श्री दशलक्षण धर्म पूजन
रचयिता: राजेश कासलीवाल, उज्जैन
पूर्ण पाठ नीचे दिया है, मूल PDF (6 पृष्ठ) सबसे नीचे संलग्न।
॥ श्री दशलक्षण धर्म पूजन ॥
रचियता - राजेश कासलीवाल, उज्जैन
(स्थापना)
(छंद अडिल्ल)
क्षमा मार्दव आर्जव शौच रु सत्य वर्य ।
संयम तप त्याग आकिंचन ब्रह्मचर्य ।
दशलक्षण युत् धर्म आत्मस्वभाव है ।
यही मोक्ष है सुखकर मोक्ष उपाव है ।
(दोहा)
परिणति पावन हो प्रभु, धर्म हृदय में धार ।
द्रव्य भाव मय अर्चना, लक्षण दसों प्रकार ॥
ॐ ह्रीं श्रीउत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्म ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् इत्याह्वाननम् ।
ॐ ह्रीं श्रीउत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्म ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः इति स्थापनम् ।
ॐ ह्रीं श्रीउत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्म ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम् परि पुष्पांजलि क्षिपेत ।
(छंद अवतार)
निजभाव भूल मतिमान, मिथ्यामल धारे ।
धर-धर्म, रोग-अवसान, जन्म-मरण सारे ॥
दशलक्षण धर्म महान, आत्म स्वभाव सही ।
अन्तर में सौख्य निधान, लें निजभाव मही ॥
ॐ ह्रीं श्रीउत्तमक्षमा-मार्दव-आर्जव शौच सत्य-संयम-तप-त्याग आकिञ्चन्य-ब्रह्मचर्येति दशलक्षणधर्माय जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय
जलं निर्वपामीति स्वाहा।
अरि-क्रोध अन्य अरि कौन, क्यों आताप करें ।
धर-धर्म रहो निज भौन, भाव क्षमादि धरें ॥ दशलक्षण धर्म…
ॐ ह्रीं श्रीउत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
लघु ना गुरू जग में कोय, मान न ठान अरे ।
धर-धर्म सभी मद खोय, अक्षय पद सुमरें ॥
दशलक्षण धर्म महान, आत्म स्वभाव सही ।
अन्तर में सौख्य निधान, लें निजभाव मही ॥
ॐ ह्रीं श्रीउत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
छल-बल माया कटु काम, क्लेश विशेष करें ।
धर-धर्म सदा निष्काम, ऋजु परिवेश धरें ॥ दशलक्षण धर्म…
ॐ ह्रीं श्रीउत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
पर से सुख की अभिलाष, भव दुख की जननी ।
धर-धर्म लोभ सब नाश, क्षुत् तृष्णा हरनी ॥ दशलक्षण धर्म…
ॐ ह्रीं श्रीउत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
हो सत्य तत्त्व परकाश, संशय मोह टले ।
धर-धर्म अज्ञतम नाश, प्रज्ञा दीप जले ॥ दशलक्षण धर्म…
ॐ ह्रीं श्रीउत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
सब दोष विनाश अनूप-, संयम शोभित हो ।
धर-धर्म अनल तप धूप, निजगृह सुरभित हो ॥ दशलक्षण धर्म…
ॐ ह्रीं श्रीउत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय अष्टकर्मविध्वंसनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
परभाव परिग्रह त्याग, ब्रह्म स्वरूप लखें ।
धर-धर्म तजें सब राग, शिवफल स्वाद चखें ॥ दशलक्षण धर्म…
ॐ ह्रीं श्रीउत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
