दशलक्षणधर्म-पूजा
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अनुक्रमणिका
| क्र. | विवरण |
|---|---|
| 1 | अंगपूजा |
| 2 | समुच्चय जयमाला |
| 3 | बेसरि छन्द |
| 4 | दोहा |
| 5 | गीता छंद |
| 6 | पद्धरि छन्द |
| 7 | गीता छंद |
| 8 | बेसरि छन्द |
| 9 | भुजंगप्रयात छन्द |
| 10 | त्रिभंगी छन्द |
| 11 | चौपाई |
| 12 | सोरठा |
| 13 | मण्डलमध्ये पुष्पांजलिं क्षिपेत् |
| 14 | समुच्च्य पूजा |
| 15 | त्रिभंगी छन्द |
| 16 | मण्युणांणद की चाल |
| 17 | जयमाला |
| 18 | दोहा |
| 19 | बेसरि छन्द |
| 20 | दोहा |
| 21 | उत्तम क्षमा धर्म पूजा |
| 22 | अडिल्ल |
| 23 | अष्टक |
| 24 | पद्धरि छन्द |
| 25 | प्रत्येक अर्घ्य |
| 26 | अडिल्ल |
| 27 | गीता छंद |
| 28 | बेसरी छन्द |
| 29 | जयमाला |
| 30 | बेसरी छन्द |
| 31 | सोरठा |
| 32 | उत्तम मार्दव धर्म पूजा |
| 33 | पद्धरि छन्द |
| 34 | अथ अष्टक |
| 35 | चाल मणुआनन्द की |
| 36 | प्रत्येक अर्घ्य |
| 37 | जयमाला |
| 38 | उत्तम आर्जव धर्म पूजा |
| 39 | अथ प्रत्येक अर्घ्य |
| 40 | जयमाला |
| 41 | सरल भाव सारै सरस, सुरनर पूज्य महान्। |
| 42 | बेसरि छन्द |
| 43 | दोहा |
| 44 | उत्तम शौच धर्म पूजा |
| 45 | बेसरि छन्द |
| 46 | अष्टक |
| 47 | पद्धरि छन्द |
| 48 | प्रत्यकार्घ्य |
| 49 | खाल मनुष्यानन्द की |
कविवर द्यानतराय
अडिल्ल
उत्तम क्षमा मारदव आरजव भाव हैं,
शौच सत्य संयम तप त्याग उपाव हैं।
आकिंचन ब्रह्मचर्य धरम दर सार हैं,
चहूँगति-दुख तैं काढ़ि मुकति करतार हैं।।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्मा। अत्र अवतर अवतर संवौषट्।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्मा। अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्मा। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
सोरठा
हेमाचल की धार, मुनि-चित सम शीतल सुरभि।
भव-आपात निवार, दस-लच्छन पूजौं सदा।।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशर्लक्षण-शौच-सत्य-संयम-तपस्त्यागाकिञ्चन्य ब्रह्मचर्याणीति दशलक्षणधर्माय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
चन्दन केशर गार, होय सुवाय दशों दिशा। भव।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय संसार तापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
अमल अखण्डित सार, तन्दुल्ल चन्द्र समान शुभ। भव।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय अक्षयपद प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
फूल अनेक प्रकार, महकें ऊरध-लोकलौं। भव।
ॐह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय कामबाणविनाशनाय पुष्पाणि निर्वपामीति स्वाहा।
नेवज विविध निहार, उत्तम षट्रस-संयुगत। भव।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय क्षुधा रोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
बाति कपूर सुधार, दीपक-ज्योति सुहावनी। भव।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
अगर धूप विस्तार, फैले सर्व सुगन्धता। भव।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
फल की जाति अपार, घ्रान-नयन-मनमोहने। भव।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
आठों दरब संवार, ‘द्यानत’ अधिक उछाह सों। भव।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय अनर्घ पद प्राप्तये अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
अंगपूजा
सोरठा
पीड़ें दुष्ट अनेक, बाँध मार बहुविधि करें।
धरिये क्षमा विवेक, कोप न कीजै पीतमा।।
चौपाई
उत्तम क्षमा गहो रे भाई, इह भव जस पर-भव सुखदाई।
गाली सुनि मन खेदन आनौ, गुन को औगुन कहै अयानो।।
गीता छन्द
कहि है अयानो वस्तु छोनैं, बाँध मार बहुविधि करें।
घर तैं निकारै तन विदारै, बैर जो न तहाँ धरै।।
तैं करम पूरब किये खोटे, सहै क्यों नहीं जीयरा।
अति क्रोध-अग्नि बुझाय प्रानी, साध्यजल ले सीयरा।।१।।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
मान महाविष रूप, करहिं नीच-गति जगत् में।
कोमल सुधा अनूप, सुख पावै प्रानी सदा।।
उत्तम मार्दव-गुन मन माना, मान करन को कौन ठिकाना।
वस्यो निगोद माहि तैं आया, दमरी रुकन भाग बिकाया।।
रुकन बिकाया भागवश तैं, देव इकेन्द्री भया।
उत्तम मुआ चाण्डाल हूवा, भूप कीड़ों में गया।।
जीतव्य जीवन धन गुमान, कहा करै जल-बुदबुदा।
करि विनय बहु-गुन बड़े जन की, ज्ञान का पावै उदा।।२।।
ॐ ह्रीं उत्तममार्दवधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
कपट न कीजै कोय, चोरन के पुर ना बसैं।
सरल सुभावी होय, ताके घर बहु सम्पदा।।
उत्तम-आर्जव रीति बखानी, रंचक दगा बहुत दुखदानी।
मन में हो सो वचन उच्चरिये, वचन होय सो तन सों करिये।।
करिये सरल तिहुँ जोग अपने, देखि निरमल आरसी।
मुख करै जैसा लक्खै तैसा, कपट-प्रीति अंगार-सी।।
नहीं लहै लक्ष्मी अधिक छल करि, करमबन्ध-विशेषता।
भय त्यागि दुख बिलाव पीवै, आपदा नहिं देखता।।३।।
ॐ ह्रीं उत्तमार्जवधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
धरहिं हिरदै सन्तोष, करहु तपस्या देह सों।
शौच सदा निरदोष, धरम बड़ो संसार में।।
उत्तम शौच सब जग जाना, लोभ पाप को बाप बखाना।
आशा-पास महा दुखदानी, सुख पावै सन्तोषी प्रानी।।
प्रानी सदा शुचि शील जप-तप, ज्ञान-ध्यान प्रभाव तैं।
नित गंग जमुन समुद्र ह्नाये, अशुचि-दोष सुभाव तैं।।
ऊपर अमल भरयो भीतर, कौन विधि घट शुचि कहैं।
बहु देह मैली सगुन थैली, शौच-गुन साधु लहैं।।४।।
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
कठिन वचन मत बोल, परनिन्दा अरु झूठ तज।
साँच जवाहर खोल, सतवादी जग में सुखी।।
उत्तम सत्य व्रत पालीजे, पर विश्वासघात नहीं कीजे।
साँचे-झूठे मानुष देखो, आपन पूत स्वपास न पेखो।।
पेखो तिहायत पुरुष साँचो को दरब सब दीजिये।
मुनिराज-श्रावक की प्रतिष्ठा साँच गुण लख लीजिये।।
ऊँचे सिंहासन बैठो वसुनृप, धरम का भूपति भया।
वच झूठ सेती नरक पहुँचा, सुरग में नारद गया ।।५।।
ॐ ह्रीं उत्तमसत्यधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
काय छहों प्रतिपाल, पंचेन्द्री मन वश करो।
संयमरतन संभाल, विषय-चोर बहु फिरत हैं।।
उत्तम संयम गहु मन मेरे, भव-भव के भार्जे अघ तेरे।
सुरग नरक पशुगति में नाहीं आलस हरन करन सुख ठाहीं।।
ठाही पृथ्वी जल आग मारुत, रुख त्रस करुणा धरो।
सपरसन रसना घ्रान नैना, कान मन सब वश करो।।
जिस बिना नहिं जिनराज सीझे, तू रुल्लयो जग-कीच में।
इक धरी मत विसरो करो नित, आव जम-मुख बीच में ।।६।।
ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
तप चाहै सुरराय, करम-शिखर को वज्र है।
द्वादशविधि सुखदाय क्यों न करै जिन सक्ति सम।।
उत्तम तप सब माहिं बखाना, करम-शैल को वज्र समाना।
वस्यो अनादि निगोद-मंझारा, भूविकलयत्र पशुतन धारा।।
धारा मनुष्य तन महादुर्लभ, सुकुल आव निरोगता।
श्री जैनवानी तत्वज्ञानी, भई विषय-पयोगता।।
अति महा-दुर्लभ त्याग विषय-कषाय जो तप आदरै।
नर-भव अनूपम कनक घर पर, मणिमयी कलसा धरै ।।७।।
ॐ ह्रीं उत्तमत्तपोधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दान चार परकार, चार-संघ को दीजिए।
धन बिजुली उनहार, नर-भव-लाहो लीजिए।।
उत्तम त्याग कहो जग सारा, औषध शास्त्र अभय आहारा।
निहचै राग-द्वेष निरवारै, ज्ञाता दोनों दान संभारै।।
दोनों संभारै कूप-जलसम, दरब घर में परिनिया।
निज हाथ दीजे साथ लीजे, खाय खोया बह गया।।
धनि साध शास्त्र अभय-दिवैया, त्याग राग विरोध को।
बिन दान श्रावक साधु दोनों, लहें नाहीं बोध को ।।८।।
ॐ ह्रीं उत्तमत्यागधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
परिग्रह चौबीस भेद, त्याग करै मुनिराज जी।
तिसना भाव उच्छेद, घटती जान घटाड़ए।।
उत्तम आकिंचन गुण जानो, परिग्रह चिंता दुख ही मानो।
फाँस तनक-सी तन में सालै, चाह लँगौटी की दुख भालै।।
भालै न समता सुख कभी नर, बिना मुनि मुद्रा धरै।
धनि नगन पर तन-नगन ठाड़े, सुर असुर पायनि परै।।
घर-माहिं तिसना जो घटावै, रुचि नहीं संसार सों।
बहु धन बुरा हू भला कहिये, लीन पर-उपगार सों ।।९।।
ॐ ह्रीं उत्तमाकिंचन्यधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
शील-बाड़ नौ राख, ब्रह्मा-भाव अन्तर लखो।
करि दोनों अभिलाख करहु सफल नरभव सदा।।
उत्तम ब्रह्मचर्य मन आनो, माता-बहिन-सुता पहिचानी।
सहें बान-बरषा बहु सूरे, टिकै न नैन-बान लखि कुरै।।
कुरै तिया के अशुचि तन में, काम-रोगिनी रति करै।
बहु मृतक सड़हिं मसान माँहीं, काग ज्यों चोंचै भरै।।
संसार में विष-बेल नारी, तजि गये जोगीश्वरा।
‘धानत’ धरम दश पैंडि चढ़िकै, शिव-महल में पग धरा ।।१०।।
ॐ ह्रीं उत्तमब्रह्मचर्यधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
समुच्चय जयमाला
दश लच्छन बन्दौं सदा, मन-वांछित फलदाय।
कहाँ आरती भारती, हम-पर होहु सहाय।।
बेसरि छन्द
उत्तम छिमा जहाँ मन होई, अन्तर बाहिर शत्रु न कोई।
उत्तम मार्दव विनय प्रकासै, नाना भेद ज्ञान सब भासै।।
उत्तम आर्जव कपट मिटावै, दुर्गति त्यागि सुगति उपजावै।
उत्तम शौच लोभ परिहारी, सन्तोषी गुण-रतन-भंडारी।।
उत्तम सत्य-वचन मुख बोलै, सो प्राणी संसार न डोलै।
उत्तम संयम पालै ज्ञाता, नर-भव सफल करै ले साता।।
उत्तम तप निरवांछित पालै, सो नर करम-शत्रु को टालै।
उत्तम त्याग करै जो कोई, भोगभूमि-सुर-शिवसुख होई।।
उत्तम आकिंचन व्रत धारै, परम-समाधि-दशा विस्तारै।
उत्तम ब्रह्मचर्य मन लावै, नर-सुर सहित मुक्तिफल पावै।।
दोहा
करै करम की निरजरा, भव-पींजरा विनाश।
अजर-अमर पद को लहें, ‘धानत’ सुख की राश।।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमा-मार्दवार्जव-शौच-सत्यम-संयम-तपस्या-गाकिंचन्य-
ब्रह्मचर्यदशलक्षणधर्माय पूर्णाघ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
।। पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् ।।
नेमीनाथो, दे तो साथो, भव भव और न चाहूँ।
भक्ति तिहारी, निशिदिन मन वच काय लाय करि गाऊँ।।
धर्म कहो तुम, वानी दशविधि, सो मोहि होउ सहाई।
करुणासागर, समरस गंभित, शीश नमों श्रुति गाई।।१।।
गीता छंद
धर्म के दश कहे लक्षण, तिन थकी जिय सुख लहै।
भवरोग को यह महा औषधि, मरण-जामन दुःख दै।।
यह वरत नीका, मीत जी का, करो आदरतै सही।
मैं जजों दशविधि धर्म के अंग, तासु फल है शिवमही।।२।।
पद्धरि छन्द
यह धर्म भवदधि नाव जान, या सेयें भवदुख होय हान।
यह धर्म कल्पतरु सुखद पूर, मैं पूजों भवदुख करन दूर।।३।।
गीता छंद
यह वरत मन-कपि गले फाँसी, सांकली सम जानिये।
गज-अक्षीन जीवन सिंह जैसी, मोहतम रवि मानिये।।
सुरथान माहीं वरत नाहीं, मनुजहुँ शुभ कुल लहै।
तातै सुअवसर है भलो, अब करों पूजा धुनि कहै।।४।।
बेसरि छन्द
जाने दशलक्षण व्रत कीना, ते सत्यरूपनि में परवीना।
भवसागर फिरनो मिट जावै, जो नर दशलक्षण वृष भावे।।५।।
भुजंगप्रयात छन्द
यही धर्म सारै, करै पाप क्षारै, यही धर्म सारै, करै सुख अपारै।
यही धर्म धीरा, हरै लोकपीरा, यही धर्म मीरा करै लोकतीरा।।६।।
१. तुम्हारा साथ। २. जीव का मित्र। ३. इन्द्रियरूपी हाथी को। ४. स्वर्ग। ५. धर्म।
६. प्रधान।
त्रिभंगी छन्द
यह धर्म हमारा, सब जग प्यारा, जगत् उधारा हितदानी।
यह दशविधि गाया, जन-मन भाया, उच्च बताय जिनवानी।।
यह शिव करतारा, अबतैं न्यारा, भवि उद्धारा मुनि धारा।
ताको मैं ध्याऊँ, शीश नवाऊँ, अर्घ चढ़ाऊँ सुखकारा।।७।।
चौपाई
या व्रत की महिमा कहै वीर, दशविधि धर्म हरै भवपीर।
इसी धर्म बिन जग भरमाय, जजुँ धर्म अति दुरलभ पाय।।८।।
दश प्रकार को धर्म यह, दशविधि सुरतरु जान।
वांछित पद सेवक लहै, अधिक कहा सुखदान।।९।।
सोरठा
धर्म हमारा नाथ, धर्म जगत् का सेहरा।
भव भव में हो साथ, और न वांछा मनविषै।।१०।।
मण्डलमध्ये पुष्पांजलिं क्षिपेत्
समुच्च्य पूजा
त्रिभंगी छन्द
यह धर्म क्षमा वा, मान गुणभावा, सरल सुभावा सतिवानी।
शुचि भाव करावा, संयम लाबा, तप करवावा अधिकानी।।
शुचि त्याग बतावै, नगन पुजावै, शील बढ़ावै शिवदाई।
यह धर्म दशारा, थाप करारा, पूजन धारा शिरनाई।।११।।
ह्रीं ह्रीं दशलक्षणधर्म! अत्र अवतर अवतर संवौषट्। आह्वाननम्।
ह्रीं ह्रीं दशलक्षणधर्म! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। स्थापनम्
ह्रीं ह्रीं दशलक्षणधर्म! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। सन्निधिकरणम्।
मण्युणांणद की चाल
क्षीरसागर तना नीर शुभ लाये।
कमक झारी विषै धार गुण गाइये।
मरण उत्पत्ति नहीं होय तो फल सही।
जानि इमिधर्म दश जाजों शिवमही।।१२।।
ह्रीं ह्रीं दशलक्षणधर्मभ्यो जन्मजरामृत्यु-विनाशनाय जलं निर्व० स्वाहा।
नीर संग अगर चन्दन घिस लायजी।
सुभग पातर विषै धारि धृति गायजी।।
जगत् ताप तासु फल तुरत नाशें सही।
जानि इमिधर्म दश जाजों शिवमही।।१३।।
ह्रीं ह्रीं दशलक्षणधर्मभ्यो संसारताप-विनाशनाय चन्दनं निर्व० स्वाहा।
लेय अक्षत भले मुक्तिफल से कहे।
ऊजले अखण्ड सुभग स्वर्ग पातर लहे।
अक्षयपद पावनै ताप मनमें सही।
जानि इमिधर्म दश जाजों शिवमही।।१४।।
ह्रीं ह्रीं दशलक्षणधर्मभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्व० स्वाहा।
फूल कंचनवन कल्पतरु के भले।
गंध जुत रंग शुभ लेइ निज कर चले।।
माल तिन गूँथ कामबाण नाशक सही।
जानि इमिधर्म दश जाजों शिवमही।।१५।।
ह्रीं ह्रीं दशलक्षणधर्मभ्यो कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्व० स्वाहा।
सुभग नैवेद्य मोदक घने लाये।
विविध स्वादामय सु धारि भक्ति उर भाये।।
भूख दुखहरण स्वर्णपात्र भरि के सही।
जानि इमिधर्म दश जाजों शिवमही।।१६।।
ह्रीं ह्रीं दशलक्षणधर्मभ्यो क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्व० स्वाहा।
दीप मणि रतनमय और घृतमय लहे।
धारि कनकथाल में सु आरति जु करि लही।।
धर्मज्योति मोह अन्धकार नाशिका सही।
जानि इमिधर्म दश जाजों शिवमही।।१७।।
ह्रीं ह्रीं दशलक्षणधर्मभ्यो मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्व० स्वाहा।
धूप दश अंग मय लायक सारजी।
अगन संग खेवहुँ सुभक्ति उर धार जी॥
कर्म क्षयकार भव-बास नाशन सही।
जानि इमिधर्म दशधा जजो शिवमही॥७॥
ॐ ह्रीं दशलक्षणधर्मेभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्व० स्वाहा।
लौंग खारिक सु नारिकेल सुखकारजी।
और बादाम पुगी फलादि सारजी॥
लेइ निज हाथ में सुभक्ति धरि के सही।
जानि इमिधर्म दशधा जजो शिवमही॥८॥
ॐ ह्रीं दशलक्षणधर्मेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्व० स्वाहा।
नीर गन्ध अक्षत सुफूल चरु सोड़ जी।
दीप अरु धूप फल अरघ संजोड़जी॥
पुरट थाली विषै भक्ति करके सही।
जानि इमिधर्म दशधा जजो शिवमही॥९॥
ॐ ह्रीं दशलक्षणधर्मेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
धर्म भव कूपतैं काढ़ने को रसी।
भव उदधि पार करतार नवका इसी॥
धर्म सुख दैन जिमि तात माता सही।
जानि इमिधर्म दशधा जजो शिवमही॥१०॥
ॐ ह्रीं दशलक्षणधर्मेभ्यो महार्घ्यं निर्व० स्वाहा।
जयमाला
दोहा
दश वृष रतन मिलाय के, माल करै भवि जोय।
धरि आपने उर विषैं, ता सम और न कोय॥११॥
बेसरि छन्द
दशलक्षण वृष शिवमग देवा, धर्म थकी सुख पावै जीवा।
मुक्तिदीप पहुँचवन नावा, ये दश धर्म जजो जुत भावा ॥१॥
दशविधि धर्म धरे जो कोई, करम नाशि फिर दुख नहिं होई।
धरम जु साधन और न कोई, यो दश धर्म जजो मद खोई ॥२॥
धरम जीव का पालनहारा, धरम मान का खण्डनवारा।
