श्री दशलक्षण धर्म पूजा (कविवर द्यानतराय) | Shri Dashlakshan Dharm Puja (Kavivar Dyanatray)

दशलक्षणधर्म-पूजा

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दश लक्षणधर्म-पूजा

कविवर द्यानतराय
अडिल्ल

उत्तम क्षमा मारदव आरजव भाव हैं,
शौच सत्य संयम तप त्याग उपाव हैं।
आकिंचन ब्रह्मचर्य धरम दर सार हैं,
चहूँगति-दुख तैं काढ़ि मुकति करतार हैं।।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्मा। अत्र अवतर अवतर संवौषट्।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्मा। अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्मा। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।

सोरठा
हेमाचल की धार, मुनि-चित सम शीतल सुरभि।
भव-आपात निवार, दस-लच्छन पूजौं सदा।।

ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशर्लक्षण-शौच-सत्य-संयम-तपस्त्यागाकिञ्चन्य ब्रह्मचर्याणीति दशलक्षणधर्माय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

चन्दन केशर गार, होय सुवाय दशों दिशा। भव।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय संसार तापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
अमल अखण्डित सार, तन्दुल्ल चन्द्र समान शुभ। भव।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय अक्षयपद प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
फूल अनेक प्रकार, महकें ऊरध-लोकलौं। भव।
ॐह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय कामबाणविनाशनाय पुष्पाणि निर्वपामीति स्वाहा।
नेवज विविध निहार, उत्तम षट्‌रस-संयुगत। भव।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय क्षुधा रोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
बाति कपूर सुधार, दीपक-ज्योति सुहावनी। भव।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

दशलक्षणधर्म-पूजा

अगर धूप विस्तार, फैले सर्व सुगन्धता। भव।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
फल की जाति अपार, घ्रान-नयन-मनमोहने। भव।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
आठों दरब संवार, ‘द्यानत’ अधिक उछाह सों। भव।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय अनर्घ पद प्राप्तये अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।

अंगपूजा

सोरठा
पीड़ें दुष्ट अनेक, बाँध मार बहुविधि करें।
धरिये क्षमा विवेक, कोप न कीजै पीतमा।।

चौपाई
उत्तम क्षमा गहो रे भाई, इह भव जस पर-भव सुखदाई।
गाली सुनि मन खेदन आनौ, गुन को औगुन कहै अयानो।।
गीता छन्द
कहि है अयानो वस्तु छोनैं, बाँध मार बहुविधि करें।
घर तैं निकारै तन विदारै, बैर जो न तहाँ धरै।।
तैं करम पूरब किये खोटे, सहै क्यों नहीं जीयरा।
अति क्रोध-अग्नि बुझाय प्रानी, साध्यजल ले सीयरा।।१।।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
मान महाविष रूप, करहिं नीच-गति जगत में।
कोमल सुधा अनूप, सुख पावै प्रानी सदा।।
उत्तम मार्दव-गुन मन माना, मान करन को कौन ठिकाना।
वस्यो निगोद माहि तैं आया, दमरी रुकन भाग बिकाया।।

दशलक्षणधर्म-पूजा

रुकन बिकाया भागवश तैं, देव इकेन्द्री भया।
उत्तम मुआ चाण्डाल हूवा, भूप कीड़ों में गया।।
जीतव्य जीवन धन गुमान, कहा करै जल-बुदबुदा।
करि विनय बहु-गुन बड़े जन की, ज्ञान का पावै उदा।।२।।
ॐ ह्रीं उत्तममार्दवधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
कपट न कीजै कोय, चोरन के पुर ना बसैं।
सरल सुभावी होय, ताके घर बहु सम्पदा।।
उत्तम-आर्जव रीति बखानी, रंचक दगा बहुत दुखदानी।
मन में हो सो वचन उच्चरिये, वचन होय सो तन सों करिये।।
करिये सरल तिहुँ जोग अपने, देखि निरमल आरसी।
मुख करै जैसा लक्खै तैसा, कपट-प्रीति अंगार-सी।।
नहीं लहै लक्ष्मी अधिक छल करि, करमबन्ध-विशेषता।
भय त्यागि दुख बिलाव पीवै, आपदा नहिं देखता।।३।।
ॐ ह्रीं उत्तमार्जवधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
धरहिं हिरदै सन्तोष, करहु तपस्या देह सों।
शौच सदा निरदोष, धरम बड़ो संसार में।।
उत्तम शौच सब जग जाना, लोभ पाप को बाप बखाना।
आशा-पास महा दुखदानी, सुख पावै सन्तोषी प्रानी।।
प्रानी सदा शुचि शील जप-तप, ज्ञान-ध्यान प्रभाव तैं।
नित गंग जमुन समुद्र ह्नाये, अशुचि-दोष सुभाव तैं।।
ऊपर अमल भरयो भीतर, कौन विधि घट शुचि कहैं।
बहु देह मैली सगुन थैली, शौच-गुन साधु लहैं।।४।।
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

दशलक्षणधर्म-पूजा

कठिन वचन मत बोल, परनिन्दा अरु झूठ तज।
साँच जवाहर खोल, सतवादी जग में सुखी।।
उत्तम सत्य व्रत पालीजे, पर विश्वासघात नहीं कीजे।
साँचे-झूठे मानुष देखो, आपन पूत स्वपास न पेखो।।
पेखो तिहायत पुरुष साँचो को दरब सब दीजिये।
मुनिराज-श्रावक की प्रतिष्ठा साँच गुण लख लीजिये।।
ऊँचे सिंहासन बैठो वसुनृप, धरम का भूपति भया।
वच झूठ सेती नरक पहुँचा, सुरग में नारद गया ।।५।।
ॐ ह्रीं उत्तमसत्यधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

काय छहों प्रतिपाल, पंचेन्द्री मन वश करो।
संयमरतन संभाल, विषय-चोर बहु फिरत हैं।।
उत्तम संयम गहु मन मेरे, भव-भव के भार्जे अघ तेरे।
सुरग नरक पशुगति में नाहीं आलस हरन करन सुख ठाहीं।।
ठाही पृथ्वी जल आग मारुत, रुख त्रस करुणा धरो।
सपरसन रसना घ्रान नैना, कान मन सब वश करो।।
जिस बिना नहिं जिनराज सीझे, तू रुल्लयो जग-कीच में।
इक धरी मत विसरो करो नित, आव जम-मुख बीच में ।।६।।
ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

