श्री दशलक्षण धर्म पूजन
धम्मो वत्थु सहावो, खमादि भावो य दशविधेधम्मो
रयणत्तयं च धम्मो, जीवाणं रुणं धम्मो ।
आड़िल्ल
उत्तम क्षमा मार्दव आर्जव शौच सत्य संयम तप त्याग,
आकिंचन ब्रह्मचर्य धर्म दशलक्षण धारी श्री मुनिराज ।
अहो अहिंसा वीतरागता, धर्म एक दशलक्षण है,
जहाँ शान्ति समता संयम हो, वही धर्म है आनंदमय ।
सभी जीव भगवान आत्मा, दिखते किससे बैर करें,
किससे मान करें मन कैसे, जो निग्रंथ पंथ विचरे ।
मोह नींद से हमें जगाने, धर्म पर्व यह आया है,
भव आताप निवारन हेतु, नमूं मुनिनगुण गाया है ।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तम क्षमादि दशलक्षण धर्म अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं । अत्र मम सन्निहितौ भव भव वषट् … ।।
(रोला)
महा भाग्य जिन शासन पाया मन हर्षाया।
जन्म-मरण से रहित आत्म वैभव दर्शाया ॥
दशलक्षण यह धर्म पर्व है मंगलकारी।
जो धारे सो उसे वंदना सतत् हमारी ॥
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्माय जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामिति स्वाहा ।
छहों द्रव्य निर्दोष दिखाये न्यारे न्यारे।
कैसे दूं मैं दोष किसी को ज्ञान जगा रे ॥
दशलक्षण यह धर्म पर्व है मंगलकारी ॥ जो धारे …
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्माय संसारताप विनाशनाय चन्दनं निर्वपामिति स्वाहा ।
चिदानंद चैतन्य तत्व अक्षय दर्शाया।
भूल इसे हे नाथ आज तक भव भरमायाः ॥
दशलक्षण यह धर्म पर्व है मंगलकारी। जो धारे …
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्माय अक्षयपद प्राप्ताय अक्षतं निर्वपामिति स्वाहा ।
प्रभु प्रसाद से विषय वासना पर जय पाऊँ।
चपल इन्द्रियों के विषयों में नहीं लुभाऊं ॥
दशलक्षण यह धर्म पर्व है मंगलकारी। जो धारे …
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्माय कामबाण विनाशनाय पुष्पं निर्वपामिति स्वाहा ।
क्षुधा वेदना पीड़ा, व्यंजन मिटा न पाये।
चिदानंद रस आस्वादी मुनि तृप्त हमारे ॥
दशलक्षण यह धर्म पर्व है, मंगलकारी। जो धारे …
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्माय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामिति स्वाहा ।
पर द्रव्यों से प्रीत यहीं संसार संवारा ।
जानूं जाननहार आप से पा उजियारा ॥
दशलक्षण यह धर्म पर्व है मंगलकारी। जो धारे …
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्माय मोहांधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामिति स्वाहा ।
शत्रु मित्र समभाव धनी मुनिराज हमारे।
सब भूले भगवान खिरे नित वचन तुम्हारे
दशलक्षण यह धर्म पर्व है मंगलकारी। जो धारे …
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्माय अष्टकर्म विनाशनाय धूपं निर्वपामिति स्वाहा ।
जैसी करनी करता वैसा ही फल पाता।
ज्ञान मात्र हूँ मुक्ति मंत्र ध्याता तिर जाता।
दशलक्षण यह धर्म पर्व है मंगलकारी। जो धारे …
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्माय मोक्षफल प्राप्ताय फलं निर्वपामिति स्वाहा ।
सब जीवों से क्षमा भाव घर क्रोध निवाएँ।
धरूं सरलता जितेन्द्रियता लोभ सहारूं ।
संयम तप धारूं परिग्रह सब छोडूं ।
चार दान दूं ब्रह्म भाव से नाता जोडूं
जल फलादि वसु द्रव्य सजाकर अर्घ्य बनाया।
भव आताप निवारक स्वामी शरणा आया ॥ दशलक्षण…
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्माय अनर्घपद प्राप्ताय अर्घ्य निर्वपामिति स्वाहा ।
अरघावली
(सोरठा छंद)
धर्म नहीं धर्मी बिना, होय न गुरु बिन ज्ञान।
विषयाशा बिनबंध नहिं, तत्व ज्ञान निर्वान।
उत्तम क्षमा (सोरठा)
खड़ी असाता द्वार, दुष्ट देयं बहु वासना।
धारूं समता भाव, बैर भाव तज के प्रभु ॥
( तर्ज - जिनधर्म की डगर पर बच्चों दिखाओ…।)
उत्तम क्षमा धरम के, धारी हमारे मुनिवर ।
शत्रु न मित्र कोई, दीखे जिन्हें कहीं पर ॥
द्रव्यानुसारि चरणं, चरणानुसारि द्रव्यं ।
निर्दोष जैन शासन, जिनका है सहज जीवन ॥
गाली गलौंच देवें, बांधे व मारें प्राणी।
फिर भी न रोष करना, सिखलाये जैनवाणी ॥
जो कर्म पूर्व बांधे, वो ही उदय में आवे।
समता से सहन करना, जिनधर्म ही सिखावे ॥
ॐ ह्रीं उत्तम क्षमा धर्मांगाय अर्घ्य निर्वपामिति स्वाहा ।
उत्तम मार्दव धर्म
मान महादुख रूप, जीता मुनिवर आपने।
कोमल सुधा अनूप, विनय भाव वसु मद हरे ॥
मार्दव धरम के धारी, अभिनन्दनीय मुनिवर
चक्री भी वंदते हैं, फिर भी न मान रतिभर ।
सबको समान देखें, तो मान कैसे आवे?