धरम थकी जावै कुटिलाई, इमि दश धर्म जजो चित्तलाई ॥३॥
साँच वचन सम धरम न आनौ, धर्म भाव निर्मल पहचानौ।
धर्मजीव-रच्छा इन्द्रिय जीते, इमि लखि धर्म जजो कर प्रीते ॥४॥
तप ही सर्व धर्म का मूला, त्याग धरमतें क्षय अघ धूला।
धर्म नगन सम और न कोई, इमि दशधर्म जजो मद खोई ॥५॥
नारी त्याग धरम शिवदाई, ये दश धर्म जगत् में भाई।
जो दश लक्षण मनमें आनै, सो भव-तप-हर-शिवपद ठानै ॥६॥
दशलक्षण व्रत इह विधि कीजे, उत्कृष्ट धर्म दश वास करीजे।
नातर बेलै पालनभाई, तथा इकन्तर वास कराई ॥७॥
शक्तिहीन है तो सुन मीता, दश एकाान्त करो धरि प्रीता।
व्रत दश वर्ष कर मन लाई, करूँ उद्यापन मन वच काई ॥८॥
नहिं उद्यापन शक्ति तुम्हारी, तो दूजो व्रत करूँ सुखकारी।
पीछे यथाशक्ति खरचावै, पूजन धरम उद्योत करावै ॥९॥
दोहा
इत्यादिक विधि सहित जो, धर्म करै दश सार।
पावै सुख मन भावना, अनुक्रम ले भव-पार।
ॐ ह्रीं दशलक्षणधर्मेभ्यो पूर्णार्घ्यं निर्व० स्वाहा।
- दीपक। 2. द्वीप। 3. नौका। 4. जीव की रक्षा। 5. आकिंचन्य धर्म। 6. नहीं तो।
- दो दिन उपवास।
उत्तम क्षमा धर्म पूजा
अडिल्ल
जीव तिरास थावर जेते जग में सही।
देव नरक नर पशु चारि गति की मही॥
तिन सब ऊपर दयाभाव उर माहि जी।
सो है उत्तम क्षमा थापि जजूँ याहि जी॥
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्म! अत्र अवतर अवतर संवौषट्। आह्वाननम्।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्म! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः। स्थापनम्।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्म! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। सन्निधिकरणम्।
अष्टक
पद्धरि छन्द
जल गंग नदी को विमल सोड़, धरि रतन पियाले शुद्ध होड़।
यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥१॥
ॐ ह्रीं श्रीउत्तमक्षमाधर्मेभ्यः जन्मजरामृत्यु-विनाशनाय जलं निर्व० स्वाहा।
बावन चन्दन घसि नीर लाय, धरि कनक रकेबी जिन चढ़ाय।
यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥२॥
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मेभ्यः संसारताप-विनाशनाय चन्दनं निर्व० स्वाहा।
अक्षत मुक्ताफलसम जु लाय, अति उच्चल नखशिख शुद्ध भाय।
यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥३॥
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मेभ्यः अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्व० स्वाहा।
शुभ फूल कल्पतरु के अनूप, करि माला सुमन सुगन्ध रूप।
यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥४॥
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मेभ्यः कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्व० स्वाहा।
नाना रस पूरित चरु सम्हाल, शुभ मोदक आदि अनेक धार।
यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥५॥
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मेभ्यः क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्व० स्वाहा।
मणि दीपक सार बनाय लाय, धरि कनकथाल भरि भक्ति भाय।
यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥६॥
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मेभ्यः मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्व० स्वाहा।
ले धूप अगरुजा अधकार, दुर्भाव हुताशन माहि जार।
यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूजौं मन वच भक्ति आन॥७॥
ह्रीं ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मगाय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
फल नारिकेल बादाम सोई, पुंगीफल खारिक भक्ति जोइ।
यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूजौं मन वच भक्ति आन॥८॥
ह्रीं ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मगाय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
जल चन्दन अक्षत फूल लाव, चरु दीप धूप फल अर्घ भाव।
यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूजौं मन वच भक्ति आन॥९॥
ह्रीं ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मगाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
प्रत्येक अर्घ्य
अडिल्ल
पाप प्रकृति कर जीव अशुभ बंधन करौ।
थावर नामा कर्म उदय दुख को भरौ॥
पृथ्वी माहि सु जाय सहे बहु अथ फला।
तिनका रक्षण भाव क्षमा उत्तम भला॥१॥
ह्रीं ह्रीं पृथ्वीकायिक-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जे जलकायिक जीव ज्ञान बिन दुख लहें।
इक इन्द्रिय के द्वार अतुल विपदा सहें॥
तिनको दुखमय जानि मुनी करुणा धरै।
तसु प्रसादर्ते झटिति मोक्ष वनिता वरै॥२॥
ह्रीं ह्रीं जलकायिक-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अग्निकायिक धर जीव एक इन्द्रिय सही।
नाना दुःख तन सहैं जलै सब जग मही॥
इन पर करुणाभाव धरै जे भवि सही।
सो ही उत्तम क्षमा मोक्षदाता कही॥३॥
ह्रीं ह्रीं अग्निकायिक-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पवनकाय के जीव महा संकट सहैं।
हाथ पांव मुख वचन थकी बाधा लहें॥
इन पर करुणाभाव जती धारै सही।
सो ही उत्तमक्षमा कही शिव की मही॥४॥
ह्रीं ह्रीं वायुकायिक-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
हरित काय मे प्राणी अति बेदन लहें।
छेदन भेदन कष्ट महा अघ फल सहें॥
इन पर समता भाव सुखी इनको चहैं।
सो ही उत्तम क्षमा धारि मुनि शिव लहें॥५॥
ह्रीं ह्रीं वनस्पतिकायिक-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
थावर के पन भेद पाप फलंतें बने।
सूक्ष्म बादर भेद दोय यों जिन भनें॥
इनको दुखमय जानि दया मन लाय है।
सो ही उत्तम क्षमा जजों शिर नाय है॥६॥
ह्रीं ह्रीं सूक्ष्मस्थूलपंचावर-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
लट अरु जोक गिडोला इल्ली जानिये।
कोड़ी शंख दुइन्द्रिय अति दुख थानिये॥
इन पर करुणाभाव जती धारै सही।
सो ही उत्तम क्षमा जजों शिवकी मही॥७॥
ह्रीं ह्रीं द्वीन्द्रियजीव-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
चोटी कुंथा खटमल बीछू दुखमही।
ते इन्द्रिय परजाय पाय घृण आदि ही॥
इनको दुखमय जानि मुनी करुणा धरै।
सो ही उत्तम क्षमा जजों सब अघ जरै॥८॥
ह्रीं ह्रीं त्रीन्द्रियजीव-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
माखी मच्छर टीडी भँवरादिक सही।
बर्रै ततपड़ा मकड़ी चतुरिन्द्रिय कही॥
इनको दुखिया देखि मुनी करुणा धरै।
सो ही उत्तम क्षमा जजों वसुविधि जरै॥९॥
ह्रीं ह्रीं चतुरिन्द्रियजीव-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
इन्द्रिय पांचों होय, नहीं मन जो लहें।
ते जिय जानि असैनी अघफल अति दहें॥
इनको दुख भरपूर जानि करुणा धरै।
सो ही उत्तम क्षमा जजों शिवधरल धरै॥१०॥
ह्रीं ह्रीं असैनीपंचेन्द्रियजीव-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
नरक जीव अति दुखी पापफलंतें सही।
छेदन भेदन पीर सहैं जात न कहीं॥
इन पर करुणाभाव जती अति लाय है।
सो ही उत्तम क्षमा जजों सुखदाय है॥११॥
ह्रीं ह्रीं नारकीजीव-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
गीता छंद
मनुष्य क्रोध रु मान माया, लोभवश दुखिया घने।
बहुबाह पीड़ा रागद्वेषी, अघ घनो उपजे तिनें॥
तिन देख यतिवर दया लावे, महादीन दयाल जी।
सो धर्म उत्तम क्षमा निर्मल, जजों भाग्य विशालजी॥१२॥
ह्रीं ह्रीं मनुष्यजीव-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
परकार चारो देव गति मे, जीव सुख राचे सही।
लखि देखि परको झुरै नितही, मानतैं पीड़ा कही॥
तिन देखि मुनि उर दया लावे, महा कोमल भावजी।
सो धर्म उत्तम क्षमा पूजौं, अर्घतैं कर चावजी॥१३॥
ह्रीं ह्रीं चतुर्विधदेवजीव-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
बेसरी छन्द
थावर तिरस जीव जब जोई, चहुँगति करमनि केवशि होई।
तिनको देखि दया उर लाई, सो उत्तम खम धर्म जजाई॥१४॥
ईं ह्रीं त्रसथावर-समस्तजीव-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मंगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
धर्म क्षमा उत्तम बड़ो, सब जीवन सुखदाय।
जर्जै जीव सो पुनि लहै, करै जु शिवपुर जाय॥१॥
बेसरी छन्द
सब जीवन में राग न दोषा, सो है क्षमा धर्म निरदोषा।
दुर्जन कृत उपसर्ग लखावै, ताहू पै समभाव रहावै॥२॥
मुनि को वचन कहै दुखकारी, मरम छेद छेदै अघ धारी।
मान खंड किरिया करवावै, तब मुनि क्षमा धर्म मन लावै॥३॥
जे कोई दुष्ट मुनिन को मारै, तीक्ष्ण शस्त्रतै करि परिहरै।
बंधै तन को खेद न पावै, तिनपर क्षमा धर्म मन लावै॥४॥
अति दुखिया जियको ऋषि जानें, तब मुनि अनुकंपा मन आनै।
आपा पर को हित उपजावै, तब मुनि क्षमा धरम मन लावै॥५॥
उत्तम क्षमा धरम सुखदाई, क्षमा धरम सब जियका भाई।
जब मुनिहू पै कष्ट जु आवै, तब मुनि क्षमा धरम मन लावै॥६॥
क्षमा धरमसी ढाल न होई, क्रोध समान प्रहार न कोई।
क्षमा समान न बल अति पावै, तातैं जती क्षमा वृष भावै॥७॥
क्षमा धरम शिव राह बताई, क्षमा तात मात अरु भाई।
जातैं सिद्ध सुखुन को पावै, ऐसी क्षमा मुनी मन लावै॥८॥
सोरठा
क्षमा आभूषण सार, उर में जो परिहरे सही।
ते भवसागर पार, जजौं धर्म उत्तम क्षमा॥९॥
ईं ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मंगाय पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
उत्तम मार्दव धर्म पूजा
पद्धरि छन्द
मार्दव वृष भाव विचार सोई, जहँ मान भाव दीखै न कोई।
इह धारी मुनि शिवगामि जानि, मैं जजौं थापि मार्दव सुभानि॥
ईं ह्रीं उत्तममार्दवधर्म! अत्र अवतर अवतर संवौषट्। आह्वाननम्।
ईं ह्रीं उत्तममार्दवधर्म! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। स्थापनम्।
ईं ह्रीं उत्तममार्दवधर्म! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। सन्निधिकरणम्।
अथ अष्टक
चाल मणुआनन्द की
क्षीर सम नीर शुद्ध गाल कर लाइये।
पात्र सुवरण विषै धारि गुण गाइये॥
जगत् फिरनो मिटै तासु फलतैं सही।
धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही॥१॥
ईं ह्रीं उत्तममार्दवधर्मंगाय जन्मजरामृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
स्वच्छ नीर संग चंदनादि को मिलाय जी।
शुद्ध गंधयुक्त भक्तिभावतैं चढ़ायजी॥
जगत् आताप-हर जानि ता फल सही।
धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही॥२॥
ईं ह्रीं उत्तममार्दवधर्मंगाय संसारताप-विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
अक्षत समुज्ज्वल खंड बिन जानिये।
सुभग मोती जिसे थाल भरि आनिये॥
ध्रौव्य फलदाय मनलाय ध्याऊँ सही।
धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही॥३॥
ईं ह्रीं उत्तममार्दवधर्मंगाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
फूल कल्पवृक्ष के गंध रंग सारजी।
माल गुंथि शुद्धभाव भक्ति कर धारजी॥
मदन मद हरन सुफल जानि यातैं सही।
धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही॥४॥
ईं ह्रीं उत्तममार्दवधर्मंगाय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
सुभग रस शुद्ध नैवेद्य मन लाइये।
मोदकादि शुद्ध भक्तिभावतैं चढ़ाइये॥
दीप्त रतनमयी नाश तमको करा।
कनक पातर विषै भक्तिभावतैं धरा॥
नाश अज्ञान है तासु फलतैं सही।
धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही॥५॥
ईं ह्रीं उत्तममार्दवधर्मंगाय मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
धूप दशगंध शुभ लेय मन मानिये।
अगर चंदन सबै मेलि शुभ ठानिये॥
अमिन संग खेड़ये कर्म जालन सही।
धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही॥६॥
ईं ह्रीं उत्तममार्दवधर्मंगाय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
श्रीफलादि लौंग पुंगीफलादि जानिये।
शुद्ध बादाम खारक भले आनिये॥
सिद्ध थानक लहै तासु फलतैं सही।
धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही॥७॥
ईं ह्रीं उत्तममार्दवधर्मंगाय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
नीर चंदन अखिल पुष्प चरु दीप जी।
धूप फल अरघकर भाव शुद्ध टीपजी॥
लोक में फिरन, तन धरन मिटि है सही।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवपदा मही॥१०॥
ॐ ह्रीं उत्तममार्दवधर्मगाया अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
प्रत्येक अर्घ्य
चाल मणुयणन्द की
देव वीतराग सर्वज्ञ तारक सही।
दोष अष्टादशों तासु माहीं नहीं॥
नमन तिन पद करें धर्म मार्दव कहा।
सो जजों चारि गति माँहि भरमत दहा॥१॥
ॐ ह्रीं श्रीवीतरागदेव-पद-नमन-मार्दवधर्मगाया अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
वीतराग देव कही वांनि सो धर्म है।
ता सुनै जीव निज ह्वै भाव भर्म है।
मन वचन काय श्रुतपाद सिर नाय है।
सो जजों चारि गति माँहि भरमत दहा॥२॥
ॐ ह्रीं श्रीजिनधर्म-पद-नमन-मार्दवधर्मगाया अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
धर्म को सेव तप लेय कर्म जार जी।
भव सिद्ध देव तन रहित सुखकारजी॥
लेय इन नाम मन वचन शिर नाय है।
सो जजों चारि गति माँहि भरमत दहा॥३॥
ॐ ह्रीं श्रीसिद्ध-पद-नमन-मार्दवधर्मगाया अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
धारि छत्तीस गुण सुरि सुखदायजी।
धर्म तप भाव सों गुप्त धरि भायजी॥
मान तजि नमन इन पद विषैं लायो।
सो जजों चारि गति माँहि भरमत दहा॥४॥
ॐ ह्रीं श्रीआचार्य-पद-नमन-मार्दवधर्मगाया अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
धारि गुण पाँच अरु बीस उवझायजी।
और भी अनेक गुण पास तिन थायजी॥
मान तजि इन चरण कायको नायो।
सो जजों चारि गति माँहि भरमत दहा॥५॥
ॐ ह्रीं श्रीउपाध्याय-पद-नमन-मार्दवधर्मगाया अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
क्षेत्र अतिशय तहाँ धर्म को धाय है।
नमन बहु जिय करै देव गुण गाय है॥
मान तजि क्षेत्र शुभ जानि शिर नायो।
सो जजों चारि गति माँहि भरमत दहा॥६॥
ॐ ह्रीं श्रीअतिशयक्षेत्र-नमन-मार्दवधर्मगाया अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
देव जिनकी सु प्रतिमा अकृत्रिम इसी।
रूप द्युति ध्यानमुद्रा कही जिन जिसी॥
मान तजि शीश इन चरण को सुनायो।
सो जजों चारि गति माँहि भरमत दहा॥७॥
ॐ ह्रीं श्रीअकृत्रिमजिनचैत्य-पद-नमन-मार्दवधर्मगाया अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
सुरग धानक विषै देव जिनके सही।
रतनमय जैन बिम्ब बिगर किये हैं मही॥
मान तजि शीश इन चरणको सुनायो।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पायो॥८॥
ॐ ह्रीं श्रीऊर्ध्वलोकसम्बन्धिजिनचैत्य-नमन-मार्दवधर्मगाया अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
ज्योतिषी व्यन्तरा थान मध्यलोकजी।
बिन किये चैत्य जिन कहे अघ रोकजी॥
मान तजि शीश इन चरणको सुनायो।
सो जजों चारि गति माँहि भरमत दहा॥९॥
ॐ ह्रीं श्रीमध्यलोकसम्बन्धिजिनचैत्य-नमन-मार्दवधर्मगाया अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
भवन देवनि विषैं बहुत जिनरायजी।
बिम्ब अकृत्रिम कहे सेय तसु पायजी॥
मान तजि शीश इन चरणको सुनायो।
सो जजों चारि गति माँहि भरमत दहा॥१०॥
ॐ ह्रीं श्रीअधोलोकसम्बन्धिजिनचैत्य-पद-नमन-मार्दवधर्मगाया अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
आदि इन पूज्य थानक बहुत हैं सही।
सिद्ध क्षेत्र मोक्ष फलदाय तीर्थ सही॥
मान तजि शीश इन चरणको सुनायो।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पायो॥११॥