तप चाहै सुरराय, करम-शिखर को वज्र है।
द्वादशविधि सुखदाय क्यों न करै जिन सक्ति सम।।
उत्तम तप सब माहिं बखाना, करम-शैल को वज्र समाना।
वस्यो अनादि निगोद-मंझारा, भूविकलयत्र पशुतन धारा।।
धारा मनुष्य तन महादुर्लभ, सुकुल आव निरोगता।
श्री जैनवानी तत्वज्ञानी, भई विषय-पयोगता।।
अति महा-दुर्लभ त्याग विषय-कषाय जो तप आदरै।
नर-भव अनूपम कनक घर पर, मणिमयी कलसा धरै ।।७।।
ॐ ह्रीं उत्तमत्तपोधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

दशलक्षणधर्म-पूजा

दान चार परकार, चार-संघ को दीजिए।
धन बिजुली उनहार, नर-भव-लाहो लीजिए।।
उत्तम त्याग कहो जग सारा, औषध शास्त्र अभय आहारा।
निहचै राग-द्वेष निरवारै, ज्ञाता दोनों दान संभारै।।
दोनों संभारै कूप-जलसम, दरब घर में परिनिया।
निज हाथ दीजे साथ लीजे, खाय खोया बह गया।।
धनि साध शास्त्र अभय-दिवैया, त्याग राग विरोध को।
बिन दान श्रावक साधु दोनों, लहें नाहीं बोध को ।।८।।
ॐ ह्रीं उत्तमत्यागधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

परिग्रह चौबीस भेद, त्याग करै मुनिराज जी।
तिसना भाव उच्छेद, घटती जान घटाड़ए।।
उत्तम आकिंचन गुण जानो, परिग्रह चिंता दुख ही मानो।
फाँस तनक-सी तन में सालै, चाह लँगौटी की दुख भालै।।
भालै न समता सुख कभी नर, बिना मुनि मुद्रा धरै।
धनि नगन पर तन-नगन ठाड़े, सुर असुर पायनि परै।।
घर-माहिं तिसना जो घटावै, रुचि नहीं संसार सों।
बहु धन बुरा हू भला कहिये, लीन पर-उपगार सों ।।९।।
ॐ ह्रीं उत्तमाकिंचन्यधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

शील-बाड़ नौ राख, ब्रह्मा-भाव अन्तर लखो।
करि दोनों अभिलाख करहु सफल नरभव सदा।।
उत्तम ब्रह्मचर्य मन आनो, माता-बहिन-सुता पहिचानी।
सहें बान-बरषा बहु सूरे, टिकै न नैन-बान लखि कुरै।।
कुरै तिया के अशुचि तन में, काम-रोगिनी रति करै।
बहु मृतक सड़हिं मसान माँहीं, काग ज्यों चोंचै भरै।।
संसार में विष-बेल नारी, तजि गये जोगीश्वरा।
‘धानत’ धरम दश पैंडि चढ़िकै, शिव-महल में पग धरा ।।१०।।
ॐ ह्रीं उत्तमब्रह्मचर्यधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

दशलक्षणधर्म-पूजा

समुच्चय जयमाला

दश लच्छन बन्दौं सदा, मन-वांछित फलदाय।
कहाँ आरती भारती, हम-पर होहु सहाय।।

बेसरि छन्द

उत्तम छिमा जहाँ मन होई, अन्तर बाहिर शत्रु न कोई।
उत्तम मार्दव विनय प्रकासै, नाना भेद ज्ञान सब भासै।।
उत्तम आर्जव कपट मिटावै, दुर्गति त्यागि सुगति उपजावै।
उत्तम शौच लोभ परिहारी, सन्तोषी गुण-रतन-भंडारी।।
उत्तम सत्य-वचन मुख बोलै, सो प्राणी संसार न डोलै।
उत्तम संयम पालै ज्ञाता, नर-भव सफल करै ले साता।।
उत्तम तप निरवांछित पालै, सो नर करम-शत्रु को टालै।
उत्तम त्याग करै जो कोई, भोगभूमि-सुर-शिवसुख होई।।
उत्तम आकिंचन व्रत धारै, परम-समाधि-दशा विस्तारै।
उत्तम ब्रह्मचर्य मन लावै, नर-सुर सहित मुक्तिफल पावै।।

दोहा

करै करम की निरजरा, भव-पींजरा विनाश।
अजर-अमर पद को लहें, ‘धानत’ सुख की राश।।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमा-मार्दवार्जव-शौच-सत्यम-संयम-तपस्या-गाकिंचन्य-
ब्रह्मचर्यदशलक्षणधर्माय पूर्णाघ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
।। पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् ।।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान

नेमीनाथो, दे तो साथो, भव भव और न चाहूँ।
भक्ति तिहारी, निशिदिन मन वच काय लाय करि गाऊँ।।
धर्म कहो तुम, वानी दशविधि, सो मोहि होउ सहाई।
करुणासागर, समरस गंभित, शीश नमों श्रुति गाई।।१।।

गीता छंद

धर्म के दश कहे लक्षण, तिन थकी जिय सुख लहै।
भवरोग को यह महा औषधि, मरण-जामन दुःख दै।।
यह वरत नीका, मीत जी का, करो आदरतै सही।
मैं जजों दशविधि धर्म के अंग, तासु फल है शिवमही।।२।।

पद्धरि छन्द

यह धर्म भवदधि नाव जान, या सेयें भवदुख होय हान।
यह धर्म कल्पतरु सुखद पूर, मैं पूजों भवदुख करन दूर।।३।।

गीता छंद

यह वरत मन-कपि गले फाँसी, सांकली सम जानिये।
गज-अक्षीन जीवन सिंह जैसी, मोहतम रवि मानिये।।
सुरथान माहीं वरत नाहीं, मनुजहुँ शुभ कुल लहै।
तातै सुअवसर है भलो, अब करों पूजा धुनि कहै।।४।।

बेसरि छन्द

जाने दशलक्षण व्रत कीना, ते सत्यरूपनि में परवीना।
भवसागर फिरनो मिट जावै, जो नर दशलक्षण वृष भावे।।५।।

भुजंगप्रयात छन्द

यही धर्म सारै, करै पाप क्षारै, यही धर्म सारै, करै सुख अपारै।
यही धर्म धीरा, हरै लोकपीरा, यही धर्म मीरा करै लोकतीरा।।६।।

१. तुम्हारा साथ। २. जीव का मित्र। ३. इन्द्रियरूपी हाथी को। ४. स्वर्ग। ५. धर्म।
६. प्रधान।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान

त्रिभंगी छन्द

यह धर्म हमारा, सब जग प्यारा, जगत उधारा हितदानी।
यह दशविधि गाया, जन-मन भाया, उच्च बताय जिनवानी।।
यह शिव करतारा, अबतैं न्यारा, भवि उद्धारा मुनि धारा।
ताको मैं ध्याऊँ, शीश नवाऊँ, अर्घ चढ़ाऊँ सुखकारा।।७।।