उत्तम पद सम्यक सार, धर्म प्रसिद्ध कहें ।
धर-धर्म तजें संसार, निजपद सिद्ध लहें ॥ दशलक्षण धर्म…
ॐ ह्रीं श्रीउत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दश धर्मों के अर्घ्य
(दोहा)
ज्ञान रहे बस ज्ञान में, तहां क्रोध ना होय ।
दोष न पर में आप में, क्षमा धरम है सोय ॥
(छंद गीतिका)
पर वस्तु में ना दोष देखें रोष चित से परिहरें ।
जग में न कोई इष्ट है न अनिष्ट कोई द्रव्य रे ॥
निज में रहें यह धर्म हैं उत्तम क्षमा का मर्म है ।
वह क्रोध जो परभाव है उपयोग का ना कर्म है ॥
ॐ ह्रीं श्रीउत्तमक्षमाधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पर से लघु गुरु मानना, मान महा दुःख रूप ।
सर्व जीव हैं सिद्ध सम, मार्दव धर्म स्वरूप ॥
भूलकर निज आतमा पर से प्रभुता हीनता ।
है मान हेतु-चहुंगति तज भज स्वयं स्वाधीनता ॥
निज मान निज को धर्म मार्दव भाव उत्तम है यही ।
समभाव धर परभाव तज पावें शिवालय की मही ॥
ॐ ह्रीं श्रीउत्तममार्दवधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
निज सुख निज से भोगना, सरल आत्म परिणाम ।
छोड़ कुटिलता सर्व ही, आर्जव आनन्द धाम ॥
पर द्रव्य में सुख खोजने की चाल छल बल कुटिलता ।
सब यत्न निष्फल ही रहे बस हाथ आई विकलता ॥
सुखकंद है निज आतमा निज में रहो आनंद लहो ।
निर्दोष उत्तम धर्म आर्जव धर सदा सुख में रहो ॥
ॐ ह्रीं श्रीउत्तमआर्जवधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
वैभव अपना भूलकर, पर से जो अभिलाष ।
पाप मूल वह लोभ है, परम शौच का नाश ॥
मैं एक हूँ मैं शुद्ध हूँ परिपूर्ण हूँ तब लोभ क्यों ।
ना चाह पर से एक कण की रह सकेगा क्षोभ क्यों ॥
अस्पर्श पर से नित रहे पर अशुचि आशा जन्य है ।
अस्पर्शता पहिचानना ही शौच उत्तम धन्य है ॥
ॐ ह्रीं श्रीउत्तमशौचधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति निर्वपामीति स्वाहा।
वचन कथन व्यवहार है, सत् सम्यक पहिचान ।
सत् सन्मुख परिणाम ही, उत्तम सत्य महान ॥
उत्पाद व्यय ध्रुव युक्त सत् है ज्ञान सत् का सत्य है ।
सम्यक्त्व प्रज्ञा चरण शिवपथ ज्ञान पथ का सत्य है ॥
हो असत् का परिहार सत् का भान उत्तम सत्य है ।
सत् में निरत प्रज्ञा निरंतर ध्यान उत्तम सत्य है ॥
ॐ ह्रीं श्रीउत्तमसत्यधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
चित थिर निज में ही रहे, गमन न भ्रमता ज्ञान ।
प्राणी रक्षा हो स्वयं, इंद्रिय मन वश जान ॥
प्रमाद युत् परिणाम हिंसा-वासना का मूल है ।
हो ज्ञान ज्ञायक में सुथिर संयम नियम अनुकूल है ॥
वासना तज वास निज में रक्षा करें निज धर्म की ।
यम नियम संयम धर्म उत्तम शर्म-शिव के मर्म की ॥
ॐ ह्रीं श्रीउत्तमसंयमधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
निस्तरंग प्रतपन करें, हो स्वरूप विश्रान्त ।
तप निरोध-इच्छा तथा, निर्जर कर्म नितान्त ॥
चैतन्य में परिणाम की विश्रांति शांति तप सही ।
सब कष्ट को जो नष्ट करता कष्टप्रद तप है नहीं ॥
है भवातप का नाश हेतु आनन्द सेतु तप महा ।