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धक्षेत्र-पद-नमन-मार्दवधर्मगाया अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
जयमाला
बेसरी छन्द
मार्दव धर्म मान को खोवै, ताफल जगत् पूज्य फल होवै।
मार्दव सकल दोष निवारै, ताफल आप तिरै अनि तारै ॥१॥
मार्दव धर्म इन्द्र सुर पूजै, मार्दव धर्म भजै अघ भूजै।
मार्दव मान हरै सुखकारै, ताफल आप तिरै अनि तारै ॥२॥
मार्दव धर्म महा नर ध्यावै, मार्दव धर्म हानि नहिं पावै।
यह मार्दव वृष शिवथल धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै ॥३॥
मार्दव सबको राखै माना, मार्दव सब धरमनि में दाना।
मार्दव धरम जीव जे धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै ॥४॥
मार्दव धरम सुगुण केरा, उपद्रव नाशि हरै भवफेरा।
मार्दव उत्तम पुरुष सु धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै ॥५॥
मार्दव मोक्षमार्ग को दाता, मार्दव धर्म सकल जग त्राता।
मार्दव वृष गुणवत्ता धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै ॥६॥
मार्दव धर्म कल्पतरु भाई, मार्दव मनवांछित फलदाई।
मार्दव धरम मुकुट जो धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै ॥७॥
मार्दव धरम कनक में मीना, मार्दव धारि सकै न कमीना।
मान मार मार्दव वृष धारै, ताफल आप तिरै अनै तारै ॥८॥
मार्दव वृष सब धर्म प्रमाना, मार्दव मोह मल्ल को हाना।
मार्दव-माल पुरुष उर धारै, ताफल आप तिरै अनै तारै ॥९॥
दोहा
मान मार मार्दव करै, हरै पाप मल सोय।
जगत् छुड़ावै शिव करै, ते मो रक्षक होय ॥१०॥
ॐ ह्रीं उत्तममार्दवधर्मंगाथ पूर्णाघ्यं निर्व० स्वाहा।
उत्तम आर्जव धर्म पूजा
बेसरी छन्द
जग परपंच रहित जो भावा, सरल चित्त सबसे निरदावा।
तिनको आर्जव भाव सुकहिये, सो ह्याँ थापि पूज फल लहिये ॥१॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्म! अत्र अवतर अवतर संवौषट्। आह्वाननम्।
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्म! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। स्थापनम्
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्म! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। सन्निधिकरणम्।
अष्टक
क्षीर समुद्र का उज्ज्वल नीरा, कनक पियाले धरि अति धीरा।
जरा रोग नाशनको भाई, आर्जव भाव नमो शिरनाई ॥१॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्मगाय जन्मजरामृत्यु-विनाशनाय जलं निर्व० स्वाहा।
चन्दन बावन जल घसि लाया, कनकपात्रा में धरि उमगाया।
शोकानल तप नाशन भाई, आर्जव भाव नमो शिरनाई ॥२॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्मगाय संसारताप-विनाशनाय चन्दनं निर्व० स्वाहा।
अक्षत मुक्ताफल से जानी, उज्ज्वल खण्ड विवर्जित आनी।
क्षय नहि होय इसो पद दाई, आर्जव भाव नमो शिरनाई ॥४॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्मगाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्व० स्वाहा।
फूल सुगन्ध कल्पद्रुम लाया, तथा सुवर्ण रजतमय भाया।
तिनकी माल गुँथि कर लाई, आर्जव भाव नमो शिरनाई ॥५॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्मगाय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्व० स्वाहा।
नाना रस नैवेद्य करावै, मोदक आदि भक्ति तैं लावै।
भूख व्याधि नाशन को भाई, आर्जव भाव नमो शिरनाई ॥६॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्मगाय क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्व० स्वाहा।
दीपक रतन थालि धरि लीजै, मन वचकाय शुद्धि कर लीजै।
घाति अज्ञान ज्ञान दरशाई, आर्जव भाव नमो शिरनाई ॥७॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्मगाय मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्व० स्वाहा।
धूप अगरजा चन्दन भीनी, गंध सहित निज करमें लीनी।
कर्म दहनको अग्नि जराई, आर्जव भाव नमो शिरनाई ॥८॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्मगाय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्व० स्वाहा।
ले नारियल बादाम सुपारी, खारिक लौंग आदि हितकारी।
सिद्धलोक बांछा मनमाहीं, आर्जव धरम जजों शिरनाई ॥९॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्मगाय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्व० स्वाहा।
जल चन्दन अक्षत कुमारी, चरु दीपक फल धूप विधारी।
अर्घ्य लेय मनवचन भाई, आर्जव धरम नमों शिरनाई ॥१०॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्मगाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
अथ प्रत्येक अर्घ्य
बेसरी छन्द
गुण छ्यालीस जहाँ प्रभु तेरा, अष्टादश तहाँ दोष न हेरा।
तिनपद सरल भाव शिरनावे, सो आर्जव वृष जजि शिव पावै ॥१॥
ॐ ह्रीं श्रीषट्त्वारिंशत्-गुणसहित-जिनचरणन-आर्जवधर्मगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
मूक जीव अरहंत थुति कीजै, मन वच कुटिल भाव तज दीजै।
तिनपद सरल भाव शिरनावे, सो आर्जव वृष जजि शिव पावै ॥२॥
ॐ ह्रीं श्रीमुकजीव-अरहंतपदनमन-आर्जवधर्मगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
कर्म काटि शिवलोक सिधारै, सिद्ध सुदेव होय अध सारै।
तिनपद सरल भाव शिरनावे, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥३॥
ॐ ह्रीं श्रीसिद्ध-पद-नमन-आर्जवधर्मगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
सिद्धशिला पैंतालीस लाखा, योजन विस्तृत जिन वच भाषा।
तत्रस्थित आत्म शिर नावे, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥४॥
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धशिलास्थित-मुक्तात्मपदनमन-आर्जवधर्मगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
गुण छत्तीस सुधारक सूरा, आचारज सब गुण भरपूरा।
तिनपद सरल भाव शिरनावे, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥५॥
ॐ ह्रीं श्रीआचार्य-पद-नमन-आर्जवधर्मगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
आचारज सब गुण भरपूरा, आचारादि गुणयुत सूरा।
तिनपद सरल भाव शिरनावे, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥६॥
ॐ ह्रीं श्रीआचार्य-पद-परोक्षनमन-आर्जवधर्मगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
गुण पच्चीस उपझाय सु मोही, ग्यारह अंग चौदह पूरवीही।
तिनपद सरल भाव शिरनावे, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥७॥
ॐ ह्रीं श्रीउपाध्याय-पद-नमन-आर्जवधर्मगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
बहु गुण धर उपझाय सु जानो, दुरिहै तैं तिनको चित्त आनो।
तिनपद सरल भाव शिरनावे, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥८॥
ॐ ह्रीं श्रीउपाध्याय-परोक्ष-नमन-आर्जवधर्मगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
बीस आठ गुण साधन साधा, सो नहि लहे जगत् की बाधा।
तिनपद सरल भाव शिरनावे, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥९॥
ॐ ह्रीं श्रीसाधु-पद-नमन-आर्जवधर्मगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
दुरिहेंते मुनि गुण जु चितारै, मनवचकाया निज वश धारै।
तिनपद सरल भाव शिरनावे, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥१०॥
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुनिपरोक्ष-पद-नमन-आर्जवधर्मगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
वरणविहीन सु जिनवर वाणी, तिनको सुनि सुख पावै प्राणी।
तिनपद सरल भाव शिरनावे, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥११॥
ॐ ह्रीं श्रीजिनवाणी-नमन-आर्जवधर्मगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
अतिशय क्षेत्र सु तीर्थ थापा, यात्री गण के पुरे कामा।
तिनपद सरल भाव शिरनावे, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥१२॥
ॐ ह्रीं श्रीअतिशयक्षेत्र-नमन-आर्जवधर्मगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
शिखर सम्मेद आदि सिद्धथाना, तहँ मुनि लिय कर्मेशनाना।
तिनपद सरल भाव शिरनावे, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥१३॥
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धक्षेत्र-नमन-आर्जवधर्मगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
बिगर किये जिनलिंब अनुपा, लक्षण चिह्न जानि जिन रूपा।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै॥४॥
ॐ ह्रीं आर्जवजिनाय-पद-नमन-आर्जवधर्माय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
कुत्रिम जे जिनबिंब बिराजै, विनय सहित पुन दायक छाजै।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै॥५॥
ॐ ह्रीं कृत्रिमजिनचैत्य-पद-नमन-आर्जवधर्माय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
इत्यादिक बहु क्षेत्र सुथाना, पूजनीक तीरथ अथ हाना।
तिनपद सरलभाव शिरनावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै॥६॥
ॐ ह्रीं सकलपूज्यस्थानक-पद-नमन-आर्जवधर्माय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
सरल भाव सारै सरस, सुरनर पूज्य महान्।
तातैं तजनी कुटिलता, आर्जव भाव लहान॥१॥
बेसरि छन्द
सरल भाव समता उर आनै, सरल भाव सब अवगुन भानै।
आर्जव भाव धरै जो जीवा, तिनने जिनवानी रस पीवा॥२॥
आर्जव भाव धरै जे प्रानी, तिनके होनहार शिवरानी।
दोषभाव तिनतैं नहीं छीवा, आर्जवभाव धरै जे जीवा॥३॥
आर्जव भाव अमर पद ध्यावै, आर्जव में अवगुन नहिं पावै।
कुटिल भाव विष जिन नहिं पीवा, आर्जवभाव धरै जे जीवा॥४॥
आर्तभाव आर्जव ही खोवै, आर्जवभाव पापमल धोवै।
रोग-शोक ताको नहिं छीवा, आर्जवभाव धरै जो जीवा॥५॥
आर्जव शुद्ध भाव जिन पाया, तिनने लहि पुन पाप गमाया।
अनुभव आनन्द तामैं छीवा, आर्जवभाव धरै जे जीवा॥६॥
आर्जवभाव दोष सब खोवै, आर्जव कर्म कालिमा धोवै।
शुद्ध सुभाव सु तानै लीवा, आर्जवभाव धरै जे जीवा॥७॥
आर्जवभाव सकल को प्यारा, आर्जवभाव भ्रमणतैं न्यारा।
ताकों और रुचे न मतीवा, आर्जवभाव धरै जे जीवा॥८॥
आर्जव जब शिव के सुख ठाने, आर्जवभाव पूर्व अध भाने।
अद्भुत आपापर भिन कीवा, आर्जवभाव धरै जे जीवा॥९॥
दोहा
अन्तरंग निरदोष कें, प्रगटै आर्जवभाव।
जाके फल मरती मिटै, छुटै कर्म को दाव ॥१०॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्माय पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
उत्तम शौच धर्म पूजा
बेसरि छन्द
शौच धर्म पर-चाह निवारै, तनतैं हूँ ममता निरवारै।
जग वांछा तजि निर्मल भावा, शौचधर्म पूजौं कर चावा॥१॥
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माय अत्र अवतर अवतर संवौषट्। आह्वानम्।
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माय अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। स्थापनम्।
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माय अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। सन्निधिकरणम्।
अष्टक
पद्धरि छन्द
जल क्षीरसमुद्र को सुभग लाय, धरि कनकपात्र में भक्ति भाय।
तन धन मिटै बहुफल सुजान, मैं शौचधर्म जजि हर्ष आन॥२॥
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माय जन्मजरामृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
घसि बावन चन्दन नीर आन, अलि गुंजन मानों करत गान।
धरि कनक पियाले भक्ति जान, मैं शौचधर्म जजि हर्ष आन॥३॥
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माय संसारताप-विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
उज्ज्वल अखण्ड शुभ गंधदाय, अक्षत अनूप लखि शशि लजाय।
कन-पात्र विषैं धरि भक्ति आन, मैं शौचधर्म जजि हर्ष आन॥४॥
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
ले फूल कल्पद्रुम के मनोग, आसक्त भ्रमर चित्त करत भोग।
तिन गुंथि माल उर भक्ति ठान, मैं शौचधर्म जजि हर्ष आन॥५॥
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
शुभ मोदक आदि अनेक भाय, रसनांजन नैवेद्य लाय।
धरि पुष्ट थाल में भक्ति ठान, मैं शौचधर्म जजि हर्ष आन॥६॥
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माय क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
मणि दीपक वा घृतमय संजोय, मनविषिद्ध मोहतम नाश होय।
उर ज्ञान प्रकाश करै महान्, मैं शौचधर्म जजि हर्ष आन॥७॥
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माय मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
शुभ धूप अगरजा गंध लाय, कन धूपवन ताको दिखवाय।
मिस धूम मनौ वसुविधि उड़ान, मैं शौचधर्म जजि हर्ष आन॥८॥
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
ले फल बिदाम खारिक अनूप, अरु पूर्णफल आदिक स्वरूप।
धरि भक्तिभाव मनमाहिं सोय, मैं शौचधर्म जजि हर्ष होय॥९॥
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
जल गंधाक्षत वर-कुसुम होय, चरु दीप धूप फल सुभग जोय।
कर अर्घ्य धरौं कनपात्र लाय, मैं जजों शौचवर भक्ति भाय॥१०॥
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
प्रत्यकार्घ्य
खाल मनुष्यानन्द की
देव के सकल सुख जानि चंचलमीय।
आयु पल्य सागर की तुरत ही क्षय गयी॥
जानि सब अधिर उर भाव निर्मल करै।
पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धरै ॥११॥
ॐ ह्रीं देवसुख-वांछाविहीन-शौचधर्माय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
चाह चक्री तने सुखुन की उर नहीं।
सहस छिन्नवैं तिया और षट्खंड मही॥
जानि सब अधिर उर भाव निर्मल करै।
पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धरै ॥१२॥
ॐ ह्रीं चक्रिपदभोगावांछाविहीन-शौचधर्माय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
खण्ड तीन को जु राज नारि बहु जानिये।
चारि विधि सैन सुर नर खगादि मानिये॥
जानि सब अधिर उर भाव निर्मल करै।
पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धरै ॥३॥
ॐ ह्रीं नायोपभोग-वांछाविहीन-शौचधर्माय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
कामदेव को सुरूप देखि देव मन हरै।
भोग वांछित सकल देव सेवा करै॥
जानि सब अधिर उर भाव निर्मल करै।
पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धरै ॥४॥
ॐ ह्रीं कामदेवभोग-वांछाविहीन-शौचधर्माय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
आठ परकार सपरस विषै जानिये।
द्रव्य क्षेत्र काल अनुसार भाव मानिये॥
जानि सब अधिर उर भाव निर्मल करै।
पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धरै ॥५॥
ॐ ह्रीं स्पर्शेन्द्रियभोग-वांछाविहीन-शौचधर्माय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पांच परकार रस जानि शुभ सारजी।
भोग वांछा सभी जगत् दुखकारजी॥
जानि सब अधिर उर भाव निर्मल करै।
पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धरै ॥६॥
ॐ ह्रीं रसनेन्द्रियभोग-वांछाविहीन-शौचधर्माय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
घ्राण इन्द्रियतने गंध दो हैं सही।
ताहि अनुकूल पाय जीव सता लही॥
जानि सब अधिर उर भाव निर्मल करै।
पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धरै ॥७॥
ॐ ह्रीं घ्राणेन्द्रियभोग-वांछाविहीन-शौचधर्माय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दशलक्षणधर्म-पूजा
सोरठा
पीड़ें दुष्ट अनेक, बाँध मार बहुविधि करें। धरिये छिमा विवेक, कोप न कीजै पीतमा ।।
चौपाई
उत्तम छिमा गहो रे भाई, इह भव जस पर-भव सुखदाई। गाली सुनि मन खेद न आनो, गुन को औगुन कहै अयानो ।। गीता छन्द