चौपाई

या व्रत की महिमा कहै वीर, दशविधि धर्म हरै भवपीर।
इसी धर्म बिन जग भरमाय, जजुँ धर्म अति दुरलभ पाय।।८।।

दश प्रकार को धर्म यह, दशविधि सुरतरु जान।
वांछित पद सेवक लहै, अधिक कहा सुखदान।।९।।

सोरठा

धर्म हमारा नाथ, धर्म जगत का सेहरा।
भव भव में हो साथ, और न वांछा मनविषै।।१०।।

मण्डलमध्ये पुष्पांजलिं क्षिपेत्

समुच्च्य पूजा

त्रिभंगी छन्द

यह धर्म क्षमा वा, मान गुणभावा, सरल सुभावा सतिवानी।
शुचि भाव करावा, संयम लाबा, तप करवावा अधिकानी।।
शुचि त्याग बतावै, नगन पुजावै, शील बढ़ावै शिवदाई।
यह धर्म दशारा, थाप करारा, पूजन धारा शिरनाई।।११।।

ह्रीं ह्रीं दशलक्षणधर्म! अत्र अवतर अवतर संवौषट्। आह्वाननम्।
ह्रीं ह्रीं दशलक्षणधर्म! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। स्थापनम्
ह्रीं ह्रीं दशलक्षणधर्म! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। सन्निधिकरणम्।

मण्युणांणद की चाल

क्षीरसागर तना नीर शुभ लाये।
कमक झारी विषै धार गुण गाइये।
मरण उत्पत्ति नहीं होय तो फल सही।
जानि इमिधर्म दश जाजों शिवमही।।१२।।

ह्रीं ह्रीं दशलक्षणधर्मभ्यो जन्मजरामृत्यु-विनाशनाय जलं निर्व० स्वाहा।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान

नीर संग अगर चन्दन घिस लायजी।
सुभग पातर विषै धारि धृति गायजी।।
जगत ताप तासु फल तुरत नाशें सही।
जानि इमिधर्म दश जाजों शिवमही।।१३।।

ह्रीं ह्रीं दशलक्षणधर्मभ्यो संसारताप-विनाशनाय चन्दनं निर्व० स्वाहा।

लेय अक्षत भले मुक्तिफल से कहे।
ऊजले अखण्ड सुभग स्वर्ग पातर लहे।
अक्षयपद पावनै ताप मनमें सही।
जानि इमिधर्म दश जाजों शिवमही।।१४।।

ह्रीं ह्रीं दशलक्षणधर्मभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्व० स्वाहा।

फूल कंचनवन कल्पतरु के भले।
गंध जुत रंग शुभ लेइ निज कर चले।।
माल तिन गूँथ कामबाण नाशक सही।
जानि इमिधर्म दश जाजों शिवमही।।१५।।

ह्रीं ह्रीं दशलक्षणधर्मभ्यो कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्व० स्वाहा।

सुभग नैवेद्य मोदक घने लाये।
विविध स्वादामय सु धारि भक्ति उर भाये।।
भूख दुखहरण स्वर्णपात्र भरि के सही।
जानि इमिधर्म दश जाजों शिवमही।।१६।।

ह्रीं ह्रीं दशलक्षणधर्मभ्यो क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्व० स्वाहा।

दीप मणि रतनमय और घृतमय लहे।
धारि कनकथाल में सु आरति जु करि लही।।
धर्मज्योति मोह अन्धकार नाशिका सही।
जानि इमिधर्म दश जाजों शिवमही।।१७।।

ह्रीं ह्रीं दशलक्षणधर्मभ्यो मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्व० स्वाहा।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान

धूप दश अंग मय लायक सारजी।
अगन संग खेवहुँ सुभक्ति उर धार जी॥
कर्म क्षयकार भव-बास नाशन सही।
जानि इमिधर्म दशधा जजो शिवमही॥७॥
ॐ ह्रीं दशलक्षणधर्मेभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्व० स्वाहा।

लौंग खारिक सु नारिकेल सुखकारजी।
और बादाम पुगी फलादि सारजी॥
लेइ निज हाथ में सुभक्ति धरि के सही।
जानि इमिधर्म दशधा जजो शिवमही॥८॥
ॐ ह्रीं दशलक्षणधर्मेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्व० स्वाहा।

नीर गन्ध अक्षत सुफूल चरु सोड़ जी।
दीप अरु धूप फल अरघ संजोड़जी॥
पुरट थाली विषै भक्ति करके सही।
जानि इमिधर्म दशधा जजो शिवमही॥९॥
ॐ ह्रीं दशलक्षणधर्मेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।

धर्म भव कूपतैं काढ़ने को रसी।
भव उदधि पार करतार नवका इसी॥
धर्म सुख दैन जिमि तात माता सही।
जानि इमिधर्म दशधा जजो शिवमही॥१०॥
ॐ ह्रीं दशलक्षणधर्मेभ्यो महार्घ्यं निर्व० स्वाहा।

जयमाला

दोहा

दश वृष रतन मिलाय के, माल करै भवि जोय।
धरि आपने उर विषैं, ता सम और न कोय॥११॥

श्री दशलक्षण मण्डल विधान

बेसरि छन्द

दशलक्षण वृष शिवमग देवा, धर्म थकी सुख पावै जीवा।
मुक्तिदीप पहुँचवन नावा, ये दश धर्म जजो जुत भावा ॥१॥
दशविधि धर्म धरे जो कोई, करम नाशि फिर दुख नहिं होई।
धरम जु साधन और न कोई, यो दश धर्म जजो मद खोई ॥२॥
धरम जीव का पालनहारा, धरम मान का खण्डनवारा।
धरम थकी जावै कुटिलाई, इमि दश धर्म जजो चित्तलाई ॥३॥
साँच वचन सम धरम न आनौ, धर्म भाव निर्मल पहचानौ।
धर्मजीव-रच्छा इन्द्रिय जीते, इमि लखि धर्म जजो कर प्रीते ॥४॥
तप ही सर्व धर्म का मूला, त्याग धरमतें क्षय अघ धूला।
धर्म नगन सम और न कोई, इमि दशधर्म जजो मद खोई ॥५॥
नारी त्याग धरम शिवदाई, ये दश धर्म जगत में भाई।
जो दश लक्षण मनमें आनै, सो भव-तप-हर-शिवपद ठानै ॥६॥
दशलक्षण व्रत इह विधि कीजे, उत्कृष्ट धर्म दश वास करीजे।
नातर बेलै पालनभाई, तथा इकन्तर वास कराई ॥७॥
शक्तिहीन है तो सुन मीता, दश एकाान्त करो धरि प्रीता।
व्रत दश वर्ष कर मन लाई, करूँ उद्यापन मन वच काई ॥८॥
नहिं उद्यापन शक्ति तुम्हारी, तो दूजो व्रत करूँ सुखकारी।
पीछे यथाशक्ति खरचावै, पूजन धरम उद्योत करावै ॥९॥

