भव भोगों से होकर विरक्त, प्रभु हुए स्वयं तुम आत्ममगन,
प्रगटा तब केवलज्ञान सूर्य, फिर रहे नहीं विधि के बंधन ।
तीर्थंकर हो जग त्राण किया, तुमने पाया नव अभिनन्दन,
ऋषभादि चतुर्विंशति जिनवर, शतशतप्रणाम शतशतवंदन ।
ॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशति जिनसमूह ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशति जिनसमूह ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशति जिनसमूह ! अत्र मम् सन्निहितो भव भव वषट् ।
भवभव में भटक रहा भगवन, जीवन भारी दुःखदायी है,
कर दर्शन नाथ तुम्हारा यह, मुझको मेरी सुधि आई है ।
मिट जाये मेरा जन्म मरण, जल से करता हूँ मैं अर्चन,
ऋषभादि चतुर्विंशति जिनवर, आदर्श रहो मेरे प्रतिछन ।
ॐ ह्रीं श्रीवृषभादि चतुर्विंशति जिनेभ्यो जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
भवताप कहूँ क्या प्रभु तुमसे, मुझसे न सहन अब होता है,
इसलिए शरण में आया हूँ, तब पूजन भव दुःख खोता है ।
जग का संताप मिटे मेरा, चंदन से करता हूँ अर्चन,
ऋषभादि चतुर्विंशति जिनवर, आदर्श रहो मेरे प्रतिछन ।
ॐ ह्रीं श्रीवृषभादि चतुर्विंशति जिनेभ्यो संसारताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।
अक्षय न यहाँ कुछ बसुधा पर, जो कुछ है सब क्षय हो जाता,
इसदुःख से बहुत व्यथित व्याकुल, मैं त्राण नहीं किंचित पाता ।
अक्षय पद मैं अब पा जाऊँ, अक्षत से करता हूँ अर्चन,
ऋषभादि चतुर्विंशति जिनवर, आदर्श रहो मेरे प्रतिछन ।
ॐ ह्रीं श्रीवृषभादि चतुर्विंशति जिनेभ्यो अक्षयपद प्राप्तयें अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।
यह काम बड़ा बलशाली है, तन-मन को आकुल कर देता,
विषयों के वश में पर प्राणी, उसकी बुद्धि को हर लेता ।
तुम कामजयी हो इसीलिए, पुष्पों से करता हूँ अर्चन,
ऋषभादि चतुर्विंशति जिनवर, आदर्श रहो मेरे प्रतिछन ।
ॐ ह्रीं श्रीवृषभादि चतुर्विंशति जिनेभ्यो कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
है क्षुधा जगत् में महारोग, जिसका न अन्त हो पाया है,
युग-युग से इसके वश होकर, मैंने अखाद्य सब खाया है ।
तुम इस पर विजयी हुए नाथ, नैवेद्य चढ़ा करता अर्चन,
ऋषभादि चतुर्विंशति जिनवर, आदर्श रहो मेरे प्रतिछन ।
ॐ ह्रीं श्रीवृषभादि चतुर्विंशति जिनेभ्यो क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
कुछ सरल बात है नहीं मोहतम, प्राणों से यह कढ़ जाये,
तुम सा वैरागी बनकर ही, अपने स्वरूप को पा जाये ।
तुम वीतराग हो निर्मोही, मैं दीपक से करता अर्चन,
ऋषभादि चतुर्विंशति जिनवर, आदर्श रहो मेरे प्रतिछन ।
ॐ ह्रीं श्रीवृषभादि चतुर्विंशति जिनेभ्यो मोहाँधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
यह कर्मों की माया सारी भव भव में इसने भरमाया,
कुछ शुभ संयोग मिला मुझको, मैं शरण तुम्हारी हूँ आया ।
तुमने कर्मों को जीत लिया, मैं धूप चढ़ा करता अर्चन,
ऋषभादि चतुर्विंशति जिनवर, आदर्श रहो मेरे प्रतिछन ।
ॐ ह्रीं श्रीवृषभादि चतुर्विंशति जिनेभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
जीवन की उलझन ने मुझको, उलझन में इतना उलझाया,