कहि है अयानो वस्तु छीनें, बाँध मार बहुविधि करै। घर तैं निकारै तन विदारै, बैर जो न तहाँ धरै ।। तें करम पूरब किये खोटे, सहै क्यों नहिं जीयरा। अति क्रोध-अगनि बुझाय प्रानी, साम्यजल ले सीयरा ।।१।। ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्माङ्गाय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। मान महाविष रूप, करहिं नीच-गति जगत् में।
कोमल सुधा अनूप, सुख पावै प्रानी सदा ।।
उत्तम मार्दव-गुन मन माना, मान करन को कौन ठिकाना। वस्यो निगोद माहि तैं आया, दमरी रूकन भाग बिकाया ।। दशलक्षणधर्म-पूजा
रूकन बिकाया भागवश तैं, देव इकइन्द्री भया। उत्तम मुआ चाण्डाल हूवा, भूप कीड़ों में गया।। जीतव्य जोवन धन गुमान, कहा करै जल-बुद्बुदा। करि विनय बहु-गुन बड़े जन की, ज्ञान का पावै उदा ।। २।। ॐ ह्रीं उत्तममार्दवधर्माङ्गाय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। कपट न कीजे कोय, चोरन के पुर ना बसै।
सरल सुभावी होय, ताके घर बहु सम्पदा ।।
उत्तम-आर्जव रीति बखानी, रंचक दगा बहुत दुखदानी। मन में हो सो वचन उचरिये, वचन होय सो तन सौं करिये ।। करिये सरल तिहुँ जोग अपने, देख निरमल आरसी। मुख करै जैसा लखै तैसा, कपट-प्रीति अंगार-सी ।। नहिं लहै लछमी अधिक छल करि, करमबन्ध-विशेषता। भय त्यागि दूध बिलाव पीवै, आपदा नहिं देखता ।। ३।। ॐ ह्रीं उत्तमार्जवधर्माङ्गाय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। धरि हिरदै सन्तोष, करहू तपस्या देह सौं।
शौच सदा निरदोष, धरम बड़ो संसार में ।।
उत्तम शौच सर्व जग जाना, लोभ पाप को बाप बखाना। आशा-पास महा दुखदानी, सुख पावै सन्तोषी प्रानी ।। प्रानी सदा शुचि शील जप-तप, ज्ञान-ध्यान प्रभाव तैं। नित गंग जमुन समुद्र न्हाये, अशुचि-दोष सुभाव तैं।। ऊपर अमल मल भरयो भीतर, कौन विधि घट शुचि कहैं। बहु देह मैली सुगुन थैली, शौच-गुन साधु लहैं ।। ४।। ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माङ्गाय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। दशलक्षणधर्म-पूजा
कठिन वचन मत बोल, परनिन्दा अरु झूठ तज।
साँच जवाहर खोल, सतवादी जग में सुखी ।।
उत्तम सत्य वरत पालीजै, पर विश्वासघात नहिं कीजै। साँचे-झूठे मानुष देखो, आपन पूत स्वपास न पेखो ।। पेखो तिहायत पुरुष साँचे को दरब सब दीजिये। मुनिराज-श्रावक की प्रतिष्ठा साँच गुण लख लीजिये ।। ऊँचे सिंहासन बैठि वसुनृप, धरम का भूपति भया। वच झूठ सेती नरक पहुँचा, सुरग में नारद गया ।। ५ ।। ॐ ह्रीं उत्तमसत्यधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा। काय छहों प्रतिपाल, पंचेन्द्री मन वश करो।
संजमरतन सँभाल, विषय-चोर बहु फिरत हैं ।।
उत्तम संजम गहु मन मेरे, भव-भव के भाजें अघ तेरे। सुरग नरक पशुगति में नाहीं आलस हरन करन सुख ठाहीं ।। ठाहीं पृथी जल आग मारुत, रूख त्रस करुना धरो। सपरसन रसना धान नैना, कान मन सब वश करो ।।
जिस बिना नहिं जिनराज सीझे, तू रुल्यो जग-कीच में। इक घरी मत विसरो करो नित, आव जम-मुख बीच में ।। ६ ।। ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा। तप चाहै सुरराय, करम-शिखर को वज्र है।
द्वादशविधि सुखदाय क्यों न करै जिन सकति सम ।। उत्तम तप सब माहिं बखाना, करम-शैल को वज्र समाना। वस्यो अनादि निगोद-मँझारा, भूविकलत्रय पशुतन धारा ।। धारा मनुष तन महादुर्लभ, सुकुल आव निरोगता। श्री जैनवानी तत्त्वज्ञानी, भई विषय-पयोगता ।। अति महा-दुर्लभ त्याग विषय-कषाय जो तप आदरैं। नर-भव अनूपम कनक घर पर, मणिमयी कलसा धेरैं ।।७।। ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा। दशलक्षणधर्म-पूजा
दान चार परकार, चार-संघ को दीजिए।
धन बिजुली उनहार, नर-भव-लाहो लीजिए।।
उत्तम त्याग कह्यो जग सारा, औषध शास्त्र अभय आहारा। निहचै राग-द्वेष निरवारै, ज्ञाता दोनों दान संभारै।। दोनों संभारे कूप-जलसम, दरब घर में परिनया। निज हाथ दीजे साथ लीजे, खाय खोया बह गया।।
धनि साध शास्त्र अभय-दिवैया, त्याग राग विरोध को। बिन दान श्रावक साधु दोनों, लहैं नाहीं बोध को ।।८।। ॐ ह्रीं उत्तमत्यागधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा। परिग्रह चौबीस भेद, त्याग करें मुनिराज जी। तिसना भाव उछेद, घटती जान घटाइए।।
उत्तम आकिंचन गुण जानो, परिग्रह-चिंता दुख ही मानो। फाँस तनक-सी तन में साले, चाह लँगोटी की दुख भालै।। भालै न समता सुख कभी नर, बिना मुनि मुद्रा धेरै। धनि नगन पर तन-नगन ठाड़े, सुर असुर पायनि परें।। घर-माहिं तिसना जो घटावैं, रुचि नहीं संसार सौं। बहु धन बुरा हू भला कहिये, लीन पर-उपगार सौं।।९।। ॐ ह्रीं उत्तमाकिञ्चन्यधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा। शील-बाढ़ नौ राख, ब्रह्म-भाव अन्तर लखो।
करि दोनों अभिलाख करहु सफल नरभव सदा।।
उत्तम ब्रह्मचर्य मन आनौ, माता-बहिन-सुता पहिचानौ। सहैं बान-वरषा बहु सूरे, टिकै न नैन-वान लखि कूरे।। कूरे तिया के अशुचि तन में, काम-रोगी रति करें। बहु मृतक सड़हिं मसान माँहीं, काग ज्यों चोंचें भरें।। संसार में विष-बेल नारी, तजि गये जोगीश्वरा।। ‘द्यानत’ धरम दश पैंडि चढ़िकै, शिव-महल में पग धरा ।।१०।। ॐ ह्रीं उत्तमब्रह्मचर्यधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा। दशलक्षणधर्म-पूजा
समुच्चय जयमाला
दश लच्छन वन्दौं सदा, मन-वांजित फलदाय।
कहों आरती भारती, हम-पर होहु सहाय ।।
बेसरी छन्द
करै करम की निरजरा, भव-पींजरा विनाश।
अजर-अमर पद को लहैं, ‘द्यानत’ सुख की राश ।। ॐ ह्रीं उत्तमक्षमा-मार्दवार्जव-शौच-सत्य-संयम-तपस्त्या-गाकिञ्चन्य- ब्रह्मचर्यदशलक्षणधर्माय पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा। ।। पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् ।।
श्री दशलक्षण मण्डल विधान
श्री दशलक्षण मण्डल विधान
जोगीरासा
नेमीनाथो, दे तो साथो’, भव भव और न चाहूँ।
भक्ति तिहारी, निशिदिन मन वच काय लाय करि गाऊँ॥ धर्म कह्यो तुम, वानी दशविधि, सो मोहि होउ सहाई। करुणासागर, समरस गर्भित, शीश नमों थुति गाई॥१॥ गीता छंद
धर्म के दश कहे लक्षण, तिन थकी जिय सुख लहै। भवरोग को यह महा औषधि, मरण-जामन दुःख दहै।। यह वरत नीका, मीत जी का, करो आदरतें सही।
मैं जजों दशविधि धर्म के अंग, तासु फल है शिवमही॥२॥ पद्धरि छन्द
यह धर्म भवोदधि नाव जान, या सेयें भवदुख होय हान। यह धर्म कल्पतरु सुक्ख पूर, मैं पूजों भवदुख करन दूर॥३॥ गीता छन्द
यह वरत मन-कपि गले माँही, सांकली सम जानिये। गज-अक्ष³ जीतन सिंह जैसो, मोहतम रवि मानिये॥ सुरथान⁴ माहीं वरत नाहीं, मनुजहूँ शुभ कुल लहै। तातैं सुअवसर है भलो, अब करौं पूजा धुनि कहै॥४॥ बेसरी छन्द
जाने दशलक्षण व्रत कीना, ते सत्पुरुषनि में परवीना। भवसागर फिरनो मिट जावै, जो नर दशलक्षण वृष⁵ भावै॥५॥ भुजंगप्रयात छन्द
यही धर्म सारं, करै पाप क्षारं, वही धर्म सारं, करै सुख अपारं। यही धर्म धीरा, हरै लोकपीरा, यही धर्म मीरा⁶ करै लोकतीरा॥६॥ 1. तुम्हारा साथ। 2. जीव का मित्र। 3. इन्द्रियरूपी हाथी को। 4. स्वर्ग। 5. धर्म। 6. प्रधान।
श्री दशलक्षण मण्डल विधान
त्रिभंगी छन्द
या व्रत की महिमा कहि वीर, दशविधि धर्म हरैं भवपीर। इसी धर्म बिन जग भरमाय, जजहुँ धर्म अति दुरलभ पाय॥८॥ दोहा
दश प्रकार को धर्म यह, दशविधि सुरतरु जान।
वांछित पद सेवक लहै, अधिक कहा सुखदान॥९॥
सोरठा
धर्म हमारा नाथ, धर्म जगत् का सेहरा।
भव भव में हो साथ, और न वांछा मनविषै॥१०॥
मण्डलमध्ये पुष्पांजलिं क्षिपेत्
समुच्चय पूजा
त्रिभंगी छन्द
यह धर्म क्षमा वा, मान गुमावा, सरल सुभावा सतिवानी। शुचि भाव करावा, संजम लावा, तप करवावा अधिकनी॥ शुचि त्याग बतावै, नगन पुजावै, शील बढ़ावै शिवदाई। यह धर्म दशारा, थाप करारा, पूजन धारा शिरनाई॥१॥ ॐ ह्रीं दशलक्षणधर्म ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्। आह्वाननम्। ॐ ह्रीं दशलक्षणधर्म ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। स्थापनम् ॐ ह्रीं दशलक्षणधर्म ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। सन्निधिकरणम्। मणुयणाणंद की चाल
क्षीरसागर तना नीर शुभ लाइये।
कनक झारी विषै धार गुण गाइये।
मरण उत्पत्ति नहीं होय ता फल सही।
जानि इमिधर्म दशधा जजों शिवमही॥१॥
ॐ ह्रीं दशलक्षणधर्मेभ्यो जन्मजरामृत्यु-विनाशनाय जलं निर्व॰ स्वाहा। श्री दशलक्षण मण्डल विधानः
नीर संग अगर चन्दन घिस लायजी।
सुभग पातर विषै धारि थुति गायजी॥ जगत् ताप तासु फल तुरत नाशै सही। जानि इमिधर्म दशधा जजों शिवमही ॥२॥ ॐ ह्रीं दशलक्षणधर्मेभ्यो संसारताप-विनाशनाय चन्दनं निर्व० स्वाहा। लेय अक्षत भले मुक्तिफल से कहे। ऊजले अखण्ड सुभग स्वर्ग पातर लहे॥ अक्षयपद पावनै ताप मनमें सही।
जानि इमिधर्म दशधा जजों शिवमही॥३॥ ॐ ह्रीं दशलक्षणधर्मेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्व० स्वाहा। फूल कंचनवरन कल्पतरु के भले।
गंध जुत रंग शुभ लेइ निज कर चले॥ माल तिन गूँथ कामबाण नाशक सही। जानि इमिधर्म दशधा जजों शिवमही॥४॥ ॐ ह्रीं दशलक्षणधर्मेभ्यो कामबाणविध्वंशनाय पुष्पं निर्व० स्वाहा। सुभग नैवेद्य मोदक घने लाइये।
विविध स्वादमय सु धरि भक्ति उर भाइये॥ भूख दुखहर्ण स्वर्णपात्र धरि के सही। जानि इमिधर्म दशधा जजों शिवमही॥५॥ ॐ ह्रीं दशलक्षणधर्मेभ्यो क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्व० स्वाहा। दीप मणि रतनमय और घृतमय लही।
धारि कनकथाल में सु आरति जु करि लही॥ धर्मज्योति मोह अन्धकार नाशिका सही। जानि इमिधर्म दशधा जजों शिवमही॥६॥ ॐ ह्रीं दशलक्षणधर्मेभ्यो मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्व० स्वाहा। श्री दशलक्षण मण्डल विधान
धूप दश अंग मय लायकर सारजी।
अगनि संग खेवहूँ सुभक्ति उर धार जी॥ कर्म क्षयकार भव-वास नाशन सही।
जानि इमिधर्म दशधा जजों शिवमही ॥७॥ ॐ ह्रीं दशलक्षणधर्मेभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्व॰ स्वाहा। लौंग खारिक सु नारिकेल सुक्खकारजी। और बादाम पुंगी फलादि सारजी॥
लेड़ निज हाथ में सुभक्ति धरि के सही ॥ जानि इमिधर्म दशधा जजों शिवमही ॥८॥ ॐ ह्रीं दशलक्षणधर्मेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वः स्वाहा। नीर गन्ध अक्षत सुफूल चरु सोइ जी। दीप अरु धूप फल अरघ संजोइजी ॥
पुरट थाली विषै भक्ति करके सही।
जानि इमिधर्म दशधा जजों शिवमही ॥९॥ ॐ ह्रीं दशलक्षणधर्मेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। धर्म भव कूपतें काढ़ने को रसी।
भव उदधि पार करतार नवका इसी ॥
धर्म सुख दैन जिमि तात माता सही। जानि इमिधर्म दशधा जजों शिवमही ॥१०॥ ॐ ह्रीं दशलक्षणधर्मेभ्यो महार्घ्यं निर्वः स्वाहा। जयमाला
दोहा
दश वृष रतन मिलाय के, माल करै भवि जोय। धेरै आपने उर विषै, ता सम और न कोय ॥१॥ = श्री दशलक्षण मण्डल विधान =
बेसरी छन्द
दशलक्षण वृष शिवमग दीवा’, धर्म थकी सुख पावैं जीवा। मुकति दीप’ पहुँचावन नावा’, ये दश धर्म जजौं जुत भावा ॥२॥ दशविधि धरम धेरै जो कोई, करम नाशि फिर दुख नहिं होई। धरम जु साधन और न कोई, यो दश धर्म जजौं मद खोई ॥३॥ धरम जीव का पालनहारा, धरम मान का खण्डनवारा। धरम थकी जावै कुटिलाई, इमि दश धर्म जजौं चितलाई ॥४॥ साँच वचन सम धरम न आनौ, धर्म भाव निर्मल पहचानौ। धर्मजीव-रख इन्द्रिय जीतं, इमि लखि धर्म जजौं कर प्रीतं ॥५॥ तप ही सर्व धर्म का मूला, त्याग धरमतें क्षय अघ थूला। धर्म नगन’ सम और न कोई, इमि दशधर्म जजौं मद खोई ॥६॥ नारी त्याग धरम शिवदाई, ये दश धरम जगत् में भाई। जो दश लक्षण मनमें आनै, सो भव-तप-हर-शिवपद ठानै ॥७॥ दशलक्षण व्रत इह विधि कीजे, उत्कृष्टें दश वास करीजे। नातर बेले पारनभाई, तथा इकन्तर वास कराई ॥८॥ शक्तिहीन है तो सुन मीता, दश एकान्त करौ धरि प्रीता। व्रत दश वर्ष करै मन लाई, करूँ उद्यापन मन वच काई ॥९॥ नहिं उद्यापन शक्ति तुम्हारी, तौ दूनो व्रत करूँ सुखकारी। पीछे यथाशक्ति खरचावै, पूजन धरम उद्योत करावै ॥१०॥ दोहा
इत्यादिक विधि सहित जो, धर्म करै दश सार।
पावै सुख मन भावनो, अनुक्रम ले भव-पार।।
ॐ ह्रीं दशलक्षणधर्मेभ्यो पूर्णार्घ्य निर्वः स्वाहा। •••
श्री दशलक्षण मण्डल विधान
उत्तम क्षमा धर्म पूजा
अडिल्ल
जीव तिरस थावर जेते तग में सही।
देव नरक नर पशू चारि गति की मही।।
तिन सब ऊपर दयाभाव उर माँहि जी।
सो है उत्तम क्षमा थापि जजूँ याहिं जी।।१।।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्म ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्। आह्वाननम्। ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्म ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। स्थापनम् ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्म ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। सन्निधिकरणम्। अथ अष्टक
पद्धरि छन्द
जल गंग नदी को विमल सोइ, धरि रतन पियाले शुद्ध होइ।
यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन ॥१॥ ॐ ह्रीं श्रीउत्तमक्षमाधर्मागाय जन्मजरामृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वः स्वाहा। बावन चन्दन घसि नीर लाय, धरि कनक रकेबी जिन चढ़ाय।
यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥२॥ ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मांगाय संसारताप-विनाशनाय चन्दनं निर्वः स्वाहा। अक्षत मुक्ताफलसम जु लाय, अति उज्ज्वल नखशिख शुद्ध भाय। यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥३॥ ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मागाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वः स्वाहा। शुभ फूल कल्पतरु के अनूप, करि माला सुमन सुगन्ध रूप।
यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥४॥ ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मागाय कामबाणविध्वंशनाय पुष्पं निर्वः स्वाहा। नाना रस पूरित चरु सम्हाल, शुभ मोदक आदि अनेक धार।
यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥५॥ ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मांगाय क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्व॰ स्वाहा। मणि दीपक सार बनाय लाय, धरि कनकथाल भरि भक्ति भाय।
यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥६॥ ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मांगाय मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्वः स्वाहा। श्री दशलक्षण मण्डल विधानः
ले धूप अगुरुजा अन्धकार, दुर्भाव हुताशन माहिं जार। यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥७॥ ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मागाय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्व॰ स्वाहा। फल नारिकेल बादाम सोई, पुंगीफल खारक भक्ति जोइ। यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥८॥ ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मागाय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्व॰ स्वाहा। जल चन्दन अक्षत फूल लाय, चरु दीप धूप फल अर्घ भाय। यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥९॥ ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मागाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्व॰ स्वाहा।
प्रत्येक अर्घ्य
अडिल्ल
पाप प्रकृति कर जीव अशुभ बंधन करयो।