दोहा

इत्यादिक विधि सहित जो, धर्म करै दश सार।
पावै सुख मन भावना, अनुक्रम ले भव-पार।
ॐ ह्रीं दशलक्षणधर्मेभ्यो पूर्णार्घ्यं निर्व० स्वाहा।

  1. दीपक। 2. द्वीप। 3. नौका। 4. जीव की रक्षा। 5. आकिंचन्य धर्म। 6. नहीं तो।
  2. दो दिन उपवास।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान

उत्तम क्षमा धर्म पूजा

अडिल्ल

जीव तिरास थावर जेते जग में सही।
देव नरक नर पशु चारि गति की मही॥
तिन सब ऊपर दयाभाव उर माहि जी।
सो है उत्तम क्षमा थापि जजूँ याहि जी॥
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्म! अत्र अवतर अवतर संवौषट्। आह्वाननम्।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्म! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः। स्थापनम्।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्म! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। सन्निधिकरणम्।

अष्टक

पद्धरि छन्द

जल गंग नदी को विमल सोड़, धरि रतन पियाले शुद्ध होड़।
यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥१॥
ॐ ह्रीं श्रीउत्तमक्षमाधर्मेभ्यः जन्मजरामृत्यु-विनाशनाय जलं निर्व० स्वाहा।

बावन चन्दन घसि नीर लाय, धरि कनक रकेबी जिन चढ़ाय।
यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥२॥
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मेभ्यः संसारताप-विनाशनाय चन्दनं निर्व० स्वाहा।

अक्षत मुक्ताफलसम जु लाय, अति उच्चल नखशिख शुद्ध भाय।
यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥३॥
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मेभ्यः अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्व० स्वाहा।

शुभ फूल कल्पतरु के अनूप, करि माला सुमन सुगन्ध रूप।
यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥४॥
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मेभ्यः कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्व० स्वाहा।

नाना रस पूरित चरु सम्हाल, शुभ मोदक आदि अनेक धार।
यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥५॥
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मेभ्यः क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्व० स्वाहा।

मणि दीपक सार बनाय लाय, धरि कनकथाल भरि भक्ति भाय।
यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥६॥
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मेभ्यः मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्व० स्वाहा।

श्री दश लक्षण मण्डल विधान

ले धूप अगरुजा अधकार, दुर्भाव हुताशन माहि जार।
यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूजौं मन वच भक्ति आन॥७॥
ह्रीं ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मगाय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
फल नारिकेल बादाम सोई, पुंगीफल खारिक भक्ति जोइ।
यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूजौं मन वच भक्ति आन॥८॥
ह्रीं ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मगाय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
जल चन्दन अक्षत फूल लाव, चरु दीप धूप फल अर्घ भाव।
यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूजौं मन वच भक्ति आन॥९॥
ह्रीं ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मगाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

प्रत्येक अर्घ्य

अडिल्ल

पाप प्रकृति कर जीव अशुभ बंधन करौ।
थावर नामा कर्म उदय दुख को भरौ॥
पृथ्वी माहि सु जाय सहे बहु अथ फला।
तिनका रक्षण भाव क्षमा उत्तम भला॥१॥
ह्रीं ह्रीं पृथ्वीकायिक-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जे जलकायिक जीव ज्ञान बिन दुख लहें।
इक इन्द्रिय के द्वार अतुल विपदा सहें॥
तिनको दुखमय जानि मुनी करुणा धरै।
तसु प्रसादर्ते झटिति मोक्ष वनिता वरै॥२॥
ह्रीं ह्रीं जलकायिक-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अग्निकायिक धर जीव एक इन्द्रिय सही।
नाना दुःख तन सहैं जलै सब जग मही॥
इन पर करुणाभाव धरै जे भवि सही।
सो ही उत्तम क्षमा मोक्षदाता कही॥३॥
ह्रीं ह्रीं अग्निकायिक-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

पवनकाय के जीव महा संकट सहैं।
हाथ पांव मुख वचन थकी बाधा लहें॥
इन पर करुणाभाव जती धारै सही।
सो ही उत्तमक्षमा कही शिव की मही॥४॥
ह्रीं ह्रीं वायुकायिक-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
हरित काय मे प्राणी अति बेदन लहें।
छेदन भेदन कष्ट महा अघ फल सहें॥
इन पर समता भाव सुखी इनको चहैं।
सो ही उत्तम क्षमा धारि मुनि शिव लहें॥५॥
ह्रीं ह्रीं वनस्पतिकायिक-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
थावर के पन भेद पाप फलंतें बने।
सूक्ष्म बादर भेद दोय यों जिन भनें॥
इनको दुखमय जानि दया मन लाय है।
सो ही उत्तम क्षमा जजों शिर नाय है॥६॥
ह्रीं ह्रीं सूक्ष्मस्थूलपंचावर-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
लट अरु जोक गिडोला इल्ली जानिये।
कोड़ी शंख दुइन्द्रिय अति दुख थानिये॥
इन पर करुणाभाव जती धारै सही।
सो ही उत्तम क्षमा जजों शिवकी मही॥७॥
ह्रीं ह्रीं द्वीन्द्रियजीव-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
चोटी कुंथा खटमल बीछू दुखमही।
ते इन्द्रिय परजाय पाय घृण आदि ही॥
इनको दुखमय जानि मुनी करुणा धरै।
सो ही उत्तम क्षमा जजों सब अघ जरै॥८॥
ह्रीं ह्रीं त्रीन्द्रियजीव-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

माखी मच्छर टीडी भँवरादिक सही।
बर्रै ततपड़ा मकड़ी चतुरिन्द्रिय कही॥
इनको दुखिया देखि मुनी करुणा धरै।
सो ही उत्तम क्षमा जजों वसुविधि जरै॥९॥
ह्रीं ह्रीं चतुरिन्द्रियजीव-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
इन्द्रिय पांचों होय, नहीं मन जो लहें।
ते जिय जानि असैनी अघफल अति दहें॥
इनको दुख भरपूर जानि करुणा धरै।
सो ही उत्तम क्षमा जजों शिवधरल धरै॥१०॥
ह्रीं ह्रीं असैनीपंचेन्द्रियजीव-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
नरक जीव अति दुखी पापफलंतें सही।
छेदन भेदन पीर सहैं जात न कहीं॥
इन पर करुणाभाव जती अति लाय है।
सो ही उत्तम क्षमा जजों सुखदाय है॥११॥
ह्रीं ह्रीं नारकीजीव-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