अभिमान धूल धन का, तो धूल में मिलावें।
मानी महा दुखी था, रावण नरक सिधाया।
शिवभूति, मुनि विनयने, भव अन्त कर दिखाया।
ज्ञानी न होय मानी, मानी न होय ज्ञानी।
होवे विनय हृदय में, चित मोम सा हो सानी ॥
ॐ ह्रीं उत्तम मार्दव धर्मागाय अर्घ्य निर्वपामिति स्वाहा ।
उत्तम आर्जव धर्म
सरस भाव उरधार, सुखी जीव निश्छल सदा।
माया मति दुखकार, आर्जव धरम धरो सुधी ॥
आर्जव धरम के धारी मुनिराज हैं हमारे।
जीवन है पारदर्शी, निग्रंथ पंथ धारे ॥
दोषों को गुरूवरों से, कहकर उन्हें हटाऊँ।
सब जानते हैं जिनवर कैसे उन्हें छिपाऊँ।
प्रभु गुप्त पाप करके, तो गुप्त रोग पाये।
ज्यो गुप्त दान दानी को गुप्त धन दिलाये।
मन वचन काय तीनों, इकदम सरल बनाऊँ।
आर्जव धरम प्रगटकर, सिद्धत्व दशा पाऊँ ॥
ॐ ह्रीं उत्तम आर्जव धर्मागाय अर्घ्य निर्वपामिति स्वाहा ।
उत्तम शौच
तृष्णा गर्त असार, तृप्त कहीं कोई नहीं।
लोभी, दुखी अपार, सन्तोषी सुखिया सदा
प्रभु शौच धर्म धारी, मुनिराज हैं हमारे।
यद्यपि मलिन वदन है, फिर भी रतन पिटारे ॥
प्रभु ख्याति लाभ पूजा, तृष्णा सदा सताती।
मनमानी करते करते, मंहगी ये आयु जाती।
हैं भोग मधुर विषसम, आसक्ति, शक्ति कितनी ।
चेतन क्या भोग लोगे हे आयु बची कितनी ।
रस गंध वर्ण लोभी, बन प्राण हैं गंवावे।
लोभी बनूं धरम का, जिन धर्म शरण आये
ॐ ह्रीं उत्तम शौंच धर्मागाय अर्घ्यं निर्वपामिति स्वाहा ।
उत्तम सत्य धर्म
सत्य धरम सुखकार, अमृत सम वाणी झरे ॥
सुने भव्य जन सार, सत्यवादी जग में सुखी ।
सत्यार्थ धर्म धारी, मुनिराज श्री हमारे।
जिनकी वचन किरन से, अंधियारे हों विदारे ।
चैतन्य आत्मा में, दुनिया असत बताई
निश्चिंत बना देती, वाणी सरस तुम्हारी ॥
निर्ग्रंथ पंथ जग में, जयवंत सदा वर्ते ।
कड़वे बचन न बोलूं, मधुरिम मिले हैं क्षण ये ॥
वसु राजा झूठ बोला, सप्तम नरक सिधाया।
प्रभु सत्य धर्म धारूं, जिन धर्म शरण आया ।।
ॐ ह्रीं उत्तम सत्य धर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामिति स्वाहा ।
उत्तम संयम धर्म
संयम धरम महान, पंचेन्द्रिय मन वश करूँ ।
धारे भव्य सुजान, एक घड़ी विसरूं नहीं ।
संयम धरम के धारी, मुनिराज हैं हमारे ।
संयम बिना का जीवन, बिन ब्रेक की गाड़ी रे ।
स्वर्गादि आयु में भी, संयम न धर सकेंगे।
वीतरागता का आनंद वहां भोग न सकेंगे।
षट काय जीवों पर भी, करूणा मुनीश रखते ।
शुद्धोपयोगी साधु, स्वाधीन हैं विचरते !