थावर नामा कर्म उदय दुख को भरयो॥
पृथ्वी माहिं सु जाय सहे बहु अघ फला।
तिनका रथण भाव क्षमा उत्तम भला॥१॥
ॐ ह्रीं पृथ्वीकायिक-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व॰ स्वाहा। जे जलकायिक जीव ज्ञान बिन दुख लहैं।
इक इन्द्रिय के द्वार अतुल विपदा सहैं।।
तिनको दुखमय जानि मुनी करुणा करें।
तसु प्रसादतैं झटिति मोक्ष वनिता वरें॥२॥
ॐ ह्रीं जलकायिक-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व॰ स्वाहा। अगनिकाय धर जीव एक इन्द्रिय सही।
नाना दुःख तन सहैं जलै सब जग मही॥
इन पर करुणाभाव धेरै जे भवि सही।
सो ही उत्तम क्षमा मोक्षदाता कही॥३॥
ॐ ह्रीं अग्निकायिक-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व॰ स्वाहा। श्री दशलक्षण मण्डल विधानः
पवनकाय के जीव महा संकट सहैं।
हाथ पाँव मुख वचन थकी बाधा लहैं।
इन पर करुणाभाव जती धारै सही।
सो ही उत्तमक्षमा कही शिव की मही ॥४॥ ॐ ह्रीं वायुकायिक-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। हरित काय में प्राणी अति वेदन लहै। छेदन भेदन कष्ट महा अघ फल सहै।।
इन पर समता भाव सुखी इनको चहै।
सो ही उत्तम क्षमा धारि मुनि शिव लहै ॥५॥ ॐ ह्रीं वनस्पतिकायिक-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मांगाय अर्घ्य निर्वः स्वाहा। थावर के पन भेद पाप फलतैं बने।
सूक्ष्म बादर भेद दोय यों जिन भने ॥ इनको दुखमय जानि दया मन लाय है।
सो ही उत्तम क्षमा जजौं शिर नाय है ॥६॥ ॐ ह्रीं सूक्ष्मस्थूलपंचस्थावर-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। लट अरु जोक गिडोला इल्ली जानिये।
कौड़ी शंख दुइन्द्रिय अति दुख थानिये। इन पर करुणाभाव जती धारै सही।
सो ही उत्तम क्षमा जजौं शिवकी मही ॥७॥ ॐ ह्रीं द्वीन्द्रियजीव-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। चींटी कुंथा खटमल बीछू दुखमही।
ते इन्द्रिय परजाय पाय घुण आदि ही ॥ इनको दुखमय जानि मुनी करुणा धेरै। सो ही उत्तम क्षमा जजौं सब अघ जैरें ॥८॥ ॐ ह्रीं त्रीन्द्रियजीव-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मांगाय अर्घ्य निर्व॰ स्वाहा। श्री दशलक्षण मण्डल विधानः
माखी मच्छर टीडी भँवरादिक सही।
बर्र ततझ्या मकड़ी चतुरिन्द्रिय कही।।
इनको दुखिया देखि मुनी करुणा धेरै।
सो ही उत्तम क्षमा जजौं वसुविधि जैरें ॥९॥ ॐ ह्रीं चतुरिन्द्रियजीव-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। इन्द्रिय पाँचों होय, नहीं मन जो लहै।
ते जिय जानि असैनी अघफल अति दहै।।
इनको दुख भरपूर जानि करुणा धेरै।
सो ही उत्तम क्षमा जजौं शिवथल धेरै ॥१०॥
ॐ ह्रीं असंज्ञीपंचेन्द्रियजीव-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। नरक जीव अति दुखी पापफलतैं सही।
छेदन भेदन पीर सहैं जात न कही।।
इन पर करुणाभाव जती अति लाय हैं।
सो ही उत्तम क्षमा जजौं सुखदाय हैं ॥११॥
ॐ ह्रीं नारकीजीव-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। गीता छंद
मनुष क्रोध रु मान माया, लोभवश दुखिया घने। बहुचाह पीड़त रागद्वेषी, अघ घनो उपजे तिने।। तिन देख यतिवर दया लावे, महादीन दयाल जी।
सो धर्म उत्तम क्षमा निर्मल, जजौं भाग्य विशालजी ॥१२॥ ॐ ह्रीं मनुष्यजीव-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। परकार चारों देव गति में, जीव सुख राचै सही। लछि देखि परकी झुरै नितही, मानतें पीड़ा कही।। तिन देखि मुनि उर दया लावै, महा कोमल भावजी। सो धर्म उत्तम क्षमा पूजौं, अर्घतें कर चावजी ॥१३॥ ॐ ह्रीं चतुर्विधिदेवजीव-परिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। श्री दशलक्षण मण्डल विधान
बेसरी छन्द
जयमाला
धर्म क्षमा उत्तम बड़ो, सब जीवन सुखदाय।
जजै जीव सो पुनि लहै, करै जु शिवपुर जाय॥१॥
बेसरी छन्द
सब जीवन में राग न दोषा, सो है क्षमा धरम निरदोषा। दुर्जन कृत उपसर्ग लहावै, ताहू पै समभाव रहावै॥२॥ मुनि को वचन कहै दुखकारी, मरम छेद छेदै अघ धारी। मान खंड किरिया करवावै, तब मुनि क्षमा धर्म मन लावै॥३॥ जे कोई दुष्ट मुनिन को मारै, तीक्ष्ण शस्त्रतें करि परिहारै। बाँधै तन को खेद न पावै, तिनपर क्षमा धर्म मन लावै॥४॥ अति दुखिया जियको ऋषि जानें, तब मुनि अनुकंपा मन आनै। आपा पर को हित उपजावै, तब मुनि क्षमा धरम मन लावै॥५॥ उत्तम क्षमा धरम सुखदाई, क्षमा धरम सब जियका भाई। जब मुनिहू पै कष्ट जु आवै, तब मुनि क्षमा धरम मन लावै॥६॥ क्षमा धरमसी ढाल न होई, क्रोध समान प्रहार न कोई। क्षमा समान न बल अति पावै, तातैं जती क्षमा वृष भावै॥७॥ क्षमा धरम शिव राह बताई, क्षमा तात मात अरु भाई। जातैं सिद्ध सुखन को पावे, ऐसी क्षमा मुनी मन लावै॥८॥ सोरठा
क्षमा आभूषण सार, उर में जो परिहरे सही।
ते भवसागर पार, जजौं धर्म उत्तम क्षमा॥९॥
ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मांगाय पूर्णार्घ्य निर्वः स्वाहा। श्री दशलक्षण मण्डल विधानः
उत्तम मार्दव धर्म पूजा
पद्धरि छन्द
मार्दव वृष भाव विचार सोई, जहाँ मान भाव दीखे न कोई। इह धारी मुनि शिवगामि जानि, मैं जजौं थापि मार्दव सुभानि॥ ॐ ह्रीं उत्तममार्दवधर्म ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्। आह्वाननम्। ॐ ह्रीं उत्तममार्दवधर्म ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। स्थापनम् ॐ ह्रीं उत्तममार्दवधर्म ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। सन्निधिकरणम्। अथ अष्टक
चाल मणुयणानन्द की
क्षीर सम नीर शुद्ध गाल कर लाइये।
पात्र सुवरण विषै धारि गुण गाइये॥
जगत् फिरनो मिटे तासु फलतैं सही।
धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही ॥२॥
ॐ ह्रीं उत्तममार्दवधर्मांगाय जन्मजरामृत्यु-विनाशनाय जलं निर्व० स्वाहा। स्वच्छ नीर संग चंदनादि को मिलाय जी।
शुद्ध गंधयुक्त भक्तिभावतें चढ़ायजी॥
जगत् आताप-हर जानि ता फल सही।
धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही ॥३॥
ॐ ह्रीं उत्तममार्दवधर्मांगाय संसारताप-विनाशनाय चन्दनं निर्व० स्वाहा। अक्षतं समुज्ज्वलं खंड बिन जानिये।
सुभग मोती जिसे थाल भरि आनिये॥
ध्रौव्य फलदाय मनलाय ध्याऊँ सही।
धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही ॥४॥
ॐ ह्रीं उत्तममार्दवधर्मांगाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्व० स्वाहा। फूल कल्पवृक्ष के गंध रंग सारजी।
माल गूंथि शुद्धभाव भक्ति कर धारजी॥
श्री दशलक्षण मण्डल विधान
मदन मद हरन सुफल जानि यातें सही। धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही॥५॥ ॐ ह्रीं उत्तममार्दवधर्मांगाय कामबाणविध्वंशनाय पुष्पं निर्व॰ स्वाहा। सुभग रस शुद्ध नैवेद्य मन लाइये। मोदकादि शुद्ध भक्तिभावतें चढ़ाइये॥ धारि स्वर्णपात्र शुद्ध मन वचन तन सही। धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही॥६॥ ॐ ह्रीं उत्तममार्दवधर्मांगाय क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्व॰ स्वाहा। दीप रतनमयी नाश तमको करा।
कनक पातर विषै भक्तिभावतें धरा॥ नाश अज्ञान है तासु फलतै सही।
धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही॥७॥ ॐ ह्रीं उत्तममार्दवधर्मांगाय मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्व॰ स्वाहा। धूप दशगंध शुभ लेय मन मानिये।
अगर चंदन सबै मेलि शुभ ठानिये॥ अग्नि संग खेड्ये कर्म जालन सही। धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही॥८॥ ॐ ह्रीं उत्तममार्दवधर्मागाय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्व॰ स्वाहा। श्रीफलादि लौंग पुंगीफलादि जानिये। शुद्ध बादाम खारक भले आनिये॥
सिद्ध थानक लहै तासु फलतै सही॥ धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही॥९॥ ॐ ह्रीं उत्तममार्दवधर्मांगाय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्व॰ स्वाहा। नीर चंदन अखिल पुष्प चरु दीप जी। धूप फल अर्घकर भाव शुद्ध टीपजी॥ श्री दशलक्षण मण्डल विधानः
लोक में फिरन, तन धरन मिटि है सही। धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही ॥१०॥ ॐ ह्रीं उत्तममार्दवधर्मांगाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। प्रत्येक अर्घ्य
चाल मणुयणानन्द की
देव वीतराग सर्वज्ञ तारक सही।
दोष अष्टादशों तासु माहीं नहीं॥
नमन तिन पद करै धर्म मार्दव कह्या। सो जजों चारि गति माँहि भरमत दह्या ॥१॥ ॐ ह्रीं श्रीवीतरागदेव-पद-नमन-मार्दवधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा। वीतराग देव कही वानि सो धर्म है। ता सुनै जीव निज हरै भाव भर्म है। मन वचन काय श्रुतपाद सिर नाय हैं। सो जजों चारि गति माँहि भरमत दह्या ॥२॥ ॐ ह्रीं श्रीजिनधर्म-पद-नमन-मार्दवधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। धर्म को सेय तप लेय कर्म जार जी। भय सिद्ध देव तन रहित सुखकारजी ॥ लेय इन नाम मन वचन शिर नाय है।
सो जजों चारि गति माँहि भरमत दह्या ॥३॥ ॐ ह्रीं श्रीसिद्ध-पद-नमन-मार्दवधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। धारि छत्तीस गुण सूरि सुखदायजी।
धर्म तप भाव सों गुप्त धरि भायजी ॥ मान तजि नमन इन पद विषै लाइयो।
सो जजों चारि गति माँहि भरमत दह्या ॥४॥ ॐ ह्रीं श्रीआचार्य-पद-नमन-मार्दवधर्मागाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। श्री दशलक्षण मण्डल विधान
मान तजि इन चरण कायको नाइयो।
सो जजों चारि गति माँहि भरमत दह्या॥५॥ ॐ ह्रीं श्रीउपाध्याय-पद-नमन-मार्दवधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। क्षेत्र अतिशय तहाँ धर्म को धाय है। नमन बहु जिय करै देव गुण गाय हैं। मान तजि क्षेत्र शुभ जानि शिर नाइयो। सो जजों चारि गति माँहि भरमत दह्या॥६॥ ॐ ह्रीं श्रीअतिशयक्षेत्र-नमन-मार्दवधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व॰ स्वाहा। देव जिनकी सु प्रतिमा अकृत्रिम इसी। रूप द्युति ध्यानमुद्रा कही जिन जिसी॥ मान तजि शीश इन चरण को सुनाइयो। सो जजों चारि गति माँहि भरमत दह्या॥७॥ ॐ ह्रीं श्रीअकृत्रिमजिनचैत्य-पद-नमन-मार्दवधर्मांगाय अर्घ्य निर्वः स्वाहा। सुरग थानक विषै देव जिनके सही।
रतनमय जैन बिम्ब बिगर किये हैं मही॥ मान तजि शीश इन चरणको सुनाइयो।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो॥८॥ ॐ ह्रीं श्रीऊर्ध्वलोकसम्बन्धिजिनचैत्य-नमन-मार्दवधर्मांगाय अर्घ्य निर्वः स्वाहा। ज्योतिषी व्यन्तरा थान मध्यलोकजी। बिन किये चैत्य जिन कहे अघ रोकजी॥ मान तजि शीश इन चरणको सुनाइयो।
सो जजों चारि गति माँहि भरमत दह्या॥९॥ ॐ ह्रीं श्रीमध्यलोकसम्बन्धिजिनचैत्य-नमन-मार्दवधर्मांगाय अर्घ्य निर्वः स्वाहा।
श्री दशलक्षण मण्डल विधान
भवन देवनि विर्षं बहुत जिनरायजी।
बिम्ब अकृत्रिम कहे सेय तसु पायजी॥
मान तजि शीश इन चरणको सुनाइयो।
सो जजों चारि गति माँहि भरमत दह्या ॥१०॥
ॐ ह्रीं श्रीऊर्ध्वलोकसम्बन्धिजिनचैत्य-पद-नमन-मार्दवधर्मागाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। आदि इन पूज्य थानक बहुत हैं सही।
सिद्ध क्षेत्र मोक्ष फलदाय तीरथ सही॥
मान तजि शीश इन चरणको सुनाइयो।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ॥११॥
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धक्षेत्र-पद-नमन-मार्दवधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। जयमाला
बेसरी छन्द
मार्दव धर्म मान को खोवै, ताफल जगत् पूज्य फल होवै। मार्दव सकल दोष निरवारै, ताफल आप तिरै अनि तारै ॥१॥ मार्दव धरम इन्द्र सुर पूजें, मार्दव धरम भजैं अघ धूनें। मार्दव मान हरै सुखकारै, ताफल आप तिरै अनि तारै ॥२॥ मार्दव धरम महा नर ध्यावै, मार्दव धरम हानि नहिं पावै। यह मार्दव वृष शिवथल धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै ॥३॥ मार्दव सबको राखै माना, मार्दव सब धरमनि में दाना। मार्दव धरम जीव जे धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै ॥४॥ मार्दव धरम सुरग सुख केरा, उपद्रव नाशि हरै भवफेरा। मार्दव उत्तम पुरुष सु धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै ॥५॥ मार्दव मोक्षमार्ग को दाता, मार्दव धर्म सकल जग त्राता। मार्दव वृष गुणवन्ता धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै ॥६॥ मार्दव धरम कल्पतरु भाई, मार्दव मनवांछित फलदाई। मार्दव धरम मुकुट जो धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै ॥७॥ श्री दशलक्षण मण्डल विधानः
मान मार मार्दव करै, हरै पाप मल सोय।
जगत् छुड़ावै शिव करै, ते मो रक्षक होय ॥१०॥
ॐ ह्रीं उत्तममार्दवधर्मागाय पूर्णार्घ्य निर्वः स्वाहा।
उत्तम आर्जव धर्म पूजा
बेसरी छन्द
जग परपंच रहित जो भावा, सरल चित्त सबतै निरदावा। तिनको आर्जव भाव सुकहिये, सो ह्यां थापि पूज फल लहिये ॥१॥ ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्म ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्। आह्वाननम्। ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्म ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। स्थापनम् ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्म ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। सन्निधिकरणम् । अष्टक
क्षीर समुद्र का उज्ज्वल नीरा, कनक पियाले धर अति धीरा। जरा रोग नाशनको भाई, आर्जव भाव नमों शिरनाई॥२॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्मागाय जन्मजरामृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वः स्वाहा। चन्दन बावन जल घसि लाया, कनकपात्र में धरि उमगाया। शोकानल तप नाशन भाई, आर्जव भाव नमों शिरनाई॥३॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्मांगाय संसारताप-विनाशनाय चन्दनं निर्वः स्वाहा। अक्षत मुक्ताफल से जानो, उज्ज्वल खण्ड विवर्जित आनो। क्षय नहिं होय इसो पद दाई, आर्जव भाव नमों शिरनाई॥४॥ ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्मागाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वः स्वाहा। फूल सुगन्ध कल्पद्रुम लाया, तथा सुवर्ण रजतमय भाया। तिनकी माल गूंथि कर लाई, आर्जव भाव नमों शिरनाई॥५॥ ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्मागाय कामबाणविध्वंशनाय पुष्पं निर्वः स्वाहा। श्री दशलक्षण मण्डल विधान
नाना रस नैवेद्य करावै, मोदक आदि भक्ति तैं लावै।
भूख व्याधि नाशन को भाई, आर्जव भाव नमों शिरनाई॥६॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्मागाय क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्व० स्वाहा। दीपक रतन थालि धरि लीजै, मन वचकाय शुद्धि कर लीजै।
घाति अज्ञान ज्ञान दरशाई, आर्जव भाव नमों शिरनाई॥७॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्मांगाय मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्व० स्वाहा। धूप अगरजा चन्दन भीनी, गंध सहित निज करमें लीनी।
कर्म दहनको अग्नि जराई, आर्जव भाव नमों शिरनाई॥८॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्मागाय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्व० स्वाहा। ले नरियल बादाम सुपारी, खारिक लौंग आदि हितकारी।
सिद्धलोक वांछा मनमाहीं, आर्जव धरम जजौं शिरनाई॥९॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्मांगाय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्व० स्वाहा। जल चन्दन अक्षत कामारी, चरु दीपक फल धूप विथारी।