गीता छंद

मनुष्य क्रोध रु मान माया, लोभवश दुखिया घने।
बहुबाह पीड़ा रागद्वेषी, अघ घनो उपजे तिनें॥
तिन देख यतिवर दया लावे, महादीन दयाल जी।
सो धर्म उत्तम क्षमा निर्मल, जजों भाग्य विशालजी॥१२॥
ह्रीं ह्रीं मनुष्यजीव-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
परकार चारो देव गति मे, जीव सुख राचे सही।
लखि देखि परको झुरै नितही, मानतैं पीड़ा कही॥
तिन देखि मुनि उर दया लावे, महा कोमल भावजी।
सो धर्म उत्तम क्षमा पूजौं, अर्घतैं कर चावजी॥१३॥
ह्रीं ह्रीं चतुर्विधदेवजीव-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री दश लक्षण मण्डल विधान

बेसरी छन्द

थावर तिरस जीव जब जोई, चहुँगति करमनि केवशि होई।
तिनको देखि दया उर लाई, सो उत्तम खम धर्म जजाई॥१४॥
ईं ह्रीं त्रसथावर-समस्तजीव-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मंगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

धर्म क्षमा उत्तम बड़ो, सब जीवन सुखदाय।
जर्जै जीव सो पुनि लहै, करै जु शिवपुर जाय॥१॥

बेसरी छन्द

सब जीवन में राग न दोषा, सो है क्षमा धर्म निरदोषा।
दुर्जन कृत उपसर्ग लखावै, ताहू पै समभाव रहावै॥२॥
मुनि को वचन कहै दुखकारी, मरम छेद छदै अघ धारी।
मान खंड किरिया करवावै, तब मुनि क्षमा धर्म मन लावै॥३॥
जे कोई दुष्ट मुनिन को मारै, तीक्ष्ण शस्त्रतै करि परिहरै।
बंधै तन को खेद न पावै, तिनपर क्षमा धर्म मन लावै॥४॥
अति दुखिया जियको ऋषि जानें, तब मुनि अनुकंपा मन आनै।
आपा पर को हित उपजावै, तब मुनि क्षमा धरम मन लावै॥५॥
उत्तम क्षमा धरम सुखदाई, क्षमा धरम सब जियका भाई।
जब मुनिहू पै कष्ट जु आवै, तब मुनि क्षमा धरम मन लावै॥६॥
क्षमा धरमसी ढाल न होई, क्राध समान प्रहार न कोई।
क्षमा समान न बल अति पावै, तातैं जती क्षमा वृष भावै॥७॥
क्षमा धरम शिव राह बताई, क्षमा तात मात अरु भाई।
जातैं सिद्ध सुखुन को पावै, ऐसी क्षमा मुनी मन लावै॥८॥

सोरठा

क्षमा आभूषण सार, उर में जो परिहरे सही।
ते भवसागर पार, जर्जौ धर्म उत्तम क्षमा॥९॥
ईं ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मंगाय पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री दश लक्षण मण्डल विधान

उत्तम मार्दव धर्म पूजा

पद्धरि छन्द

मार्दव वृष भाव विचार सोई, जहँ मान भाव दीखै न कोई।
इह धारी मुनि शिवगामि जानि, मैं जर्जौ थापि मार्दव सुभानि॥
ईं ह्रीं उत्तममार्दवधर्म! अत्र अवतर अवतर संवौषट्। आह्वाननम्।
ईं ह्रीं उत्तममार्दवधर्म! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। स्थापनम्।
ईं ह्रीं उत्तममार्दवधर्म! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। सन्निधिकरणम्।

अथ अष्टक

चाल मणुआनन्द की

क्षीर सम नीर शुद्ध गाल कर लाइये।
पात्र सुवरण विषै धारि गुण गाइये॥
जगत फिरनो मिटै तासु फलतैं सही।
धर्म मार्दव जर्जौ शुद्ध शिवदा मही॥१॥
ईं ह्रीं उत्तममार्दवधर्मंगाय जन्मजरामृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
स्वच्छ नीर संग चंदनादि को मिलाय जी।
शुद्ध गंधयुक्त भक्तिभावतैं चढ़ायजी॥
जगत आताप-हर जानि ता फल सही।
धर्म मार्दव जर्जौ शुद्ध शिवदा मही॥२॥
ईं ह्रीं उत्तममार्दवधर्मंगाय संसारताप-विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
अक्षत समुज्ज्वल खंड बिन जानिये।
सुभग मोती जिसे थाल भरि आनिये॥
ध्रौव्य फलदाय मनलाय ध्याऊँ सही।
धर्म मार्दव जर्जौ शुद्ध शिवदा मही॥३॥
ईं ह्रीं उत्तममार्दवधर्मंगाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
फूल कल्पवृक्ष के गंध रंग सारजी।
माल गुंथि शुद्धभाव भक्ति कर धारजी॥

श्री दश लक्षण मण्डल विधान

मदन मद हरन सुफल जानि यातैं सही।
धर्म मार्दव जर्जौ शुद्ध शिवदा मही॥४॥
ईं ह्रीं उत्तममार्दवधर्मंगाय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
सुभग रस शुद्ध नैवेद्य मन लाइये।
मोदकादि शुद्ध भक्तिभावतैं चढ़ाइये॥
दीप्त रतनमयी नाश तमको करा।
कनक पातर विषै भक्तिभावतैं धरा॥
नाश अज्ञान है तासु फलतैं सही।
धर्म मार्दव जर्जौ शुद्ध शिवदा मही॥५॥
ईं ह्रीं उत्तममार्दवधर्मंगाय मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
धूप दशगंध शुभ लेय मन मानिये।
अगर चंदन सबै मेलि शुभ ठानिये॥
अमिन संग खेड़ये कर्म जालन सही।
धर्म मार्दव जर्जौ शुद्ध शिवदा मही॥६॥
ईं ह्रीं उत्तममार्दवधर्मंगाय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
श्रीफलादि लौंग पुंगीफलादि जानिये।
शुद्ध बादाम खारक भले आनिये॥
सिद्ध थानक लहै तासु फलतैं सही।
धर्म मार्दव जर्जौ शुद्ध शिवदा मही॥७॥
ईं ह्रीं उत्तममार्दवधर्मंगाय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
नीर चंदन अखिल पुष्प चरु दीप जी।
धूप फल अरघकर भाव शुद्ध टीपजी॥