रे साधकों को प्रिय सदा ही धर्म उत्तम तप कहा ॥
ॐ ह्रीं श्रीउत्तमतपोधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
त्याग राग की आग को, त्याग द्वेष मय क्लेश ।
कर्म त्याग जो धर्म लहे, रहे न विप्लव शेष ॥
पर वस्तु को निज मान ग्रहता कर्ता बना भोक्ता बना ।
पर ग्रहण कण ना हो सका ना कर सका ना भोगना ॥
यह ज्ञान प्रत्याख्यान है यह दान निज को शांति का ।
यह धर्म उत्तम त्याग है परभाव का चिर भ्रांति का ॥
ॐ ह्रीं श्रीउत्तमत्यागधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
परिग्रह चिंता व्यर्थ की, तज दो आतमराम ।
चिद् वैभव के हो धनी, नंत गुणों के धाम ॥
परद्रव्य में परभाव में मूर्च्छित परिग्रह पाप हैं ।
आकुल रहे व्याकुल रहे सब व्यर्थ के संताप हैं ॥
बाह्य अंतर तज परिग्रह आनन्द मुनिवर भोगते ।
रे ! धर्म आकिंचन्य उत्तम धर बचें भवरोग ते ॥
ॐ ह्रीं श्रीउत्तमआकिंचन्यधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
ब्रह्म स्वरूपी आतमा, रमण भाव अभिराम ।
तजें विषय विष वासना, परिणति हो निष्काम ॥
परद्रव्य में निज ज्ञान का नित डोलना व्यभिचार है ।
अपनत्व का कर्तृत्व का रतिभाव का कुविचार है ॥
सम्यक्त्व सम्यकज्ञान रमना-आत्म में अब हो सदा ।
उत्तम धरम यह ब्रह्मचर्य सदैव साधक सम्पदा ॥
ॐ ह्रीं श्रीउत्तमब्रह्मचर्यधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
(दोहा)
वीतरागता धर्म है, लक्षण दश शुभ जान ।
क्षमादि उत्तम सर्व ही, पावन परम महान ॥
(छंद चौपाई)
उत्तम क्षमा क्रोध निरवारा, मार्दव मान मिटावन हारा ।
उत्तम आर्जव माया नाशी, शौच लोभ कषाय विनाशी ॥
धर्म शांतिमय है सुखकारी, मंगलमय मंगल करतारी ।
धर्म भवोदधि तारणहारा, वीतरागता धर्म हमारा ॥
सत्य धर्म सत्पथ दिखलावे, उत्तम संयम शिवमग धावे ।
उत्तम तप है करम विनाशी, त्याग दिखावे निजगुण राशी ॥
धर्म रत्नत्रय भूषण सोहे, धर्मधार साधक मनमोहे ।
धर्म जीव को शिवकरतारा, वीतरागता धर्म हमारा ॥
धर्म आकिंचन मुनिगण धारे, सर्व परिग्रह को निरवारे ।
उत्तम ब्रह्मचर्य जस गावें, महाशील धर शिवपद पावें ॥
लक्षण दशयुत धर्म एक ही, साध्य साधना धर्म एक ही ।
धर्म सर्व सुगुण धरनारा, वीतरागता धर्म हमारा ॥
उत्तम पद समकित दिखलावे, उत्तम सब जग में जस पावे ।
उत्तम पंच परम पद पावें, उत्तम पंचम गति पहुंचावें ॥
धर्मधुरंधर श्री अरिहंता, धर्म शिरोमणि सिद्ध महंता ।
धर्म साधुगण ने उरधारा, वीतरागता धर्म हमारा ॥
ॐ ह्रीं श्रीउत्तमक्षमा-मार्दव-आर्जव शौच सत्य-संयम-तप-त्याग-आकिञ्चन्य-ब्रह्मचर्येतिदशलक्षणधर्माय जयमालापूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
दशलक्षण युत् धर्म को, वंदन बारम्बार ।
अष्ट द्रव्य से पूजकर, अन्तर में अवधार ॥
पुष्पांजलि क्षिपेत्।
मूल दस्तावेज़ (PDF):
- Shri_Dashlakshan_Dharm_Pujan_Rajesh_Kasliwal.pdf (0.2 MB, 6 पृष्ठ)
स्रोत: Jain Granth E Library (Telegram), t.me/jainegranth/60348।