सुलझा न सका उसकोअब तक, कब शिवफल तुमसा प्रभु पाया ।
तुम मुक्त हुए इस उलझन से, फल से करता हूँ मैं अर्चन,
ऋषभादि चतुर्विंशति जिनवर, आदर्श रहो मेरे प्रतिछन ।
ॐ ह्रीं श्रीवृषभादि चतुर्विंशति जिनेभ्यो मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
मिट जावे मेरा जन्म मरण, संताप न हो अक्षय पद हो,
निष्काम रहूँ न विभुक्षा हो, ना मोह न यह विधि भयप्रद हो ।
बन जाऊँ जीवनमुक्त नाथ, यह अर्घ्य चढ़ा करता अर्चन,
ऋषभादि चतुर्विंशति जिनवर, आदर्श रहो मेरे प्रतिछन ।
ॐ ह्रीं श्रीवृषभादि चतुर्विंशति जिनेभ्यो अनर्घपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
मैं उर में लेकर भक्ति भाव से, प्रभुवर करता हूँ प्रणाम,
मिथ्यातम से मैं दूर रहूँ, बन जाऊँ सम्यक् ज्योति धाम ।
तुम दर्शन पूजन से भगवन्, हो जाये निज दर्शन ललाम,
तुम सा बन जाऊँ इसीलिए, करता हूँ मैं सादर प्रणाम ।
हे ऋषभनाथ हे आदिनाथ, मुझ पर अब तो करुणा कर दो,
प्रभु अजितनाथ मेरे उर का, चिर संचित सब संशय हर दो ।
सम्भव जिन मुझ पर हो दयालु, सब काम असंभव बन जावे,
भज अभिनन्दन प्रभु को निश दिन, नवजीवन अभिनन्दन पावे ।
श्री सुमति सुमति मेरी कर दो, मिथ्यामति हो न कभी मेरी,
भव पार करो प्रभु पदमप्रभु, अब और न हो पावे देरी ।
भगवन् सुपार्श्व मेरे भव के, सब पाप नाश कर दो सत्वर,
चन्द्रप्रभु मेरे इस उर का, सब शाप-ताप हरलो अघहर ।
श्री सुविधि नाथ दो सुविधि बता, मेरे टूटे सब विधि बंधन,
संतप्त हृदय शीतल करदो, शीतल जिन मेरा सुन क्रन्दन ।
हे श्रेयनाथ दो मुझे श्रेय, भव बाधा का कर दूँ भंजन,
मेरे उर के दृग खुल जावें, हे वासुपूज्य दो वह अंजन ।
श्री विमल विमल पद दो मुझको, युग-युग से भूला भटका हूँ,
करदो अनन्त सब कष्ट अन्त, भव भव में आकर अटका हूँ ।
पथ धर्मनाथ अब बतलादो, शाश्वत सुख मुझको मिल जाये,
प्रभु शांतिनाथ मेरे उर में, आ शान्ति निराकुल छा जाये ।
हे कुन्थुनाथ होकर कृपालु, मुझपर भी तनिक कृपा करदो,
श्री अरहनाथ अब तो मेरे, वसु अरि का बल विक्रम हर दो ।
मेरे मन से यह मोह मल्ल, हे मल्लिनाथ अब दूर करो,
मुनि सुव्रतनाथ सुनो विनती, तृष्णा मेरी चकचूर करो ।
नमिनाथ तुम्हारे चरणों में, मैं नमन कर रहा दुखियारा,
हे नेमिनाथ अब बाँह गहो, उद्धार करो मैं हूँ हारा ।
तुम नाथ अनाथों के अपने ही, पारसनाथ सुनो मेरी,
शिव धाम मुझे दो वर्द्धमान, मेटो मेरी भव भव फेरी ।
‘कुमरेश’ तुम्हारा दास प्रभो, अब तो मुझ पर करुणा करदो,
बन जाये यह जीवन सुखमय, मुझको प्रभुवर ऐसा वर दो ।
ॐ ह्रीं श्रीवृषभादि चतुर्विंशति जिनेभ्यो अनर्घपद प्राप्तये जयमालार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
प्रेरणा
जो भक्ति भाव से प्रेरित हो, पूजन करता है जिनवर की,
उसको सुधि आ जाती अपनी, ममता विसरा जाती परकी ।
जग का जंजाल न भाता है, तृष्णा मिट जाती है उर की,
वह मंजिल अपनी पा जाता, या गैल यहाँ शिवपुर की ।
इत्याशीर्वादः
Artist: श्री कुमरेश जी
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ १११ से ११४
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