श्री दशलक्षण मण्डल विधान

लोक में फिरन, तन धरन मिटि है सही।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवपदा मही॥१०॥
ॐ ह्रीं उत्तममार्दवधर्मगाया अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।

प्रत्येक अर्घ्य

चाल मणुयणन्द की

देव वीतराग सर्वज्ञ तारक सही।
दोष अष्टादशों तासु माहीं नहीं॥
नमन तिन पद करें धर्म मार्दव कहा।
सो जजों चारि गति माँहि भरमत दहा॥१॥
ॐ ह्रीं श्रीवीतरागदेव-पद-नमन-मार्दवधर्मगाया अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

वीतराग देव कही वांनि सो धर्म है।
ता सुनै जीव निज ह्वै भाव भर्म है।
मन वचन काय श्रुतपाद सिर नाय है।
सो जजों चारि गति माँहि भरमत दहा॥२॥
ॐ ह्रीं श्रीजिनधर्म-पद-नमन-मार्दवधर्मगाया अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।

धर्म को सेव तप लेय कर्म जार जी।
भव सिद्ध देव तन रहित सुखकारजी॥
लेय इन नाम मन वचन शिर नाय है।
सो जजों चारि गति माँहि भरमत दहा॥३॥
ॐ ह्रीं श्रीसिद्ध-पद-नमन-मार्दवधर्मगाया अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।

धारि छत्तीस गुण सुरि सुखदायजी।
धर्म तप भाव सों गुप्त धरि भायजी॥
मान तजि नमन इन पद विषैं लायो।
सो जजों चारि गति माँहि भरमत दहा॥४॥
ॐ ह्रीं श्रीआचार्य-पद-नमन-मार्दवधर्मगाया अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।

धारि गुण पाँच अरु बीस उवझायजी।
और भी अनेक गुण पास तिन थायजी॥
मान तजि इन चरण कायको नायो।
सो जजों चारि गति माँहि भरमत दहा॥५॥
ॐ ह्रीं श्रीउपाध्याय-पद-नमन-मार्दवधर्मगाया अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।

क्षेत्र अतिशय तहाँ धर्म को धाय है।
नमन बहु जिय करै देव गुण गाय है॥
मान तजि क्षेत्र शुभ जानि शिर नायो।
सो जजों चारि गति माँहि भरमत दहा॥६॥
ॐ ह्रीं श्रीअतिशयक्षेत्र-नमन-मार्दवधर्मगाया अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।

देव जिनकी सु प्रतिमा अकृत्रिम इसी।
रूप द्युति ध्यानमुद्रा कही जिन जिसी॥
मान तजि शीश इन चरण को सुनायो।
सो जजों चारि गति माँहि भरमत दहा॥७॥
ॐ ह्रीं श्रीअकृत्रिमजिनचैत्य-पद-नमन-मार्दवधर्मगाया अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।

सुरग धानक विषै देव जिनके सही।
रतनमय जैन बिम्ब बिगर किये हैं मही॥
मान तजि शीश इन चरणको सुनायो।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पायो॥८॥
ॐ ह्रीं श्रीऊर्ध्वलोकसम्बन्धिजिनचैत्य-नमन-मार्दवधर्मगाया अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।

ज्योतिषी व्यन्तरा थान मध्यलोकजी।
बिन किये चैत्य जिन कहे अघ रोकजी॥
मान तजि शीश इन चरणको सुनायो।
सो जजों चारि गति माँहि भरमत दहा॥९॥
ॐ ह्रीं श्रीमध्यलोकसम्बन्धिजिनचैत्य-नमन-मार्दवधर्मगाया अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।

भवन देवनि विषैं बहुत जिनरायजी।
बिम्ब अकृत्रिम कहे सेय तसु पायजी॥
मान तजि शीश इन चरणको सुनायो।
सो जजों चारि गति माँहि भरमत दहा॥१०॥
ॐ ह्रीं श्रीअधोलोकसम्बन्धिजिनचैत्य-पद-नमन-मार्दवधर्मगाया अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।

आदि इन पूज्य थानक बहुत हैं सही।
सिद्ध क्षेत्र मोक्ष फलदाय तीर्थ सही॥
मान तजि शीश इन चरणको सुनायो।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पायो॥११॥
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धक्षेत्र-पद-नमन-मार्दवधर्मगाया अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।

जयमाला

बेसरी छन्द

मार्दव धर्म मान को खोवै, ताफल जगत पूज्य फल होवै।
मार्दव सकल दोष निवारै, ताफल आप तिरै अनि तारै ॥१॥
मार्दव धर्म इन्द्र सुर पूजै, मार्दव धर्म भजै अघ भूजै।
मार्दव मान हरै सुखकारै, ताफल आप तिरै अनि तारै ॥२॥
मार्दव धर्म महा नर ध्यावै, मार्दव धर्म हानि नहिं पावै।
यह मार्दव वृष शिवथल धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै ॥३॥
मार्दव सबको राखै माना, मार्दव सब धरमनि में दाना।
मार्दव धरम जीव जे धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै ॥४॥
मार्दव धरम सुगुण केरा, उपद्रव नाशि हरै भवफेरा।
मार्दव उत्तम पुरुष सु धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै ॥५॥
मार्दव मोक्षमार्ग को दाता, मार्दव धर्म सकल जग त्राता।
मार्दव वृष गुणवत्ता धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै ॥६॥
मार्दव धर्म कल्पतरु भाई, मार्दव मनवांछित फलदाई।
मार्दव धरम मुकुट जो धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै ॥७॥

श्री दशलक्षण मण्डल विधान

मार्दव धरम कनक में मीना, मार्दव धारि सकै न कमीना।
मान मार मार्दव वृष धारै, ताफल आप तिरै अनै तारै ॥८॥
मार्दव वृष सब धर्म प्रमाना, मार्दव मोह मल्ल को हाना।
मार्दव-माल पुरुष उर धारै, ताफल आप तिरै अनै तारै ॥९॥
दोहा
मान मार मार्दव करै, हरै पाप मल सोय।
जगत छुड़ावै शिव करै, ते मो रक्षक होय ॥१०॥
ॐ ह्रीं उत्तममार्दवधर्मंगाथ पूर्णाघ्यं निर्व० स्वाहा।