अर्घ लेय मनवचतन भाई, आर्जव धरम नमौं शिरनाई॥१०॥
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्मांगाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। अथ प्रत्येक अर्घ्य
बेसरी छन्द
गुण छ्यालीस जहाँ प्रभु तेरा, अष्टादश तहाँ दोष न हेरा। तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव पावै॥१॥ ॐ ह्रीं श्रीषट्चत्वारिशत्-गुणसहित-जिनचरणनमन-आर्जवधर्मागाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। मुक्त जीव अरहंत थुति कीजै, मन वच कुटिल भाव तजि दीजै। तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव पावै॥२॥ ॐ ह्रीं श्रीमुक्तजीव-अरहंतपदनमन-आर्जवधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। कर्म काटि शिवलोक सिधारै, सिद्ध सुदेव हरो अघ सारै।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै॥३॥ ॐ ह्रीं श्रीसिद्ध-पद-नमन-आर्जवधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। सिद्धशिला पैंतालिस लाखा, योजन विस्तृत जिन वच भाषा।
तत्रस्थित आतम शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै॥४॥ ॐ ह्रीं श्रीसिद्धशिलास्थित-मुक्तात्मपदनमन-आर्जवधर्मागाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। श्री दशलक्षण मण्डल विधानः
गुण छत्तीस सुधारक सूरा, आचारज सब गुण भरपूरा।
ॐ ह्रीं श्रीआचार्य-पद-नमन-आर्जवधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। आचारज सब गुण भरपूरा, आचारादि गुणन युत सूरा।
ॐ ह्रीं श्रीआचार्य-पद-परोक्षनमन-आर्जवधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। गुण पचीस उवझाय सु माँही, ग्यारह अंग चौदह पूर्वाही।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥७॥
ॐ ह्रीं श्रीउपाध्याय-पद-नमन-आर्जवधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। बहु गुण धर उवझाय सु जानो, दूरहिं तैं तिनको चित आनो।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥८॥
ॐ ह्रीं श्रीउपाध्याय-परोक्ष-नमन-आर्जवधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। बीस आठ गुण साधन साधा, सो नहिं लहै जगत् की बाधा।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥९॥
ॐ ह्रीं श्रीसाधु-पद-नमन-आर्जवधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। दूरहितैं मुनि गुण जु चितारै, मनवचकाया निज वश धारै।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥१०॥ ॐ ह्रीं श्रीजिनमुनिपरोक्ष-पद-नमन-आर्जवधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। वरणविहीन सु जिनवर वानी, तिनको सुनि सुख पावै प्रानी।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥११॥ ॐ ह्रीं श्रीजिनवाणी-नमन-आर्जवधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। अतिशय क्षेत्र सु तीरथ ठामा, यात्री गण के पूरे कामा।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥१२॥ ॐ ह्रीं श्रीअतिशयक्षेत्र-नमन-आर्जवधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। शिखर सम्मेद आदि सिद्धिथाना, तहँ मुनि लिय शिव कर्मनशाना। तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥१३॥ ॐ ह्रीं श्रीसिद्धक्षेत्र-नमन-आर्जवधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। श्री दशलक्षण मण्डल विधान
बिगर किये जिनबिंब अनूपा, लक्षण चिह्न जानि जिन रूपा। तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥१४॥ ॐ ह्रीं श्रीअकृत्रिमजिनचैत्य-पद-नमन-आर्जवधर्मागाय अर्घ्य निर्व॰ स्वाहा। कृत्रिम जे जिनबिंब विराजैं, विनय सहित पुन दायक छाजैं। तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥१५॥ ॐ ह्रीं श्रीकृत्रिमजिनचैत्य-पद-नमन-आर्जवधर्मागाय अर्घ्य निर्व॰ स्वाहा। इत्यादिक बहु क्षेत्र सुथाना, पूजनीक तीरथ अघ हाना। तिनपद सरलभाव शिरनावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥१६॥ ॐ ह्रीं श्रीसकलपूज्यस्थानक-पद-नमन-आर्जवधर्मागाय अर्घ्यं निर्व॰ स्वाहा। जयमाला
सरल भाव सारै सरस, सुरनर पूज्य महान्।
तातैं तजनी कुटिलता, आरजव भाव लहान॥१॥
बेसरी छन्द
सरल भाव समता उर आनै, सरल भाव सब औगुन भानै।
आरजव भाव धेरै जो जीवा, तिनने जिनवानी रस पीवा॥२॥ आरजव भाव धेरै जे प्रानी, तिनके होनहार शिवरानी। दोषभाव तिनतै नहिं छीवा, आरजवभाव धेरै जे जीवा ॥३॥ आरजव भाव अमर पद ध्यावे, आर्जव में औगुन नहिं पावे। कुटिल भाव विष जिन नहिं पीवा, आरजवभाव धेरै जे जीवा ॥४॥ आर्तभाव आरजव ही खोवै, आरजवभाव पापमल धोवै।
रोग-शोक ताको नहिं छीवा, आरजवभाव धेरै जो जीवा ॥५॥ आरजव शुद्ध भाव जिन पाया, तिनने लहि पुन पाप गमाया। अनुभव आनन्द तानै छीवा, आरजवभाव धेरै जे जीवा ॥६॥ आरजवभाव दोष सब खोवै, आरजव कर्म कालिमा धोवै।
शुद्ध सुभाव सु तानै लीवा, आरजवभाव धेरै जे जीवा ॥७॥ आरजवभाव सकल को प्यारा, आरजवभाव भ्रमणतैं न्यारा। ताकों और रुचे न मतीवा, आरजवभाव धेरै जे जीवा ॥८॥ श्री दशलक्षण मण्डल विधान
आरजव सुर शिव के सुख ठाने, आरजवभाव पूर्व अघ भाने। अद्भुत आपापर भिन कीवा, आरजवभाव धेरै जे जीवा।।९।। दोहा
अन्तरंग निरदोष के, प्रगटें आरजभाव।
जाके फल मरनौ मिटै, छुटै कर्म को दाव ।।१०।।
ॐ ह्रीं उत्तमआर्जवधर्मांगाय पूर्णार्घ्य निर्वः स्वाहा।
उत्तम शौच धर्म पूजा
बेसरी छन्द
शौच धर्म पर-चाह निवारै, तनतै हूँ ममता निरवारै।
जग वांछा तजि निर्मल भावा, शौचधर्म पूजौं कर चावा ।।१।। ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्म ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्। आह्वाननम्। ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्म ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। स्थापनम्। ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्म ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। सन्निधिकरणम्। अष्टक
पद्धरि छन्द
जल क्षीरसमुद्र को सुभग लाय, धरि कनकपात्र में भक्ति भाय। तन धरन मिटै बहुफल सुजान, मैं शौचधर्म जजि हर्ष आन।।२।। ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्मांगाय जन्मजरामृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वः स्वाहा। घसि बावन चन्दन नीर आन, अलि गुंजन मानों करत गान।
धरि कनक पियाले भक्ति जान, मैं शौचधर्म जजि हर्ष आन।।३।। ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्मांगाय संसारताप-विनाशनाय चन्दनं निर्वः स्वाहा। उज्ज्वल अखंड शुभ गंधदाय, अक्षत अनूप लखि शशि लजाय। कन-पात्र विषै घरि भक्ति आन, मैं शौचधर्म जजि हर्ष आन।।४।। ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्मांगाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वः स्वाहा। ले फूल कल्पद्रुम के मनोग, आसक्त भ्रमर थित करत भोग। तिन गूँथि माल उर भक्ति ठान, मैं शौचधर्म जजि हर्ष आन।।५।। ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्मांगाय कामबाणविध्वंशनाय पुष्पं निर्वः स्वाहा। श्री दशलक्षण मण्डल विधान
शुभ मोदक आदि अनेक भाय, रसनारंजन नैवेद्य लाय।
धरि पुरट थाल में भक्ति ठान, मैं शौचधर्म जजि हर्ष आन ॥६॥ ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्मांगाय क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्व॰ स्वाहा। मणि दीपक वा घृतमय सँजोय, मनुनिविड़ मोहतम नाश होय।
अरु ज्ञान प्रकाश करै महान्, मैं शौचधर्म जजि हर्ष आन ॥७॥ ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्मांगाय मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्व॰ स्वाहा। शुभ धूप अगरजा गंध लाय, कन धूपायन ताकों खिवाय।
मिस धूम मनों वसुविधि उड़ान, मैं शौचधर्म जजि हर्ष आन ॥८॥ ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्मांगाय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्व॰ स्वाहा। ले फल बिदाम खारक अनूप, अरु पुंगीफल आदिक स्वरूप।
धरि भक्तिभाव मनमाहिं सोय, मैं शौचधर्म जजौं हर्ष होय ॥९॥ ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्मांगाय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्व॰ स्वाहा। जल गंधाक्षत वर-कुसुम होय, चरु दीप धूप फल सुभग जोय।
कर अर्घ धरौं कनपात्र लाय, मैं जजौं शौच वर भक्ति भाय॥१०॥ ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्मांगाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्व॰ स्वाहा। प्रत्येकार्घ्य
चाल मणुयणानन्द की
देव के सकल सुख जानि चंचलमयी।
आयु पल्य सागर की तुरत ही क्षय गयी।
जानि सब अथिर उर भाव निर्मल करै।
पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धेरै ॥१॥
ॐ ह्रीं देवसुख-वांछाविहीन-शौचधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व॰ स्वाहा। चाह चक्री तने सुखन की उर नहीं।
सहस छिनवै तिया और षट्खंड मही।
जानि सब अथिर उर भाव निर्मल करै।
पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धेरै ॥२॥
ॐ ह्रीं चक्रिपदभोगवांछाविहीन-शौचधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व॰ स्वाहा। श्री दशलक्षण मण्डल विधानः
खण्ड तीन को जु राज नारि बहु जानिये। चारि विधि सैन सुर नर खगादि मानिये ॥ जानि सब अथिर उर भाव निर्मल करै। पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धेरै ॥३॥ ॐ ह्रीं नारायणपदभोग-वांछाविहीन-शौचधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। कामदेव को सुरूप देखि देव मन हरे। भोग वांछित सकल देव सेवा करें।। जानि सब अथिर उर भाव निर्मल करै। पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धेरै ॥४॥ ॐ ह्रीं कामदेवपदभोग-वांछाविहीन-शौचधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। आठ परकार सपरस विषै जानिये।
द्रव्य क्षेत्र काल अनुसार भाव मानिये ॥ जानि सब अथिर उर भाव निर्मल करै। पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धेरै ॥५॥ ॐ ह्रीं स्पर्शनेन्द्रियभोग-वांछाविहीन-शौचधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। पाँच परकार रस जानि शुभ सारजी।
भोग वांछा सभी जगत् दुखकारजी ॥
जानि सब अथिर उर भाव निर्मल करै। पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धेरै ॥६॥ ॐ ह्रीं रसनेन्द्रियभोग-वांछाविहीन-शौचधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। घ्राण इन्द्रियतने गंध दो हैं सही। ताहि अनुकूल पाय जीव साता लही ॥ जानि सब अथिर उर भाव निर्मल करै। पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धेरै ॥७॥ ॐ ह्रीं घ्राणेन्द्रियभोग-वांछाविहीन-शौचधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा।
श्री दशलक्षण मण्डल विधानः
चक्षु इन्द्रियतने पाँच रूप भोग हैं। ताहि चाहें अमर नाहिं तन रोग हैं।। जानि सब अथिर उर भाव निर्मल करै। पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धेरै ॥८॥ ॐ ह्रीं चक्षुरेन्द्रियभोग-वांछाविहीन-शौचधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व॰ स्वाहा। राग संगीत इन आदि सुर साजिये।
सप्त स्वर भेद कर्ण भोग मन राचिये।। जानि सब अथिर उर भाव निर्मल करै। पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धेरै ॥९॥ ॐ ह्रीं कर्णेन्द्रियभोग-वांछाविहीन-शौचधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व॰ स्वाहा। भोग वांछित घने चित्त आधारजी।
ताहि सेय जीव सुख लहै अपारजी।।
जानि सब अथिर उर भाव निर्मल करै। पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धेरै ॥१०॥ ॐ ह्रीं मनोवांछितभोग-वांछाविहीन-शौचधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व॰ स्वाहा। तन अशुचि आपको सु चाम मय जानिये। सप्त मल धातु पूरित सु घिन आनिये।। जानि सब अथिर उर भाव निर्मल करै। पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धेरै ॥११॥ ॐ ह्रीं तनसम्बन्धीभोग-वांछाविहीन-शौचधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व॰ स्वाहा। रतन नवधादि भरपूर घर में सही।
कोटि नित दान देते सु क्षय होवे नहीं।। जानि सब अथिर उर भाव निर्मल करै। पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धेरै ॥१२॥ ॐ ह्रीं धन-वांछाविहीन-शौचधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व॰ स्वाहा।
श्री दशलक्षण मण्डल विधानः
रूप में शची समान नारि घर में घनी। शीश आज्ञा धेरै प्रीति रस में सनी ॥ जानि सब अथिर उर भाव निर्मल करै। पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धेरै ॥१३॥ ॐ ह्रीं वनिताभोग-वांछाविहीन-शौचधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। कामदेव के समान पुत्र रूप धारजी। विनयवान सर्व बलवन्त तेज सारजी ॥ जानि सब अथिर उर भाव निर्मल करै। पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धेरै ॥१४॥ ॐ ह्रीं पुत्रभोग-वांछाविहीन-शौचधर्मांगाय अर्घ्य निर्व० स्वाहा। भ्रात बहु विनयजुत आनि-पालक सही। संग तिन भोग भोगि जीव साता लही॥
जानि सब अथिर उर भाव निर्मल करै। पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धेरै ॥१५॥ ॐ ह्रीं भ्रातृसुख-वांछाविहीन-शौचधर्मांगाय अर्घ्य निर्व० स्वाहा। मन्त्र दाता विपति माहिं मित्र सारजी। प्रेम अन्तरंग धारि नित्य रहें लारजी॥ जानि सब अथिर उर भाव निर्मल करै। पूजि शौचधर्म को जु शौच थानक धेरै ॥१६॥ ॐ ह्रीं मित्रानुबन्ध-वांछाविहीन-शौचधर्मांगाय अर्घ्य निर्वः स्वाहा। मित्र तिय पुत्र सब घरतने दासिया। आदि परिजन सकल और घरवासिया ॥
जान सब अथिर उर भाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक करै।॥१७॥ ॐ ह्रीं सकलपरिजनानुकारित्व-वांछाविहीन-शौचधर्मागाय अर्घ्य निर्वः स्वाहा।
श्री दशलक्षण मण्डल विधानः
जयमाला
दोहा
शौच सकल उर सुख करै, हरे लोभ मद सोइ।
मोक्ष धेरै मरनो टरै, ताहि जजैं शिव होइ ॥१॥ शौच भावतें पुण्य बढ़ोई, कटे पाप जगमें जस होई। शौच भाव संतन को प्यारा, जजौं शौच यह धर्म हमारा ॥२॥ शौच भाव पर-चाह निवारै, शौच भाव दुख शोक विडारै। शौच सरब को बड़ा सहारा, जजौं शौच यह धर्म हमारा ॥३॥ शौच साँच के बड़ा सनेहा, शौच मुनिव्रत की इक देहा। शौच भाव मंगल करतारा, जजौं शौच यह धर्म हमारा ॥४॥ शौच भाव में नाहिं कषाया, शौच भाव सब जग का भाया। शौच धर्म का शरण गहारा, जजौं शौच यह धर्म हमारा ॥५॥ शौच धर्म को मुनिगण सेवें, ताफल स्वयं सिद्ध थल लेवें। शौच धर्म समता रस धारा, जजौं शौच यह धर्म हमारा ॥६॥ शौच समान और नहिं मिन्ता, शौच भाव टारै सब चिंता। शौच सदा सब जियका प्यारा, जजौं शौच यह धर्म हमारा ॥७॥ दोहा
शौच सार संसार मं, करै पवित्र जु भाव।
तातै धारो शौच को, भलो मिलो यह दाव ॥८॥
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्मांगाय पूर्णार्घ्य निर्वः स्वाहा। उत्तम सत्य धर्म पूजा
अडिल्ल
सत्य सरीखो धर्म जगत् में है नहीं।
सत्य धरम परभाव लहै शिव की मही।
तातैं भव दुख हरण सत्य वृष भाइये।
यहाँ थापि मैं जजौं सत्य मन लाइये ॥१॥
श्री दशलक्षण मण्डल विधानः
ॐ ह्रीं उत्तमसत्यधर्म ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्। आह्वाननम् । ॐ ह्रीं उत्तमसत्यधर्म ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। स्थापनम् ॐ ह्रीं उत्तमसत्यधर्म ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। सन्निधिकरणम्। अष्टक