तीर्थेश भी तिरे न, संयम बिना न चेतन
निग्रंथ साधु बनने की, भावना हो निशदिन
ॐ ह्रीं उत्तम संयम धर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामिति स्वाहा ।
उत्तम तप धर्म
तपसी श्री मुनिराज, करें करम की निरजरा
आनन्द अपरम्पार, द्वादश विधि तप आचरे ।
उत्तम तपश्चरण के धारी, हमारे मुनिवर ।
इच्छा निरोध तप से काटें, करम ऋषीश्वर ॥
हे जीव तुझको जग में, जब कुछ नहीं सुहावे।
उपयोग पलट अपना, आतम अवश्य भावे ।
प्रभु अनशानादि तप से, सब पाप मैल धुलते ।
शुद्धोपयोग तप बिन, नहिं कर्म जाल जलते ॥
तप में क्लेश मानें, जग में अजान सारे ।
तप सुरपति भी चाहें, आनंद की वर्षा रे॥
ॐ ह्रीं उत्तम तप धर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामिति स्वाहा ।
उत्तम त्याग धर्म
ममता मोह निवार, मुक्त हुये मुनिवर नमन।
त्याग धरम अनिवार, ग्रहण पूर्वक आचरूँ ।
उत्तम त्याग धर्मी, मुनि वृंद हैं हमारे ।
मूर्छा ममत्व त्यागी, आनन्द रस पिटारे ॥
षट् खण्ड अधिपति भी दीक्षा सहर्ष लेते।
वैभव अचिन्त्य पाकर जड़ की विभूति तजते ।
जो राग द्वेष त्यागी, वो सद्गुरू हमारा ।
चिद्रूप ही सहारा, इस बिन नहीं गुजारा।
औषध अभय आहार, ज्ञानी ही दान देते ॥
जीवन को धन्य करते, उनको करूं नमस्ते ॥
ॐ ह्रीं उत्तम त्याग धर्मांगाय अर्घ्य निर्वपामिति स्वाहा ।
उत्तम अकिंचन्य धर्म
मार्ग परंम निर्ग्रथ, पद धारी मुनिवर नमूं।
परिग्रह पोट उतार, पार भवोदधि तिर रहे ॥
आ किंच्य धर्म धारी, मुनिराज हैं हमारे ।
चौबीस परिग्रह के, त्यागी जगत सहारे ॥
मुद्रा नगन दिगम्बर, अविकारी आत्म निर्भर ।
है पार दर्शी जीवन, आनंद बहे निर्झर ॥
हो पाप तो छिपावें, हो नेह तो सजावें।
धन रत्नत्रय से सज्जित, वंशी मधुर बजावें।
कब सन्त साधु बनके, विचरूं मैं नगन वन में ।
चैतन्य मात्र निरखूं, जिनराज की शरण में ॥
ॐ ह्रीं उत्तम आकिंचन धर्मांगाय अर्घ्य निर्वपामिति स्वाहा ।
उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म
धर्म शिरोमणि सार, ब्रह्म भाव अन्तर लखूं ।
शील करे भव पार, धारूं अति उत्साह सों ।।
ब्रह्मचर्य धर्म धारी, मुनिराज हैं हमारे।
चैतन्य ब्रह्म निरखें, शोभें जगत सितारे ॥
जिस कामदेव ने तो, जीता जगत है सारा।
उस काम को पछारा, पौरूष सफल तुम्हारा ॥
विषयों की वासना से दुर्गति में जीव जावे ।
नारी के अंगों में ही ले जन्म भव भ्रमावे ॥
चित्राम काष्ट का भी, नारी से दूर रहना ॥
नौ बाढ़ लगाकर के जयवन्त शील करना ॥
ॐ ह्रीं उत्तम ब्रह्मचर्य धर्मांगाय अर्घ्य निर्वपामिति स्वाहा ।
जयमाला
( दोहा )
क्षमा आदि दशधर्म से, होय मंगलाचार ।
जीवन हो आनंदमय, धारो भविजन सार ॥
( मानव छन्द )
यह क्षमा धर्म अति पावन, क्रोधादि कषाय निवारे
उत्तम मार्दव मन भावन, विनयादि भाव अवधारे ।।
उत्तम आर्जव वृष भाई, माया प्रपंच विनशावे।
निर्लोभ वृत्ति लहरावे जब शौच हृदय में आवे ।।
सत् लक्षण धर्म हमारा, सत्यार्थ धरम आधारा।
संयम बिन घड़ी न जावे, नर भव तब सफल कहावे ।।
तप धारी महा मुनीश्वर, आनंदित करम खिपाते।
जो तृप्त हुये सो त्यागी, दानी भी यही दिखाते ॥
उत्तम अकिंचन धर्मी, मुनिवृंद विचरते वन में।
ब्रह्मचर्य धर्म से शोभित, जायेंगे सिद्ध सदन में ।।
( दोहा )
भक्ति सहित अर्पण करूं, अर्घ्य अहो मुनिराज ।
दशलक्षण धन के धनी, एक तुम्हीं सरताज ॥
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्माय जयमाला पूर्णार्घ्य निर्वपामिति स्वाहा ।
आत्म धर्म आराधना, का यह पर्व महान।
अनागार पद धारके, पाऊंसौख्य महान ।।
।। परिपुष्पांजलिं क्षिपेत् ।।
Artist: पं. राजेन्द्र कुमार जैन
स्रोत: जिनेन्द्र पूजन