उत्तम आर्जव धर्म पूजा

बेसरी छन्द

जग परपंच रहित जो भावा, सरल चित्त सबसे निरदावा।
तिनको आर्जव भाव सुकहिये, सो ह्याँ थापि पूज फल लहिये ॥१॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्म! अत्र अवतर अवतर संवौषट्। आह्वाननम्।
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्म! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। स्थापनम्
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्म! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। सन्निधिकरणम्।
अष्टक
क्षीर समुद्र का उज्ज्वल नीरा, कनक पियाले धरि अति धीरा।
जरा रोग नाशनको भाई, आर्जव भाव नमो शिरनाई ॥१॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्मगाय जन्मजरामृत्यु-विनाशनाय जलं निर्व० स्वाहा।
चन्दन बावन जल घसि लाया, कनकपात्रा में धरि उमगाया।
शोकानल तप नाशन भाई, आर्जव भाव नमो शिरनाई ॥२॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्मगाय संसारताप-विनाशनाय चन्दनं निर्व० स्वाहा।
अक्षत मुक्ताफल से जानी, उज्ज्वल खण्ड विवर्जित आनी।
क्षय नहि होय इसो पद दाई, आर्जव भाव नमो शिरनाई ॥४॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्मगाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्व० स्वाहा।
फूल सुगन्ध कल्पद्रुम लाया, तथा सुवर्ण रजतमय भाया।
तिनकी माल गुँथि कर लाई, आर्जव भाव नमो शिरनाई ॥५॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्मगाय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्व० स्वाहा।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान

नाना रस नैवेद्य करावै, मोदक आदि भक्ति तैं लावै।
भूख व्याधि नाशन को भाई, आर्जव भाव नमो शिरनाई ॥६॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्मगाय क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्व० स्वाहा।
दीपक रतन थालि धरि लीजै, मन वचकाय शुद्धि कर लीजै।
घाति अज्ञान ज्ञान दरशाई, आर्जव भाव नमो शिरनाई ॥७॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्मगाय मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्व० स्वाहा।
धूप अगरजा चन्दन भीनी, गंध सहित निज करमें लीनी।
कर्म दहनको अग्नि जराई, आर्जव भाव नमो शिरनाई ॥८॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्मगाय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्व० स्वाहा।
ले नारियल बादाम सुपारी, खारिक लौंग आदि हितकारी।
सिद्धलोक बांछा मनमाहीं, आर्जव धरम जजों शिरनाई ॥९॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्मगाय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्व० स्वाहा।
जल चन्दन अक्षत कुमारी, चरु दीपक फल धूप विधारी।
अर्घ्य लेय मनवचन भाई, आर्जव धरम नमों शिरनाई ॥१०॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्मगाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।

अथ प्रत्येक अर्घ्य

बेसरी छन्द

गुण छ्यालीस जहाँ प्रभु तेरा, अष्टादश तहाँ दोष न हेरा।
तिनपद सरल भाव शिरनावे, सो आर्जव वृष जजि शिव पावै ॥१॥
ॐ ह्रीं श्रीषट्त्वारिंशत्-गुणसहित-जिनचरणन-आर्जवधर्मगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
मूक जीव अरहंत थुति कीजै, मन वच कुटिल भाव तज दीजै।
तिनपद सरल भाव शिरनावे, सो आर्जव वृष जजि शिव पावै ॥२॥
ॐ ह्रीं श्रीमुकजीव-अरहंतपदनमन-आर्जवधर्मगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
कर्म काटि शिवलोक सिधारै, सिद्ध सुदेव होय अध सारै।
तिनपद सरल भाव शिरनावे, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥३॥
ॐ ह्रीं श्रीसिद्ध-पद-नमन-आर्जवधर्मगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
सिद्धशिला पैंतालीस लाखा, योजन विस्तृत जिन वच भाषा।
तत्रस्थित आत्म शिर नावे, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥४॥
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धशिलास्थित-मुक्तात्मपदनमन-आर्जवधर्मगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान

गुण छत्तीस सुधारक सूरा, आचारज सब गुण भरपूरा।
तिनपद सरल भाव शिरनावे, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥५॥
ॐ ह्रीं श्रीआचार्य-पद-नमन-आर्जवधर्मगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
आचारज सब गुण भरपूरा, आचारादि गुणयुत सूरा।
तिनपद सरल भाव शिरनावे, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥६॥
ॐ ह्रीं श्रीआचार्य-पद-परोक्षनमन-आर्जवधर्मगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
गुण पच्चीस उपझाय सु मोही, ग्यारह अंग चौदह पूरवीही।
तिनपद सरल भाव शिरनावे, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥७॥
ॐ ह्रीं श्रीउपाध्याय-पद-नमन-आर्जवधर्मगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
बहु गुण धर उपझाय सु जानो, दुरिहै तैं तिनको चित्त आनो।
तिनपद सरल भाव शिरनावे, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥८॥
ॐ ह्रीं श्रीउपाध्याय-परोक्ष-नमन-आर्जवधर्मगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
बीस आठ गुण साधन साधा, सो नहि लहे जगत की बाधा।
तिनपद सरल भाव शिरनावे, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥९॥
ॐ ह्रीं श्रीसाधु-पद-नमन-आर्जवधर्मगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
दुरिहेंते मुनि गुण जु चितारै, मनवचकाया निज वश धारै।
तिनपद सरल भाव शिरनावे, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥१०॥
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुनिपरोक्ष-पद-नमन-आर्जवधर्मगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
वरणविहीन सु जिनवर वाणी, तिनको सुनि सुख पावै प्राणी।
तिनपद सरल भाव शिरनावे, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥११॥
ॐ ह्रीं श्रीजिनवाणी-नमन-आर्जवधर्मगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
अतिशय क्षेत्र सु तीर्थ थापा, यात्री गण के पुरे कामा।
तिनपद सरल भाव शिरनावे, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥१२॥
ॐ ह्रीं श्रीअतिशयक्षेत्र-नमन-आर्जवधर्मगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
शिखर सम्मेद आदि सिद्धथाना, तहँ मुनि लिय कर्मेशनाना।
तिनपद सरल भाव शिरनावे, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥१३॥
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धक्षेत्र-नमन-आर्जवधर्मगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान

बिगर किये जिनलिंब अनुपा, लक्षण चिन्ह जानि जिन रूपा।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै॥४॥
ॐ ह्रीं आर्जवजिनाय-पद-नमन-आर्जवधर्माय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
कुत्रिम जे जिनबिंब बिराजै, विनय सहित पुन दायक छाजै।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै॥५॥
ॐ ह्रीं कृत्रिमजिनचैत्य-पद-नमन-आर्जवधर्माय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
इत्यादिक बहु क्षेत्र सुथाना, पूजनीक तीरथ अथ हाना।
तिनपद सरलभाव शिरनावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै॥६॥
ॐ ह्रीं सकलपूज्यस्थानक-पद-नमन-आर्जवधर्माय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