त्रिभंगी छन्द
जो झूठ विनाशै जग विसवासै, पुण्य प्रकाशै हितदानी। सब दोष निवारै समता धारै, शिवपुर कारै गुण थानी॥
जग आदरकारी मोहनिवारी, आनदधारी जग मानो।
ऐसौ सत धर्मा काटत कर्मा, जल ले परमा जजि जानो ॥२॥ ॐ ह्रीं उत्तमसत्यधर्मागाय जन्मजरामृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वः स्वाहा। सत-सों वृष नाहीं या जग माहीं, पूज्य कहाहीं शिव थानी। सब औगुण धोवै पाप बिलोवै, धर्म मिलावै दुख हानी॥
पावत शिवनारी मुनिजन प्यारी, सुख करतारी भवि मानी। ऐसौ सत धर्मा काटत कर्मा, गंध ले परमा जजि जानो ॥३॥ ॐ ह्रीं उत्तमसत्यधर्मांगाय संसारताप-विनाशनाय चन्दनं निर्वः स्वाहा। या सत्य समानौ रतन न आनौ, सम्यक् दानौ शिवकारी।
भवदशि को नावा अशुभ गमावा, सरल स्वभावा दुखहारी ॥
सिधलोक नसैनी शिवसुख बैनी, ध्यावत जैनी अमलानौ ।
ऐसौ सत धर्मा काटत कर्मा, अक्षत परमा जजि जानौ ॥४॥ ॐ ह्रीं उत्तमसत्यधर्मागाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वः स्वाहा। सत सौं नहिं मिन्ता मेटत चिंता, अघ-अरि हन्ता जसदाई। सत जगत् पियारो भव उद्धारो, दुख-जम तारो थुति गाई॥
याकौ मुनि ध्यावैं शिवसुखपावैं, पाप गमावैं भव हानौ। ऐसौ सत धर्मा काटत कर्मा, पुष्पं परमा जजि जानो ॥५॥ ॐ ह्रीं उत्तमसत्यधर्मागाय कामबाणविध्वंशनाय पुष्पं निर्वः स्वाहा। सत धर्म सु पूजै सब अघ धूजै, शिवमग सूझे अधिकाई।
यातें वृष सारा काज सँवारा, अशुभ विहारा सिधिदाई॥
- श्री दशलक्षण मण्डल विधानः
सत सारा नीका सुखदा जीका, शिवमग टीका शुभ आनौ। ऐसौ सत धर्मा काटत कर्मा, ले चरु परमा जजि जानौ ॥६॥ ॐ ह्रीं उत्तमसत्यधर्मांगाय क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्व॰ स्वाहा। सत धर्म उजाला जग का पाला, विभ्रम टाला धर्म करा। यह ज्ञान उजालें अशुभ सु टालें, संजम पालैं झूठ हरा ॥ सत प्रीति उपावै वैर गमावै, जो थुति लावै उर ज्ञानौ। ऐसौ सत धर्मा काटत कर्मा, दीपक परमा जजि जानौ ॥७॥ ॐ ह्रीं उत्तमसत्यधर्मांगाय मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्वः स्वाहा। सत धर्म प्रभावै मुनि शिव जावै, जगजस गावै थुति लाई। सत धर्म जु मूला अघ-काय थूला, झूठ कुसूला दह भाई॥ सत धर्म अनूपा शुभ रस कूपा, पुष्प स्वरूपा मग मानौ। ऐसौ सत धर्मा काटत कर्मा, धूप जु परमा जजि जानौ ॥८॥ ॐ ह्रीं उत्तमसत्यधर्मागाय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्व॰ स्वाहा। सत धर्म अभ्यासौ शिवथल वासौ, पाप विनासौ हितकारी। गुण ज्ञान बढ़ावै आदर ल्यावै, पुण्य उपावै सत भारी॥ जगमें अति नीका बन्धु जी का, शिवतिय पीका गुण थानौ। ऐसौ सत धर्मा काटत कर्मा, ले फल परमा जजि जानौ ॥९॥ ॐ ह्रीं उत्तमसत्यधर्मांगाय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्कः स्वाहा। जल चंदन नीका अक्षत ठीका, फूल चुनीका माल करौं। चरु दीप सु लाया धूप बनाया, श्रीफल आया अर्घ्य धरौं। उर भक्ति बढ़ाई मुख थुति गाई, सत सब भाई पहचानौ। ऐसौ सत धर्मा काटत कर्मा, अर्घ्यं परमा जजि जानौ ॥१०॥ ॐ ह्रीं उत्तमसत्यधर्मागाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्व॰ स्वाहा। प्रत्येकार्घ्य
चौपाई
क्रोध सहित जिय सत नहिं कहैं, झूठ वचनतै अघ शिर लहै। क्रोधरहित जे वचन प्रमानि, सो सतधर्म चयो जिनवानि ॥१॥ ॐ ह्रीं क्रोधातिचाररहित-सत्यधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व॰ स्वाहा। श्री दशलक्षण मण्डल विधान
लोभ सहित जिय झूठ बखानि, साँच धरम ताकौ नहिं मानि। लोभरहित सतधरम सुभाय, सो सतधर्म जजौं थुति गाय ॥२॥ ॐ ह्रीं लोभातिचाररहित-सत्यधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। साँच न कहै भीतियुत जीव, बोले असत सु वचन सदीव। भयतें रहित सत्य वच भाख, सो सत धर्म करो थुति लाख ॥३॥ ॐ ह्रीं भयातिचाररहित-सत्यधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। हास्य सत्य को नाशनहार, तातें सहै महादुख मार। हास्यरहित सब धर्म कहाय, सो सतधर्म जजौं थुति गाय ॥४॥ ॐ ह्रीं हास्यातिचाररहित-सत्यधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। जिन आज्ञा बिन भाखै बैन, पूर्वापर वच ठीक कहैन। ऐसे दोषरहित यति भाय, सो सतधर्म जजौं थुति गाय ॥५॥ ॐ ह्रीं जिनाज्ञोलंघनातिचाररहित-सत्यधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। गीता छन्द
जा देश में जिस वस्तु को तिस मानिये सो सति सही। जिमि भात को गुजरात-मालवदेश में चोखा कही ॥
करनाट में कूलू कहें द्राविड़ में चौरु बखानिये। इमि जानि जनपद सत्य को जजि हर्ष उर में आनिये ॥६॥ ॐ ह्रीं जनपद-सत्यधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। अडिल्ल
बहु नर ताको कहैं तिसो ही मानिये।
रंक नाम लक्ष्मीधर जाहि बखानिये ॥
तौ यह रूढ़ी नाम सत्य संवृत कही।
या नयतें सत जानि जजौं सत वृष सही॥७॥
ॐ ह्रीं संवृत-सत्यधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। काहू पर आकार तथा पशु के सही।
चित्र काष्ठ में थापि नाथ नर पशु कही॥
श्री दशलक्षण मण्डल विधानः
यह थापन सत भेद शास्त्र में गाड्यो। ताकों सत वृष जानि जजौं मन लाइयो ॥८॥ ॐ ह्रीं स्थापन-सत्यधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व॰ स्वाहा। जाकों जग में नाम प्रसिद्ध बखानिये। सोई ताको नाम सत्य सो मानिये॥
नाम सत्य सो जानि वानि जिन इमि कही। ताको मन वच काय जजौं शुभ सुखमही॥९॥ ॐ ह्रीं नाम-सत्यधर्मांगाय अर्घ्य निर्वः स्वाहा। पीत श्याम अरु रक्त श्वेत गोरा सही। रूपवान इत्यादिक अंग बहुतै कही। रूपसत्य सो जानि कह्यो जिनवानिजी। ऐसो सत्य सुजानि जजौं सुखदानजी ॥१०॥ ॐ ह्रीं रूप-सत्यधर्मागाय अर्घ्य निर्वः स्वाहा। कही वस्तु यह यातें छोटी है सही। यातें है यह बड़ी अपेक्षा इमि कही। याको नाम प्रतीति सत्य सो जानिये। ताको भी है जजौं भक्ति उर आनिये ॥११॥ ॐ ह्रीं अपेक्षा-सत्यधर्मांगाय अर्घ्य निर्व॰ स्वाहा। जो नरपति को पुत्र ताहि राजा कहै। सो नैगमनय जानि सत्य तातै लहै।। यही सत्य व्यौहार जिनेश्वर धुनि कही। मैं जजिहाँ कर भक्ति नाय मस्तक सही ॥१२॥ ॐ ह्रीं व्यवहार-सत्यधर्मांगाय अर्घ्य निर्वः स्वाहा। शक्ति इन्द्रमें यों हि लोक उलटा करै। सो तो लोक अनादि उलटि कैसे धेरै।। श्री दशलक्षण मण्डल विधानः
पै यह शक्ति अपेक्षा वचन प्रमान है।
यह सम्भावन सत्य जजौं थिति आन है।।१३।।
ॐ ह्रीं संभावना-सत्यधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। जीव अनन्त अनादि नजर आवै नहीं।
द्रव्य अमूर्ती पाँच नरक सुर की मही।।
ये नहिं दीखें नयन सूत्रसौं जानिये।
भावसत्य सो जानि जजौं मन आनिये।।१४।।
ॐ ह्रीं भाव-सत्यधर्मांगाय अर्घ्य निर्वः स्वाहा। किसी वस्तु की उपमा जाको लाइये।
ज्यों दानी नर देख कल्पद्रुम गाइये।।
याको उपमा-सत्य नाम जानौ सही।
सो मैं पूजौं भक्ति नाय मस्तक मही।।१५।।
ॐ ह्रीं उपमा-सत्यधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। इत्यादिक बहु भेद सत्य के जानिये।
कहे देव जिनराय आपनी वानिये।।
सो मैं मन वच काय शुद्ध थुति गायजी।
पूजौं सत्य सुधर्म अरथ कर लायजी।।१६।।
ॐ ह्रीं सत्यधर्मांगाय महार्घ्य निर्वः स्वाहा। जयमाला
बेसरी छन्द
सत्य धरम जग पूज्य बताया, सत्य श्रेष्ठव्रत जिनधुनि गाया। सत्यधरम भवदधिको नावा, सो सत धर्म जजौं शुभ भावा ।।१।। सत्य धरम वर अंग प्रवीना, सत्य धरम ज्यों कंचनमीना। सत्य धर्म का सबको चावा, सो सत धर्म जजौं शुभ भावा ।।२।। सत्य धरम का राखनहारा, सत्यधरम मुनिजन को प्यारा। सत्य शिरोमणि धर्म कहाता, सो सतधर्म जजौं शुभ भावा ।।३।। श्री दशलक्षण मण्डल विधान
सत्य समान और नहिं मिन्ता, सत्य धर्म मेटे भवचिन्ता। सत्य करै अघतें निरदावा, सो सतधर्म जजौं शुभ भावा ॥४॥ सत्य धरम अपयश क्षयकारी, सत्य सुरक्षा करै हमारी। सतही का सुरनर जस गावा, सो सतधर्म जजौं शुभ भावा ॥५॥ सत्य सहित सग सार्थक धर्मा, तासों कटै चिरन्तन कर्मा। सत्य समान और नहिं ठावा, सो सतधर्म जजौं शुभ भावा ॥६॥ सत्य जगत् में पूजा पावै, सत्य धरम शिव राह बतावै। सत्य जजौं सतधर्म लहावा, सो सतधर्म जजौं शुभ भावा ॥७॥ धर्म सरोवर में सत नीरा, सत्यधर्म खोवै सब पीरा। सत्य धर्मसों कुगति न पावा, सो सतधर्म जजौं शुध भावा ॥८॥ सतसागर में जे रमे, ते वृष नायक जोय।
जजैं धर्म सतको सही, मन वच काया सोय ॥९॥
ॐ ह्रीं उत्तमसत्यधर्मागाय पूर्णार्घ्य निर्वः स्वाहा।
उत्तम संयम धर्म पूजा
अडिल्ल
संयमधर्म अनूप दोय विधि जानिये।
इक रक्षा षट्काय दया उर आनिये ॥
मन इन्द्रिय वश करै दूसरो संयमा।
सो मैं पूजौं थापि लहौं उत्तम रमा॥१॥
ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्म ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्। आह्वाननम् । ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्म ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। स्थापनम् ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्म ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। सन्निधिकरणम् । अष्टक
बेसरी छन्द
निर्मल नीर भाव कर भीजे, मन मनोज्ञ बासन धरि लीजे। जिनको जन्म मरण गद जावै, सो संयमवृष जजि शिर नावै ॥२॥ ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्मांगाय जन्मजरामृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वः स्वाहा। श्री दशलक्षण मण्डल विधान
चंदन शीतल भावन भाया, तापर मन भंवरा जु लुभाया।
जग आताप तासु नशि जावै, सो संयम वृष जजि शिर नावै ॥३॥
ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्मांगाय संसारताप-विनाशनाय चन्दनं निर्व॰ स्वाहा। शालि अखंड अखत ले भाई, शुभपरणति भाजन भरवाई।
जो अखंड थानक ले धावै, सो संयम वृष जजि शिर नावै ॥४॥
ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्मांगाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वः स्वाहा। फूल प्रफुल्लित भाव सु लीजै, भक्ति-तार में माल करीजै। मदन-बाण-हर सो बल पावै, सो संयम वृष जजि शिर नावै ॥५॥
ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्मांगाय कामबाणविध्वंशनाय पुष्पं निर्वः स्वाहा। भाव अवांछित कर नैवेद्यं, नाना रस मय जे निरखेद्यं।
भूख नाशि चित साता पावै, सो संयम वृष जजि शिर नावै ॥६॥ ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्मांगाय क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्वः स्वाहा। सम्यग्ज्ञान दीप करि भाई, शुद्ध भाव भाजन धरवाई।
ताके फल अज्ञान मिटावै, सो संयम वृष जजि शिर नावै ॥७॥
ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्मांगाय मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्वः स्वाहा। कर्म आठ मय धूप करीजे, धरम सु ध्यान अगनि खेवीजे।
ताफल दुष्टकर्म नशि जावै, सो संयम वृष जजि शिर नावै ॥८॥ ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्मांगाय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वः स्वाहा। उत्तम परिणति को फल कीजे, शुद्ध भाव कनथाल धरीजे।
तातैं मनवांछित फल पावै, सो संयम वृष जजि शिर नावै ॥९॥ ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्मांगाय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्व॰ स्वाहा। आठों द्रव्य अमोलिक जानी, प्रासुक भाव सहित हितदानी।
पद अनर्घ्य तासु फल पावै, सो संयम वृष जजि शिर नावै ॥१०॥ ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्मांगाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। प्रत्येकार्घ्य
ताल कूप खाई न खुदाय, भूमिकाय तब दया पलाय।
पृथिवीकाय की रक्षा होय, संयम धर्म जजौं मद खोय ॥१॥
ॐ ह्रीं पृथवीकायजीव-रक्षणरूप-संयमधर्मागाय अर्घ्य निर्व॰ स्वाहा। श्री दशलक्षण मण्डल विधान
अनगालो जल वरतें नाहिं, नदी तलाब फुड़ावै नाहिं।
जलकायिक जिय रक्षा करै, संयम वृष जजि शिवतिय वरै ॥२॥
ॐ ह्रीं जलकायिकजीव-रक्षणरूप-संयमधर्मांगाय अर्घ्य निर्वः स्वाहा। अगनि जलावन काज न करै, नांहि बुझावै करुणा धेरै।
अगनिकाय जिय रक्षा होय, संयम धर्म जजौं शुचि होय ॥३॥
ॐ ह्रीं अग्निकायिकजीव-रक्षणरूप-संयमधर्मांगाय अर्घ्य निर्वः स्वाहा। पवनकाय की रक्षा सार, पंखा आदि काज नहिं धार।
पवनकाय जिय रक्षा होय, संयम धर्म जजौं मद खोय ॥४॥
ॐ ह्रीं वायुकायिकजीव-रक्षणरूप-संयमधर्मांगाय अर्घ्य निर्व॰ स्वाहा। फूल पात तरु तोड़ै नाहिं, वन बागादि लगावै नाहिं।
हरितकाय जिय रक्षा होय, संयम धर्म जजौं मद खोय ॥५॥
ॐ ह्रीं वनस्पतिकायिकजीव-रक्षणरूप-संयमधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। इल्ली जोंक गिंडोला जान, बाला आदि जीव पहचान।
बे-इन्द्रिय जिय रक्षा होय, संयम धर्म जजौं मद खोय ॥६॥
ॐ ह्रीं द्वीन्द्रियजीव-रक्षणरूप-संयमधर्मांगाय अर्घ्य निर्वः स्वाहा। चींटी कुंथु वा खटमल लीक, जुआ तिरूला जिय करि ठीक।
ते-इन्द्रिय जिय रक्षा होय, संयम धर्म जजौं मद खोय ॥७॥
ॐ ह्रीं त्रीन्द्रियजीव-रक्षणरूप-संयमधर्मागाय अर्घ्य निर्वः स्वाहा। माखी भँवरा टीडी जान, मच्छर आदि जीव पहचान।
चउ-इन्द्रिय जिय रक्षा होय, संयम धर्म जजौं मद खोय ॥८॥
ॐ ह्रीं चतुरिन्द्रियजीव-रक्षणरूप-संयमधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व॰ स्वाहा। जीव असैनी बहुत प्रकार, जलचर सर्प आदि निरधार।
पंचेन्द्रिय जिय रक्षा होय, संयम धर्म जजौं शुचि होय ॥९॥
ॐ ह्रीं असंज्ञीपंचेन्द्रियजीव-रक्षणरूप-संयमधर्मागाय अर्घ्य निर्वः स्वाहा। नर सुर नारकि सब जिय संज्ञि, तिर्यक्गति में संज्ञि असंज्ञि। संज्ञी जिय की रक्षा होय, संयम धर्म जजौं मद खोय ॥१०॥
ॐ ह्रीं संज्ञीपंचेन्द्रियजीव-रक्षणरूप-संयमधर्मागाय अर्घ्यं निर्व॰ स्वाहा। श्री दशलक्षण मण्डल विधान
सपरस इन्द्रिय विषय निरवार, वीतरागता वरतै सार।
शीत उष्ण उर चाह न होय, संयम धर्म जजौं शुचि होय ॥११॥ ॐ ह्रीं स्पर्शनेन्द्रिय-विषयवर्जनरूप-संयमधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। रसनेन्द्रिय पाँच भट जान, तिनवश भये सकल गुणखान।
रसनेन्द्रिय के वश नहिं होय, संयम धर्म जजौं मद खोय ॥१२॥ ॐ ह्रीं रसनेन्द्रिय-विषयवर्जनरूप-संयमधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। घ्राणेन्द्रिय के भट दुइ जान, तिन प्रसाद जिय दुःख लहान। घ्राणेन्द्रिय के वश नहिं होय, संयम धर्म जजौं मद खोय ॥१३॥ ॐ ह्रीं घ्राणेन्द्रिय-विषयवर्जनरूप-संयमधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। चक्षु विषय भट जानों पाँच, ते दुख देय सकल जिय साँच।
चक्षु अक्ष के वश नहिं होय, संयमधर्म जजौं मद खोय ॥१४॥ ॐ ह्रीं चक्षुरिन्द्रिय-विषयवर्जनरूप-संयमधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। कर्णेन्द्रिय शुभाशुभ बैन, ता वश होय सुरासुर ऐन।
शब्द शुभाशुभवश नहिं होय, संयम धर्म जजौं मद खोय ॥१५॥ ॐ ह्रीं कर्णेन्द्रिय-विषयवर्जनरूप-संयमधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। मन चंचल कपि की गति जिसौ, ताकेवश जगजिय दुख फसौ।
मन के वश कबहूँ नहिं होय, संयम धर्म जजौं मद खोय ॥१६॥ ॐ ह्रीं मन-विषयवर्जनरूप-संयमधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। सब जियमें धरि समता भाव, तप संयम करिबे को चाव।
आरत रौद्र भाव नहिं होय, संयम धर्म जजौं शुचि होय ॥१७॥ ॐ ह्रीं सामायिकरूप-संयमधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। जो प्रमादवश संयम जाय, प्रायश्चित ले पुनि थिर थाय।
