील की पवित्र महिमा ऋषि गणधर वर्णन करते ।
उत्तम ब्रह्मचर्य के धारी ही भव सागर से तिरते ।।
ॐ ह्रीं उत्तमब्रह्मचर्यधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
उत्तम क्षमा धर्म को धारूँ क्रोध कषाय विनाश करूँ ।
पर पदार्थ को इष्ट अनिष्ट न मानूँ आत्म प्रकाश करूँ ।।
उत्तम मार्दव धर्म ग्रहण कर विनय स्वरूप विकास करूँ ।
पर कर्तृत्व मान्यता त्यागूँ अहंकार का नाश करूँ ।।
उत्तम आर्जव धर्म धार माया कषाय संहार करूँ ।
कपट भाव से रहित शुद्ध आतम का सदा विचार करूँ ।।
उत्तम शौच धर्म धारण कर लोभ कषाय विनष्ट करूँ ।
शुचिमय चेतन से अशुद्ध ये चार घातिया कर्म हरूँ ।।
उत्तम सत्य धर्म से निर्मल निज स्वरूप को सत्य करूँ ।
हितमित प्रिय सच बोलूँ नित निज परिणति के संग नृत्य करूँ ।।
उत्तम संयम धर्म सभी जीवों के प्रति करुणा धारूँ ।
समितिगुप्ति व्रत पालन करके निज आतम गुण विस्तारूँ ।।
उत्तम तप धर शुक्ल ध्यान से आठों कर्मों को जारूँ ।
अन्तरंग बहिरंग तपों से निज आतम को उजियारूँ ।।
उत्तम त्याग पाँचों पापों का सर्व देश में त्याग करूँ ।
योग्य पात्र को योग्य दान दें उर में सहज विराग भरूँ ।।
उत्तम आकिंचन रागादिक भावों का परिहार करूँ ।
सर्व परिग्रह से विमुक्ति हो मुनिपद अंगिकार करूँ ।।
उत्तम ब्रह्मचर्य उर धारूँ आत्म ब्रह्म में लीन रहूँ ।
कामबाण विध्वंस करूँ मैं शील स्वभावाधीन रहूँ ।।
दशलक्षणव्रत की महिमा का निज प्रति जय जयगान करूँ ।
दश धर्मों का पालन करके महामोक्ष निर्वाण वरूँ ।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य शौच, संयम, तप त्याग, आकिंचन, ब्रह्मचर्य दशलधर्मेभ्यो पूर्णार्घ्यं नि. स्वाहा ।
श्री दशलक्षण धर्म की महिमा अगम अपार ।
जो भी इसको धारते होते भव से पार ।।
इत्याशीर्वादः
Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ ३०९ से ३१४