श्री चौबीसी समुच्चय पूजन | Shri Chaubisi Samucchay Pujan

गीतिका

पंचकल्याणक सुपूजित, ऋषभ आदि जिनेश्वरा।
वर्तमान इस क्षेत्र में, विभु धर्म-तीर्थ प्रगट करा॥
पूजन करूँ अति भक्ति से, उपकार परम विचारि के।
बोधि समाधि प्राप्त हो, यह भाव उर में धारि के ॥
ॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशति जिनसमूह अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् ।
ॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशति जिनसमूह अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् ।
ॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशति जिनसमूह अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम् ।

रोला

भव-भव में प्रभु जन्म मरण करि बहु दुख पाया।
दर्शन पाकर आज देव ! अमरत्व लखाया ॥
समता जल ले पूजूँ ध्याऊँ हे अविकारी।
ऋषभादिक चौबीस जिनेश्वर मंगलकारी ॥
ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि चतुर्विंशतिजिनेभ्यो जन्म जरा मृत्यु विनाशनाय जलं निर्व… ।
क्षमा भाव धरि क्रोधादिक पर प्रभु जय पाई।
आत्म शान्ति की युक्ति दिव्यध्वनि से दरशाई ।।
क्षमा भाव चन्दन ले पूजूँ हे अविकारी ॥ ऋषभादिक. ॥

ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि चतुर्विंशतिजिनेभ्यो संसारताप विनाशनाय चंदनं निर्व. स्वाहा।

क्षत् भावों में फँसकर नहिं संसार बढ़ाना।
नाथ इष्ट है तुम सम ही अक्षय पद पाना॥
आत्म भावना अक्षत ले पूजूँ अविकारी ॥ ऋषभादिक. ॥

ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि चतुर्विंशतिजिनेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।

प्रभु प्रसाद से काम सुभट क्षण में विनशाऊँ।
भाऊँ ब्रह्म स्वरूप सहज आनन्द प्रगटाऊँ ॥
जजूँ पुष्प निष्काम भावमय ले अविकारी॥ऋषभादिक. ॥

ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि चतुर्विंशतिजिनेभ्यो कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्व. स्वाहा।

चपल इन्द्रियों पर जय पाकर तृप्ति पाऊँ।
निजानन्द रस आस्वादी हो क्षुधा मिटाऊँ ॥
सहज तृप्त निर्वाछक हो पूजूँ अविकारी ॥ ऋषभादिक .।।

ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि चतुर्विंशतिजिनेभ्यो क्षुधारोग विनाशनाय नैवैद्यं निर्व. स्वाहा।

जिनवाणी सुन भेदज्ञान कर मोह तजूँ मैं।
अन्तर्मुख हो परमभाव निज सहज लखूँ मैं ।।
निर्मोही हो पूजूँ ध्याऊँ हे अविकारी ॥ ऋषभादिक. ।।

ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि चतुर्विंशतिजिनेभ्यो मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्व. स्वाहा।

द्रव्य भाव नो कर्मों से शुद्धातम न्यारा।
अहो आपकी साक्षी में प्रत्यक्ष निहारा ।।
कर्म कलंक नशाऊँ पूजूँ हे अविकारी ॥ ऋषभादिक. ।।

ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि चतुर्विंशतिजिनेभ्यो अष्टकर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।

हो निरीह निज से ही निज में शिवफल पाया।
नित्य मुक्त आतम परमातम सम दर्शाया ॥
ध्याऊँ आत्म स्वरूप सहज पूजूँ अविकारी ॥ ऋषभादिक. ॥

ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि चतुर्विंशतिजिनेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।

अरे! धूल सम जग वैभव क्षण में ठुकराया।
अन्तर्मग्न हुए अनर्घ्य निज वैभव पाया।

जजूँ अर्घ्य ले शुद्ध भावमय हे अविकारी ॥ऋषभादिक. ।।

ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि चतुर्विंशतिजिनेभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

जयमाला

दोहा

सहज भाव से पूजकर, गाऊँ शुभ जयमाल।
ध्याऊँ ध्येय स्वरूप निज, कटे कर्म जंजाल ।।
(भुजंगप्रयात, तर्ज-मैं हूँ पूर्ण ज्ञायक…)
ऋषभनाथ पूजूँ महासुक्खकारी, अजितनाथ वन्दूँ करम रिपु संहारी।
सम्भव जिनेश्वर जजूँ शम प्रदाता, नमूँ नाथ अभिनन्दनं शिव विधाता ।।
सुमति पद्मप्रभ अरु सुपारस को वंदन, अहो चन्द्रप्रभ जिन भजूँ दुख निकन्दन ।
श्री पुष्पदंत सु शीतल जिनेश्वर, नमूँ भक्ति से पूज्य श्रेयांस जिनवर ॥
प्रथम बालयति वासुपूज्य सुस्वामी, करममल विघातक विमल जिन नमामी ।
अनन्त जिनेश्वर सुगुणऽनन्त धारी, नमूँ धर्मनाथं धरम पथ प्रचारी ॥
जजूँ शान्तिनाथं परम शान्तिदायक, जयतु कुन्थु जिनवर अहिंसा विधायक।
श्री अर जिनेन्द्रं धरम नीति धारी, नमूँ मल्लि जिनवर परम ब्रह्मचारी ॥
मुनिसुव्रतं नमि तथा नेमिनाथं, नमूँ पार्श्वनाथं श्री वीरनाथं।
महाभक्ति से नाथ गुणगान करके, धरम तीर्थ पाऊँ स्वपद दृष्टि धरिके ।।
न लौकिक फलों की प्रभो कामना है, न विषसम कुभोगों की कुछ वासना है।
रहो आप आदर्श निजपद को ध्याऊँ, कि साधन ही क्या? साध्य भी निज में पाऊँ ।।

घत्ता

जय जय अविकारी, शिवसुखकारी, तीर्थेश्वर चौबीस भला।
जो प्रभु गुण गावें, मोह नशावें, पावें केवलज्ञान कला ॥
ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि चतुर्विंशतिजिनेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये जयमालाऽर्घ्यं नि.

सोरठा

पूजें जिनपद सार, ध्यावें निज शुद्धात्मा।
सो पावें भव पार, त्रिविध कर्ममल नाशिके।।
।। पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि ॥
तत्त्व के आराधक कभी दुखी नहीं होते हैं।
जो आत्मा को भूलता है, वही क्रोध करता है।
स्वाधीन सुख स्वाधीन ज्ञान के द्वारा ही सम्भव है।
कषायों का फल दुख है और ज्ञान का फल सुख है।


Artist: रवींद्र जी आत्मन
स्रोत: जिनेन्द्र आराधना संग्रह