छेदोपस्थापन है सोय, संयम धर्म जजौं मद खोय ॥१८॥
ॐ ह्रीं छेदोपस्थापनारूप-संयमधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। दोय कोष नित गमन कराय, तन निहार नहिं बहु रिध पाय।
सो परिहार-विशुद्धी जोय, संयम धर्म जजौं शुचि होय ॥१९॥ ॐ ह्रीं परिहारविशुद्धिरूप-संयमधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। श्री दशलक्षण मण्डल विधानः
सकल कषाय नाश है जाय, नाम मात्र कछु लोभ रहाय। सूक्ष्म-सांपराय है सोय, संयम धर्म जजौं शुचि होय ॥२०॥ ॐ ह्रीं सूक्ष्मसाम्परायरूप-संयमधर्मागाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। सकल मोह नाशै जिसकाल, या उपशमैं मोह जंजाल। यथाख्यात में रहे न मोह, संयम धर्म जजौं शुचि होय ॥२१॥ ॐ ह्रीं यथाख्यातरूप-संयमधर्मागाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। अडिल्ल
इस प्रकार बहु विधि को संयम जानिये।
शिव सुखदायक होय दया की खानि ये॥
पूरण मुनि के होय धर्म हितदाय जी।
ताहि जजौं मैं अर्घ थकी यश गायजी ॥२२॥
ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्मांगाय महार्घ्यं निर्वः स्वाहा।
जयमाला
बेसरी छन्द
संयम सार जगत् में भाई, संयम तैं जिय शिव सुख पाई। संयम सबका राखनहारा, संयम है शिरताज हमारा ॥१॥ संयम सकल जीव सुखदाई, संयम जगत् जीव बड़ भाई। संयम जगत् गुरुनिका प्यारा, संयम है शिरताज हमारा ॥२॥ पूरण संयम मुनिजन पावैं, संयम तैं ही शिवमग धावैं। संयम अघनाशन असिधारा, संयम है शिरताज हमारा ॥३॥ संयम सर्व मुकुट धर धारें, संयम तैं विषधर डर हारै। संयम जामन मरण हमारा, संयम है शिरताज हमारा ॥४॥ संयम के सब दास बताये, संयम बिना जगत् भरमाये। संयम मोह सुभट को मारा, संयम है शिरताज हमारा ॥५॥ संयम मन का जीतनहारा, संयम इन्द्रिय रोग निवारा। पाप-बेलि को नाशनहारा, संयम है शिरताज हमारा ॥६॥ संयम जग-विरक्त जिय भावै, संयम को मुनिजन जस गावै। श्री दशलक्षण मण्डल विधान
संयम धर्म बहू अघजारा, संयम है शिरताज हमारा ॥७॥ संयम भवसागर नवका-सी, संयम धरि जिय शिवपुर जासी। संयम कर्म कलंक निवारा, संयम है शिरताज हमारा ॥८॥ संयम जग का बन्धु है, संयम मातरु तात।
संयम भव भव शरण है, नमों टेक अघ जात ॥९॥
ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्मांगाय पूर्णार्घ्य निर्व॰ स्वाहा।
उत्तम तपो धर्म पूजा
अडिल्ल
अन्तर बाहर भेद कहे तप सारजी।
दुविध भाव परकार करन भव-पारजी ॥
तप बारह परकार कर्म-गज केहरी।
मैं पूजौं इस थान जानि नित शुभ घरी ॥१॥
ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्म ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्। आह्वाननम् । ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्म ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। स्थापनम् ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्म ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। सन्निधिकरणम्। अष्टक
चौपाई
भवजलतरण नाव तप भाव, करि अघ नाश जु देव उछाव।
ऐसो तप निर्मल जल लाय, पूजौं जामन मरण नशाय ॥२॥
ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्मांगाय जन्मजरामृत्यु-विनाशनाय जलं निर्व॰ स्वाहा। त्रिभुवन में तप तिलक समान, याको मुनि धारै हित ठान। तपहर चन्दन सुभग मंगाय, मैं पूजौं भव तप नशि जाय ॥३॥ ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्मांगाय संसारताप-विनाशनाय चन्दनं निर्व॰ स्वाहा। बेसरी
तपतैं निरत लखे बहुतेरे, तपको जपें जु साहब मेरे। ऐसो तप अक्षत शुभ आनो, पूजौं फल अक्षय उपजानो ॥४॥ ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्मांगाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्व॰ स्वाहा। - श्री दशलक्षण मण्डल विधानः
पद्धरी
यह तप त्रिभुवन में पूज्य सार, यह तप नाना मंगल सु धार। ऐसो तप बहु शुभ फूल लाय, मैं पूजौं तसु फल मदन जाय ॥५॥ ॐ ह्रीं उत्तमतपोमधर्मागाय कामबाणविध्वंशनाय पुष्पं निर्वः स्वाहा। तप सुर वांछै पै नाहिं पाय, तातैं सुर पूजें तप सुभाय। ऐसो तप चरु ले भक्ति लाय, मैं पूजौं तसु फल क्षुधा जाय ॥६॥ ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्मांगाय क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्व॰ स्वाहा। तप कल्पवृक्ष वांछित सुदेइ, तप दीप अनूपम तम हरेइ।
ता तप को दीपक रतनलाय, मैं पूजौं तसु फल ज्ञान पाय ॥७॥ ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्मांगाय मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्वः स्वाहा। तपही तैं तीर्थंकर जु होय, तपही तैं शिव लहि कर्म खोय। ऐसे तप को शुभ धूप लाय, मैं पूजौं विधि ईंधन जराय ॥८॥ ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्मांगाय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्व॰ स्वाहा। तप पूजत जग करि पूज्य होय, तप औषधि दुखगद हरन जोय।
ता तपको बहुविधि फल मंगाय, मैं पूजौं तसु फल शिव लहाय ॥९॥ ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्मांगाय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्व॰ स्वाहा। तपतैं उर करुणाभाव होय, तप तपैं जगत् में पूज्य सोय। ता तप को उत्तम अर्घ लाय, मैं पूजौं पद अनरघ लहाय ॥१०॥ ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्मांगाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। प्रत्येकार्घ्य
गीता
तप सार जग में भेद बारह भव उदधि को नाव है।
पाप दाहक तप करन हित साधु मन उच्छाव है ॥
तप देय सुख दुख, दूरि करि है, और कहूँ लग गाइये।
इमि जानि पूजौं अर्घ लेकर, तासु फल शिव जाइये ॥१॥
ॐ ह्रीं द्वादशविध-उत्तमतपोधर्मांगाय अर्घ्य निर्वः स्वाहा। श्री दशलक्षण मण्डल विधान
बेसरी छन्द
जिन-गुण-सम्पति है तप मीता, त्रेसठ वास होय जिन गीता। भिन-भिन तिथियन में सुखदाई, यह तप अनशन जजि गुणगाई॥२॥ ॐ ह्रीं जिनगुणसंपत्ति-तपोधर्मांगाय अर्घ्य निर्व॰ स्वाहा। कर्म क्षपण तप के उपवासा, इकसौ अड़तालिस जिन भाषा। भिन-भिन तिथियन में सुखदाई, यह तप अनशन जजि गुणगाई॥३॥ ॐ ह्रीं कर्मक्षपण-तपोधर्मागाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। चाल जोगीरासा
सिंह निःक्रीड़ित तप दिन सौ, अरु जान सतत्तरि भाई। तिनमें इकसौ जानि पैंतालिस वास कहै सुखदाई॥
बाकी बत्तिस जानि पारणा, यह विधिजिन धुनि माँहि। यह अनशन तप जानि जजौं, मैं अर्घ लेय हित ठाहीं ॥४॥ ॐ ह्रीं सिंहनिष्क्रीड़ित-तपोधर्मांगाय अर्घ्य निर्व॰ स्वाहा। सर्वतोभद्र तपस्या के दिन एक सैकड़ा जानों।
हैं उपवास पचत्तर अद्भुत पारण पचविस मानों।॥ इसकी विधि भिन-भिन जिन भासी सो तप अनशन गाया। अर्घ लेय मैं पूजों मन वच काय भक्ति जुत भाया ॥५॥ ॐ ह्रीं सर्वतोभद्र-तपोधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वः स्वाहा। महा सर्वतोभद्र बड़ो तप दिन दोसै पैताली।
इकसौ छिनवे वास कहे जिन पारण गिन नव चाली॥
ताकी विधि जिनशासन में लखि विधिजुत करता भाई। यह अनशन तप जानि जजौं मैं अर्घ लेय हितदाई ॥६॥ ॐ ह्रीं महासर्वतोभद्र-तपोधर्मांगाय अर्घ्य निर्वः स्वाहा। लघु निष्क्रीड़ित के दिन जिन धुनि बीसी चार कहे हैं। तिनमें बीस जु कहे पारणा साठि उपास लहे हैं ॥ करने की विधि जिन धुनि में लखि ताको करिये भाई। यह तप अनशन जानि जजौं मैं अर्घ आनि सुखदाई ॥७॥ ॐ ह्रीं लघुनिष्क्रीड़ित-तपोधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व॰ स्वाहा। = श्री दशलक्षण मण्डल विधान =
बेसरी छन्द
नव पारण उपवास पचीसा, दिन चौतीस कहे जगदीशा।
मुक्तावलि तप विधि जिन गाई, यह अनशन तप जजि सुखदाई॥८॥ ॐ ह्रीं मुक्तावलि-तपोधर्मागाय अर्घ्यं निर्व॰ स्वाहा। मास मास के छह उपवासा, एक वरष दुइ सत्तरि खासा। यह कनकावलि विधिश्रुतगाई, यह तप अनशन जजि सुखदाई॥९॥ ॐ ह्रीं कनकावलि-तपोधर्मागाय अर्घ्यं निर्व॰ स्वाहा। सो अनशन पारन उनईसा, इकसौ उनइस दिन शुभ दीसा।
जिनभाषित आचामल भाई, यह अनशन तप जजि सुखदाई॥१०॥ ॐ ह्रीं आचाम्ल-तपोधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व॰ स्वाहा। चौबिस वास पारना चौई, सब दिन अड़तालीस गिनोई।
तपजु सुदर्शन विधि श्रुत जानो, यह अनशन तप जजि सुखदानो॥११॥ ॐ ह्रीं सुदर्शन-तपोधर्मागाय अर्घ्यं निर्व॰ स्वाहा। एक वरष तक वास करंता, उत्तम तप जिनवाणि भणंता।
ताके भेद बहुत हैं भाई, यह अनशन तप जजि सुखदाई॥१२॥ ॐ ह्रीं अनशन-तपोधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व॰ स्वाहा। भूख प्रमाण थकी लघु खइये, सो अवमौदर तप बरनइये। यह तप विधि भूधर१ पवि२ माना, सो मैं जजौं अर्घकर आना॥१३॥ ॐ ह्रीं अवमौदर्य-तपोधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व॰ स्वाहा। आज इसी विधि भोजन पइये, तो हम लेय नतर थिर रहिये। ऐसी विधि परतिज्ञा ठानै, सो तप जजौं कर्म गिरि भानै॥१४॥ ॐ ह्रीं व्रतपरिसंख्यान-तपोधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व॰ स्वाहा। त्यागै इक दुइ त्रय रस भाई, चार पाँच षट् तजि करि खाई। ऐसो रस परित्याग सु ठानै, सो तप जजौं कर्म गिरि भानै॥१५॥ ॐ ह्रीं रसपरित्याग-तपोधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व॰ स्वाहा।
१. भूधर-पर्वत। २. पवि-वज्र।
श्री दशलक्षण मण्डल विधान
आसन दिढ़ भू सोधि करावै, थिरता भजै सु तन न हिलावै। शय्यासन तप या विधि ठानै, सो तप जजौं कर्म गिरि भानै॥१६॥ ॐ ह्रीं विविक्तशय्यासन-तपोधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। काय कसै मन आनंद पावै, सो तप काय-कलेश कहावै। शोक हरै सुख करै महानो, सो तप जजौं कर्मगिरि भानो॥१७॥ ॐ ह्रीं कायक्लेश-तपोधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। अडिल्ल छन्द
मुनि को जो परमादवशी दूषण लगै।
तत्क्षण गुरुपै जाय जु प्रायश्चित मंगै॥
जो आचारज दण्ड देय सो लेय ही।
तप प्रायश्चित जजौं अर्घ शुभ देय ही॥१८॥
ॐ ह्रीं प्रायश्चित-तपोधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। देव धर्म गुरु और थान जो पूज हैं।
तीरथ अतिशय सिद्धक्षेत्र अघधूज हैं॥
तिनकी विनय अनूप करे तजि मानजी।
सो तप विनय विचार जजौं शिवदानजी॥१९॥
ॐ ह्रीं विनय-तपोधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। जो मुनि को मन चलत तथा तप करत ही।
उपजै तन में खेद कर्मबलतें सही॥
तो मुनि के करि पांव चम्पिये जो सुधी।
सो तप वैय्यावृत्य जजौं नाशक कुधी॥२०॥
ॐ ह्रीं वैयावृत्य-तपोधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। जिन धुनि बांचै सुनै हरष करि चिंतवै।
धरि जिनकी आम्नाय पाप मलको चवै॥
सो तप है स्वाध्याय ज्ञान उर लावनो।
सो यह तप मैं जजौं स्वर्गसुख पावनो॥२१॥
ॐ ह्रीं स्वाध्याय-तपोधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। श्री दशलक्षण मण्डल विधान
काय ममत को त्याग यतीश्वर थिति करै।
काय त्याग तप धार कर्म अरि मद हरै।।
तप व्युत्सर्ग महान् जान मनभानो।
सो मैं पूजों अर्घ धारि कर पावनो।।२२।।
ॐ ह्रीं व्युत्सर्ग-तपोधर्मागाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। मन वच काया एक थान थिरि लाइये।
आरत रौद्र कुभाव सबै ही ढाइये।।
या वपुतैं जिय भिन्न शुद्ध जानै सही।
सो तप ध्यान अनूप पूजि लूँ शिवमही।।२३।।
ॐ ह्रीं ध्यान-तपोधर्मांगाय अर्घ्यं निर्व० स्वाहा। इमि धारि तप के भेद बारह सकल कर्म विनाशियो। यह कर्म भूधर नाश कारण वज्रसम जिन भाषियो।। जे जीव चाहें तरन भवदधि, ते लहैं तप सारजी। हम शक्तिहीन न कर सकत, तातें जजैं उर धारजी।।२४।। ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्मांगाय महार्घ्यं निर्व० स्वाहा।
अथ जयमाला
दोहा
तप तारै भव उदधिसौं, टारै पाप असाधि।
धेरै महासुख थल विषै, देहै ध्यान समाधि।।१।। बेसरी छन्द
तप ही सार धरम है भाई, तप ही तैं मुनिवर शिव पाई। सिद्धक्षेत्र जे सिद्ध सधे हैं, ते सब पहले तपहि भजे हैं ।।२।। तप भव उदधि धरण नवकाया, तप को जस गणधर ने गाया। ये तपही जगजिन सुखदाई, तात मात स्वामी तप भाई ।।३।। तप को तो तीर्थंकर ध्यावैं, तप बिन मोक्ष कभी नहिं पावैं। तप शिव महल तनों मगजानो, तप ही तैं सब कर्म हरानो ।।४।। श्री दशलक्षण मण्डल विधान
तप-सा तीर्थ और नहिं कोई, तपही तारन सब विधि होई। तप शिव वाट दिखावन दीवा, तपही तैं सुख होय अतीवा ॥५॥ तपतैं इन्द्री मन-भट हारै, तप निज बलतें मोह निवारै। तप को कायर जिय नहिं पावै, तप को महत पुरुष उमगावै ॥६॥ अविचल तपतैं सुख बहु होई, तपतैं लच्छि अखै पुनि जोई। तपतैं खानपान परमाना, तपही तैं रस बिन सब खाना ॥७॥ दिढ़ आसन तन तपतें जानों, काय कष्टतैं जिय सुख जानों। तप ही लगे पाप को धोवै, तपतैं विनय भाव उर होवै॥८॥ धरमी काय तनी सुश्रूषा, तप ही करवावे अघ लूसा।
शास्त्र पठन है तप सुखकारा, यातें होवै वपुतैं न्यारा ॥९॥ तप ही मन इन्द्रिय वश आनै, ध्यान धरत वसु कर्म हरानै। यातें तप लागत हैं प्यारा, शुद्ध भावतें है अघ छारा ॥१०॥ तप मेटत भव ताप को, शान्त भाव दिढ़ होय।
हरै भरम देवै धरम, सो तप पूजौं लोय ॥११॥
ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्मांगाय पूर्णार्थं निर्वः स्वाहा।
उत्तम त्याग धर्म पूजा
चौपाई
त्याग धरम में ममत न कोई, त्याग धरम सुरतरु अवलोई। वांछा, त्याग धरम में नाहीं, सो वृष थापि जजौं इस ठाहीं ॥१॥ ॐ ह्रीं उत्तमत्यागधर्म ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्। आह्वाननम् । ॐ ह्रीं उत्तमत्यागधर्म ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। स्थापनम् ॐ ह्रीं उत्तमत्यागधर्म ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। सन्निधिकरणम् । नीर शुभ क्षीरदधि सार सो लायजी।
साधु चित तुल्य निर्मल सुमन भायजी ॥
कनक झारी भरी भक्ति मन लाइयो।
त्याग धर्म जजौं स्वर्ग-शिव-सुख दाइयो ॥२॥
ॐ ह्रीं उत्तमत्यागधर्मांगाय जन्मजरामृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वः स्वाहा। श्री दशलक्षण मण्डल विधान
चन्दनादि गन्ध सार नीर में रलाइयो। अमर सौरभ थकी भक्ति भरमाइये ॥
कनक झारी भरी भक्ति मन लाइयो।
त्याग धर्म जजौं स्वर्ग-शिव-सुख दाइयो ॥३॥ ह्रीं उत्तमत्यागधर्मागाय संसारताप-विनाशनाय चन्दनं निर्व० स्वाहा। तन्दुलं समुज्वलं जु अक्षतं सुहायजी। खण्ड बिन सोहने विलोकि हरषायजी॥
थाल कंचन भरौं भाव शुभ लाइये।
त्याग धर्म जजौं स्वर्ग-शिव-सुख दाइयो ॥४॥ ह्रीं उत्तमत्यागधर्मागाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वः स्वाहा। पुष्प नाना प्रकार गन्धजुत सारजी।
कल्पवृक्षादि के हेम थाल धारजी ॥
माल करि सोहनी भक्ति उर लाइयो।
त्याग धर्म जजौं स्वर्ग-शिव-सुख दाइयो ॥५॥ ह्रीं उत्तमत्यागधर्मांगाय कामबाणविध्वंशनाय पुष्पं निर्व० स्वाहा। लाय नैवेद्य बिन खेद अति सोहना।
मोदकादि सरल सार धार मन मोहना ॥
स्वर्ण भाजन विषै भक्ति भर लाइयो।
त्याग धर्म जजौं स्वर्ग-शिव-सुख दाइयो ॥६॥ ह्रीं उत्तमत्यागधर्मांगाय क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्व० स्वाहा। रत्नमय दीप कर ज्योति परकाशिया।
मोह अन्धकार तासु तेजतैं विनाशिया॥ हेमथाल धारि भक्तिभाव चित्त लाइया। त्याग धर्म जजौं स्वर्ग-शिव-सुख दाइयो ॥७॥ ह्रीं उत्तमत्यागधर्मांगाय मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्व० स्वाहा।
अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3105.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ ३०२ से ३०८