सरल भाव सारै सरस, सुरनर पूज्य महान।

तातैं तजनी कुटिलता, आर्जव भाव लहान॥१॥

बेसरि छन्द

सरल भाव समता उर आनै, सरल भाव सब अवगुन भानै।
आर्जव भाव धरै जो जीवा, तिनने जिनवानी रस पीवा॥२॥
आर्जव भाव धरै जे प्रानी, तिनके होनहार शिवरानी।
दोषभाव तिनतैं नहीं छीवा, आर्जवभाव धरै जे जीवा॥३॥
आर्जव भाव अमर पद ध्यावै, आर्जव में अवगुन नहिं पावै।
कुटिल भाव विष जिन नहिं पीवा, आर्जवभाव धरै जे जीवा॥४॥
आर्तभाव आर्जव ही खोवै, आर्जवभाव पापमल धोवै।
रोग-शोक ताको नहिं छीवा, आर्जवभाव धरै जो जीवा॥५॥
आर्जव शुद्ध भाव जिन पाया, तिनने लहि पुन पाप गमाया।
अनुभव आनन्द तामैं छीवा, आर्जवभाव धरै जे जीवा॥६॥
आर्जवभाव दोष सब खोवै, आर्जव कर्म कालिमा धोवै।
शुद्ध सुभाव सु तानै लीवा, आर्जवभाव धरै जे जीवा॥७॥
आर्जवभाव सकल को प्यारा, आर्जवभाव भ्रमणतैं न्यारा।
ताकों और रुचे न मतीवा, आर्जवभाव धरै जे जीवा॥८॥

श्री दशलक्षण मण्डल विधान

आर्जव जब शिव के सुख ठाने, आर्जवभाव पूर्व अध भाने।
अद्भुत आपापर भिन कीवा, आर्जवभाव धरै जे जीवा॥९॥

दोहा

अन्तरंग निरदोष कें, प्रगटै आर्जवभाव।
जाके फल मरती मिटै, छुटै कर्म को दाव ॥१०॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्माय पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

उत्तम शौच धर्म पूजा

बेसरि छन्द

शौच धर्म पर-चाह निवारै, तनतैं हूँ ममता निरवारै।
जग वांछा तजि निर्मल भावा, शौचधर्म पूजौं कर चावा॥१॥
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माय अत्र अवतर अवतर संवौषट्। आह्वानम्।
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माय अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। स्थापनम्।
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माय अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। सन्निधिकरणम्।

अष्टक

पद्धरि छन्द

जल क्षीरसमुद्र को सुभग लाय, धरि कनकपात्र में भक्ति भाय।
तन धन मिटै बहुफल सुजान, मैं शौचधर्म जजि हर्ष आन॥२॥
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माय जन्मजरामृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
घसि बावन चन्दन नीर आन, अलि गुंजन मानों करत गान।
धरि कनक पियाले भक्ति जान, मैं शौचधर्म जजि हर्ष आन॥३॥
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माय संसारताप-विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
उज्ज्वल अखण्ड शुभ गंधदाय, अक्षत अनूप लखि शशि लजाय।
कन-पात्र विषैं धरि भक्ति आन, मैं शौचधर्म जजि हर्ष आन॥४॥
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
ले फूल कल्पद्रुम के मनोग, आसक्त भ्रमर चित्त करत भोग।
तिन गुंथि माल उर भक्ति ठान, मैं शौचधर्म जजि हर्ष आन॥५॥
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान

शुभ मोदक आदि अनेक भाय, रसनांजन नैवेद्य लाय।
धरि पुष्ट थाल में भक्ति ठान, मैं शौचधर्म जजि हर्ष आन॥६॥
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माय क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
मणि दीपक वा घृतमय संजोय, मनविषिद्ध मोहतम नाश होय।
उर ज्ञान प्रकाश करै महान, मैं शौचधर्म जजि हर्ष आन॥७॥
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माय मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
शुभ धूप अगरजा गंध लाय, कन धूपवन ताको दिखवाय।
मिस धूम मनौ वसुविधि उड़ान, मैं शौचधर्म जजि हर्ष आन॥८॥
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
ले फल बिदाम खारिक अनूप, अरु पूर्णफल आदिक स्वरूप।
धरि भक्तिभाव मनमाहिं सोय, मैं शौचधर्म जजि हर्ष होय॥९॥
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
जल गंधाक्षत वर-कुसुम होय, चरु दीप धूप फल सुभग जोय।
कर अर्घ्य धरौं कनपात्र लाय, मैं जजों शौचवर भक्ति भाय॥१०॥
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

प्रत्यकार्घ्य

खाल मनुष्यानन्द की

देव के सकल सुख जानि चंचलमीय।
आयु पल्य सागर की तुरत ही क्षय गयी॥
जानि सब अधिर उर भाव निर्मल करै।
पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धरै ॥११॥
ॐ ह्रीं देवसुख-वांछाविहीन-शौचधर्माय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
चाह चक्री तने सुखुन की उर नहीं।
सहस छिन्नवैं तिया और षट्खंड मही॥
जानि सब अधिर उर भाव निर्मल करै।
पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धरै ॥१२॥
ॐ ह्रीं चक्रिपदभोगावांछाविहीन-शौचधर्माय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान

खण्ड तीन को जु राज नारि बहु जानिये।
चारि विधि सैन सुर नर खगादि मानिये॥
जानि सब अधिर उर भाव निर्मल करै।
पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धरै ॥३॥
ॐ ह्रीं नायोपभोग-वांछाविहीन-शौचधर्माय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
कामदेव को सुरूप देखि देव मन हरै।
भोग वांछित सकल देव सेवा करै॥
जानि सब अधिर उर भाव निर्मल करै।
पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धरै ॥४॥
ॐ ह्रीं कामदेवभोग-वांछाविहीन-शौचधर्माय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
आठ परकार सपरस विषै जानिये।
द्रव्य क्षेत्र काल अनुसार भाव मानिये॥
जानि सब अधिर उर भाव निर्मल करै।
पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धरै ॥५॥
ॐ ह्रीं स्पर्शेन्द्रियभोग-वांछाविहीन-शौचधर्माय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पांच परकार रस जानि शुभ सारजी।
भोग वांछा सभी जगत दुखकारजी॥
जानि सब अधिर उर भाव निर्मल करै।
पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धरै ॥६॥
ॐ ह्रीं रसनेन्द्रियभोग-वांछाविहीन-शौचधर्माय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
घ्राण इन्द्रियतने गंध दो हैं सही।
ताहि अनुकूल पाय जीव सता लही॥
जानि सब अधिर उर भाव निर्मल करै।
पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धरै ॥७॥
ॐ ह्रीं घ्राणेन्द्रियभोग-वांछाविहीन-शौचधर्माय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3105.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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